सोमवार, 11 मई 2015

कबीर की जाति
(कंवल भारती)
मैंने 1968 के आसपास ‘वैदिक संस्कृति में स्त्री और शूद्र’ नाम से एक छोटी सी किताब लिखी थी, जो तथ्यात्मक से ज्यादा उत्तेजनात्मक थी। 1971 में मैं उसके प्रकाशन के लिए चन्द्रिकाप्रसाद जिज्ञासु के पास लखनऊ गया था। पाण्डुलिपि को सरसरी निगाह से देखने के बाद उन्होंने मुझसे कहा था, ‘इसमें परिपक्वता दिखाई नहीं है। अगर तथ्यों के साथ बात कहोगे, तो विजन स्पष्ट होगा।’ फिर उसके बाद उन्होंने एक वाकया सुनाया कि एक बार एक आर्य समाजी पंडित उनके पास आकर बोला, ‘आपको इस विषय पर एक किताब छापना है।’ जिज्ञासुजी ने पूछा, ‘क्या विषय है?’ उस आर्य समाजी पंडित ने कहा, ‘विषय यह है कि बुद्ध और उनके धर्म की वजह से भारत गुलाम हुआ है और देश में यौनाचार बढ़ा है।’ जिज्ञासु जी ने उस पंडित को जवाब दिया, ‘आपका दोषारोपण निराधार है। बहुजन कल्याण प्रकाशन से ऐसी किताबें नहीं छापी जाती हैं। इस घटना का उल्लेख उन्होंने अपनी एक किताब में भी किया है। यह घटना मुझे ‘फारवर्ड प्रेस’ के साहित्य वार्षिकी अंक-2015 को देखकर याद आ गई। ‘फारवर्ड प्रेस’ की बहुजन वैचारिकी को देखते हुए उसमें कबीर पर कमलेश वर्मा का लेख नहीं छपना चाहिए था। अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता अपनी जगह सही हो सकती है, पर ‘फारवर्ड प्रेस’ अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का मंच नहीं है। वह एक खास वैचारिकी की पत्रिका है, जिसकी स्थापना उसका मिशन भी है।
मुझे कमलेश वर्मा के लेख ‘कबीर की जाति’ में भी तथ्यात्मक अपरिपक्वता दिखाई दे रही है। बहुजन वैचारिकी की दृष्टि से तो यह लेख लेखक की समझ पर प्रश्न चिह्न लगाता ही है, प्रत्युत दलित विमर्श की दृष्टि से भी कबीर का उन्होंने गलत अध्ययन किया है। वे दलित को अछूत के अर्थ में लेते हुए कहते हैं कि कबीर अछूत नहीं थे। उनके अनुसार, ‘कबीर ने स्वयं को कहीं भी अछूत नहीं कहा है। यदि कबीर में ब्राह्मण रक्त था, तब भी, यदि वे जुलाहा परिवार में जन्मे थे, तब भी- वे अछूत नहीं थे।’
कमलेश वर्मा दलित और अछूत के शब्दजाल में उलझकर कबीर की उस पूरी विचारधारा के विरोध में चले गए हैं, जिसने भक्तिकाल में ब्राह्मणवाद के खिलाफ सबसे निर्णायक लड़ाई लड़ी थी। कबीर ने स्वयं को अछूत नहीं कहा है, तो दलित भी नहीं कहा है। इससे कोई फर्क भी नहीं पड़ता है, फर्क इस बात से पड़ता है कि ब्राह्मण समाज की नजर में कबीर क्या थे? क्या ब्राह्मण समाज उनसे छूतछात करता था कि नहीं? अगर करता था, तो वे अछूत थे कि नहीं? अब अगर कोई यह कहे कि ब्राह्मण समाज कबीर से छूतछात नहीं करता था, तो वह हद दर्जे का अज्ञानी है, तब छूतछात के खण्डन वाले कबीर के पद भी कोई मायने नहीं रखते, क्योंकि जब कबीर ने छूतछात को अनुभव ही नहीं किया, तो वे कैसे कह सकते थे-‘काहे को कीजै पाण्डे छोति बिचार, छोति ही तैं उपजा सब संसार।’
कमलेश वर्मा यह सामान्य बात नहीं जान सके कि ‘दलित’ शब्द सातवें दशक में हिन्दी में आया और ‘अछूत’ शब्द दलितों का दिया हुआ नहीं है। किसी दलित ने अपने को अछूत नहीं कहा है, और कहेगा भी क्यों, जबकि वह अछूत है ही नहीं। कबीर स्वयं को क्यों ‘अछूत’ कहेंगे? यह तो ब्राह्मण समाज था, जो उन्हें अछूत मानता था। इसका प्रमाण हमें ‘भक्तकल्पद्रुम’ में मिलता है। उसमें लिखा है- ‘इस बात की पुकार, कि कबीर अपने को रामानन्द का चेला कहता है, रामानन्दजी तक पहुॅंची, रामानन्दजी ने आज्ञा दी कि कबीर को पकड़ लाओ। हमने कब उनको चेला किया है? कबीरजी गए, रामानन्दजी ने परदा डलवा कर वृतान्त पूछा।’ (पृष्ठ 316) अगर कबीर को अछूत नहीं समझा जा रहा था या बकौल कमलेश वर्मा कबीर अछूत नहीं थे, तो परदा डलवाकर बात करने का क्या मतलब है? इतनी बात तो वह जानते ही होंगे कि जिसे देखना नहीं होता है, परदा वहीं डलवाया जाता है।
कमलेश वर्मा का कहना है कि पिछड़ी जातियाॅं अस्पृश्य नहीं रही हैं, इसलिए कबीर दलित नहीं थे। यह अस्पृश्यता का वैज्ञानिक सिद्धान्त नहीं है और न यह अनुसूचित जातियों का वैज्ञानिक मापदण्ड है। इधर कई नई जातियाॅं अनुसूचित जातियों में शामिल की गई हैं, जो अस्पृश्यता की शिकार जातियाॅं नहीं हैं, लेकिन वे ब्राह्मणवाद से पीडि़त जातियाॅं जरूर हैं। ब्राह्मणों ने सिर्फ दलितों का ही मन्दिर-प्रवेश वर्जित नहीं किया था, बल्कि यह प्रतिबन्ध शूद्र पर भी लागू किया था, जिन्हें पिछड़ी जाति कहा जाता है। आज भी कुछ मन्दिरों में ‘शूद्रों का प्रवेश निषेध’ का बोर्ड लगा मिल जायगा। अगर यह अस्पुश्यता नहीं है, तो फिर क्या है? हिन्दू समाज में चमार-कोरी अछूत जातियाॅं मानी जाती हैं। कोरी और जुलाहा एक ही जाति है, कोरी हिन्दू धर्म में है और जुलाहा मुस्लिम समाज में आता है। जुलाहा आज भी मुसलमानों में अछूत माना जाता है। कमलेश वर्मा का यह कथन सही है कि इस्लाम में अस्पृश्यता की अवधारणा नहीं है। लेकिन मुस्लिम समाज में मौजूद अस्पृश्यता को वे क्यों नहीं देख सके? अगर वे इससे इन्कार करते हैं, तो बहुत बड़े भ्रम में हैं। मुस्लिम समाज में सवर्ण मुस्लिम ‘अशराफ’ और दलित मुस्लिम ‘अजलाफ’ कहलाता है। मुसलमानों में जुलाहा को निम्न जाति का मुसलमान माना जाता है। अगर कमलेश वर्मा भारत में धर्मान्तरण के इतिहास पर एक नजर डाल लेते, तो उन्हें इस सवाल का भी जवाब मिल जाता कि कबीर का परिवार हिन्दू से इस्लाम में धर्मान्तरित हुआ था और उनके पूर्वज कोरी थे, जो अनुसूचित जाति में आती है। उनके पूर्वजों ने चाहे जिन परिस्थिति में धर्मान्तरण किया हो, पर उनकी सामाजिक हैसियत में कोई बदलाव नहीं आया था। वे मुस्लिम की हैसियत से भी ब्राह्मण और मुस्लिम दोनों समाजों में इज्जत से नहीं देखे जाते थे। ब्राह्मण और मुल्ला से उनकी लड़ाई यों ही नहीं थी, वरन् उसके पीछे उन्हे सदियों से दबाकर रखने का दर्द था। कमलेश वर्मा यह सब जानते हुए भी अनजान बने हुए हैं और केवल यह साबित करने के लिए निरर्थक जाति-प्रश्न में उलझ गए हैं कि गैर दलित भी दलित साहित्य लिख सकता है, जैसे कि उनके अनुसार, कबीर ने लिखा, जो दलित नहीं थे। इसीलिए वे कहते हैं, ‘दलित विमर्श का सिद्धान्त कबीर की चैखट पर टूट जाता है कि दलित साहित्य केवल दलित ही रच सकता है।’ यह बकवास का सवाल है। जिस गैर दलित को लिखना होता है, वह लिखता है और जिसे नहीं लिखना होता है, वह सिर्फ गाल बजाता है।
कमलेश वर्मा कहते हैं कि ‘दलित विमर्श को जातिवादी वर्चस्व का घुन लग गया है’, लेकिन दूसरी ओर वे स्वयं कबीर को एक दूसरे जातिवादी वर्चस्व का घुन लगा रहे हैं, कि कबीर को पिछड़ी जाति जुलाहा घोषित करके उनकी दलितवादी व्याख्याएॅं खारिज कर देनी चाहिए। क्या खारिज करने से विमर्श बदल जाएगा? क्या दलित विमर्श की वैचारिकी पिछड़ी जाति के विमर्श की वैचारिकी से भिन्न है? अगर भिन्न है, तो किस मायने में भिन्न है? दलित और पिछड़े वर्ग को यदि मिलाकर बात करें, जो जरूरी भी है, तो वह बहुजन-विमर्श और बहुजन-साहित्य ही हो सकता है, जिसकी एक ही वैचारिकी है- वर्णव्यवस्था और जातिभेद का विरोध और समतामूलक समाज की स्थापना पर जोर। किसने कबीर को किस निगाह से देखा है, यह छोडि़ए। रामचन्द्र शुक्ल से लेकर हजारीप्रसाद द्विवेदी और पुरुषोत्तम अग्रवाल तक के कबीर वैष्णववादी हैं। इन लोगों ने एक तरह से कबीर को उनकी मौलिकता में स्थापित करने का नहीं, बल्कि उन्हें, ओशो के शब्दों में, ठोकपीट कर ठिकाने लगाने का ‘प्रायेजित काम’ किया है। धर्मवीर के कबीर भी दलित विमर्श में पूरी तरह स्वीकार्य नहीं हैं। कबीर का वर्णव्यवस्था और जातिभेद के विरोध का काव्य प्रथम रचना-कर्म नहीं है। वह पूर्ववर्ती कई शताब्दियों से चली आ रही परम्परा का अंग है, जिसकी जड़ें बौद्धधर्म में मिलती हैं। वेद, शास्त्र, कतेब, ब्राह्मणवाद, वर्णव्यवस्था और परलोकवाद के खण्डन की यह धारा आजीवकों, बुद्ध, अश्वघोष, सिद्धों और नाथों से होती हुई कबीर तक पहुॅंची थी। कबीर इसी परम्परा आते हैं। इस पूरी परम्परा को एक ही नाम दिया जा सकता है- ‘बहुजन-चिन्तन-परम्परा’। यह न जातिवादी है, न वर्णवादी, और न हिन्दूवादी है, मुस्लिमवादी। इसलिए क्षत्रिय बुद्ध भी इसी परम्परा में हैं और अश्वघोष ब्राह्मण भी। इसीलिए कबीर ने अपने को ‘न हिन्दू-न मुसलमान’ कहा है। और, मेरी दृष्टि में बहुजन अवधारणा भी यही होनी चाहिए।

(11-5-2015)

शनिवार, 2 मई 2015


1927 में प्रकाशित कैथरीन मेयो की बहुचर्चित पुस्तक मदर इंडिया से उसका ‘परिचय’ यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ. यह वह पुस्तक है, जिसने पहली बार भारत में दासप्रथा का खुलासा किया गया था. भारतीय राजनीति में इस किताब ने इतनी जबरदस्त दस्तक दी थी कि लालपत राय को इसके जवाब में अनहैप्पी इंडिया के नाम से किताब लिखनी पड़ गयी थी. डा. आंबेडकर ने इस किताब का जिक्र अपने कई लेखों में किया है. यह किताब की प्रस्तावना का अनुवाद है,

कलकत्ता का काली घाट
(कैथरीन मेयो)
                कलकत्ता, ब्रिटिश साम्राज्य का दूसरा बड़ा शहर, जो बंगाल की खाड़ी के शिखर पर हुगली कही जाने वाली गंगा तक फैला हुआ है। कलकत्ता, विशाल, पश्चिमी, आधुनिक इमारतों से भरापूरा, राष्ट्रीय स्मारक, पार्क, बगीचे, अस्पताल, संग्रहालय, विश्वविद्यालय, न्यायालय, होटल, कार्यालय, दुकानें, और वह सब कुछ, जो एक समृद्ध अमेरिकी शहर में होता है; और उसके उलट यह भारतीय नगर, मन्दिरों, मस्जिदों, बाजारों तथा उलझे हुए आंगनों और गलियारों से भरपूर, जो किसी तरह अपने आप बनने के बावजूद नक्शे में आयताकार दिखाई देते हैं। चौराहों और गलियों तथा बाजारों में छोटे-छोटे बुकस्टाल्स हैं, जहाँ सुस्त चाल वाले, कमजोर नजर वाले और बीमार कदकाठी के नौजवान भारतीय छात्र अपनी देशज पोशाक में किताबों में डूबे हुए, ऐसे दिखाई दे रहे हैं, जैसे लोग रूसी साहित्य पढ़ते हुए खो जाते हैं.
