शनिवार, 1 नवंबर 2014

किस भगवान ने गरीबों का भला किया है?
(कॅंवल भारती)
चाटुकार लोग कितनी जल्दी अपनी निष्ठा बदलते हैं, इसका ताजा उदाहरण लोकेश चन्द्र हैं, जिन्हें मोदी सरकार ने आईसीसीआर का नया अध्यक्ष नियुक्त किया है। जीवन भर कांग्रेस में रहकर खूब मलाई खाई और पद्मभूषण का तमगा हासिल किया। अब मोदी की चाटुकारिकारिता करके भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद के उपाध्यक्ष से अध्यक्ष बन गए हैं। यानी उन्होंने अपने हिन्दुत्ववादी मिथकीय विचारों से कांग्रेस में रहकर भी प्रदूषण फैलाया और अब हिन्दूराष्ट्रवादियों की सरकार में और भी स्वतन्त्र होकर प्रदूषण फैलाएंगे। उनकी चाटुकारिता के नमूने ‘इंडियन एक्सप्रेस’ (1नवम्बर 2014) में शुभाजित राय को दिए गए उनके साक्षाकार में देखे जा सकते हैं।  आप भी दखिए, वह क्या कहते हैं।
लोकेश चन्द्र कहते हैं, ‘मोदी महात्मा गाँधी से भी आगे निकल गए हैं, क्योंकि मोदी विचारों के व्यक्ति हैं, विचारधारा के नहीं।’ चलिए, कोई तो हुआ, जिसने गाँधी को अप्रासंगिक कर दिया।
एक सवाल के जवाब में लोकेश चन्द्र कहते हैं, ‘कार्लमार्क्स  ने गरीबी पर अनेक ग्रन्थ लिखे हैं। पर उनका अपना क्या योगदान था? जबकि मोदी गरीबों के जीवन पर सार्थक प्रभाव डालते हैं। जन धन योजना को देखिए। वे बहुत खुले एप्रोच वाले हैं। वे गरीबों के लिए भगवान जैसे हैं। वे भगवान के अवतार हैं।’ इन महाशय को यह भी नहीं मालूम कि हिन्दुओं के किसी भगवान ने गरीबों का भला नहीं किया। भगवान ने तो अवतार भी गाय और ब्राह्मणों की रक्षा के लिए लिया है। गरीबों के उद्धार और कल्याण के लिए एक भी अवतार भारत की धरती पर नहीं उतरा। यदि मोदी भी, बकौल लोकेश चन्द्र, भगवान के अवतार हैं, तो अवतारों की परम्परा के विरुद्ध कैसे जा सकते हैं? वे भी कारपोरेट और ब्राह्मणों की सेवा के लिए ही अवतरित हुए हैं। जहाँ तक कार्लमार्क्स  के योगदान की बात है, तो कोई पल्ले दरजे का मूर्ख ही उनके योगदान पर सवाल उठा सकता है। मोदी और गाँधी के बीच वह चाहे जो तुलना करें, पर माक्र्स से मोदी का क्या मुकाबला? एक वैज्ञानिक भौतिकवादी समाजवादी से एक हिन्दूवादी-पूंजीवादी राजनेता की तुलना कैसे की जा सकती है?  मार्क्स  ने दुनिया के मजदूरों को एक होने का नारा दिया था। यह पूंजीवादी-सामन्तवादी व्यवस्था के विरुद्ध मजदूरों को संगठित करने का नारा था। मोदी ने गरीबों के लिए क्या नारा दिया है? क्या उन्होंने गरीबों को उनका खून चूसने वाली कारपोरेट व्यवस्था के खिलाफ एक जुट होने का नारा दिया है? फिर कैसे उन्हें गरीबों का भगवान कहा जा सकता है?
इसी साक्षात्कार में लोकेश चन्द्र हिन्दू मूल्यों में आस्था रखने के कारण भी मोदी को भगवान मानते हैं। वह कहते हैं, ‘उन्होंने (मोदी ने) नवरात्र में नौ दिनों तक उपवास रखा और उपवास में भी वे बराबर काम करते रहे। वे भगवान के अवतार हैं। इससे पता चलता है कि मूल्यों (आध्यात्मिक) से उनका कितना जुड़ाव है। ये मूल्य ही भारत के आधार हैं।’ कोई लोकेश जी से पूछे कि नवरात्र में उपवास रखने और काम करते रहने वाले मोदी अकेले हिन्दू प्राणी तो हैं नहीं, लाखों हिन्दुओं ने व्रत रखा होगा और वे सभी काम भी बराबर करते रहे होंगे, तब वे सब भी भगवान क्यों नहीं हैं? उपवास रखने और काम करते रहने के कारण अकेले मोदी ही भगवान कैसे हो सकते हैं? और नौ दिन होते ही कितने हैं? कभी उन्होंने मुसलमानों का खयाल किया है? वे रमजान में तीस दिन उपवास रखते हैं। मोदी तो फिर भी उपवास में पानी पीते रहे थे, जबकि मुसलमान तो उपवास में पानी भी नहीं पीते हैं। और इस दिनों में वे निष्क्रिय होकर घर में नहीं बैठते हैं, बल्कि अपने कार्यों में सक्रिय रहते हैं। मूल्यों से जुड़ने का मतलब यह नहीं है कि वे भगवान हो गए।
एक बेहद हास्यास्पद बात भी लोकेश चन्द्र अपने साक्षात्कार में कहते हैं, ‘मोदी का न कोई बेटा है और न कोई दामाद है। भारत को ऐसा ही प्रधानमन्त्री चाहिए।’ अब एक सीधी सी बात उनके दिमाग में नहीं आई कि जब उन्होंने अपनी पत्नी को अपने साथ रक्खा ही नहीं, तो कहाँ  से उनका बेटा और दामाद होगा? और यह कहना तो चाटुकारिता की हद है कि भारत को मोदी जैसा ही प्रधानमन्त्री चाहिए, बिना बेटा और दामाद वाला यानी अविवाहित। यानी अब तक जितने भी विवाहित और बेटा-दामाद वाले प्रधानमन्त्री हुए हैं, वे सभी नाकारा थे, अटलबिहारी वाजपेयी भी?
