गुरुवार, 13 फ़रवरी 2014

संसद में बदतमीजी
(कँवल भारती)
      आज संसद में तेलंगाना के मुद्दे पर जिस बदतमीज अमाननीय सांसद राजगोपाल ने मिर्च-स्प्रे करके जो गुंडई दिखायी है, उसकी जितनी भी निंदा की जाये, कम है. निस्संदेह, इस घटना ने आज के दिन को भारत के संसदीय इतिहास का सर्वाधिक काला दिन बना दिया है. इस घटना ने केवल संसद की गरिमा को ही ठेंगा नहीं दिखाया है, बल्कि जनता की नजर में इन माननीय सांसदों को भी अमाननीय बना दिया है. हालाँकि ये सांसद बिल फाड़ने, माइक तोड़ने, कुर्सियां उठाकर फेंकने, असंसदीय भाषा का इस्तेमाल करने और हाथापाई करने की अपनी गुंडई से पहले भी संसद को शर्मसार करते रहे हैं, पर बाप रे! मिर्च का स्प्रे! यह तो गुंडई का वह दुस्साहस है, जो आगे चलकर संसद में किसी को भी गोली मारने की हद तक जा सकता है. क्या इसी तरह गुंडई करके ये जनता की नुमाइंदगी करेंगे? लेकिन अब समय आ गया है कि इसे रोकने के लिए संसद को ही कुछ सख्त कानून बनाने होंगे. लेकिन कानून तो सांसद ही बनायेंगे. क्या वे बना पायेंगे? उन्हें बनाना ही होगा, वरना संसद सुरक्षित नहीं रहेगी और दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र अपनी सबसे कलंकित संसद के लिए कुख्यात हो जायेगा.
      सुना है कि संसद ने राजगोपाल और उनकी गुंडई में साथ देने वाले 16 सांसदों को निलंबित कर दिया है. किन्तु, यह कार्यवाही पर्याप्त नहीं कही जा सकती. वह इसलिए कि कानून सबके लिए बराबर होना चाहिए. मिर्च स्प्रे करना आपराधिक कृत्य है. यह कृत्य अगर किसी आम आदमी ने बाज़ार, माल या अन्य आम जगह पर किया होता, तो पुलिस उसके साथ क्या सुलूक करती, यह हम सब जानते हैं. पुलिस उसके हाथ-पाँव तो तोड़ती ही, उसे जेल भी भिजवा चुकी होती. सवाल यह है कि गुंडई करने वाले राजगोपाल और उनके साथी सांसदों को पुलिस के हवाले क्यों नहीं किया गया? उन्हें जेल भेजने की कार्यवाही क्यों नहीं की गयी? क्या इसलिए कि ये “माननीय” हैं? क्या माननीय होना कानून से ऊपर होना है? तब क्या कानून सबके लिए बराबर नहीं है? अगर लोकतंत्र में समस्याओं का हल सांसद इसी तरह गुंडई से करते रहेंगे, तब क्या ये आपराधिक चरित्र के सांसद इस देश में अराजकता फैलाने का काम नहीं कर रहे हैं?
अगर संसद को अराजक होने से सचमुच बचाना है, तो सबसे पहले गुंडे-लफंगे, मनी-माफिया, रेत-माफिया, खनिज-माफिया, औद्योगिक घरानों के दलाल, बलात्कारी, अपराधी, और बाहुबलियों को संसद और विधान मंडलों में भेजने का रास्ता बंद करना होगा. अवश्य ही यह काम आसान नहीं है, क्योंकि वाम दलों को छोड़कर लगभग सभी स्थापित पार्टियाँ ऐसे ही अराजक तत्वों के बल पर सत्ता में आना चाहती हैं, यहाँ तक कि दलित-पिछड़ों की राजनीति करने वाली पार्टियाँ भी.
      तीसरा कदम जनता को उठाना होगा. उसे बहिष्कार करना होगा, ऐसे अराजक तत्वों का, जो उनकी नुमाइंदगी के नाम पर धब्बा बनी हुई हैं.
(13 फरवरी 2014)



बुधवार, 29 जनवरी 2014

ओमप्रकाश वाल्मीकि का इतिहास-बोध
(कॅंवल भारती)
हिन्दी में सर्वाधिक ख्याति-प्राप्त दलित लेखक ओमप्रकाश वाल्मीकि ने कविता, कहानी और आत्मकथा के माध्यम से दलित साहित्य को जितना समृद्ध किया, उतना ही आलोचना के माध्यम से उसको नुकसान भी पहुॅंचाया। उनके सृजनात्मक साहित्य की सारी अनुभूतियाॅं हिन्दी क्षेत्र की हैं, पर, उसी तरह आलोचना में उनका चिन्तन हिन्दी क्षेत्र का नहीं है। आलोचना में वे अपने इतिहास-बोध में पूरी तरह मराठी की जमीन पर खड़े हैं, जो हिन्दी क्षेत्र से ज्यादा परिचित नहीं है। इसलिये यह अत्यन्त दुखद है कि वे आलोचना में हिन्दी की पूरी चिन्तन-परम्परा से कटे हुए हैं और कबीर, रैदास, हीरा डोम, अछूतानन्द, केवलानन्द और अयोध्यानाथ दण्डी आदि किसी के भी अवदान को उन्होंने समझने की कोशिश ही नहीं की। इस सन्दर्भ में मैं यहाॅं उनकी आलोचना-पुस्तक ‘दलित साहित्य: अनुभव, संघर्ष एवं यथार्थ’ में संकलित उनके लेख ‘हिन्दी दलित कविता और सन्त साहित्य’ पर कुछ विचार करना आवश्यक समझता हूॅं।