                समृद्ध कलकत्ता, विश्व व्यापार के लिए भारत का विशाल मुक्त द्वार, सोने-चाँदी का व्यापार, जूट का व्यापार, काटन का व्यापार, और उन सब चीजों का व्यापार, जिसकी जरूरत भारत और विश्व को एक-दूसरे से रहती है। सुरुचिपूर्ण, कृत्रिम कलकत्ता, जहाँ सभी धर्मों, सभी वर्णों और सभी प्रथाओं के सुरुचिपूर्ण और बनावटी लोग गवर्नमेंट हाउस की गार्डेन पार्टीज में जाते हैं, अपने महामहिमों को फर्शी सलाम बजाते हैं, और उन्हें प्रसन्न करने के लिए अच्छी अंग्रेजी बोलते हैं, जबकि वे अपनी चाय और बर्फ लेते हैं और सेना के बैंड को सुनते हैं।
                आप गवर्नमेंट हाउस गार्डेन से सड़क नहीं देख सकते, क्योंकि दीवालें काफी ऊॅंची हैं। किन्तु यदि आप देख सकते हैं, तो आप देखेंगे कि वह सड़क मोटर यातायात, खासकर कारों, टैक्सियों और प्राइवेट मशीनों से भरी पड़ी हैं। और कभी-कभी उनमें अकेले ही एक फिफ्थ एवेन्यूबस घूमती हुई दिखती है, जिस पर बड़े अक्षरों में लिखा होता है, ‘काली घाट
                यदि आपने ध्यान दिया हो, तो अकेली यही बस इम्पायर थिएटर के पीछे पार्क, अनेकों क्लबों, सेंट पौल केथेड्रल, बिशप हाउस के पीछे, सामान्य चिकित्सालय, और लंदन मिशन सोसाइटी संस्थान से गुजरकर चलती है, और अब वर्तमान में यह एक घनी बस्ती तक भी आकर रुकती है, जैसाकि इसके स्टापेज का विज्ञापन किया गया है।
                ‘काली घाटअर्थात् काली का स्थान, यह कलकत्ता का उद्गम शब्द है। हिन्दू देवी कालीविनाश के महान देवता शिव की पत्नी है, जिसकी पिपासा जीवों की बलि चढ़ाकर उनके रक्त से शान्त होती है। विश्व में उसका आध्यात्मिक शासन पिछले लगभग पांच हजार वर्षों से आरम्भ होता है, और लगभग चार सौ बत्तिस हजार साल के बाद तक रहेगा, ऐसा माना जाता है.
                भारत में काली के छोटे-बड़े हजारों मन्दिर हैं। कलकत्ता का काली मन्दिर ब्राह्मणों के एक परिवार की निजी सम्पत्ति है, जो तीन शताब्दियों से उनके पास है। जिनके कब्जे में आज यह है, वे सौ के करीब एक ही पिता के पुत्र हैं। उन सौ में से एक ने मुझे एक ब्राह्मण मित्र के साथ मन्दिर परिसर दिखाने की कृपा की है। मैं उसे मि. हलदार कहूँगी, क्योंकि यह उसका पारिवारिक नाम है।
                किन्तु सफेद तहमद और सफेद चोगे की वजह से, जो आम बंगाली पहिनावा है, मि. हलदार एक सुन्दर सजधज के साथ उत्तरी इटैलियन सज्जन ज्यादा लग रहे थे। उसकी अंग्रेजी परिमार्जित है और उसका आचरण पूरी तरह पसन्द आने वाला।
                उसने मुझे बताया, यह मन्दिर 590 एकड़ में फैला हुआ है. यहाँ नजदीक और दूर सब जगह से श्रद्धालु आते हैं, जिससे यहाँ हमेशा भीड़ रहती है.  वे यहाँ  पूजा करते हैं, पैसा चढ़ाते हैं। यहाँ पुरोहित को भी दक्षिणा दी जाती है। यहाँ बहुत-सारे मण्डप हैं, जो एक-दूसरे के समीप और ऊपर-नीचे हैं. इनमें मिठाईयां,  प्रतिमायें,  गेंदा के फूल, तावीज, और मन्नत का चढ़ावा बेचा जाता है। इससे भारी आय होती है।
                आते-जाते श्रद्धालुओं की भीड़ को तेजी से चीर कर आगे बढ़ते हुए मि. हलदार हमें पूरा मन्दिर दिखाते हैं। एक ऊॅंचा चबूतरा, उसकी लम्बाई और चैड़ाई को तीन तरफ से घेरते छत और स्तम्भ। एक छोर पर, एक गहरा, आधा-घेरा हुआ समाधि-स्थल, जिसमें, देवियों की धुंधली, आधी नजर आने वाली, अस्पष्ट मूर्ति। वह है, काला चेहरा, बाहर को निकली हुई जीभ और टपकता हुआ खून। उसके चार हाथों में से, एक हाथ में खून से टपकते हुए आदमी का सिर है, दूसरे हाथ में खड्ग, तीसरे में रक्त से भरा पात्र और चौथा धमकाने में उठा हुआ, खाली है। उसके पैरों की परछाईं के पास एक पुरोहित खड़ा है।
                देवी के सामने वाले एक लम्बे चबूतरे पर, स्त्री और पुरुष लेटे हुए जोर-जोर से प्रार्थना कर रहे हैं। उनमें मटरगश्ती करते हुए और लोलीपाप चूसते हुए लड़के हैं। एक सफेद बछड़ा भी भ्रमण कर रहा है, जबकि इस सबके बीच में एक श्रद्धालु वृद्ध पालथी मारकर बैठा हुआ एक मोटी किताब के आगे जोर-जोर से बुदबुदा रहा है।
                ‘वह’, मि. हलदार ने कहा, ‘हमारे हिन्दू पुराण से श्लोक पढ़ रहा है। काली का इतिहास।
                अचानक, एक कर्णभेदी मिमियाने की मार्मिक चीख जैसी आवाज आई। हम मन्दिर के छोर के पीछे की तरफ खुले बरामदे की ओर गए। वहाँ दो पुरोहित खड़े हैं, एक के हाथ में तलवार है, और दूसरा एक युवा बकरे को पकड़े हुए है। बकरे की चीख से अभी भी हवा में सिहरन भरी है। देवी के सामने बजते हुए ढोल-नगाड़े। पुरोहित ने बकरे को पकड़कर उसकी गर्दन को (अंग्रेजी के ‘V’ आकार में बने) एक खूंटे में फॅंसा दिया है। दूसरा पुरोहित अपनी तेज धार की तलवार से उस नन्ही जान का सिर काट देता है। खून की धार जैसे ही फर्श पर गिरी, देवी की मूर्ति के आगे घण्टे-घडि़याल बजने लगे और सारे पुरोहित और भक्त साथ-साथ चिल्लाए- काली! काली! काली!कुछ तो मन्दिर के फर्श पर अपने सिर पटकने लगे।
                इसी समय, एक औरत, जो बकरी की हत्या करने वाले पुरोहित के पीछे खड़ी प्रतीक्षा कर रही थी, आकर फर्श पर लेट गई और अपनी जीभ से नीचे गिरे हुए उस खून को बच्चा पैदा होने की आस  मेंचाटने लगी, तो दूसरी औरत झपट्टा मार कर उस खून पर अपना कपड़ा डाल देती है और उसे  खून में सानकर अपने वक्ष में घुसेड़ लेती है, जबकि अनजान रोगों से ग्रस्त आधा दर्जन बीमार, भयंकर कुरूप और जख्मी कुत्ते, जो अपनी भूख सहते हुए निर्जीव हो गए हैं, फर्श पर जमे हुए खून में जीवन तलाश रहे हैं।
                ‘हम यहाँ इसी तरीके से प्रतिदिन 150 से 200 तक शिशु बकरों को मारते हैं’, मि. हलदार ने कुछ गर्व के साथ कहा, ‘बलि के लिए इन शिशुओं को पूजा करने वाले लोग ही यहाँ लाते हैं।
                अब वह हमें कुछ छोटी देवियों के मन्दिरों में ले जाता है- उन छोटी देवियों में एक लाल देवी है, जो चेचक की देवी है, वह लाल जोड़े में है. यह चेचक से छुटकारा दिलाती है या नहीं, पर अफवाह है; एक अन्य प्रतिमा पांच सिरों वाले काले कोबरा सांप की है,  जिसकी ठोढ़ी के नीचे पुरोहित की नन्हीं आकृति है, इसकी पूजा वे लोग करते हैं, जो सर्प-दंश से डरते हैं.  आगे एक और प्रतिमा लाल कपीश है, जिसकी पूजा पहलवान करते हैं, जब अखाड़े में जाते हैं.  धनी व्यापारी और विश्वविद्यालय के छात्र भी इस देवता से परीक्षा में पास होने या व्यापार में घाटा न होने के लिए प्रार्थना करते हैं, आगे एक सार्वभौम देवताका चेहरा है, Alaskan totem की तरह। और उसके बाद अंत में सर्वत्र विद्यमान काली के पति शिव का लिंग चिह्न है। उन सबसे पहले, गेंदे के फूलों या टोकरियों में भरकर लाई गई लाल रंग की किसी चीज का छोटा चढ़ावा, ये दोनों चीजें मन्दिर की दूकानों पर, खरीदने के लिए उपलब्ध थीं, उसके साथ ही मन्दिर के वृषभों के गोबर से बनी पवित्र टिक्की भी बिक रही थी।
                मि. हलदार हमें एक गली में ले गए, जहाँ पंक्तियों में लगभग नंगे साधु और भिखारी बैठे थे, ज्यादातर मोटे-मुस्टन्डे और बड़े केशों वाले, और पूरे शरीर पर राख लपेटे हुए, भीख मांगते हुए। वे सभी फोटो खिंचवाने के लिए आतुर हैं। उन साधुओं ने उठ खड़े होकर फोटो खिंचवाए। एक, पागल तो एक लड़की को बुरी तरह डराते हुए, खुद हम पर ही गिर गया. उस लड़की को एक युवक खींच कर ले गया, जिसकी कलाई पर बंधा स्कार्फ का दूसरा सिरा लड़की की नन्हीं कलाई से बंधा है। ये पति- पत्नी है’, मि. हलदार बताता है, ‘ये यहाँ पुत्र के लिए प्रार्थना करने आए हैं।‘