अब भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद के अध्यक्ष के रूप में लोकेश चन्द्र क्या कार्य करेंगे, यह पूछने पर वह बताते हैं, ‘वह महाभारत तथा रामायण पर आधारित कार्यक्रमों के जरिए भारत से दक्षिण-पूर्व एसियन देशों को जोड़ना चाहते हैं। वह इंडोनेशिया, कंबोडिया और लाओस के साथ मिलकर रामायण-महाभारत आधारित कार्यक्रमों का आयोजन कर सकते हैं।’ यह है उनका भारतीय इतिहास अनुसंधान का कार्य, जो मिथकों पर आधारित है, जिसकी कोई ऐतिहासिकता नहीं है और जो ब्राह्मणवाद की विजय गाथाएं  के सिवा कुछ नहीं हैं।

(1 नवम्बर 2014)
हुनर को खत्म करने की साजिश
(कॅंवल भारती)
जिन्होंने भी दलित लेखक श्योराजसिंह बेचैन की आत्मकथा ‘मेरा बचपन मेरे कंधों पर’ पढ़ी है, वे जानते होंगे कि किस तरह लेखक ने मृतक पशुओं को उठाने और उनकी खाल उतारने से लेकर खेत-खलिहानों तक में मजदूरी करके अपना और अपने भाई-बहनों का पेट पाला था। मेरा सवाल यहाँ यह है कि अगर बालश्रम कानून के तहत उस बालक को मजदूरी करने से रोक दिया गया होता, तो उसका और उसके परिवार का क्या हुआ होता?निश्चित रूप से वे भूखे मरते। क्योंकि जिस समाज-व्यवस्था में हम जी रहे हैं, वह इतनी निर्दयी है कि किसी के प्रति भी अपनी कोई जिम्मेदारी नहीं समझती है। आज भी करोड़ों घरों में तभी चूल्हा जलता है, जब उनके सदस्य दिनभर मजदूरी करके शाम को पैसा लेकर घर लौटते हैं। जिस दिन उन्हें काम नहीं मिलता है, उस दिन उन्हें भूखे ही सोना पड़ता है। और, हाँ, यह भी बता दॅं कि सिर्फ घर के बड़े लोग ही काम पर नहीं जाते हैं, बल्कि बच्चे और महिलायें भी मजदूरी पर जाते हैं। गरीब लोग आगे की  सोचते हैं। इसलिए वे अपने बच्चों को किसी हुनर में डालने की सोचते हैं। वे उन्हें छोटी उमर से ही जरी, चिकन, टेलरिंग, बिजली-मरम्मत, स्कूटर-कार मरम्मत, ड्राइविंग, राजमिस्त्री, पिलम्बर, बढ़ई, लोहार, जूता और बीड़ी बनाने आदि के काम में डाल देते हैं। दो-चार साल में ही वह बच्चा इतना काम सीख जाता है कि उसे कुछ पैसे भी मिलने लगते हैं, और घर को भी एक बड़ी राहत मिलती है। अब बालश्रम कानून बन जाने से 16 साल से कम उमर के बच्चे को कोई काम नहीं सिखाता, उन्हें मजदूरी भी नहीं मिलती। जो भी उन्हें काम सिखाएगा या काम पर रखेगा, उसे जेल जाना पड़ेगा। फिर क्यों कोई मास्टर उन्हें काम सिखाएगा या काम पर रखेगा?
निश्चित रूप से इन बच्चों का बचपन उनके कंधों पर ही बीतता है। अब सवाल यह है कि भारत में ऐसे करोड़ों बच्चे हैं, जो अपना बचपन अपने कंधों पर ढो रहे हैं। समाज उनके लिए क्या करता है? चलो समाज की छोडि़ए, सरकार भी उनके लिए क्या कर रही है? सरकार ने तो एनजीओज के दबाव में कानून बनाकर 16 वर्ष से कम उमर के बच्चों को काम पर रखने को अपराध घोषित कर दिया। सरकार और एनजीओज कहते हैं कि बच्चों को खेलने-कूदने की उमर में काम नहीं करना चाहिए, उन्हें खेलना-कूदना चाहिए और स्कूल जाना चाहिए। सुनने में ये बातें बहुत अच्छी लगती हैं। पर, वे कैसे खेलेंगे-कूदेंगे और स्कूल जाएंगे, जबकि बुनियादी सुविधाएं तक उनके पास नहीं हैं, दो जून की रोटी तक उन्हें ठीक से नसीब हो नहीं रही है, ठीक-ठाक घर तक उनके पास है नहीं? ऐसे में वे पढ़ने जाएंगे? चलो यहाँ यह भी मान लेते हैं कि सरकारी स्कूलों में मुफ्त शिक्षा दी जा रही है,और यह भी मान लेते हैं कि सरकार उन्हें खाना-कपड़ा भी मुफ्त दे रही है, लेकिन क्या यह भी मान लें कि पढ़ने-लिखने के बाद सरकार उन्हें नौकरी भी दे रही है? किसी को विश्वास हो तो वह मान सकता है, पर मैं यह मानने को तैयार नहीं हूँ कि सरकार ने उन्हें नौकरी देने की भी गारन्टी दी है। अगर सरकार ने नौकरी की गारन्टी दी होती, तो ‘मनरेगा’ लाने की जरूरत नहीं पड़ती। मतलब साफ है कि सरकार मिट्टी खोदने वाले मजदूर तो चाहती है, पर बाल मजदूर नहीं चाहती है। अतः, जब सरकारी स्कूलों में पढ़ने-लिखने के बाद उन्हें नौकरी मिलने वाली नहीं है, (क्योंकि हमारे देश में तृतीय और चतुर्थ श्रेणी की नौकरियों में जो सिस्टम काम करता है, उसमें लाखों रुपयों की रिश्वत चलती है, जिसकी व्यवस्था वे गरीब लोग नहीं कर सकते,) तो क्या उनके लिए बचपन में ही किसी हुनर को सीख कर अपने पैरों पर खड़े होना बेहतर नहीं है?