वे लेख के आरम्भ में ही दलित कविता की संघर्ष-यात्रा को रेखांकित करते हुए लिखते हैं- ‘वह यदि तथाकथित सृष्टि निर्माता या ईश्वर से भी अपनी शिकायत दर्ज करता तो उसें अन्तस में बसी हीनता उसे गिड़गिड़ाने को ही बाध्य करती थी। सन्तों की वाणी में यह गिड़गिड़ाहट साफ तौर पर देखी जा सकती है।’ (पृष्ठ 57) यहाॅं उन्होंने अपनी अज्ञानता का परिचय दिया है। उन्हें यदि कबीर-रैदास की परम्परा का ज्ञान होता तो वे देख सकते थे कि जिस हीनता और गिड़गिड़ाहट की बात वे कर रहे हैं, उसका लेश मात्र भी कबीर-रैदास में नहीं है। उन्होंने ब्राह्मण की आॅंखों में आॅंखें डालकर न सिर्फ खुद को मनुष्य घोषित किया है, बल्कि उसके उच्चता के दम्भ को भी चकनाचूर किया है। यह कबीर ही थे, जिन्होंने दोनों हाथ उठाकर घोषणा की थी कि ब्राह्मण कहता रहे अपने को जगतगुरु, पर वह निर्गुण साधुओं का कदापि गुरु नहीं हो सकता। यह कबीर ही थे, जिन्होंने ब्राह्मण के लिये कहा था कि यदि वह जन्मजात उच्च पैदा हुआ है, तो वह किसी अन्य द्वार से क्यों नहीं पैदा हुआ? यथा-
ब्राह्मण गुरु जगत का, साधु का गुरु नाहीं।
उरझि-पुरझि कर मरि रहा, चारिउ वेदा माहीं।।
जौ तू बांभन बंभनी जाया, तौ आन वाट काहे नहीं आया।
वर्णव्यवस्था, ब्राह्मणी सत्ता और ब्राह्मण-शास्त्रों को नकारने वाले दलित सन्तों के बारे में वाल्मीकि की जानकारी कितनी सतही है, यह उनके इस विचार से पता चलता है- ‘बिखरती हिन्दू सत्ता व वर्णव्यवस्था को कमजोर करने के बजाय उसे और ज्यादा मजबूत बनाने और उसका व्यापक प्रचार-प्रसार करने में सन्त साहित्य की भूमिका रही है। इससे वर्णव्यवस्था की वैचारिकता को बल मिला।’ (पृष्ठ 57-58) ओमप्रकाश वाल्मीकि ब्राह्मण सन्तों और दलित सन्तों में अन्तर नहीं कर पाये, यह उनके अध्ययन की कमजोरी है। इसी कमजोरी की वजह से वे दलित साहित्य को सन्त साहित्य से जोड़कर देखने का भी विरोध करते हैं। वे खण्डन के इरादे से डा0 चमनलाल का मत उद्धृत करते हैं-
‘आधुनिक दलित साहित्य ने भी अपनी पहचान समाज के विकृत जातिगत ढाॅंचे के प्रति अपना आक्रोश जताकर की है। इस सन्दर्भ में आधुनिक दलित साहित्य की जड़ें कबीर और रविदास की वाणी में देखी जा सकती हंै। इसलिये इस तथ्य को यहाॅं रेखांकित किया जा सकता है कि सही मायनों में कबीर और रविदास हिन्दी दलित साहित्य के अग्रदूत हैं। उत्तरी भारत के दलित साहित्य का आरम्भ कबीर और रविदास से माना जाना चाहिए और वहीं से दलित साहित्य का ऐतिहासिक अध्ययन किया जाना चाहिए।’ (पृष्ठ 58)
डा0 चमनलाल ने कुछ भी गलत नहीं कहा है। वे बिल्कुल ठीक कहते हैं कि आधुनिक दलित साहित्य की जड़ें कबीर और रविदास की वाणी में देखी जा सकती हैं। यह इतिहास की सही जानकारी है। किन्तु वाल्मीकि जी डा0 चमनलाल को ही इतिहास से अनभिज्ञ बताते हुए लिखते हैं-‘यहाॅं डा0 चमनलाल सभी ऐतिहासिक सन्दर्भों को अनदेखा करते हुए सिर्फ जाति-विरोध को ही दलित साहित्य समझने का तर्क देते दिखायी देते हैं। दलित साहित्य की अन्तःचेतना, जिसे दलित चेतना कहा जाता है, जो साहित्य को दलित साहित्य में परिवर्तित करती है, को न देखने की प्रवृत्ति यहाॅं दिखायी देती है।’ (वही)
निश्चित रूप से यह वाल्मीकि जी की कमजोरी थी कि उन्होंने कबीर और रैदास (रविदास) का विधिवत् अध्ययन नहीं किया था, अन्यथा वे कबीर और रैदास की वाणी में दलित चेतना के संघर्ष को जरूर देखते। लेकिन हमारे लिये यह जानना जरूरी है कि उन्होंने किस आधार पर कबीर-रैदास की दलित चेतना को खारिज किया था? इसके लिये यह जानना जरूरी है कि दलित चेतना से उनका अभिप्राय क्या था? वे अपनी दलित चेतना को स्पष्ट करते हुण् लिखते हैं-
‘वैचारिक रूप से दलित चेतना बन्धुता और स्वतन्त्रता की पक्षधर है। अनीश्वरवाद, अनात्मवाद, पुनर्जन्म, ब्राह्मणवादी समाज-व्यवस्था का विरोध, आर्थिक क्षेत्र में पूॅंजीवाद का विरोध, स्त्री के प्रति समानता का भाव आदि विशिष्ट बिन्दु हैं, जो दलित चेतना के सरोकारों में शामिल हैं। दलित चेतना का सरोकार इन प्रश्नों से बहुत गहरे तक जुड़ा है कि ‘मैं कौन हूॅं’, मेरी पहचान क्या है?’ (पृष्ठ 59-60)