                अब हम मन्दिर के श्मशान घाट पहुँचते हैं। एक चिता की तैयारी चल रही है। एक खुली जगह के बीच में एक आयताकार गड्ढा है। गड्ढा अभी लकडि़यों से आधा भरा है। पास में ही जमीन पर, एक खूबसूरत जवान भारतीय स्त्री लेटी हुई है, शान्त जैसे अचेत हो, उसके लम्बे काले बाल उसके चारों ओर बिखरे हुए हैं, कुछ फूल भी उनमें थे। उसका माथा, उसके हाथ और उसके पैरों के लाल रंग से पुते तलवे बताते थे कि वह सौभाग्यवती स्त्रियों में थी, यानी वह विधवा होने से बच गई थी, उसका पति जीवित था। उसके दो-तीन सम्बन्धी और एक दस वर्ष का बालक पास में ही खड़े थे, जो उदास लग रहे थे। कुछ दूरी पर एक बूढ़ी स्त्री बैठी रो रही थी। पांच या छह घुड़मक्खियों जैसे भिखारी भी वहां थे।
                अब उन्होंने लाश को उठाया और गड्ढे में लकड़ियों पर रख दिया। स्त्री का सिर घूमता है और एक हाथ लटक जाता है, जैसे उसने सोते में करवट बदली हो। लगता है, वह कुछ ही घण्टे पहले उसकी मृत्यु हुई है। उन्होंने उस पर ऊपर तक लकड़ियों का ढेर लगा दिया है। अब वह छोटा बालक, जो शायद उसका बेटा है, हाथ में जलती आग लेकर चिता के सात चक्कर लगाता है। उसके बाद वह उस आग को लकड़ियों पर फेंक देता है, लकड़ियों सुलगती हैं और धुंआ उठने लगता है. इस तरह अन्तिम संस्कार सम्पन्न होता है।
अच्छी आग से सब कुछ जल जाता है’, मि. हलदार समझाता है, ‘मन्दिर के चाकरों द्वारा चुनी गई चिता की राख को, सोने के सिक्के के साथ, जो मृतक के परिवार द्वारा दिया जाता है, मिट्टी के एक गोले में रखकर गंगा में बहा दिया जाता़ है। अब हम गंगा दिखायेंगे।
वह पुनः हमें मन्दिर से नीचे की ओर ले गया, जहाँ एक कींचड़-युक्त छोटी नदी थी, जो उसमें नहाने वाले लोगों से भरी हुई थी। मि. हलदार ने कहा, ‘यह अत्यन्त प्राचीन गंगा का अवशेष द्वार है। इसलिए यह बहुत गुणवान मानी जाती है। यहाँ हर वर्ष हजारों बीमार लोग स्नान करने आते हैं और अपनी बीमारियों से मुक्ति पाते हैं, जैसा कि अब आप यहाँ देख रही हैं। कुछ लोग अपने पापों से मुक्ति के लिए भी देवी की शरण में आते हैं और इसमें स्नान करके उनके पाप धुल जाते हैं।
 जो लोग उसमें नहा रहे थे, उन्होंने अपना स्नान खत्म करने के बाद उस पानी को न सिर्फ पिया, बल्कि अपने घुटनों पर भी मला। उसके बाद उनमें से बहुतों ने उसकी तलहटी में से अपने हाथों से गन्दगी तलाशी, और मुट्ठीभर कीचड़ निकालकर उसे सावधानी से अपनी हथेली पर रखकर उसमें कुछ ढूँढने लगे। मि. हलदार ने बताया, ‘वे चिता की इस राख में से सोने का सिक्का ढूंढ रहे हैं। उन्हें सिक्का मिलने की उम्मीद रहती है।
इसी वक्त, नदी के पुश्ते पर आगे-पीछे कुछ पुरोहित आए, हरेक तीन या चार बकरी के बच्चे लिए हुए थे, जिन्हें उन्होंने उसी नदी में स्नान कराकर उन्हें खींचते हुए वापिस मन्दिर के अहाते में ले गए, वे चीखते और छटपटाते रहे. इसी बीच उस नदी में से पानी भरकर ले जाने वाले स्त्री-पुरुषों का आना-जाना बदस्तूर जारी रहा, जो जिस रास्ते से आते थे, उसी रास्ते से गायब हो जाते थे.
हरेक बच्चा’, मि. हलदार ने कहना जारी रखा, ‘बलि देने से पहले पवित्र नदी में स्नान कराकर शुद्ध किया जाता है। जहां तक पानी लाने की बात है, वे पानी प्रसाद के रूप में लाते हैं। उसे काली के चरणों पर और उसके बाद पुराहितों के चरणों पर प्रवाहित किया जाता है।
जैसे ही मि. हलदार ने हमें मन्दिर के बाहर दीवार तक छोड़ा, मेरा ध्यान आदमी के हाथ के आकार के बराबर एक गटर जैसे होल पर गया, जो जमीन की सतह पर था। इस होल से, एक छोटे सपाट पत्थर पर, कुछ गेंदे के फूल, कुछ गुलाब-दल और कुछ सिक्के गिराए गए थे। उसे देखते ही, अचानक होल में से बहुत तेजी से गन्दा पानी बाहर आया, और एक औरत भागती हुई आई, और उसमें से एक कप से पानी लेकर पी गई।
मि. हालदार ने बताया--वह हमारी गंगा का पवित्र जल है, जो काली और पुरोहितों के चरणों पर से बहकर और ज्यादा पवित्र हो गया है। मन्दिर के फर्श से यह इसी तरह इस प्राचीन नाली से यहाँ आता है। यह आंव और आँतों के बुखार में बहुत बढि़या फायदा करता है। बीमार लोग ही यहाँ आकर पहले गंगा में स्नान करते हैं, फिर इस जल को पीते हैं। इस जल को वे अपने परिचित बीमार लोगों के लिए भी बर्तनों में भर कर ले जाते हैं।
खैर, अब हमें अपनी प्रतीक्षित मोटर मिल गई और हमने जनरल अस्पताल, बिशप हाउस, अनेक क्लबों, इम्पायर थिएटर होते हुए, कुछ ही मिनटों में कलकत्ता के हृदय का भ्रमण कर लिया।
तुम काली घाट क्यों गईं थीं? वह भारत नहीं है। केवल नीच, अज्ञानी और अनपढ़ भारतीय ही काली की पूजा करते हैं’, एक अंग्रेज थियोसोफिस्ट ने दुखी होकर अगले दिन मुझसे कहा।
मैंने एक प्रकाण्ड विद्वान और प्रख्यात बंगाली ब्राह्मण के शब्दों को दुहरा दिया। उन्होंने कहा था-
तुम्हारे अंग्रेज मित्र गलत हैं। यह सही है कि नीची जातियों में काली को पूजने वालों का प्रतिशत ज्यादा है और विष्णु को पूजने वालों का प्रतिशत कम है, शायद इसलिए कि वे आत्मसंयमी हैं, जैसे वे मांस-मदिरा से परहेज करते हैं। किन्तु हजारों ब्राह्मण, हर जगह काली की पूजा करते हैं, और काली घाट पर आने वाले श्रद्धालुओं में सभी जातियों के हिन्दू शामिल होते हैं, जिनमें बहुत से अत्यन्त उच्च शिक्षित और इस शहर व भारत के महत्वपूर्ण गणमान्य व्यक्ति होते हैं।
(30 अप्रैल 2015)
अनुवाद : कँवल भारती
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शनिवार, 4 अप्रैल 2015


बाबू जगजीवनराम: एक संस्मरण
(कॅंवल भारती)
एक समय भारतीय राजनीति में दलित अस्मिता के स्तम्भ माने जाने वाले बाबू जगजीवन राम आज दलितों द्वारा लगभग भुला दिए गए हैं। इस विस्मृति के दो कारण मैं समझ पाया हूॅं, एक, डा. आंबेडकर के साथ उनकी गलत तुलना, और दो, उनका काॅंग्रेसी होना। हालांकि वह काॅंगे्रस के अध्यक्ष भी रहे थे और आपात काल में काॅंगे्रस छोड़कर उन्होंने अपनी अलग पार्टी (काॅंगे्रस फाॅर डेमाक्रेसी) भी बनाई थी, जनता पार्टी में भी रहे थे और बाद में देवराज अर्श की काॅंगे्रस में चले गए थे, पर इससे उनकी पहिचान में कोई फर्क नहीं आया था। वह आजीवन पहिचाने काॅंगे्रसी नेता के रूप में ही गए। ठीक कल्याण सिंह और उमा भारती की तरह, जो भाजपा छोड़कर  अपनी अलग पार्टी बनाकर भी भाजपाई छवि में कैद थे। इसका कारण शायद यही था कि वह किसी पृथक सामाजिक और लोकतान्त्रिक आन्दोलन की उपज नहीं थे, बल्कि उनकी प्रारम्भिक शिक्षा-दीक्षा काॅंगे्रस में ही हुई थी।
लेकिन, बाबू जी के साथ यह दुखद ही है कि उन्हें डा. आंबेडकर के सन्दर्भ में देखने की कोशिश की जाती है, जो एक गलत कोशिश है। दोनों के बीच कोई तुलना होनी ही नहीं चाहिए, क्योंकि दोनों नेताओं के राजनीतिक मार्ग और विचार अलग-अलग थे। पर, कुछ भावुक आंबेडकरवादियों ने उनकी छवि खलनायक की बना दी है। इन्हीं में एक रेवती राम थे, जो मेरे जनपद में खण्ड विकास अधिकारी के पद पर तैनात थे। उन्होंने एक छोटी सी पुस्तिका ‘बाबासाहेब डा. अम्बेडकर और बाबू जगजीवन राम’ नाम से लिखी। उसमें कुछ बातें बहुत ही अभद्र थीं, जैसे- बाबासाहेब गोरवर्ण थे, पर बाबूजी उसके विलोम थे; बाबासाहेब महार थे, जो सैनिक जाति है, जबकि बाबूजी चमार थे, जो हीन जाति है; बाबासाहेब की शिक्षा अमेरिका, जर्मन और इंग्लैण्ड में हुई थी और उन्होंने सर्वोच्च डिग्रियाॅं हासिल की थीं, जबकि बाबूजी की शिक्षा बीएचयू में हुई थी और वह सिर्फ बी.एससी. पास थे; बाबासाहेब अनेक भाषाओं के ज्ञाता थे, जिनके सामने बाबूजी को साक्षर ही कहा जा सकता है, इत्यादि। विडम्बना यह है कि इस पुस्तिका के छपने का कारक भी मैं ही था। यह पुस्तिका जब बाबूजीके हाथों में गई, तो उसने ऐसी विपत्ति खड़ी की कि उसने मुझे सड़क पर पटक दिया था। यह प्रसंग मैं आगे बताऊॅंगा । पहले यह बता दूॅं कि मामला क्या था?