मैं यहाँ अपने दो संस्मरण ( मैं इन्हें संस्मरण ही कहूँगा ) आपके साथ शेयर करना चाहता हूँ. पहला संस्मरण अपने एक टेलर का है, जहाँ से मैं पिछले तीस सालों से अपने कपड़े सिलवाता आ रहा हूँ । एक दिन मैंने उससे कहा, ‘भई, क्या बात है? काम कुछ ढीला-ढाला लग रहा है?’ उसने जो जवाब दिया, वह बेहद गौरतलब है। उसका जवाब था-‘कारीगर कहाँ हैं? अब चाइना से कारीगर मंगाने पड़ेंगे।’ मैंने इसका मतलब जानना चाहा, तो उसने बताया-‘यहाँ 16 साल से नीचे के बच्चों को काम सिखाने पर पाबन्दी है। उन्हें काम पर रखकर कौन जेल जाएगा?  इसलिए नए कारीगर अब कहाँ आ रहे हैं? जो कारीगर हैं, उन्हीं के भरोसे चल रहे हैं।’ भारत के शिल्प-कौशल के लिए यह गम्भीर चिन्ता है। यह सिर्फ टेलरिंग के क्षेत्र की ही समस्या नहीं है, बल्कि दूसरे तकनीकी कामों की भी यही स्थिति है। लग रहा है जैसे विदेशों की बड़ी कम्पनियों के माल के लिए भारत के हुनर को खत्म किया जा रहा है। यह कहा जा सकता है कि 16 साल के लड़कों पर तो पाबन्दी नहीं है, उन्हें सिखाइए काम। पर सच यह है कि हुनर छोटी उमर से सीखा जाता है, 16 साल की उमर सीखने की नहीं होती। अगर किसी गरीब घर के बच्चे ने 16 साल की उमर तक कोई काम नहीं सीखा है,तो वह मजदूरी ही करेगा या शहरों में रिक्शा चलाएगा।
दूसरा संस्मरण एक ऐसे शहरी नवयुवक का है, जिसने दो लाख रुपये रिश्वत देकर कचहरी में चपरासी की नौकरी हासिल की है। यह मेरे ही शहर का वाकया है। अब वह इस नौकरी से परेशान है। उसकी परेशानी का कारण वह काम है, जो उसे सुबह 7 बजे से रात के 9 बजे तक करना पड़ता है। वह सुबह 7 बजे साहब के बंगले पर पहुँचता है, साफ-सफाई करता है, वाशिंग मशीन में उनके कपड़े धोता है, फिर सबको नाश्ता कराता है, और साहब के बच्चों को स्कूल की बस तक छोड़ता है, जिसमें सवा दस बज जाते हैं। उसके बाद वह आफिस जाता है। वहाँ साहब केबिन में बैठे रहते हैं और वह साहब और स्टाफ को चाय-पानी लाने का काम करता रहता है। पांच बजे जब आफिस बन्द होता है, तो उसे फिर साहब के बंगले पर जाना पड़ता है। वहाँ साहब उसे खाने-पीने का सामान और सब्जी लाने के लिए मार्कीट भेजते हैं। यह सब सामान लाने के बाद वह रसोई में काम करता है और साहब को डिनर कराने के बाद जब वह अपने घर पहुँचता है, तो रात के नौ बज जाते हैं। वह अपने परिवार को नहीं देख पाता और घर में सब्जी न बनने पर अपनी सारी भड़ास अपनी बीबी पर उतारता है। वह नवयुवक इस नौकरी को छोड़ना चाहता है, पर जो मोटी रकम उसने कर्ज लेकर दी है,उसकी वजह से वह फॅंसा हुआ है। अगर इस युवक ने कोई हुनर सीख लिया होता, तो क्या वह यह ‘जलील’ नौकरी करता? ठाठ से अपना व्यवसाय चला रहा होता और कुछ दूसरे लोगों को भी काम सिखाकर उन्हें रोजगार दे रहा होता।
इसलिए, कैलाश सत्यार्थी जी,  इस गरीब-विरोधी बालश्रम कानून को खत्म कराइए या फिर यह बताइए कि आप किस का भला कर रहे हैं? गरीबों का भला तो इस कानून से कतई नहीं हो रहा है. इससे भला तो कारपोरेट का ही हो रहा है. वे ही अपने संस्थानों में लाखों रूपये लेकर हुनर सिखायेंगे. आपको तो नोबेल पुरस्कार मिल गया, पर इन बाल मजदूरों को क्या मिला? आपको पुरस्कार में कई करोड़ रुपये मिल गए,  आप जैसा चाहें इन रुपयों का इस्तेमाल कर सकते हैं। अगर कैलाश जी, पुरस्कार में मिली इस सारी धनराशि को भी इन बालश्रमिकों में बाँट देंगे, तब भी समस्या को हल नहीं कर पाएंगे। यह है वह यथार्थ,  जिसे वे देखना नहीं चाहते।
कैलाश के समर्थक चिल्ला-चिल्लाकर कह सकते हैं कि उन्होंने बंधुआ मजदूरों को मुक्त कराया है। वे अपने मिशन में ठीक हो सकते हैं, पर क्या उन्होंने इस यथार्थ पर विचार किया? काश, उन्होंने शोषक वर्ग को कुचलने के लिए आन्दोलन चलाया होता, बड़े जमीदारों, भूमाफियाओं और कारपोरेट के खिलाफ आन्दोलन चलाया होता। काश उन्होंने जरूरत से ज्यादा जमीन हथियाने वालों के खिलाफ आन्दोलन चलाया होता। और काश उन्होंने गरीबों की बुनियादी सुविधाओं को भकोसने वाली सरकारी नीतियों के खिलाफ आन्दोलन चलाया होता। लेकिन, तब उनको नोबेल नहीं मिलता।
(30 अक्टूबर 2014)   

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Kanwal Bharti
C - 260\6, Aavas Vikas Colony,
Gangapur Road, Civil Lines, Rampur 244901 

शुक्रवार, 24 अक्टूबर 2014

क्या डॉ. आंबेडकर विफल हुये?