दलित चेतना के ये सारे सरोकार, जो आधुनिक दलित साहित्य के सरोकार हैं, पन्द्रहवीं सदी के कबीर और रैदास के काव्य में भी पूरी जीवन्तता के साथ मौजूद हैं। समस्या वाल्मीकि जी के अध्ययन की है। यद्यपि निर्गुणवाद उस अर्थ में ईश्वरवाद नहीं है, जिस अर्थ में ब्राह्मणवाद उसे सृष्टिकर्ता और भाग्यविधाता के रूप में मानता है। कबीर-रैदास का ईश्वर गुण-विहीन है, जो न किसी को पैदा करता है और न किसी को मृत्यु देता है। इसके लिये भी तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों को समझना जरूरी है। वह लोकशाही का नहीं, बल्कि मुस्लिम सुलतान की राजशाही का युग था, जिसकी नजर में ईश-निन्दा अपराध था और उसकी सजा मौत से कम नहीं थी। क्या कबीर-रैदास अनीश्वरवादी बनकर जिन्दा रह सकते थे? शायद इसीलिये उन्हें अपनी वैचारिक लड़ाई को जारी रखने के लिये ईश्वर के रूप में उस निर्गुण को स्थापित करना पड़ा, जो अद्वैतवादी ब्राह्मणों और एकेश्वरवादी मुस्लिम धर्मगुरुओं की आॅंखों में धूल झोंकने के लिये एक क्रान्तिकारी आड़ थी। इसीलिये उन्होंने बुद्ध की तरह चार तत्वों से नहीं, पाॅंच तत्वों से जीव की उत्पत्ति मानी, पर बुद्ध के इस मत का समर्थन किया कि जीव के मरने पर कुछ भी शेष नहीं रहता, सभी तत्व बिछड़ जाते हैं। इसी बिना पर कबीर ने परलोक को नहीं माना तथा आवागमन, पुनर्जन्म और बैकुण्ठ का भी खण्डन किया। यथा-
पाणीं पवन अवनि नभ पावक, तिहि संग सदा बसेरा।
कहै कबीर मन मन करि बेध्या, बहुरि न कीया फेरा।।
अपनै  परचै लागी  तारी,  अपन  पै आप  समाॅंनाॅं।
कहै कबीर जे आप बिचारे, मिटि गया आवन जाॅंनाॅं।ं।
चलन चलन सबको कहत है, नाॅं जानौं बैकुण्ठ कहाॅं है।
जोजन एक प्रमिति नहिं जानैं, बातनि ही बैकुण्ठ बखानै।।
ब्राह्मणवादी समाज-व्यवस्था का विरोध कबीर और रैदास ने सबसे ज्यादा किया है। रैदास की दृष्टि में ब्राह्मणी व्यवस्था श्रमिक-विरोधी है। वे ब्राह्मण को नहीं, श्रमिक को महत्व देते हैं। यथा-
धरम करम जानै नहीं, मन मह जाति अभिमान।
ऐसो ब्राह्मण सो भलो, रविदास श्रमिकहु जान।।
कबीर और रैदास दोनों ही वर्णव्यवस्था का खण्डन करते हैं। कबीर का यह पद देखिए-
जैं तै करता बरण बिचारै।
तौ जनमत तीनि डाॅंडि किन सारै।।
नही को ऊॅंचा नहीं को नीचा, जाका प्यंड ताही का सींचा।
जहाॅं तक आर्थिक क्षेत्र में पूॅंजीवाद के विरोध और वर्ण-वर्ग-विहीन समाज की पक्षधरता का सवाल है, तो इतिहास में एक व्यवस्थित और वैज्ञानिक ढ़ग से पूॅंजीवाद और वर्ग की व्याख्या हम कार्लमाक्र्स से पहले नहीं देखते। लेकिन कल्पनावादी समाजवाद की अवधारणा हमें पूर्ववर्ती दर्शन में जरूर मिलती है। यह कल्पनावादी समाजवाद कबीर और रैदास के दर्शन में भी मौजूद है। अगर हम उनके दर्शन पर निर्गुणवाद की लौकिक दृष्टि डालकर देखें, तो वे भारतीय चिन्तन में सबसे प्रखर भौतिकवादी दर्शन है। रैदास ने यह कह कर-
रविदास ब्राहमन मत पूजिए, जो होवै गुन हीन।
पूजिए चरन चण्डाल के, जउ हो ग्यान परबीन।।
एक नये सौन्दर्यशास्त्र की रचना की थी। यह सामन्तवाद का अब तक का सबसे बड़ा विरोध था। कल्पनावादी समाजवाद उनके इस पद में विद्यमान है-
ऐसा चाहौं राज मैं, मिलै सबन को अन्न।
छोट बड़ो सभ सम बसैं, रैदास रहे प्रसन्न।।
यदि बकौल ओमप्रकाश वाल्मीकि ‘दलित चेतना का सरोकार इन प्रश्नों से बहुत गहरे जुड़ा है कि मैं कौन हूॅं और मेरी पहचान क्या है’, तो यह बिल्कुल भी गूढ़ प्रश्न नहीं हैं। हिन्दू संस्कृति में इनका अर्थ यही है कि मैं ब्राह्मण हूॅं या ठाकुर हूॅं या भंगी-चमार हूॅं। क्या यही होना मेरी पहचान है? दलित चेतना इस पहचान की पक्षधर तो नहीं है, क्योंकि उसका मूल तत्व-‘मैं मनुष्य हूं’ और मनुष्यता ही मेरी पहचान है’ यह है। फिर भी यदि वाल्मीकि जी की परेशानी का कारण यह था कि कबीर और रैदास ने अपने आप को जुलाहा और चमार कहा है, तो यह जातीय पहचान वे स्वयं भी