सातवें दशक में आंबेडकरवाद की लहर मेरे शहर में पहुॅंची थी। जिन लोगों ने यह मुहिम शुरु की थी, वे कुछ सरकारी कर्मचारी थे, जो अलीगढ़-आगरा से पहली नियुक्ति या तबादले पर जिले में तैनात हुए थे। उन्होंने जो ‘मिशन’ शुरु किया, वह कोरा भावुक मिशन था, जो कांशीराम-मायावती पर ही आकर खत्म हो सकता था। मुक्ति का रास्ता वे स्वयं नहीं जानते थे, क्योंकि डा. आंबेडकर की जीवनी और बुद्धधर्म ही उनका मिशन था। उनके मिशन में गाॅंधी और काॅंग्रेस दोनों दलितों के शत्रु थे; मित्र कौन थे, यह उन्हें खुद नहीं पता था, क्योंकि उस समय तक, यानी आजादी के तीन दशकों बाद तक भारत के वामपंथ ने दलित सवालों की ओर करवट नहीं ली थी। लेकिन डा. आंबेडकर का दर्शन खुद में एक वामपंथ है, यह उन अम्बेडकर-मिशनरियों को क्या, खुद मुझे भी दो दशकों के बाद पता चला था। अतः यही भावुक ‘अम्बेडकर-मिशन’ मेरी चेतना में भी रच-बस गया था, जिसने मुझे रेवती राम की पुस्तिका के विस्फोट तक पहुॅंचाया।
बात 1978 की है। महेन्द्रप्रसाद गुप्त के प्रेस और अखबार में कई साल काम करने के बाद अपने मन में भी अपना प्रेस लगाने की इच्छा पैदा हो गई थी। उन दिनों उत्तर प्रदेश सरकार ने अनुसूचित जातियों में लघु उद्योग को प्रोत्साहित करने के लिए एक ‘अनुसूचित जाति वित्त एवं विकास निगम’ स्थापित किया था, जो दलितों को लघु उद्योग लगाने पर बैंक-ऋण पर दस प्रतिशत मार्जिन मनी और गारण्टी देता था। शहर में समाज कल्याण विभाग का एक ‘हरिजन औद्योगिक आस्थान’ भी था, (‘हरिजन’ शब्द 1990 में हटा था), जिसमें सामान्य वर्ग के उद्यमियों के लिए 111 रुपए और दलित वर्ग के उद्यमियों के लिए 25 रुपए माह के किराए पर शेड आवन्टित किए जाते थे। मैंने अपने मित्र रमेश प्रभाकर के साथ इस योजना का लाभ उठाया। पहले हमने दो शेड (संख्या एक और दो) आवन्टित कराए, उसके बाद अपनी-अपनी इकाइयों के लिए बैंकों में ऋण के लिए आवेदन किए। मार्जिन मनी के लिए हमें लखनऊ के कई चक्कर लगाने पड़े। कई आईएएस अधिकारियों, जैसे माता प्रसाद, डी. पी. वरुण और सी. डी. गौतम से उसी वक्त पहली दफा मिलना हुआ था। खैर! सालभर की मशक्कत के बाद हम दोनों की लघु इकाइयाॅं अपने-अपने शेडों में खड़ी हो गईं। शेड संख्या एक में रमेश प्रभाकर का ‘अदिति काॅपी हाउस’ और शेड संख्या दो में मेरा ‘रामपुर प्रिन्टिंग प्रेस’। रामपुर में दलितों की ये पहली इकाइयाॅं थीं, जो हम लोगों ने स्थापित की थीं। इकाइयाॅं लगते ही, जिनके हाथ में शहर का बाजार था, उन बनियों में खलबली मच गई। हमारी इकाइयों को ठप करने की योजनाएॅं बनने लगीं। हम बाजार से पहली बार रू-ब-रू हुए थे, और साफ देख रहे थे कि बाजार हमें अपनाने को तैयार नहीं था और बाजार को अपनाने पर हमारी बरबादी तय थी। आठ घण्टे लगातार मशीन चलने पर ही प्रेस के खर्चे और ऋण की किश्तें निकल सकती थीं, पर बाजार के भरोसे मशीन ठीक से दो घण्टे भी नहीं चल रही थी। उसी समय दिमाग में प्रकाशन शुरु करने का विचार आया। उस वक्त तक मैं एक किताब लिख चुका था-‘डा. अम्बेडकर बौद्ध क्यों बने?’ मैंने उसकी कम्पोजिंग शुरु करा दी। पर किताबें छापने के लिए भी कम्पोजीटर और मशीनमैन को वेतन देने के अलावा कागज के लिए भी नकद पूॅंजी चाहिए थी, जो मेरे पास नहीं थी। तब जाब-वर्क के रूप में छापने के लिए किताबें ढॅंूढ़ने का काम शुरु हुआ। रेवतीराम की किताब ‘बाबासाहेब डा. अम्बेडकर और बाबू जगजीवन राम’ की छपाई इसी आधार पर मेरी प्रेस से हुई थी। उस पर प्रकाशक के रूप में भी ‘बोधिसत्व प्रकाशन’ का नाम छापा गया था, जिसे मैं चला रहा था। इस तरह यह मेरे प्रकाशन की 19वीं किताब थी।
1980 में, रमेश प्रभाकर ने, कापी मैनुफेक्चरिंग का काम बन्द होने के बाद, एक पाक्षिक अखबार निकाला था-‘मूक भारत’। बारह पृष्ठों के उस अखबार के वह प्रधान सम्पादक थे और मैं सम्पादक। वह अखबार भी मेरी ही प्रेस में छपता था। उन दिनों बाबू जगजीवन राम जी दलित गौरव के रूप में सर्वाधिक चर्चित थे। स्थिति यह थी कि जिधर बाबूजी जाते थे, उधर ही दलित वर्ग जाता था। ‘जनता पार्टी’ से बाबूजी अलग हो गए थे, तो दलित वर्ग भी उससे अलग हो गया था, क्योंकि उस समय तक वैकल्पिक दलित राजनीति का उदय नहीं हुआ था। ‘मूक भारत’ की आर्थिक सहायता के लिए रमेश ने दिल्ली चलकर बाबूजी से बात करने का विचार रखा। मुझे विश्वास नहीं था कि वे मदद करेंगे। फिर भी, मैं और रमेश रात की किसी ट्रेन से (यह अप्रेल 1980 के पहले सप्ताह की कोई तारीख होनी चाहिए) चलकर सुबह 8 बजे तक उनके आवास 6, कृष्णा मेनन मार्ग पर पहुॅंच गए। वहाॅं और भी बहुत से मुलाकाती थे। नम्बर आने पर हम भी अन्दर गए। बाबूजी एक बड़े सोफे पर बाईं तरफ बैठे थे। नमस्कार करने के बाद हमने ‘मूक भारत’ के प्रवेशांक की एक प्रति उन्हें भेंट की, जिसमें उनके बारे में मेरा एक लेख छपा था। हमने खड़े-खड़े ही अखबार खोलकर उन्हें उस लेख को दिखाया। रमेश ने अखबार के लिए कुछ मदद माॅंगी और यह भी कहा कि इसे आप पर बेस करना चाहते हैं। इससे पहले हम बाबूजी से कभी नहीं मिले थे। वह हमारी पहली मुलाकात थी। उस पहली मुलाकात में ही वे हमें बहुत सहज लगे थे। उन्होंने हमसे दो बातें कहीं थीं। पहली बात आगरा के जाटवों के सम्बन्ध में थी, जो मैं भूल चुका हूॅं। दूसरी बात बात याद है, जिसमें उन्होंने कहा था कि ‘अपना इतिहास लिखो। और हमारा इतिहास विरोधियों के इतिहास में मिलेगा। वेदों में, स्मृतियों में दो धाराएॅं साथ-साथ चलती हैं, एक विरोध की और दूसरी समर्थन की। जो विरोध की धारा है, वही हमारी धारा है। उसी धारा में मूलनिवासियों का इतिहास है।’ इसके बाद उन्होंने कहा, हर महीने दो हजार रुपए ले जाना। फिर घण्टी बजाकर किसी को बुलाकर उनसे कहा, ‘इन्हें दो हजार रुपए दे दो।’ हम बाहर आए, बाईं ओर स्थित आफिस में गए, जहाॅं उस व्यक्ति ने हमें बिना किसी लिखा-पढ़ी के दो हजार रुपए दे दिए। बाद में पता चला कि वह व्यक्ति त्रिवेणी सहाय थे। 1980 में दो हजार रुपए पर्याप्त थे, एक हजार प्रतियाॅं छापने के बाद भी कुछ रुपए बच जाते थे, जो अन्य मदों में खर्च हो जाते थे।  
यह सिलसिला कुछ महीनों तक ही चला। एक बार रमेश रुपए लेने अकेले दिल्ली गए, बाबूजी से मिले, पर उन्होंने रुपए नहीं दिए। रुपए हम दोनों के एक साथ जाने पर ही मिलते थे। अगर मैं भी अकेले जाता, तो मुझे भी वे शायद रुपए नहीं देते। शायद किसी के भी अकेले जाने से यह विचार आना स्वाभाविक था कि हम दोनों एक दूसरे से अलग हो गए हैं और साथ-साथ नहीं हैं। पर, नवम्बर 1980 में रेवतीराम की पुस्तिका ने सारा खेल बिगाड़ दिया। इसका पता तब चला, जब हम दोनों बाबूजी से रुपए लेने गए और त्रिवेणी सहाय ने हमें बाबूजी से बिना मिलवाए ही बैरंग वापिस लौटा दिया। रमेश ने मेरी तरफ देखा और मैंने उसकी तरफ। माजरा न उसकी समझ में आया और न मेरी। हम वापिस रामपुर आए। उसके कुछ दिनों बाद ही, एक बड़ा विस्फोट हुआ। उस मनहूस दिन की तारीख भी याद नहीं आ रही है। मैं किसी काम से शहर में कहीं गया हुआ था। शाम को लौटकर जब प्रेस आया, तो देखता क्या हूॅं कि प्रेस पर सरकारी ताला लगा हुआ है, जो कपड़े से सिलकर सील्ड कर दिया गया है। उसे देखकर मेरी क्या मनोस्थिति हुई होगी, यह कोई भुक्तभोगी ही समझ सकता है। वह प्रेस ही सील्ड नहीं हुआ था, मेरी जीविका, मेरा भविष्य और मेरा संघर्ष सब सील्ड हो गया था। पता चला कि कुछ किश्तें रुक जाने से बैंक वालों ने पुलिस की सहायता से मेरा प्रेस सील्ड किया है। मुझे इसमें बाबूजी का हाथ नजर आया था। शहर के बाजार और बनियों के लिए यह बहुत ही सुखद समाचार था। बैंक और प्रशासन ने मुझे जिस तरह जलील किया था, उस हालत में मैं रामपुर में नहीं रह सकता था। मैंने रामपुर छोड़ दिया। कहाॅं-कहाॅं भटका, यह एक अलग कहानी है, जिस पर फिर कभी लिखूॅंगा। दो साल के बाद रमेश ने बताया कि इसके पीछे रेवती राम का ही हाथ था। उसी ने मुझे बताया कि पंजाब नेशनल बैंक, रामपुर ने प्रेस को नीलाम करके बकिया कई हजार रुपयों की वसूली का मुकदमा मेरे खिलाफ रामपुर कोर्ट में कर दिया था, पर कोर्ट ने यह कहकर मुकदमा खारिज कर दिया था कि जब आपने एक उद्यमी का उद्योग ही खत्म कर दिया, तो बकिया का कोई मामला नहीं बनता।