कॅंवल भारती
                दलित चिन्तक एवं लेखक आनन्द तेलतूमड़े ने कहा है कि आंबेडकर के सारे प्रयोग, ब्राह्मणवाद के प्रति उनकी नफरत के कारण, विफलता में समाप्त हुये। यह बात उन्होंने चण्डीगढ़ में 'जाति प्रश्न और मार्क्सवाद' विषय पर आयोजित एक पाँच दिवसीय (12-16 मार्च 2013) संगोष्ठी में कही थी। कात्यायनी ने मुझे भी इस संगोष्ठी में आमन्त्रित किया था, आमन्त्रण पत्र में कुछ केन्द्रीय मुद्दे भी दिये गये थे, जिनमें जाति प्रश्न पर मार्क्सवादी प्रतिपक्ष था। मैं आंबेडकरवादी पक्ष रखने के मकसद से इस संगोष्ठी में जाने के लिये बहुत उत्सुक था, पर अपने घुटने की तकलीफ की वजह से नहीं जा सका था। लेकिन संगोष्ठी की जो रिपोर्ट पढ़ने को मिली, वह दलितों को निराश करती है।
पहले आनन्द तेलतूमड़े की बात को लें। उन्हें मैं पिछले कुछ महीनों से जानता हूँ। वे मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय, उदयपुर में एक सेमिनार (20-21 नवम्बर 2012) में मुख्य अतिथि थे और मैं मुख्य वक्ता। संयोग से हम दोनों के पेपर भी एक ही विषय पर थे- आंबेडकर और मार्क्स के विचारों पर। लेकिन फर्क यही था कि उनका पेपर अंग्रेजी में था, मेरा हिन्दी में। पर, मेरे पेपर में भी आलोचना के केन्द्र में मार्क्सवादी थे और उनके पेपर में भी। लेकिन एक भिन्नता बौद्ध धर्म को लेकर जरूर थी, जिसे मैं दलित जातियों में जाति-विनाश के रूप में देखता हूँ और वे उसे एक विफल प्रयोग मानते हैं। जब वे दलित आन्दोलन और राजनीति पर चर्चा करते हैं, तो जाति की राजनीति का विरोध करते हैं, जो सही भी है और जैसा कि मैं भी अक्सर कहता हूँ कि जाति की राजनीति डॉ. आंबेडकर के समाजवादी विचारों के विरुद्ध पूँजीवाद को मजबूत करती है। लेकिन जब वे जाति व्यवस्था पर आंबेडकर के लेखन पर चर्चा करते हैं, तो वे उसके विरोधी हो जाते हैं। कम्युनिस्टों और ब्राह्मणवादियों की दृष्टि में उनका यही विरोध उन्हें आंबेडकर-विरोधी बना देता है। चण्डीगढ़-संगोष्ठी में आनन्द तेलतूमड़े द्वारा जो व्याख्यान दिया गया, उसे यू-ट्यूब पर सुनने के बाद मुझे भी वे आंबेडकर-विरोधी ही नजर आये।उन्होंने कहा कि अंबेडकरवाद नाम की कोई चीज नहीं है और आंबेडकर की 'भारत में जाति' तथा 'जाति का उन्मूलन' पुस्तकों में उनके सभी समाधन गलत हैं। लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि वे समाधन किस तरह गलत हैं, न ही वे आंबेडकर का कोई अकादमिक मूल्याँकन कर सके।
                संगोष्ठी के आमन्त्रण-पत्र में दी गयी तहरीर इस बात की गवाही है कि संगोष्ठी का मकसद ही जाति प्रश्न पर आंबेडकर के नेतृत्व की असफलता और अप्रासंगिकता को रेखांकित करना था।इसलिये मैं इस आलेख में पहले उन्हीं बिन्दुओं पर चर्चा करना चाहता हूँ, जो संगोष्ठी के आमन्त्राण-पत्र में उठाये गये हैं। वे कहते हैं कि दलित प्रश्न को हल करने की प्रक्रिया के बिना व्यापक मेहनतकश अवाम की वर्गीय एकजुटता और उनकी मुक्ति-परियोजना की सफलता की कल्पना नहीं की जा सकती। बात सही है, लेकिन जब वे ये कहते हैं कि 'जो मार्क्सवाद को सच्चे अर्थों में आज भी क्रान्तिकारी व्यवहार का मार्गदर्शक मानते हैं, उनके लिये यह अनिवार्य हो जाता है कि वे मार्क्सवादी नज़रिये से जाति प्रश्न के हर पहलू की सांगोपांग समझदारी बनाने की कोशिश करें, शोध्-अध्ययन और वाद-विवाद करें', तो सवाल यह जरूर पैदा होता है कि जब मार्क्सवाद में जाति का प्रश्न है ही नहीं, तो उस नज़रिये से शोध-अध्ययन और वाद-विवाद कोई कर भी कैसे सकता है? दुनिया जानती है कि मार्क्सवाद वर्ग की बात करता है, जाति की नहीं। फिर मार्क्सवादी नज़रिये से जाति के प्रश्न पर चर्चा करने की जरूरत क्या है? क्या इसका यह अर्थ नहीं है कि वे एक गम्भीर बीमारी का इलाज उस पैथी में ढूँढ रहे हैं, जिसका उसमें इलाज ही नहीं है।