अपने नाम के साथ जोड़ते थे। फिर सन्तों की जातीय पहचान से उन्हें क्या परेशानी थी? सच तो यह है कि जिस तरह ओमप्रकाश वाल्मीकि में अपनी जाति को लेकर कोई हीनता-भाव नहीं था, उसी तरह दलित सन्त भी अपनी जातियों को लेकर हीनता की ग्रन्थी से मुक्त थे। कबीर जब काशी के भूदेवों को ललकारते थे-‘तू ब्राह्मण मैं कासी का जुलाहा, चीन्हि न मोर गियाना’ और रैदास यह कहकर लोगों को पुकारते थे-‘कह रैदास खलास चमारा, जो हमसहरी सो मीत हमारा’, तो वे ब्राह्मणवादी समाज को यही बता रहे थे कि ज्ञान का कोई भी सम्बन्ध वर्ण और जाति से नहीं है और न ज्ञान ब्राह्मण की बपौती है।
निस्सन्देह ओमप्रकाश वाल्मीकि इतिहास के विद्यार्थी नहीं थे, और साहित्य के अध्येता के रूप में भी उन्होंने इतिहास का अध्ययन करना आवश्यक नहीं समझा था, इसलिये उनका इतिहास-बोध तथ्यों से परे और कोरी बयानबाजी वाला ही है। वे लिखते हैं- ‘ईश्वरभक्ति के लिये इन्हें (सन्तों को) मन्दिर के बाहर ही बैठना पड़ा। ईश्वर भी इनके लिये मन्दिर-प्रवेश कराने में असमर्थ रहा। इनकी कोई मदद ईश्वर नहीं कर पाया। इसलिये भक्तिकालीन सभी सन्त निर्गुण उपासक हैं और सभी भक्त सगुण।’ (पृष्ठ 60)
सन्त साहित्य के सम्पूर्ण इतिहास में निर्गुणवाद पर ऐसी लचर और बचकानी दलील नहीं मिलेगी, जैसी ओमप्रकाश वाल्मीकि ने यहाॅं दी है। इसका एक ही कारण था कि वे सन्त-साहित्य से अनभिज्ञ थे। अगर वे सन्त साहित्य पढ़ लेते, तो यह कभी नहीं लिखते कि जिन्हें मन्दिर में प्रवेश नहीं मिला, वे सभी सन्त निर्गुण हो गये। नानक तो अछूत जाति से नहीं थे और उनका समय भी कबीर-रैदास के बाद का है, उन्हें मन्दिर में प्रवेश भी मिल सकता था, फिर वे क्यों निर्गुण के उपासक हुए? यह सवाल वाल्मीकि जी के दिमाग में आया ही नहीं होगा। ऐसे सवाल तभी दिमाग में आते हैं, जब उस विषय का गम्भीर अध्ययन किया जाता है। दरअसल सवाल मन्दिर के भीतर और मन्दिर के बाहर का नहीं है। सवाल भीतर और बाहर के दर्शन (विचार) का है। मन्दिर के भीतर प्रतिमा है और बाहर प्रतिमा नहीं है। प्रतिमा देवता की है, ईश्वर की नहीं है, ईश्वर जो सर्वोच्च और परम-ईश्वर समझा जाता है, उसकी कोई प्रतिमा आज तक नहीं बनी, वह प्रतिमा न ब्राह्मणों ने बनायी, न ईसाईयों ने और मुसलमानों ने। निर्गुणवादी सन्त उसी परम-ईश्वर के उपासक थे, जिसके लिये कोई मन्दिर नहीं बना और जो मन्दिर की परिधि से ही मुक्त है। मन्दिर के भीतर दर्शन का जाल है-देवता के नाम, रूप, लीला, कीर्तन, आवागमन, अवतार, बैकुण्ठ, स्वर्ग-नर्क, मोक्ष सबका जाल है। पर, मन्दिर के बाहर इन सबसे मुक्ति है। बाहर सिर्फ लोक है, परलोक नहीं है; मनुष्य का जन्म है, पुनर्जन्म नहीं है।
लेकिन ओमप्रकाश वाल्मीकि आगे लिखते हैं कि दलित सन्तों को मन्दिर-प्रवेश के लिये लड़ाई लड़नी चाहिए थी। उनके ये शब्द देखिए-
‘मुस्लिम शासन के प्रभाव से उस काल में अनेक सन्त राष्ट्रीय फलक पर एक साथ उभरे, लेकिन मन्दिर के दरवाजे उनके लिये बन्द थे, जिन्हें खुलवाने के लिये संघर्ष करने के बजाय इन्होंने स्वयं को इस रास्ते से हटाकर निर्गुण की ओर मोड़ दिया, जिसका असर यह हुआ कि समाज में जो एक अधिकार पाने की लड़ाई शुरु होनी चाहिए थी, वह नहीं हुई।’ (वही)
यहाॅं वाल्मीकि जी दलित चेतना को कितना गलत मोड़ दे रहे हैं। वे पूरी दलित चेतना को ब्राह्मणवादी चेतना में बदल देने की यह राय दे रहे हैं कि कबीर और रैदास को यह घोषणा करते हुए कि हम हिन्दू हैं, मन्दिर में प्रवेश करने का अधिकार पाने की लड़ाई लड़नी चाहिए थी। क्या हिन्दू-मन्दिरों में प्रवेश करके वर्णव्यवस्था से लड़ा जा सकता था? डा0 आंबेडकर ने भी मन्दिर-प्रवेश को अपने आन्दोलन का कार्यक्रम नहीं बनाया था। उनका नासिक में कालाराम मन्दिर का सत्याग्रह भी मन्दिर-प्रवेश का आन्दोलन नहीं था, बल्कि उसका ध्येय पूरे विश्व को अछूतों की धार्मिक स्थिति से परिचित कराना था। उन्होंने लन्दन से 3 मार्च 1934 को अपने सहयोगी भाऊराव गायकवाड़ को पत्र में लिखा था-