यह मेरा बचपना ही था, जो मैंने बाबूजी पर शक किया था।  6 अगस्त 1984 को नई दिल्ली के विट्ठल भाई पटेल भवन के मावलंकर हाल में ‘भारतीय दलित साहित्य अकादमी’ की स्थापना के अवसर पर बाबूजी ने जिस आत्मीयता से मुझसे और रमेश प्रभाकर से बातचीत की थी, और हम सबके बीच खाना खाया था, वह रेवतीराम जैसे संकीर्ण दलितों के मुंह पर सबसे बड़ा तमाचा था।
मैं अपने इस संस्मरणात्मक लेख का समापन बाबू जगजीवन राम के एक भाषण के एक अंश से करना चाहूॅंगा। कहा जाता है कि वे डा. आंबेडकर के विरोधी थे। हो सकता है, रहे हों। पर 24 अप्रेल 1983 को मद्रास में उनके मराठा विश्वविद्यालय के नामान्तर आन्दोलन के पक्ष में दिया गया भाषण उनको आंबेडकर-विरोधी साबित नहीं करता है। उनके उस भाषण का वह अंश मैं यहाॅं प्रस्तुत कर रहा हूॅं-
‘‘डा मराठवाड़ा विश्वविद्यालय को डा. आंबेडकर विश्वविद्यालय के रूप में परिवर्तित करने का प्रश्न वर्षों से टलता आ रहा है। इस माॅंग के लिए महाराष्ट्र के हमारे अनुसूचित जाति के मित्रों ने भारी कीमत चुकाई है, क्योंकि मराठों ने उनके घर जलाए, तथा निर्मम हत्याएॅं कीं। कुछ दिनों पहले आपने अखबारों में पढ़ा होगा कि मराठा विश्वविद्यालय का नामान्तर डा. आंबेडकर विश्वविद्यालय में करने का बिल महाराष्ट्र विधान सभा ने अस्वीकार कर दिया है। महाराष्ट्र विधान सभा में काॅंगे्रस-आई का बहुमत है और महाराष्ट्र मंत्रीमण्डल कांग्रेस-आई का मंत्रीमण्डल है। श्रीमती इन्दिरा गाॅंधी नहीं चाहतीं कि मराठवाड़ा विश्वविद्यालय डा. आंबेडकर विश्वविद्यालय में परिवर्तित किया जाय, अन्यथा काॅंगे्रस बहुमत वाली विधान सभा इस बिल को कैसे अस्वीकार कर देती? जब भी कोई काॅंग्रेसी मुख्यमंत्री मरता है, तो उसके नाम पर एक विश्वविद्यालय की स्थापना हो जाती है। विधानचन्द्र राय पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री थे। जब वह मरे, विधानचन्दं्र राय विश्वविद्यालय की स्थापना हुई। गोविन्द वल्लभ पन्त मरे और गोविन्द वल्लभ पन्त विश्वविद्यालय स्थापित किया गया। डा. सम्पूर्णानन्द मरे, वह भी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे, और उनके नाम से भी सम्पूर्णानन्द विश्वविद्यालय बना। ललितनारायण मिश्र तो मुख्यमंत्री भी नहीं थे। उनकी हत्या हुई, उनके नाम पर ललितनारायण मिश्र विश्वविद्यालय बना। तब फिर डा. आंबेडकर विश्वविद्यालय क्यों नहीं बन सकता? क्या इसलिए नहीं बन सकता कि वे दलित थे और इसलिए योग्य नहीं थे कि उनके नाम पर विश्वविद्यालय बने?’’
5 अप्रेल 2015

गुरुवार, 12 मार्च 2015

हिन्दी साहित्य की शव-परीक्षा
-कँवल भारती-


                वास्तविक हिन्दी साहित्य का आरम्भ दलित सन्त कवियों के निर्गुण काव्य से होता है। इस काव्य में जीवन था और अपने समय के समाज से संवाद था। इसमें समाज और कवि चेतना अलग-अलग दिशाओं में नहीं थी। इन कवियों ने आंखिन देखीसच्चाई को अभिव्यक्ति दी थी, जिसमें मनुष्य और समाज-विरोधी विचार का जबरदस्त खण्डन था। सम्भवतः कबीर ही वे पहले कवि थे, जिन्हें साहित्य में यथार्थवाद को स्थापित करने का श्रेय जाता है। कबीर आदि दलित सन्त कवियों ने जो सौन्दर्यबोध विकसित किया, वह समाज के निर्माण में साहित्य की भूमिका को अनिवार्य बनाता है।
                क्या परवर्ती हिन्दी साहित्य में यह सौन्दर्यबोध विकसित हुआ? ऐसा हमें देखने को नहीं मिलता। निर्गुण काव्य के बाद सगुण काव्य अस्तित्व में आया। इस काव्य के प्रणेताओं ने उस ऊर्जा को और उस आग को बिल्कुल ठण्डा कर दिया, जो निर्गुण काव्य ने प्रज्जवलित की थी। दलित सन्तों का भक्ति आन्दोलन निस्सन्देह ब्राह्मणवाद के खिलापफ एक विद्रोह था। इस विद्रोह ने उस व्यवस्था को तोड़ा था, जो ब्राह्मणवाद ने शूद्र जातियों के लिये बनायी थी। मसलन, ब्राह्मणवाद ने शूद्र को संन्यास के अधिकार से वंचित रखा था। इसके पीछे कारण यह था कि यदि शूद्र को संन्यास का अधिकार मिल गया, तो ईश्वर के दरबार में वह समानता का उपभोग करेगा, जबकि वर्णव्यवस्था ने उसे सामाजिक स्तर पर समानता का अधिकार नहीं दिया। है। संन्यास या भक्ति का अधिकार पाने के बाद वह सामाजिक समानता के लिये आवाज उठा सकता है। ब्राह्मणवाद ने इसी सम्भावित खतरे की वजह से शूद्र को संन्यास और भक्ति से अलग रखा था। दलित सन्तों ने इसी व्यवस्था को तोड़ा और निर्गुण ईश्वर की परिकल्पना कर शूद्र जातियों को संन्यास और भक्ति का अधिकार दिया। दूसरी बड़ी क्रान्ति दलित सन्तों ने यह की थी कि वे धर्मोपदेश दे रहे थे, जो ब्राह्मणवाद में उनके लिये प्रतिबन्धित था। मनु के अनुसार शूद्र धर्मोपदेशक नहीं बन सकता था। उसकी व्यवस्था थी कि यदि शूद्र धर्म का उपदेश दे, खासतौर से ब्राह्मण को धर्म समझाये, तो उसके मुँह और कान में खौलता हुआ तेल डाल देना चाहिए। ;मनु. 8/272द्ध दलित सन्तों ने न सिपर्फ इस व्यवस्था को तोड़ा, बल्कि उन्होंने ब्राह्मण को ही धर्म समझाने का साहस किया। यह बहुत बड़ी साहित्यिक क्रान्ति थी, जो निर्गुण भक्ति आन्दोलन ने की थी और यह साहित्य की वह धारा थी, जिसे आम-जनता ने सबसे ज्यादा समर्थन दिया था और उसे स्वीकार किया था।
                सगुण भक्ति का काव्य निर्गुण भक्ति आन्दोलन की प्रतिक्रान्ति में आया। इसके प्रणेताओं में तुलसीदास प्रमुख थे। तुलसी ने रामचरित मानस की रचना करके ब्राह्मणवादी को उस ज्ञान की आँधी से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी, जिसे कबीर ने चलाया था और जो जनता में व्यापक हो गयी थी। कबीर ने कहा था कि जो ब्रह्म को जाने, वह ब्राह्मण। इसके विरु( तुलसी ने आक्रोश भरे शब्दों में मानसमें लिखा कि अब तो नीच लोग भी यह कहकर आँखें दिखाने लगे हैं कि जो ब्रह्म को जाने, वह ब्राह्मण। यथाµ
                कबीरµ
कह कबीर जो ब्रह्म विचारै।
सो ब्राह्मण कहियत है हमारे।।
                तुलसीµ
बादहिं सूद्र विप्र सम हम तुमसे कछु घाट।
जाने ब्रह्म सो विप्रवर आँख देखावहि डाटि।।
                तुलसी की सौन्दर्य चेतना में ब्राह्मण श्रेष्ठ और पूजनीय हैं तथा स्त्राी और शूद्र नीच हैं। तुलसी मानस के आरम्भ में सन्त वन्दना करते हैं। पर, उनका उपास्य सन्त कबीर की श्रेणी का नहीं है। उसके सिर पर वेद और ब्राह्मणों की पराधीनता का अपार भार है। इसलिये तुलसी जिसकी सर्वप्रथम वन्दना करते हैं, वह ब्राह्मण ही हैंµ ‘‘बन्दौ प्रथम महिसुर चरना। मोह जनित संसय, सब हरना।’’ सन्त के लिये भी तुलसी की सीमा रेखा यह है कि उसका ब्राह्मण में प्रेम होना आवश्यक हैµ ‘जप तप व्रत दम संजम नेमा। गुरु गोबिन्द विप्र पद प्रेमा।।तुलसी ने स्वयं राम के मुख से यह सन्त महिमा करायी है। एक अन्य प्रसंग में वे राम से कहलाते हैं कि सन्त में तमाम गुणों के साथ यदि द्विज पर प्रीतिनहीं है तो वह सन्त नहीं हो सकता। यथाµ
सन्तन के लच्छन सुनु भ्राता।
अगनित श्रुति पुरान विख्याता।।?