वे एक और बिन्दु उठाते हुये कहते हैं, 'ऐसे मार्क्सवादी अकादमीशियनों की कमी नहीं है, जो सबऑल्टर्न स्टडीज़ और 'आइडेण्टिटी पॉलिटिक्स'की पद्धति की मार्क्सवादी पद्धति के साथ खिचड़ी पकाकर 'वर्ग अपचयनवादी दोषों'को दुरुस्त करने की कोशिश कर रहे हैं। अतः इस विषय पर विस्तृत बहस-मुबाहसे की और अधिक जरूरत है।'मतलब साफ है कि उन्हें दलित अस्मिता की राजनीति पसन्द नहीं है। वे अपनी विचारधरा के साथ दलित विचारधरा की खिचड़ी नहीं चाहते। सम्भवतः, इसीलिये वे मार्क्सवाद और आंबेडकरवाद का समन्वय भी नहीं चाहते हैं, जिसका उल्लेख संगोष्ठी में पढ़े गये उनके आधर-आलेख में मिलता है। इसका अर्थ यह हुआ कि जो दलित बुद्धिजीवी जाति और वर्ग-विहीन समाज का सपना लेकर मार्क्स और आंबेडकर की विचारधरा के साथ चल रहे हैं, वे उनकी नजर में गलत काम कर रहे हैं। इसका उन्हें बिल्कुल अहसास नहीं है कि इससे सामाजिक क्रान्ति को कितना धक्का लगेगा। वे सिर्फ मार्क्सवाद के जरिये क्रान्ति लाना चाहते हैं, जो वे आज तक नहीं ला सके। भारत के कम्युनिस्ट डॉ. आंबेडकर के समय से क्रान्ति का ढोल पीटते आ रहे हैं, पर सफल नहीं हो सके। वे भरसक दलितों पर विजय पाने की कोशिश करते हैं, परन्तु आज तक दलितों को अपनी विचारधरा से नहीं जोड़ पाये। किसी समय उत्तर प्रदेश के पूर्वी जिलों में कम्युनिस्ट पार्टी से बीस-बाईस विधायक और आधा दर्जन के करीब सांसद हुआ करते थे। पर, आज क्या स्थिति है? वह जनाधर रेत की दीवार की तरह भरभरा कर क्यों ढह गया? कहाँ चला गया वह सारा जनाधार? क्या इसका कारण यह नहीं है कि वे कम्युनिस्ट थे ही नहीं, ब्राह्मणवादी मानसिकता वाले सवर्ण थे? वे छद्म कम्युनिस्ट थे और अपनी ब्राह्मणवादी मानसिकता से मुक्त ही नहीं हुये थे। इसलिये जब दलित उभार की आँधी चली, तो वे अपने जातीय अहं की तुष्टि के लिये उन्हीं पार्टियों में चले गये, जहाँ उनका वर्चस्व था।
अतः, कहना न होगा कि भारत का कम्युनिस्ट आन्दोलन इसी जातीय मानसिकता के कारण दलित जातियों में लोकप्रिय नहीं हो सका। मार्क्सवादियों का यह कहना सही है कि अस्मिता की राजनीति ने दलितों में वर्ग-चेतना विकसित नहीं होने दी। पर, दलितों का यह कहना भी सही है कि कम्युनिस्ट नेतृत्व अपने ब्राह्मणवादी चोले से बाहर ही नहीं निकला। उसने यह समझने की कोशिश ही नहीं की कि दलितों के लिये अस्मिता सबसे ज्यादा जरूरी चीज क्यों बन गयी? क्यों वे आज भी आरक्षण को अपने लिये सबसे ज्यादा जरूरी समझते हैं? मुझे नहीं लगता कि किसी मार्क्सवादी ने इस सवाल पर विचार किया होगा। अगर किसी ने किया भी होगा, तो सिर्फ इस वजह से कि राजनीतिक मंच पर वह दलित-विरोधी न समझ लिये जायें। क्या मार्क्सवादी यह जानने की कोशिश करेंगे कि उनसे कहाँ गलती हुयी है? यह गलती उनसे उसी दौर में हुयी, जब देश में आजादी की लड़ाई चल रही थी। तब उन्होंने उसी काँग्रेस का साथ दिया था, जो राजाओं-महाराजाओं, ब्राह्मणवादियों और पूँजीवादियों के साथ खड़ी थी। उस समय डॉ. आंबेडकर पूँजीवाद और ब्राह्मणवाद के खिलाफ समाजवादियों से अपीलें कर रहे थे कि वे काँग्रेस के विरुद्ध संयुक्त मोर्चा बनायें। पर, समाजवादी नेता तब जाति के सवाल पर डॉ. आंबेडकर के साथ खड़े होने के लिये बिल्कुल भी तैयार नहीं थे। वे सिर्फ वर्ग की ही बातें करते थे, जो वे आज भी करते हैं। जातियों में वर्ग हैं, इससे इन्कार नहीं है। पर, वे इसे क्यों नहीं स्वीकार करते कि भारत में वर्ग जाति के बाद आता है। तब वे जाति व्यवस्था पर नजर क्यों नहीं डालते, जिसने एक बड़ी आबादी को सारे अधिकारों और मनुष्य होने की गरिमा तक से वंचित करके रखा हुआ था। क्या इस आबादी को समाज में अधिकार और मनुष्य की गरिमा दिलाने का डॉ. आंबेडकर का आन्दोलन गलत था? क्या यह दलितों की स्वतन्त्रता और मुक्ति की लड़ाई नहीं थी? आज जिस पूँजीवादी समाज में हम सब रहते हैं, उसमें