‘आपने अगली रामनवमी को कालाराम मन्दिर में सत्याग्रह शुरु करने के विषय में मेरा मत जानना चाहा है। मेरी राय यह है कि सत्याग्रह को आगे न चलाया जाय और पूरी तरह बन्द कर दिया जाय। मैंने मन्दिर-प्रवेश आन्दोलन इसलिये आरम्भ नहीं किया था कि दलित लोग उन देवताओं के पूजक बन जायें, जिन्होंने उन्हें पूजा करने से रोक दिया था। यह आन्दोलन मैंने इसलिये आरम्भ किया था कि मुझे लगता था कि मन्दिर-प्रवेश उन्हें हिन्दू समाज का अनिवार्य अंग बना देगा। इस पहलू से अब तक देखने के बाद दलित वर्गों को हिन्दू समाज की पूर्ण मरम्मत करने पर जोर देने की सलाह दूॅंगा। मैंने सत्याग्रह इसलिये भी आरम्भ किया था, क्योंकि मुझे यह लगा था कि दलितों को क्रियाशील बनाने का यह बेहतर रास्ता था, जिसने उन्हें अपनी स्थिति का भी बोध कराया। पर, चूॅंकि मैं मानता हूॅं कि मैंने इस उद्देश्य को प्राप्त कर लिया है, इसलिये अब मुझे मन्दिर-प्रवेश के लिये और कुछ करने की आवश्यकता नहीं है। मैं चाहता हूॅं कि दलित वर्गों के लोग अब अपनी ऊर्जा और अपने संसाधन राजनीति और शिक्षा पर केन्द्रित करें और मुझे आशा है कि वे इन दोनों चीजों के महत्व को समझेंगे।’ (क्तण् ठंइं ैंीमइ ।उइमकांत ॅतपजपदहे ।दक ैचममबीमेए टवसण् 17ए च्ंतज वदमए चंहमे 202)
यदि कबीर और रैदास ने हिन्दूधर्म के साथ ऐसा प्रयोग नहीं किया था, तो इसका कारण यही था कि वे उस चिन्तन-परम्परा से आये थे, जो हिन्दूधर्म की नहीं थी। लेकिन अफसोस कि ओमप्रकाश वाल्मीकि ने कबीर और रैदास को उनकी अवैदिक परम्परा में समझने की बिल्कुल भी कोशिश नहीं की। इन सन्तों के बारे में उन्होंने अपनी समझ लालजी पेंडसे, डा0 आर0 जी0 सिंह, हजारीप्रसाद द्विवेदी और बाबूराव बागुल इन चार लेखकों की पुस्तकों को पढ़कर विकसित की थी। इसीलिये वे अपने लेख में कबीर और रैदास के किसी भी पद का मूल स्रोत नहीं दे सके हैं। वे अपने लेख में शुरु से अन्त तक इन्हीं पुस्तकों के सहारे चले हैं और जहाॅं वे स्वतन्त्र हुए हैं, वहाॅं उन्होंने किंवदन्तियों का सहारा लिया है। मसलन, वे कहते हैं-
‘यहाॅं यह तथ्य भी ध्यान आकर्षित करता है कि कबीर और रैदास का गुरु रामानन्द माना जाता है, जो सगुण धारा के भक्त हैं। लेकिन उनके शिष्य कबीर और रैदास निर्गुण धारा के सन्त हैं।’ (पृष्ठ 60)
वाल्मीकि जी को इसी मूल अन्तर से समझ लेना चाहिए था कि रामानन्द कबीर-रैदास के गुरु कैसे हो सकते हैं? दलित-चिन्तन ने कभी भी रामानन्द को कबीर-रैदास का गुरु नहीं माना। इतिहास से भी रामानन्द कबीर के गुरु साबित नहीं होते, क्योंकि रामानन्द कबीर से पहले हुए हैं। कबीर और रैदास को रामानन्द का शिष्य बनाने का सारा खेल केवल ब्राह्मणों ने किंवदन्तियाॅं गढ़कर खेला है। अफसोस कि वाल्मीकि जी ने भी उन्हीं किंवदन्तियों को प्रमाण मान लिया था। वे आगे और भी कबीर-रैदास को नकारते हुए लिखते हैं-
‘सामाजिक और आध्यात्मिक बदलाव लाने की स्थिति में ये सन्त कभी भी नहीं रहे। यहाॅं तक कि कबीर की जो क्रान्तिकारी छवि दिखायी देती है, वह भी आध्यात्मिक सवालों पर संघर्ष करने के बजाय अपना रास्ता ही बदल लेते हैं, जिससे समाज में जिस बदलाव की सम्भावना बन सकती थी, वह सैकड़ों साल आगे खिसक जाती है।’ (वही)
वाल्मीकि जी की इस सोच के लिये सिर्फ अफसोस ही किया जा सकता है कि वे कबीर-रैदास के अध्यात्म को नहीं समझ पाये। अगर कबीर और रैदास के अध्यात्म का वही अर्थ है, जो परलोक को जाने वाले हिन्दू अध्यात्म का है, तो वे हिन्दू सगुणवाद का ही वैदिक रास्ता अपनाते, निर्गुणवादी क्यों बनते? फिर क्या वे वर्णव्यवस्था, ब्राह्मणवाद, अवतारवाद, पुनर्जन्म और परलोक का खण्डन कर पाते? और तब भी क्या वे क्रान्तिकारी बने रह सकते थे? वाल्मीकि जी ने यह जानने की भी कोशिश नहीं की  थी कि डा0 आंबेडकर ने कबीर को अपना गुरु क्यों माना था? क्या वे परलोकवादी हिन्दू-अध्यात्म को मानने वाले कबीर को अपना गुरु मान सकते थे? यहाॅं तक अध्यात्मिक सवालों पर संघर्ष करने की बात है, कबीर का पूरा जीवन ही इसी संघर्ष में बीता है। यदि वाल्मीकि कबीर के इस कविता-संघर्ष को नहीं देख पाये, तो यह उनकी कमजोरी थी। सच तो यह है कि कबीर और रैदास का ब्राह्मण के साथ संघर्ष ही आध्यात्मिक सवालों पर हुआ था। सामन्तवादी और ब्राह्मणवादी आध्यात्मिक तन्त्र में शोषण के जितने भी प्रपंच हो सकते हैं, कबीर और रैदास ने उन सबके खिलाफ आवाज उठायी है। उन्होंने मूर्ति और तीर्थ तक का खण्डन किया है। कबीर कहते हैं- ‘तीरथ में तो सब पानी है, होवे नहिं कछु अन्हाय देखा/प्रतिमा सकल तो जड़ हैं भाई, बोले नहिं बोलाय देखा।’ लेकिन ओमप्रकाश वाल्मीकि पता नहीं, अपने किस स्रोत से लिखते हैं कि रैदास ‘गंगा-स्नान के लिये नहीं जा सकते थे। इसी विवशता में रैदास को भी कहना पड़ा-‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’।’ (वह) यह वाल्मीकि का मन-गढ़न्त चिन्तन है, क्योंकि वे जिस पद को उद्धरित कर रहे हैं, वह पद रैदास का है ही नहीं। रैदास यह कह ही नहीं सकते थे कि ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’, क्योंकि उन्होंने गंगा को कभी तीर्थ नहीं माना। दरअसल जिस पद को वाल्मीकि रैदास का बता रहे हैं, वह गोरखनाथ का है, जो इस तरह है- ‘अवधू मन चंगा तो कठौती ही गंगा/बांध्या मेल्हा तौ जगत्र चेला।’ (गोरखबानी, पद 153)
वाल्मीकि पूछते हैं वर्णव्यवस्था और जातिभेद को लेकर कबीर ने जो सवाल खड़े किये, उसका प्रभाव समाज में किस रूप में पड़ा? फिर खुद ही जवाब देते हैं-
‘हिन्दी के प्रतिष्ठित रचनाकार प्रतापनारायण मिश्र उन्हें नीच लोगों का कवि कहते हैं। यानी साहित्य में मौजूद जातिवादी मानसिकता कबीर जैसे कवि को जातीय घेरे से बाहर नहीं आने देती है। यही स्थिति रैदास के साथ भी है।’ (वही, पृष्ठ 60-61)
वाल्मीकि यहाॅं क्या कहना चाहते हैं, यह स्पष्ट नहीं है। पर, उनके लिये यहाॅं कबीर से ज्यादा महत्वपूर्ण प्रतापनारायण मिश्र हो गये हैं, जो ब्राह्मणवाद के खिलाफ जागरण करने वाले कवि को नीच कहकर गाली दे रहे हैं। वे समझ ही नहीं रहे थे कि यही तो कबीर के कविता-संघर्ष की सफलता है। क्या डा0 आंबेडकर को हिन्दुओं की गालियाॅं नहीं मिली थीं? क्या गाॅंधी ने उन्हें साॅंप नहीं कहा था? यही तो उनके संघर्ष की सफलता थी। यदि वे ब्राह्मणवाद और हिन्दूधर्म की आलोचना नहीं करते, तो क्यों उन्हें गालियाॅं मिलतीं? क्यों गाॅंधी जी आंबेडकर को साॅंप कहते?
आगे ओमप्रकाश वाल्मीकि रैदास के ये दो पद उद्धरित करते हैं-
रैदास  जनम  के  कारने  होइ न  कोई  नीच।
नर को नीच करि डारि है, ओछे करम की कीच।।
ऊॅंचे  कुल के  कारणै, ब्राह्मण  कोय  न  होय।
जेउ जान्हि ब्रह्म आत्मा, रैदास कहि ब्राह्मण होय।।
इन पदों पर वाल्मीकि टिप्पणी करते हैं- ‘यानी रैदास भी ब्रह्म के जानकार को ही ब्राह्मण मान रहे हैं। यानी घूम-फिर कर उसी दर्शन को सही मान रहे हैं, जिसके आधार पर वर्णव्यवस्था जैसी अमानवीय सोच तैयार की गयी है। उनका विरोध भी उन्हें स्वयं को ‘जाति-मुक्त’ करने में असफल रहा।’ (वही, पृष्ठ 61)
जहाॅं तक जाति से मुक्त होने का प्रश्न है, भारत में कोई भी जाति से मुक्त नहीं है। आदमी जहाॅं भी जाता है, जाति उसके साथ जाती है। क्या वाल्मीकि जी जाति से मुक्त हो सके थे? रैदास के उपर्युक्त पद ब्राह्मण की जन्मजात श्रेष्ठता के खण्डन में कहे गये हैं, वर्णव्यवस्था के समर्थन में नहीं, जैसाकि वाल्मीकि आरोपित करते हैं। रैदास अपने पदों में यही कह रहे हैं कि शूद्रत्व और ब्राह्मणत्व जन्म से नहीं होता। वाल्मीकि जी को मालूम होना चाहिए था कि कबीर-रैदास की इसी वैचारिकी से समकालीन ब्राह्मण तिलमिला गये थे, जिसकी गूॅंज सोलहवीं सदी में तुलसीदास तक दिखायी देती है। यथा-
बादहि सूद्र द्विजन्ह सन, हम तुम्हते कछु घाटि।
जानइ ब्रहम सो विप्रवर, आॅंखि देखावहिं डांटि।।
                  (मानस, उत्तर काण्ड-157)
इस दोहे में ब्राह्मणवाद का खण्डन करने वाले निर्गुण सन्तों के विरुद्ध तुलसीदास का क्रोध साफ-साफ देखा जा सकता है। लेकिन वाल्मीकि जी किसी भी तरह निर्गुण सन्तों को स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। वे पुनः उन्हें खारिज करते हुए लिखते हैं-