सीतलता सरलता मइत्राी
द्विज पर प्रीति धरम जनयित्राी।।
                तुलसी का यह सारा प्रहार दलित सन्तों पर और उनकी सन्त मत की अवधारणा पर था, जिसमें ब्राह्मणों की जन्मजात
श्रेष्ठता का समर्थन नहीं है, जो आदमी की उच्चता को उसके शील और गुणों से स्वीकार करते थे, उन दलित सन्तों की सम्पूर्ण सौन्दर्य चेतना को ब्राह्मणों की जन्मजात श्रेष्ठता का प्रतिपादन करके तुलसीदास ने उस क्रान्ति को ध्वस्त कर दिया, जो साहित्य का मूलाधार बन रही थी।
                आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने तुलसी की इस स्थापना अर्थात् प्रतिक्रान्ति की इस आधार पर प्रशंसा की है कि वह लोकधर्म रक्षक और लोकरंजक स्वरूप है। उन्होंने तुलसी के समर्थन में दलित सन्तों की निर्गुण भक्ति को विदेशी परम्परा, लोकधर्म से उदासीन तथा समाज व्यवस्था और ज्ञान-विज्ञान का विरोधी ठहराया है। उन्होंने लिखा हैµ ‘‘यह द्वितीय वर्ग ;दलित सन्तद्ध जिस घोर नैराश्य की विषम स्थिति में उत्पन्न हुआ, उसी के सामंजस्य साधन में सन्तुष्ट रहा। उसे भक्ति का उतना ही अंश ग्रहण करने का साहस हुआ, जितने की मुसलमानों के यहाँ भी जगह थी। मुसलमानों के बीच रहकर इस वर्ग के महात्माओं का भगवान के उस रूप पर जनता की भक्ति को ले जाने का उत्साह न हुआ, तो अत्याचारियों का दमन करने वाला और दुष्टों का विनाश कर धर्म को स्थापित करने वाला है। इससे उन्हें भारतीय भक्ति मार्ग के विरु(, ईश्वर के सगुण रूप से स्थान पर निर्गुण रूप ग्रहण करना पड़ा। जिसे भक्ति का विषय बनाने में उन्हें बड़ी कठिनाई हुई।’’ ;गोस्वामी तुलसीदास, रामचन्द्र शुक्ल, पृष्ठ 1द्ध
                दलित सन्तों की निर्गुण भक्ति के प्रति रामचन्द्र शुक्ल की यह टिप्पणी गौरतलब है। उन्हें यह भक्ति इसलिये स्वीकार नहीं है, क्योंकि वे इस पर इस्लाम की छाया मानते हैं और हिन्दुत्व की रक्षा के लिये अवतार लेने वाले ईश्वर को उसमें कोई जगह नहीं है। वे दलित सन्त काव्य पर सीधे आरोप लगाते हैं कि वह लोकधर्म और लोक मर्यादा पर आघात करने वाला है। वे लिखते हैं, ;संदर्भ वहीद्ध ‘‘लोक मर्यादा का उल्लंघन, समाज की व्यवस्था का तिरस्कार, अनधिकार चर्चा, भक्ति और साधुता का मिथ्या दम्भ, मूर्खता छिपाने के लिये वेद-शास्त्रा की निन्दा, ये सब ऐसी बातें थीं जिनसे गोस्वामी जी की अन्तरात्मा बहुत व्यथित हुई।’’ वे आगे लिखते हैं, ‘‘अशिष्ट संप्रदायों का औ(त्य गोस्वामी जी नहीं देख सकते थे।... धर्म व्यवस्था के बीच ऐसी विषमता उत्पन्न करने वाले नये-नये पंथों के प्रति इसी से उन्होंने अपनी चिढ़ कई जगह प्रकट की है, जैसेµ
ड्डुति सम्मत हरि भक्ति पथ, संजुत विरति विवेक।
तेहि परिहरहिं बिमोह बस कल्पहिं पंथ अनेक।।
साखी, सबदी, दोहरा, कहि किहनी उपखान।
भगत निरुपहिं भगति कलि, निन्दहि वेद पुरान।।’’
;सन्दर्भ वही, पृष्ठ 15-16द्ध
                आप समझ सकते हैं कि रामचन्द्र शुक्ल उस काव्य को किस कदर अशिष्ट और अनधिकार चेष्टा बताते हैं, जो सामाजिक परिवर्तन लाना चाहता था, जो जन्मजात ऊँच-नीच का विरोधी था और जो वेद-शास्त्रों की व्यवस्था का समर्थक नहीं था। शुक्ल जह जिसे लोकधर्म और लोकमर्यार्दा कहते हैं, वह वर्णव्यवस्था ही है। गोस्वामी तुलसीदास ने इस वर्णव्यवस्था का जमकर समर्थन किया है, जिसके बारे में शुक्ल जी कहते हैं, ‘‘धम्म है गार्हस्थ जीवन में धर्मालोकस्वरूप रामचरित और धम्म है उस आलोक को घर-घर पहुँचाने वाले तुलसीदास।’’ ;पृष्ठ 21द्ध ने वर्णाश्रम का समर्थन करते हुए आगे लिखते हैं, ‘‘लोक मर्यादा की दृष्टि से निम्नवर्ग के लोगों का धर्म यही है कि उस पर श्र(ा का भाव रखें, न रख सकें तो कम-से-कम प्रकट करते रहें। इसे गोस्वामी जी का सोशल डिसिप्लिन’ ;सामाजिक अनुशासनद्ध समझिये। इसी भाव से उन्होंने प्रसि( नीतिज्ञ और लोक व्यवस्थापक चाणक्य का यह वचन अनुवाद करके रख दियाµ ‘पूजिय विप्र सील गुन हीना। सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना।’’ ;वही, पृष्ठ 29द्ध
                इससे ज्यादा ब्राह्मणवाद का समर्थन क्या हो सकता है, जो तुलसीदास के प्रति शुक्ल जी ने व्यक्ति किया है। निस्सन्देह यह शुक्ल जी के मत से भी स्पष्ट हो गया है कि गोस्वामी तुलसीदास उस ज्ञान की आँधी को ही रोकने के लिये मैदान में आये थे, जिसे दलित सन्त कवियों ने पैदा की थी, क्योंकि उस आँधी ने जन्मना ऊँच-नीच पर खड़ी वर्णव्यवस्था को उखाड़ दिया था। पूजिय विप्र सील गुन हीनादरअसल दलित सन्तों की सौन्दर्य चेतना के विरु( तुलसीदास ने स्थापित किया था। सन्त रैदास ने कहा थाµ
बांभन को मत पूजिए जो हो गुन से हीन।
पूजिए चरन चंडाल के, जो हो ज्ञानप्रबीन।।
                ब्राह्मण लेखकों ने तुलसीदास को हिन्दी साहित्य में अभूतपूर्व प्रतिष्ठा दी है। वे एक मानक मान लिये गये, साहित्य में और उसके आधार पर पक्ष और विपक्ष की दो धाराएँ बना दी गयीं। तुलसी का पक्ष साहित्य में एक ऐसा पक्ष बना दिया गया, जो लोक मंगल और लोक महत्व का है। इसके विपरीत तुलसी का विरोध लोक के लिये अमंगलकारी हो गया। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की तरह ही रामविलास शर्मा ने भी, जो माक्र्सवादी आलोचक और विचारक माने जाते हैं, तुलसीदास को जनता का कवि माना है। उन्होंने लोकका माक्र्सवादी अर्थ लेते हुए उसे जनबना दिया। उन्होंने शुक्ल जी से बढ़कर तुलसी का पक्ष लिया। उन्होंने अपनी व्याख्याओं में उस अन्त£वरोध को भी मिटा दिया, जो तुलसी को पढ़ते समय उभरता है और जिसे शुक्ल जी दूर नहीं कर सके थे। शुक्ल जी ने सन्तों की दो श्रेणियाँ मानी थींµ एक निर्गुण सन्तों की और दूसरी सगुण सन्तों की। उन्होंने सगुण सन्तों को भारतीय भक्तिधारा का और निर्गुण सन्तों को विदेशी धारा का माना था। पर, शर्मा जी ने इस भेद को भी मिटा दिया। उन्होंने अपने ग्रंथ परम्परा का मूल्यांकनमें लिखा है, ‘‘सन्तों में स्त्राी और पुरुष, संन्यासी और गृ हस्थ, हिन्दू और मुसलमान, सगुणवादी और निर्गुणवादी दोनों हैं।’’ ;पृष्ठ 45द्ध सम्भवतः उन्होंने शुक्ल जी की स्थापनाओं में यह संकट देख लिया था, इसलिये उन्होंने तुलसीदास को भी सन्त बनाने पर पूरा जोर दिया। इसके लिये उन्होंने बाकायदा ‘‘सन्त साहित्य के अध्ययन की समस्याएँ’’ नाम से एक लेख लिखा, जो पूरी तरह तुलसी को सन्त बनाने पर केन्द्रित है। उन्होंने इस बात को ज्यादा महत्व दिया कि सन्त साहित्य भारतीय जीवन की अपनी परिस्थितियों से पैदा हुआ था। इसमें उन्होंने निर्गुण और सगुण दोनों सन्तों को समेट लिया, जो तुलसी को सन्त स्थापित करने के लिये जरूरी था।
                डा. शर्मा ने दलित सन्त साहित्य की जितनी विशेषताएँ हैं, वे सब-की-सब तुलसीदास में  स्थापित कर दी हैं और तुलसी की विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए शब्दों का ऐसा घाल-मेल उन्होंने किया है, जिसमें तुलसीदास ही अपनी दृष्टि के साथ उभरते हैं, दलित सन्त उसमें कहीं नहीं हैं। उदाहरण के लिये ज्ञान की आँधी मचा देने वाले जनता के कवि कबीर नहीं, तुलसीदास हैं। ‘‘जनता में सबसे पीडि़त वर्ग स्त्रिायों और अछूतों का था। इसलिये इनकी ओर तुलसी जैसे कवि की सहानुभूति होना स्वाभाविक था।’’ यह स्थापना देते समय डा. रामविलास शर्मा ने एक झटके में तुलसी को स्त्राी और शूद्र वर्ग का हितैषी बना दिया, जबकि तुलसी दोनों के निन्दक थे। दलित सन्तों की निर्गुण भक्ति सभी के लिये थे, इसे डा. शर्मा ने तुलसी पर स्थापित करते हुए लिखा हैµ ‘‘तुलसी के राम, भक्तों को मुक्ति देते समय, जाति-पाँति का विचार नहीं करते। जाति-पाँति पर निर्भर धर्मशास्त्रा एक और हैं, तुलसी की भक्ति, जो सभी के लिये मुक्ति का द्वार खोलती है, दूसरी ओर है।’’ ;वही, पृष्ठ 53द्ध सही मायने में दलित सन्त कबीर आदि श्रमिक जनता के लिये धरोहर हैं। पर डा. शर्मा उल्टी गंगा बहाते हुए लिखते हैं, ‘‘तुलसीदास का स्वप्न श्रमिक जनता के लिये धरोहर है, जिससे प्रेरित होकर वह समाजवाद के लिये मंजिल दर मंजिल बढ़ती जायेगी।’’ ;वही, पृष्ठ 87, लेख- तुलसी साहित्य के सामन्त विरोधी मूल्यद्ध मूर्ख ब्राह्मण को पूजने तथा विद्वान शूद्र का तिरस्कार करने की शिक्षा देने वाले तुलसी किस तरह समाजवादी हो सकते हैं?