यदि दलित पढ़-लिख गये हैं, शासन-प्रशासन में आ गये हैं, साहित्यकार और कलाकार हो गये हैं, उनमें एक मध्य वर्ग विकसित होने लगा है और कुछ उद्योगपति भी बनने लगे हैं, तो निस्सन्देह यह सब अस्मिता और भागीदारी की राजनीति के कारण हुआ है और यह भी सच है कि यह सब आरक्षण के कारण हुआ है, भले ही इससे पूँजीवाद मजबूत होता हो। लेकिन विचार का बिन्दु यहाँ यह है कि वंचित जातियाँ यह कैसे बरदाश्त कर लें कि उनको छोड़ कर बाकी सब लोग पढ़ें-लिखें, तरक्की करें, अफसर बनें, जज बनें, सारी सुविधाओं के साथ कोठियों में रहें और वे जिन्दगी भर अनपढ़, गरीब, फटेहाल मजदूर बने रहें और झुग्गी-झोंपड़ियों और फुटपाथों पर ही जिन्दगी गुजार दें। अगर अस्मिता की राजनीति ने उन्हें भी कुछ तरक्की करने का रास्ता दिखाया है, तो वे कम्युनिस्ट आन्दोलन से क्यों जुड़ेंगे, जो आज भी उनकी अस्मिता को स्वीकार करने को तैयार नहीं है। हम जानते हैं कि वर्गीय दृष्टि से यह सही नहीं है, परन्तु दलितों में वर्गों का निर्माण होने में अभी समय लगेगा, वंचित जातियों में वर्ग-निर्माण की प्रक्रिया बहुत धीमी होती है,जब वर्ग पूरी तरह बन जायेंगे, तब समाजवाद की चेतना भी दलितों में विकसित होनी ही है। पूँजीवाद का विकास ही वर्ग निर्माण की प्रक्रिया को जन्म देता है और जो दलितों में अवश्यम्भावी है।
दलित चिन्तन अक्सर इस बात को उठाता है कि स्वतन्त्रता-संग्राम के दौरान समाजवादी नेताओं ने डॉ. आंबेडकर के दलित-स्वतन्त्रता-आन्दोलन को समर्थन नहीं दिया। यह समझ में नहीं आने वाली पहेली है कि वह उनकी नजरों में समाजवादी आन्दोलन क्यों नहीं था? आज मार्क्सवादियों को इस सवाल पर आत्मचिन्तन और मन्थन करने की आवश्यकता है कि क्यों उनके नेतृत्व ने साम्राज्यवाद का विरोध तो किया, पर
ब्राह्मणवाद का विरोध नहीं किया? क्यों उनके नेतृत्व ने दलित-मुक्ति के सवाल को अपने कार्यक्रम में शामिल नहीं किया? और क्यों उन्होंने सामाजिक क्रान्ति के बिना राजनीतिक क्रान्ति को महत्व दिया? संगोष्ठी के आधार आलेख में इस सत्य को स्वीकार किया गया है कि भारत में कम्युनिस्ट पार्टी का नेतृत्व, जन्म से ही, ढीला-ढाला था। वह यह भी स्वीकार करता है कि 'जिस (कम्युनिस्ट) पार्टी के पास 1951 तक भारतीय क्रान्ति का कोई कार्यक्रम ही नहीं था, उससे सिर्फ जाति प्रश्न पर सुस्पष्ट दिशा की अपेक्षा भला कैसे की जा सकती थी?' इससे साफ पता चलता है कि डॉ. आंबेडकर के दलित-नेतृत्व के महत्वपूर्ण दौर में कम्युनिस्ट पार्टी इस योग्य ही नहीं थी कि अपने उत्तरदायित्व को समझती। जब भारत के दलितों ने 1928 में साइमन कमीशन का स्वागत किया था और 1932 में डॉ. आंबेडकर ने गाँधी के साथ दलितों के राजनीतिक प्रतिनिध्त्वि के सवाल पर पूना में समझौता किया था, तब भारत की कम्युनिस्ट पार्टी की कोई भूमिका दलितों के सन्दर्भ में नहीं थी। अब सवाल यह पैदा होता है कि तब कम्युनिस्ट पार्टी की भूमिका किस सन्दर्भ में थी? जाहिर है कि तब वह काँग्रेस के स्वतन्त्रता आन्दोलन में शामिल थी, जिसका नेतृत्व ब्राह्मणों और पूँजीपतियों के हाथों में था। उस काल में, जैसा कि श्रीपाद अमृत डांगे का कहना था, 'कम्युनिस्ट पार्टी का तात्कालिक लक्ष्य ब्रिटिश साम्राज्य को उखाड़ फेंकना'था। पर, यहाँ आंबेडकर का सवाल यह था कि ब्रिटिश साम्राज्य को उखाड़ना तो ठीक है, पर समाजवादियों के लिये यह सवाल भी गौरतलब होना चाहिये कि ब्रिटिश साम्राज्य के जाने के बाद भारत की शासन-सत्ता किनके हाथों में आयेगी, क्या वह ब्राह्मणों, सामन्तों और पूँजीपतियों के हाथों में ही रहेगी या मजदूर वर्ग के हाथों में आयेगी? समाजवादियों ने इस सवाल को हवा में उड़ा दिया। परिणाम वही हुआ, ब्रिटिश के जाने के बाद ब्राह्मणों, सामन्तों और पूँजीपतियों का ही साम्राज्य क़ायम हुआ। क्या आंबेडकर ने गलत सवाल किया था? उन्होंने यही सम्भावना व्यक्त की थी कि काँग्रेस का राष्ट्रीय आन्दोलन भारत में ब्राह्मण-राज ही कायम करेगा, जिसमें दलित-मजदूरों को कोई आजादी नहीं मिलने वाली है। इसे कोई कितना ही नकारने की कोशिश करे, पर सच यही है कि भारत में ब्राह्मणवादी और पूँजीवादी साम्राज्यवाद कायम करने में कम्युनिस्ट और समाजवादी ताकतें अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकतीं।