‘यहाॅं इस उपलब्धि को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता है कि सिखों के गुरु ग्रन्थ साहिब में रैदास की कविताओं को समान स्थान मिला। इसके बावजूद भी वे जितने पूजनीय और मान्य अपनी जाति में हैं, उतने अन्य जातियों में नहीं हैं। जो विद्रोही रूप जाति-व्यवस्था के विरुद्ध सन्त साहित्य में उभरना चाहिए था, वह नहीं उभर सका।’ (वही, पृष्ठ 61)
अगर रैदास अपनी जाति में मान्य हैं, अन्य जातियों में नहीं हैं, तो क्या इसके लिये रैदास दोषी हैं या इस देश की जाति-व्यवस्था दोषी है? इतनी सीधी सी बात भी ओमप्रकाश वाल्मीकि नहीं समझ सके। जाति-व्यवस्था के विरुद्ध कौन-सा विद्रोही रूप सन्त-साहित्य में नहीं उभरा, यह भी उन्होंने स्पष्ट नहीं किया। पन्द्रहवीं सदी में सन्त-साहित्य में जाति-व्यवस्था के खिलाफ क्या इससे बड़ा कोई विद्रोही रूप हो सकता था, जो हमें कबीर और रैदास के यहाॅं मिलता है? आखिर वाल्मीकि के पास विद्रोह का क्या मानदण्ड था? वाल्मीकि ने इस सम्बन्ध में किन्हीं डा0 आर0 जी0 सिंह के इन शब्दों को उद्धरित किया है-
‘भक्ति डा0 आंबेडकर के अनुसार लोगों में समर्पण की भावना को बढ़ाती है। यह समाज के लिये अफीम का काम करती है। भक्ति ने दलितों की नसों को कमजोर किया है। उनमें अधीनता की भावना को विकसित किया है।’ (वही)
अच्छा होता, यदि वाल्मीकि डा0 आर0 जी0 सिंह के स्रोत को डा0 आंबेडकर की मूल रचनाओं में तलाश कर लेते, तो उन्हें उसका सही सन्दर्भ मिल जाता। डा0 आर0 जी0 सिंह की जिस पुस्तक का हवाला वाल्मीकि ने दिया है, उसकी पृष्ठ संख्या का उल्लेख भी उन्होंने नहीं किया है। सम्भवतः वह पुस्तक भी उनके पास न हो और अन्यत्र ही उसका सन्दर्भ उन्होंने पढ़ा हो। आर0 जी0 सिंह की सन्दर्भित पुस्तक का नाम ‘भारतीय दलितों का समस्याएॅं और उनका समाधान’ है, जिसका प्रकाशन 1986 में मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, भोपाल से हुआ था। वाल्मीकि ने जिन पंक्तियों को उद्धरित किया है, वे आर0 जी0 सिंह की किताब में डा0 धनंजय कीर के हवाले से लिखी गयी हैं। डा0 आंबेडकर ने ब्राह्मण सन्तों के सन्दर्भ में अपने विचार व्यक्त किये थे, जो उनके ग्रन्थ ‘जाति का विनाश’ में मिलते हैं। इसे डा0 कीर ने भी स्पष्ट किया है। पर आर0 जी0 सिंह ने दलित सन्तों और ब्राह्मण सन्तों को अलग-अलग रेखांकित करने के बजाय दोनों को एक ही श्रेणी में रख दिया है और इसी अर्थ को वाल्मीकि ने भी मान लिया। सच्चाई यह है कि डा0 आंबेडकर ने ब्राह्मण सन्तों के सन्दर्भ में भक्ति का विरोध किया है। पर, वाल्मीकि डा0 आंबेडकर के हवाले से भी सन्तों का विरोध करने का अवसर नहीं छोड़ते हैं। वे डा0 आंबेडकर की ये पंक्तियाॅं उद्धरित करते हैं-
‘जहाॅं तक सन्तों का प्रश्न है, किसी भी सन्त ने जाति-व्यवस्था पर कभी भी हमला नहीं किया। इसके विपरीत वे जात-पाॅंत की व्यवस्था के पक्के विश्वासी रहे हैं। उन्होंने यह शिक्षा नहीं दी कि सारे मानव बराबर हैं, परन्तु यह शिक्षा दी कि ईश्वर की दृष्टि में सारे मानव समान हैं।’ (पृष्ठ 62)
ये पंक्तियाॅं वाल्मीकि ने डा0 आंबेडकर की पुस्तक ‘जाति का विनाश’ (ऐनिहिलेशन आफ कास्ट) से उद्धरित की हैं, पर सन्दर्भ से अलग करके उद्धरित की गयी हैं। अगर वे उनके पूरे उद्धरण को लेते तो साफ हो जाता कि उनके ये विचार ब्राह्मण-वैष्णव सन्तों के बारे में हैं। आंबेडकर ने ये विचार गाॅंधी जी के एक सवाल के जवाब में व्यक्त किये थे। पाठकों की जानकारी के लिये यहाॅं वह पूरा उद्धरण दिया जा रहा है-