                तुलसी ने अपने काव्य में किस लोकधर्म और मर्यादा की रक्षा की है, आइए देखते हैं। संक्षेप में, उनकी स्थापनाओं पर ही एक नजर डालते हैं। सबसे पहले राम को ही लेते हैं, जो उनके काव्य के नायक हैं। उनके ये राम मनुष्य की मुक्ति के लिये कर्म नहीं करते हैं। उनका अवतार केवल ब्राह्मण, गऊ, देवता और सन्तों के कल्याण के लिये हुआ हैµ ‘विप्र धेनु सुर संत हित, लीन्ह मनुज अवतार।
                लोक जीवन अवैज्ञानिक विचारों को स्थापित करने में तुलसी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। वे अंधविश्वासों को सर्वाधिक प्रश्रय देते हैं। शिव-विवाह के अवसर का वर्णन देखेंµ
ससि ललाट सुन्दर सिर गंगा।
नयन तीन उपबीत भुजंगा।।
गरल कंठ उर नर सिर माला।
मस्तक पर चन्द्रमा, सिर पर गंगा, तीन नेत्रा, साँपों का जनेऊ और गले में नर मुंडों की माला, क्या यह स्वाभाविक है? शकुन अशकुन में भी लोक विश्वास को वे मजबूत करते हैंµ ‘पफरकहिं सुअर अंग सुनु भ्राता।उनके लिये नेवले का दर्शन, खेत में कौवा, सुहागिन स्त्रिायों का भरे हुए घड़े और गोद में बालक लिये आना, गायों का बछड़ों को दूध पिलाते हुए देखना, सपफेद सिर वाली चील का देखना, दही, मछली और दो ब्राह्मणों का हाथ में पुस्तक लिये आना शुभ पफलदायक होता है। यथाµ
दाहिन काग सुखेत सुहावा, नकुल दरसु सब काहू पावा।
सानुकूल बह त्रिविध बयारी, सघट सवाल आव बर नारी।।
सनमुख आयउ दधि अरु मीना, कर पुस्तक दुइ विप्र प्रबीना।
                अंधविश्वास की एक कड़ी है शाप। तुलसी ने मानस में अनेक घटनाओं का चित्राण इस आधार पर किया है कि वे ब्राह्मण के शाप का परिणाम है। जैसे, दशरथ को पुत्रा-वियोग श्रवणकुमार के अंधे माता-पिता के शाप के कारण होता है और रावण की मृत्यु भी शाप के कारण होती है। शाप का दूसरा पहलू है वरदान। ब्राह्मण या तो शाप देता है या वरदान देता है। ब्राह्मण नाराज होता है तो शाप देता है और प्रसन्न होता है तो वरदान देता है। ये सारी घटनाएँ मानस में राम का जन्म, अहिल्या, जटायु और काक भुशुंडि के प्रसंग में देखी जा सकती हैं।
                सवाल यह है कि क्या यही लोकधर्म और समाज व्यवस्था है, जिसे स्थापित करने के लिये तुलसी पर रामचन्द्र शुक्ल और डा. रामविलास शर्मा मुग्ध होते हैं? अंधविश्वासों और अवैज्ञानिक दृष्टियों में जकड़े हुए समाज को इनसे मुक्त करने की दृष्टि देने की जरूरत थी। जो नया समाज दलित सन्त कवि नि£मत कर रहे थे, उसका विकास करने की जरूरत थी। जिस ऊँच-नीच और पाखण्ड पर खड़ी संस्कृति में आमजनता पिस रही थी, उसके खिलापफ संघर्ष ही साहित्य की भूमिका होनी चाहिए थी। पर, तुलसी ने अपना रचनाकर्म समाज को अवैज्ञानिक चिन्तन देने के लिये किया, समाज की वैज्ञानिक प्रगति को रोकने के लिये किया। तुलसी मनुष्य की मुक्ति के लिये सिपर्फ एक ही रास्ता बताते हैं कि ब्राह्मणों के चरणों में उसकी प्रीति हो ;और वह भी अत्यन्तद्ध तथा श्रुति के अनुसार अपने-अपने वर्णाश्रम कर्म को करता रहेµ
भगति कि साधम कहउं बखानी, सुगम पंथ मोहि पावहिं प्रानी।
प्रथमहिं विप्र चरन अति प्रीति, निज निज कर्म निरत श्रुति रति।।
                क्या साहित्य का समाज से यही रिश्ता बनता है कि वह सामाजिक संघर्षों की अनदेखी करे? क्या हिन्दी साहित्य में तुलसी की प्रतिष्ठा, जिसे शुक्ल जी भारत हृदय, भारतीकंठ और भक्त चूड़ामणि कहते हैं, इस बात का प्रमाण नहीं है कि साहित्य में हिन्दूधर्म की प्रतिष्ठा की गयी है? निस्सन्देह ऐसा ही है।
                तुलसी के साथ सूरदास और केशवदास का भी नाम आता है। कहावत प्रचलित हैसूर सूर तुलसी ससी उहुगन केशव दास। अब के कवि खद्यौत सम जहं जहं करत प्रकाश।।इसका अर्थ है कि हिन्दी साहित्य में सूरदास, तुलसीदास और केशवदास ये दास त्राय महत्वपूर्ण कवि माने गये हैं। आइए, देखते हैं कि सूरदास के साहित्य की अवधारणा क्या है?
                तुलसी और सूरदास के साहित्य पर हिन्दी साहित्य में जो भी काम हुआ है, वह दो तरह से हुआ है। संयोग से यह दोनों तरह का काम ब्राह्मण लेखकों ने ही किया है। ये लेखक मार्क्सवादी और हिन्दुत्ववादी दोनों हैं। इन दोनों तरह के लेखकों को दिशा दिखायी है आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने। शुक्ल जी ने अपनी आलोचनाओं में हिन्दुत्व की दृष्टि से ज्यादा काम किया है, उनकी सोच, उनके विश्लेषण और उनकी स्थापनाएँ संश्लेषणात्मक हैं, जिसे हम आम भाषा में कह सकते हैं कि उन्होंने दलित सन्तों की आँधी से ब्राह्मणवाद के पुनरो(ार के लिये तुलसी और सूर की मुक्तकंठ से प्रशंसा की है। बाद के लेखकों ने शुक्ल जी के रास्ते पर चलते हुए कुछ विश्लेषणात्मक चतुराई से काम लिया है। इनमें हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसे लेखकों ने आलोचना करते समय कबीर और अन्य दलित सन्तों को भी वहीं पहुँचा दिया है, जहाँ सूर और तूलसी पहुँचे हैं। मार्क्सवादी लेखकों ने, जिनमें डा. रामविलास शर्मा के अतिरिक्त शिव कुमार मिश्र भी हैं, सूर और तूलसी में दलित सन्तों को स्थापित करने का आपराधिक काम किया है। जैसे दलित सन्तों को वैष्णव बनाना, निर्गुण-सगुण को एक करना इत्यादि।
                इस घालमेल का एक उदाहरण डा. हजारी प्रसाद द्विवेदी से देखिए, ‘‘कबीर, दास, दादूदयाल आदि निर्गुण मतवादियों की नित्य लीला और सूरदास, नन्ददास आदि सगुण मतवादियों की नित्य-लीला एक ही जाति की है। अन्तर यही है कि पहली श्रेणी के भक्तों के सामने भगवान के व्यक्तिगत सम्बन्धात्मक रूप के साथ उसकी रूपातीत अनन्तता वर्तमान रहती है। और, दूसरी श्रेणी के भक्तों के सामने भगवान सदा प्रतीक रूप में आते हैं और इसीलिये उनकी अनन्तता और असीमता ओझल-सी हुई रहती है।’’ (दे. हिन्दी साहित्य की भूमिका, पृष्ठ 87-88)
                एक उदाहरण और देखिए, ‘‘इस युग के सगुण और निर्गुण दोनों प्रकार के मत के सन्तों ने नाम की महिमा गायी है। नाम-माहात्म्य भागवत आदि प्रायः सभी पुराणों में पाया जाता है, पर मध्य युग के भक्तों में इसका चरम विकास हुआ है। तुलसीदास ने कहा है कि ब्रह्म और राम अर्थात् नि£वशेष चिन्मय सत्ता और अखंडानंद प्रेमस्वरूप भगवान इन दोनों में नाम बड़ा है।... कबीर ने भी कहा है कि मैं भी कह रहा हूँ, ब्रह्म और महेश ने भी कहा है कि रामनाम ही सार तत्व है।... इसी प्रकार नानक, दादू आदि सन्तों ने भी नाम का माहात्म्य वर्णन किया है।’’ (सन्दर्भ- वही, पृष्ठ 90)
                दलित सन्त कवियों के शब्दों की अर्थवत्ता को तोड़-मरोड़ कर उन्हें वैष्णवी अर्थ प्रदान करना एक साजिश रचना है, जिसका मकसद वैष्णवी सन्त-मत से दलित सन्तों को जोड़ना है। यह साहित्य में अपराध है, जिसे करने के दोषी हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसे तमाम लेखक हैं। इन लेखकों ने कबीर के इस पद को नजर-अन्दाज कर दिया, जिसमें वे कहते हैं.
अंषडि़यां झाईं पड़ी पंथ निहारि निहारि।
जीभडि़यां छाला पड़या, राम पुकारि पुकारि।।
                क्या नाम के माहात्म्य का खण्डन यह पद नहीं करता है? वैष्णवी सन्तों के जिस ब्रह्मा-विष्णु-महेश को हजारी प्रसाद द्विवेदी दलित सन्तों के राम में स्थापित करते हैं, उन्हें पहले कबीर के इन पदों को देख लेना चाहिए था.
सुर नर मुनिजन औलिया यह सब उरली तीर।
अलह राम की गम नहीं, तहं घर किया कबीर।।
ब्रह्मा बिश्नू महेसर कहिए इन सिर लागी काई
इनहिं भरोसे मत कोई रहियो, इन्हूं मुक्ति न पाई।।
  ऽ     ऽ     ऽ     ऽ     ऽ     ऽ     ऽ
ता साहिब कै लागौ साथा, सुख दुख मेटि रह्यौ अनाथा।।
ना दसरथ घरि औतरि आवा, ना लंका का राव संतावा।।
देवै कूख न औतरि आवा, ना जसवै ले गोद खिलावा।।
ना वो ग्वालन कै संग पिफरिया, गोबरधन ले न कर धरिया।।
बांबन होय नहीं बलि छलिया, धरनी बेद लेन उधरिया।।
मंडक सालिकराम न कोला, मछ कछ ह्यै जलहि न डोला।।
बद्री वैस्य ध्यान नहीं लावा, परसराम ह्यै खत्राी न सतावा।।
द्वारा मती सरीर न छाड़ा, जगन्नाथ ले प्यंड न गाड़ा।।
                कहै कबीर बिचारि करि, झूठा लोही चाम।
                जो या देही दहित है, सो है रमिता राम।।
                कबीर के ये पद डा. हजार प्रसाद द्विवेदी और शिव कुमार मिश्र सरीखे आलोचकों को ही नहीं, समूची वैष्णव परम्परा को ही खारिज करते हैं। इन लेखकों ने बड़ी चतुराई से वैष्णव सन्तों के राम-नाम को दलित सन्तों में स्थापित करने की कोशिश की और इस सत्य पर परदा डाल दिया कि दलित सन्तों का भगवान, राम या कृष्ण अवतार नहीं लेता है, वह देह रहित है, वह न दशरथ के घर जन्म लेता है, न लंका के राजा को मारता है, न यशौदा की गोद में खेलता है, न ग्वालों के साथ घूमता है, न गोबरधन पर्वत को उठाता है, न ब्राह्मण बनकर बलि को छलता है, न वह सालिकराम है, न मत्स्य और कच्छप रूप में पानी में डोलता है, न वह विष्णु का ध्यान लगाता है और न परशुराम बनकर क्षत्रियों को मारता है। कबीर तो सापफ-सापफ यह भी कहते हैं कि इनके सहारे कोई मुक्ति नहीं मिल सकती, क्योंकि ये तो स्वयं ही कलुष से भरे हैं। वे कहते हैं, हम तो वहाँ है, जहाँ न अल्लाह का गम है और न राम का गम है। इतनी स्पष्ट घोषणा के बाद भी क्या दलित सन्तों पर नाम-रूप-लीला-धाम की वैष्णवी भक्ति को स्थापित किया जा सकता है?