लेकिन चण्डीगढ़-संगोष्ठी सम्भवतः आंबेडकर को नकारे जाने के लिये ही आयोजित हुयी थी। जिस तरह संगोष्ठी
नहीं किया? और वे उपनिवेशवाद-विरोधी संघष से अलग क्यों रहे? हालांकि स्वयं डॉ. आंबेडकर ने इन सवालों पर काफी कुछ कहा है, जिसे मार्क्सवादी न पढ़ना चाहते हैं और न समझना। चालीस के दशक का राजनैतिक परिदृश्य गवाह है कि जब डॉ. आंबेडकर ने इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी बनायी थी, तो एम. एन. राय सहित सारे समाजवादी नेता उनके इसलिये विरोधी हो गये थे कि उन्होंने वर्ग-आधर पर काँग्रेस से बाहर कोई पार्टी क्यों बनायी? इन्हीं में उनके एक विरोधी अखिल भारतीय किसान सभा के अध्यक्ष स्वामी सहजानन्द भी थे, जिन्होंने यह कहते हुये सभी राजनीतिक पार्टियों को काँग्रेस में शामिल होने का आह्नान किया था कि काँग्रेस ही एकमात्र साम्राज्यवाद-विरोधी पार्टी है। इस पर डॉ. आंबेडकर ने स्वामी सहजानन्द को कहा था- यदि काँग्रेस के मन्त्री साम्राज्यवाद के विरोध में मन्त्रिमण्डल से इस्तीफा दे देते हैं, तो वह यह लिख कर देने को तैयार हैं कि वह और उनकी पार्टी काँग्रेस में शामिल हो जायेंगे। उनका कहना था, 'हम सबसे ज्यादा भूखे, सबसे ज्यादा पददलित, गरीब और पीड़ित लोग हैं। हमारे साथ जितना अन्याय हुआ है, उतना किसी के साथ नहीं हुआ है। पर, हम उच्च वर्गों के साथ अपने सारे मतभेद इसी क्षण खत्म करने को तैयार हैं, हम अपनी वर्गीय माँगों को भी छोड़ देंगे और काँग्रेस में शामिल हो जायेंगे, अगर काँग्रेस साम्राज्यवाद से लड़ने का निश्चय करती है।'लेकिन उन्होंने कहा कि यह सच नहीं है कि काँग्रेस साम्राज्यवाद-विरोधी संगठन है। वह साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्षरत नहीं है, बल्कि अपनी संवैधनिक मशीनरी का उपयोग पूँजीपतियों और अन्य निहित स्वार्थों के हितों के लिये कर रही है। वह मजदूरों और किसानों के हितों की बलि चढ़ाकर उनके शोषकों को ही पाल-पोस रही है।'यह पूरी रिपोर्ट 27 दिसम्बर 1938 के 'दि टाइम्स ऑफ इण्डिया' और 'दि बाम्बे क्रॉनिकल' में देखी जा सकती है। यहाँ यह भी गौरतलब है कि जिन स्वामी सहजानन्द ने सभी पार्टियों को काँग्रेस में शामिल होने का आह्वान किया था, बाद में उन्हें ही काँग्रेस छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा था।
इसी सवाल पर फरवरी 1938 में डॉ. आंबेडकर ने दलित कामगार सभा में बहुत विस्तार से अपनी बात रखी थी। उन्होंने मजदूरों को काँग्रेस से स्वतन्त्र संगठन बनाने पर बल दिया था, जिसका विरोध कम्युनिस्टों का वह गुट भी कर रहा था, जिसके नेता एम. एन. राय थे। आंबेडकर ने आश्चर्य के साथ कहा कि 'एक कम्युनिस्ट, और वह भी स्वतन्त्र मजदूर संगठन का विरोधी! इतना भयानक विरोधभास! इसने कब्र में लेनिन को भी पागल कर दिया होगा।' उन्होंने सवाल किया कि यदि राय जैसे कम्युनिस्टों की नजर में साम्राज्यवाद का विनाश ही मुख्य लक्ष्य है, तो क्या वे इस बात की गारन्टी दे सकते हैं कि साम्राज्यवाद के समाप्त होने के साथ ही पूँजीवाद के सम्पूर्ण अवशेष भी भारत से समाप्त हो जायेंगे? यदि नहीं, तो दलित मजदूरों को आज से ही क्यों नहीं संगठित होना चाहिये? डॉ. आंबेडकर के ये विचार क्या उन्हें साम्राज्यवादी साबित करते हैं? क्या वे समाजवादी और कम्युनिस्ट सही थे, जो उस काँग्रेस के साथ थे, जिसका जन्म ही ब्रिटिश साम्राज्यवाद की रक्षा के लिये हुआ था?
आइये, इस सवाल पर विचार किया जाये कि डॉ. आंबेडकर स्वतन्त्रता-संग्राम से अलग क्यों रहे? इस सम्बन्ध में भी उन्होंने अपना पक्ष खुलकर स्पष्ट किया है, जिसे उनके विरोधी बिलकुल भी समझना नहीं चाहते। मार्क्सवादी और दूसरे समाजवादी भी इसका जो कारण मानते हैं, वह बिल्कुल गलत है। वे मानते हैं कि आंबेडकर वायसराय की कौंसिल (मन्त्रि-परिषद) में शामिल थे, इसलिये उपनिवेशवाद के साथ थे। कौंसिल में और भी बहुत से ब्राह्मण और मुस्लिम शामिल थे, पर उन्हें कोई भी उपनिवेशवादी और अंग्रेज-भक्त नहीं कहता, जबकि वे आंबेडकर की तरह दलितों के हित के लिये नहीं, बल्कि सत्ता-सुख के लिये कौंसिल में शामिल हुये थे। चूँकि अंग्रेज देश के शासक थे, इसलिये दलित अपनी मुक्ति की अपील अंग्रेज से ही कर सकते थे, हिन्दुओं से तो नहीं, जिनके पास कुछ भी ताकत नहीं थी। हिन्दू-मुसलमान सभी अपने दुखों के लिये अंग्रेज से ही अपील करते थे। वे देशद्रोही क्यों नहीं हुये? लेकिन कम्युनिस्टों ने आंबेडकर को देशद्रोही माना, क्योंकि उन्होंने साइमन कमीशन का बहिष्कार नहीं किया था, स्वागत किया था। उसे दलितों की दुर्दशा पर ज्ञापन दिया था। गोलमेज सम्मेलन, लन्दन में उन्होंने हिन्दू प्रतिनिधियों का साथ न देकर उनका विरोध करते हुये दलितों के लिये राजनैतिक अधिकारों की माँग की थी। हाँ, यह सब उन्होंने किया था और सही किया था, क्योंकि दलित-हित में यही जरूरी था। उनके इसी संघर्ष से दलितों की मुक्ति के दरवाजे खुले। कम्युनिस्ट और हिन्दूवादी कितना ही आंबेडकर की भूमिका पर सवाल खड़े करें, पर दलित चिन्तन में वे दलित-मुक्ति की लड़ाई के अप्रितम योद्धा थे, जिन्होंने अकेले ही दलितों को संगठित किया, संघर्षशील बनाया और राष्ट्रवादियों, हिन्दूवादियों और कम्युनिस्टों के विरोधों-अवरोधों से लगातार जूझते हुये उन्हें वे सारे हक दिलाये, जो इससे पहले उन्हें कभी नहीं मिले थे। उन्होंने दलित-मुक्ति के सवाल पर अपनी व्याख्यान पुस्तक 'जाति का उन्मूलन'में पूछा है कि उन हिन्दुओं को आजादी की माँग करते का क्या हक है, जिन्होंने स्वयं करोड़ों लोगों को गुलाम बनाकर रखा हुआ है? जब आंबेडकर ने दलितों के राजनैतिक अधिकारों की माँग की थी, तब बम्बई में तिलक ने कहा था कि महार, मांग, तेली, चमार पार्लियामेंट में बैठ कर क्या करेंगे? ये वही तिलक थे, जिनका नारा 'स्वतन्त्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है'प्रसिद्ध है। डॉ. आंबेडकर ने उन्हें कहा था कि अगर तिलक अछूत जाति में जन्मे होते, तो उनका नारा होता- 'अस्पृश्यता मिटाना मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है।'यदि स्वतन्त्रता हिन्दुओं का जन्मसिद्ध अधिकार है, तो यह उन अछूतों का भी जन्मसिद्ध अधिकार क्यों नहीं है, जिन्हें हिन्दुओं ने गुलाम बनाकर रखा है? आंबेडकर के सामने उपनिवेशवाद से भी बड़ा सवाल दलितों की स्वतन्त्रता का सवाल था। उनका कहना था कि यदि एक देश को दूसरे देश पर शासन करने का अधिकार नहीं है, जैसा कि उपनिवेशवाद के खिलाफ हिन्दू तर्क देते हैं, तो फिर एक वर्ग को दूसरे वर्ग पर भी शासन करने का अधिकार नहीं है। हिन्दू सिर्फ अपने लिये आजादी चाहते थे, दलितों को वे हिन्दू फोन्ड में रख कर अपने अधीन शासित बनाकर ही रखना चाहते थे। कम्युनिस्ट पार्टी के पास क्रान्ति की कोई रूपरेखा ही नहीं थी, जिससे यह पता चलता कि क्रान्ति के बाद उनकी समाजवादी या तानाशाही सरकार में दलितों की स्थिति और भूमिका क्या होती? क्या उन्हें सिर्फ अच्छी मजदूरी और मुफ्त मकान मिलता या शासन-प्रशासन में भागीदारी भी मिलती? हिन्दुओं पर दलितों को बिल्कुल भी भरोसा नहीं था। उनका राज ब्राह्मणों और पूँजीपतियों का ही राज होता। ऐसे राजनैतिक घटाटोप में दलितों का भविष्य अंध्कार में ही था, यदि उन्हें डॉ. आंबेडकर का क्रान्तिकारी नेतृत्व नहीं मिला होता। किन्तु यदि वे उपनिवेशवाद के साथ थे, तो उनके विरोधियों के लिये यह जानना जरूरी है कि यह उपनिवेशवाद ही था, जिसने दलितों के लिये उन दरवाजों और रास्तों को खोला था, जिन्हें ब्राह्मणवाद ने बन्द किया था। ब्राह्मणवाद ने उन्हें मानवीय अधिकारों से वंचित रखा था, पर यह उपनिवेशवाद ही था, जिसने उन्हें समान मानवाधिकार प्रदान किये थे। ब्राह्मणवाद ने उनको पशुवत स्थिति में रखा था, पर यह उपनिवेशवाद ही था, जिसने उन्हें मानवीय गौरव दिया था।
मार्क्सवादी जाति-मुक्ति का सवाल उठाते हैं, जबकि डॉ. आंबेडकर ने दलित-मुक्ति का सवाल उठाया था। जाति का उन्मूलन वही कर सकते हैं, जिन्होंने इसे बनाया है। यह दलितों की बनायी हुयी व्यवस्था नहीं है, इसलिये दलित इसे नष्ट नहीं कर सकते। चूँकि चण्डीगढ़ की संगोष्ठी जाति-मुक्ति के सवाल पर थी, दलित-मुक्ति के सवाल पर नहीं, इसलिये उन्होंने आंबेडकर को गरियाने में अपनी उर्जा व्यर्थ ही नष्ट की। जाति-मुक्ति का उनके पास न कोई समाधन है और न वे कोई समाधन दे पाये। जाति का उन्मूलन दलितों का विषय नहीं है, इसलिये यह दलित आन्दोलन का कार्यभार कभी नहीं रहा। अतः, मार्क्सवादी चिन्तक डॉ. आंबेडकर और दलित आन्दोलन में जाति-मुक्ति का हल तलाशने की कवायद व्यर्थ ही करते हैं।
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