                सूर भी तुलसी की तरह दलित सन्तों की नयी धा£मक क्रान्ति की प्रतिक्रान्ति के कवि थे। निर्गुण के विरुद्ध सगुण की स्थापना में सूर तुलसी से आगे हैं। सूर ने कृष्ण की लीलाओं, नाम-माहात्म्य, राधा-कृष्ण और गोपियों के प्रणय प्रसंगों का वर्णन करके दरअसल निर्गुण की अवधारणा पर ही प्रहार किया है। सम्पूर्ण भ्रमर-गीत निर्गुण और सगुण का संवाद ही है, जो उद्धव के द्वारा गोपियों और कृष्ण के बीच चलता है। एक पद में कृष्ण उद्धव से कहते हैं,  तुम तो ऐसे ब्रह्म के ज्ञाता हो, जिसके न माता है न पिता, न रूप है न रंग और न जाति है न कुल। यथा--
पूरन ब्रह्म सकल अबिनासी ताके तुम हौ ज्ञाता।
रेख, न रूप, जाति, कुल नाहीं जाके नहिं पितु माता।।
                भ्रमर गीत का यह प्रसंग अत्यन्त गौरतलब है। भ्रमर उद्धव हैं, जो कृष्ण का निर्गुण सन्देश लेकर गोपियों के पास जाते हैं। उद्धव से निर्गुण सुनकर गोपियाँ जवाब देती हैं,यहाँ ठगपना नहीं चलेगा। भला कोई अंगूर को छोड़कर कड़वी निबौरी (नीम का फल) खायेगा? भगवान के सगुण रूप को छोड़कर कौन निर्गुण की उपासना करेगा? यथा--
जोग ठगौरी ब्रज न बिकैहै।
दाख छांडि़ कै कटुक निबौरी को अपने मुख खैहें?
सूरदास प्रभु गुनहि छांडि़ कै को निर्गुण निर बैहै?
                आप देखें कि सूरदास ने निर्गुण दर्शन को ठगपने का सौदा कहा है और उसे नीम का कड़वा फल बताया है। दरअसल उद्धव कृष्ण और गोपियों की यह पूरी कथा काल्पनिक है। इसका उद्देश्य केवल निर्गुण आन्दोलन को विफल करना था। आप देखें कि यह सारा वाद-विवाद उद्धव और गोपियों के बीच चलता है। उद्धव निर्गुण का पक्ष लेता है और गोपियाँ निर्गुण का खण्डन करती हैं। यह सारा तर्क-वितर्क उसी तरह का है, जो हमें कबीरवाणी में मिलता है। जिस प्रकार तुलसी ने रामचरित मानस की रचना करके दलित वर्गों में राम को स्थापित करने का काम किया था, उसी प्रकार सूर ने दलित जातियों में कृष्ण को स्थापित करने का काम किया था। ध्यान रहे कि उद्धव गोपियों को कथा सुनाते हैं, जो दलित जातियों की है और दलित वर्गों में ही कबीर की क्रान्ति का प्रभाव था। सूर की यह बात इस बात का प्रमाण है, जिसमें गोपियाँ अपने को वर्णहीन लघु जाति का बताती हैं--
हम तो दुहूं भाँति पफल पायो।
जो ब्रजनाथ मिलै तो नीको, नातरू जग जस गायो।।
कहं वै गोकुल की गोपी सब बरनहीन लघु जाती।
कहं वै कमला के स्वामी संग मिल बैठीं इक पाँति।।
निगम ध्यान मुनिज्ञान अगोचर ते भए घोष निवासी।
ता ऊपर अब सांच कहो धौं मुक्ति कौन की दासी।।
जोक कथा, पा लागों ऊधो, ना कहु बारम्बार।
सूर स्याम तजि और भजै जो ताकी जननी छार।।
                इस पद में यही नहीं स्थापित किया गया है कि जो कृष्ण को छोड़कर अन्य का भजन करता है, उसकी माता को धिक्कार है, बल्कि मुक्तिशब्द का भी उपहास उड़ाया गया है, यह कहकर कि वह किसकी दासी है? इसी पद में वेद भी कृष्ण का भजन करते हैं।
                सूर के काव्य पर हम तीन तरह से विचार किये जाने की जरूरत है। एक, इस दृष्टि से कि सूर का काव्य पूरी तरह कल्पना की उड़ान है और उसमें कुछ भी ऐतिहासिकता नहीं है। वह केवल दलित वर्गों में निर्गुण दर्शन की क्रान्ति को रोकने के मकसद से नाम, रूप, लीला, धाम की वैष्णवी भक्ति को स्थापित करने के लिये रचा गया है। एक पद में सूर गोपियों के मुख से सीधे सवाल करते हैंµ
निर्गुण कौन देस को बासी?
मधुकर, हंसि समुझाय सौंह दै बूझति साँच, न हांसी।।
कौ है जनक, जननि को कहियत, कौन नारि, को दासी?
कैसो बरन भेस है कैसो केहि रस कै अभिलाषी।।
                यह एक कवि की नहीं, ब्राह्मण की समस्या है कि वह सगुण से बाहर नहीं रह सकता और सगुण भी वह जिसके माता-पिता हों, जिसका श्रेष्ठ और उच्च वर्ग हो, जो पत्नी और दासी रखता हो। ध्यान रहे कि भारतीय दर्शन में निर्गुण पूरी तरह दलित सन्तों की नयी खोज थी, जो ब्राह्मणों के अवतारवाद और आवागमन के मायाजाल से आम-आदमी की मुक्ति मा मार्ग था और, डा. धर्मवीर ने ठीक ही लिखा है कि ब्राह्मण चिन्तन ने निर्गुण और सगुण दोनों की खोज कर डाली। सगुण में अपना मत सुरक्षित रखा तथा निर्गुण में जाकर कबीर के दर्शन को मिटाना चाहा।(कबीर नई सदी में, भाग- 2, पृष्ठ 152) दलित सन्तों का निर्गुण देहरहित था, इसलिये वहाँ न जाति का प्रश्न था और न वर्ण का। पर, ब्राह्मण की समस्या यह है कि उसका काम बिना जाति और वर्ण के नहीं चलता। देह के साथ न सिपर्फ वर्णव्यवस्था जीवित रहती है, बल्कि आवागमन का पूरा मायाजाल भी कायम रहता है और इसके साथ शोषण की क्रूर व्यवस्था भी बनी रहती है।
                दूसरी इस दृष्टि से विचार करने की आवश्यकता है कि सूर-काव्य में अपने समय के समाज की घोर उपेक्षा है। दलित समाज उस समय किस किस्म के दुखों और समस्याओं से गुजर रहा था, उसकी कोई अभिव्यक्ति सूर में नहीं मिलती है। उसमें आँखिन देखीका यथार्थ चित्राण बिल्कुल नहीं है, जिसे दलित कवियों ने अपने काव्य का आधार बनाया था। यदि साहित्य की दृष्टि से ही देखा जाय तो हमें सोचना होगा कि वर्णहीन लघु जाति की गोपिकाओं को क्या सगुण की जरूरत थी या उनकी सामाजिक संघर्षशीलता को उभारने की जरूरत थी? सूर ने यह नहीं किया, तो इसलिये कि दलित वर्गों में सामाजिक संघर्ष को दबाने के लिये ही उनका रचनाकर्म अस्तित्व में आया था। ब्राह्मण चिन्तन यह सहन नहीं कर पा रहा था कि दलित वर्ग उस निर्गुण-धर्म से प्रभावित हों, जो वर्णव्यवस्था का खण्डन करता है। इसे रोकने के लिये ब्राह्मण चिन्तन किसी भी हद तक जा सकता था। अतः तुलसी और सूर की काव्य-विशेषताएँ निर्गुण पर सगुण की स्थापना के सिवा कुछ नहीं हैं।
                सूर-काव्य के सम्बन्ध में तीसरी इस दृष्टि से भी विचार करने की जरूरत है कि भ्रमर गीत नारी अस्मिता के साथ क्रूर खिलवाड़ करते हैं। ये नारियाँ भी दलित हैं, जिन्हें कृष्ण के प्रणय में पागल दिखाया गया है। कृष्ण के प्रेम में ब्राह्मण स्त्रियाँ पागल क्यों नहीं होती हैं? शिवकुमार मिश्र सूर के भ्रमर गीत पर लगभग मुग्ध होते हुए लिखते हैं, ‘‘चाँदनी रात है, यमुना का किनारा है, हवा में झूमते लहराते अरण्य कुुंज हैं। ऐसे ही मादक माहौल में कृष्ण की बंशी बज उठती है, और बंशी की ध्वनि को सुनते ही अपने घर-परिवार, लोक-लाज, कानून-कायदों को एक ओर रख, उनका तिरस्कार करते हुए गोपियाँ दौड़ पड़ती हैं कृष्ण के साथ यमुना के तट पर रास रचाने और यह रास सारी रात चलता है, जिसमें सब बेसुध हो जाते हैं।’’ ( भक्ति आन्दोलन और भक्ति काव्य, पृष्ठ 89)
                क्या यह दलित स्त्रियों की इज्जत के साथ खिलवाड़ नहीं है? एक कृष्ण का इतनी स्त्रियों के साथ रास रचाना ब्राह्मण चिन्तन के लिये भले ही ठीक हो, पर दलित चिन्तन इसे कैसे सहन कर सकता है? ब्रज की सारी गोपियाँ, जो दलित स्त्रियाँ हैं, कृष्ण के साथ रात-भर रास रचाती हैं, और एक भी ब्राह्मण स्त्री उसमें शामिल नहीं है, इसका क्या अर्थ है? कोई बंशी बजाये और उसे सुनकर सारी दलित स्त्रियाँ रास रचाने पहुँच जायें, क्या यह सम्पूर्ण दलित स्त्रियों के लिये अपमानजनक नहीं है? और, ब्राह्मण चिन्तन इस अस्मिता-हनन पर मुग्ध है, तो शर्म की बात है। शिव कुमार मिश्र का ब्राह्मण चिन्तन तो और भी निर्लज्जता पूर्ण है, जब वे लिखते हैं, ‘‘नारी-मुक्ति की यह वह परिकल्पना है, जो सामन्ती समाज में नारी की विगर्हणीय स्थिति को लक्ष्य कर सूर ने अपने यहाँ प्रस्तुत की है। नारी अस्मिता को पहचानने वाला और नारी मन के स्वप्नों, उसकी आशाओं, आकांक्षाओं को मानवीय संवेदना की समूची गहराई तथा व्याप्ति के साथ उभारने और अंकित करने वाला इतना बड़ा रचनाकार उस युग में दूसरा नहीं हुआ।’’ (सन्दर्भ, वही)
                यह ब्राह्मण चिन्तन का दिवालियापन है कि वह दलित स्त्री के अपमान को नारी मुक्ति की  परिकल्पना बता रहा है। स्त्री की यौन-उन्मुक्तता को नारी-मुक्ति की संज्ञा कोई विक्षिप्त चिन्तन ही दे सकता है। लेकिन यह स्पष्ट रूप से सामन्ती समाज में दलित नारी की अस्मिता का सबसे बड़ा हनन है, जिसे दलित चिंतन कैसे बर्दाश्त कर सकता है।
                हिन्दी साहित्य में निर्गुण-सगुण की इस लड़ाई में ब्राह्मण चिन्तन ने दलित सन्त कवियों को कहीं का भी नहीं छोड़ा है, उनका इतना विकृतीकरण किया है और उन्हें वैष्णवी बनाने में अपनी पूरी शक्ति लगा दी है, उसके साथ दलित चिन्तन की मुठभेड़ आज बहुत जरूरी है, अन्यथा सामन्तवाद में मुक्ति की परिकल्पना और ब्राह्मणवाद में सामाजिक समरसता की ब्राह्मण-चिन्तन की स्थापनाएँ साहित्य के विद्यार्थियों को सदैव भ्रमित करती रहेंगी।

31.12.2001