‘जहाॅं तक सन्तों का प्रश्न है तो मानना पड़ेगा कि विद्वान लोगों की तुलना में सन्तों के उपदेश कितने ही अलग और उच्च हों, वे शोचनीय रूप से निष्प्रभावी रहे हैं। वे निष्प्रभावी दो कारणों से रहे हैं। पहला, किसी भी सन्त ने जाति-व्यवस्था पर कभी भी हमला नहीं किया। इसके विपरीत वे जात-पाॅंत की व्यवस्था के पक्के विश्वासी रहे हैं। उनमें से अधिकतर उसी जाति के होकर जिये और मरे, जिस जाति के वे थे। ज्ञानदेव ब्राह्मण के रूप में अपनी प्रतिष्ठा से इतने उत्कट रूप से जुड़े थे कि जब ब्राह्मणों ने उन्हें समाज में बने रहने से इनकार कर दिया, तो उन्होंने ब्राह्मण पद की मान्यता पाने के लिये जमीन-आसमान एक कर दिया था। सन्त एकनाथ, जो अछूतों को छूने तथा उनके साथ भोजन करने का साहस दिखाने के लिये धर्मात्मा बने हुए हैं, उन्होंने ऐसा इसलिये नहीं किया, क्योंकि वे जाति-पाॅंति और छुआछूत के विरुद्ध थे, बल्कि उन्होंने ऐसा इसलिये किया, क्योंकि उनकी मान्यता थी कि अपवित्रता को पवित्र गंगा नदी (अंत्याजाचा विटाल ज्यासी, गंगा स्नाने शुद्धत्व त्यासी) में स्नान करके धोया जा सकता है। जहाॅं तक मेरा अध्ययन है, किसी भी सन्त ने जाति-पाॅंति और छुआछूत के विरुद्ध कोई अभियान नहीं चलाया। मनुष्यों के बीच चल रहे संघर्ष से वे चिन्तित नहीं थे। वे मनुष्य और ईश्वर के बीच सम्बन्ध के लिये ही चिन्तित थे। उन्होंने यह शिक्षा नहीं दी कि सारे मनुष्य बराबर हैं। यह एक बहुत अलग और बहुत अहानिकर प्रस्ताव है, जिसकी शिक्षा देने में किसी को कोई परेशानी नहीं होगी या जिसके मानने में कोई खतरा नहीं है। दूसरा कारण यह है कि सन्तों की शिक्षा प्रभावहीन रही है, क्योंकि लोगों को पढ़ाया गया है कि सन्त जाति का बन्धन तोड़ सकते हैं, लेकिन आम आदमी यह बन्धन नहीं तोड़ सकता। इसलिये सन्त अनुसरण करने का उदाहरण नहीं बने।’ (डा0 आंबेडकर सम्पूर्ण वाङमय, खण्ड 1, पृष्ठ 113)
इस उद्धरण में डा0 आंबेडकर ने कहीं भी कबीर, रैदास या किसी भी निर्गुण दलित सन्त का जिक्र नहीं किया है। उन्होंने ज्ञानदेव और एकनाथ जैसे ब्राह्मण सन्तों के विषय में अपना मत व्यक्त किया है। इससे साफ है कि वाल्मीकि ने दलित सन्तो के बारे में डा0 आंबेडकर को गलत ढंग से उद्धरित करने का काम किया है।
कबीर के सामाजिक विरोधाभासों का परिचय कराते हुए ओमप्रकाश वाल्मीकि ने यह बताने की भी कोशिश की है कि कबीर स्त्री-विरोधी थे। लेकिन उन्होंने यह जानने का प्रयास नहीं किया कि कबीर ने केवल उन स्त्रियों की निन्दा की है, जो विवाहेत्तर सम्बन्ध रखती थीं। इसी आधार पर उन्होंने कामी पुरुष की भी निन्दा की है। वाल्मीकि ने स्त्री-विरोधी होने का आरोप सिद्धों पर भी लगाया है। वे लिखते हैं- ‘ये सन्त और सिद्ध जहाॅं एक ओर जाति का विरोध कर रहे थे, वहाॅं स्त्री के प्रति असहिष्णुता भी दिखा रहे थे।’ (वही, पृष्ठ 63) लेकिन अपने मत की पुष्टि में वे सिद्धों का कोई भी दोहा पेश नहीं कर सके हैं। जो दोहा उन्होंने प्रस्तुत किया है, वह सरहपाद का यह दोहा है-
ब्राह्मणंेहि म जाणन्त भेउ। एव उ पढि़ अउ एच्च उ वेउ।।
मट्टी, पाणी, कुस, लई, पढ़न्त। धरहिं वह सी अग्नि हुणन्त।। (वही)
कोष्ठक में इन दोहों का अर्थ वाल्मीकि ने यह दिया है- ‘ब्राह्मण ही क्यों हाथ में कुश, जल लेकर हवन करते हैं? यदि आग में घी डाल देने से मोक्ष मिलता है, तो क्यों नहीं सब अन्त्यजों को आग में घी डालकर यज्ञ और हवन करने देते।’ (वही)
यहाॅं मुझे वाल्मीकि जी की नकल करने की प्रवृत्ति पर तरस आता है। उन्होंने सरहपाद के दोहे और उनके अर्थ जहाॅं से भी नकल किये हैं, वे पूरी तरह अशुद्ध हैं। माना कि मूल दोहे अपभ्रंश में हैं, पर इस अशुद्ध अनुवाद में भी यह तो साफ दिखायी दे ही रहा है कि ‘मोक्ष’ और ‘अन्त्यज’ शब्द उनमें आये ही नहीं हैं। अर्थ को नकल करते समय इस बात को उन्हें समझना चाहिए था। सरहपाद के उपर्युक्त दोहों का शुद्ध अपभ्रंश पाठ इस तरह है-
ब्रम्हणेंहि म जानन्तहि भेउ। एवइ पढिअउ ए च्चउवेउ।।
मट्टि पाणि कुस लई पढ़न्त। घरहिं अग्गि हुणन्तं।।
इन दोहों का सही अनुवाद इस प्रकार है, जो राहुल सांकृत्यायन ने छायानुवाद के रूप में किया है-
ब्राह्मण न जानते भेद। यों ही पढ़े ये चारों वेद।।
मट्टी पानी कुश लेई पढ़न्त। घर ही बैठी अग्नि होमन्त।।
                              (दोहा कोश, पृष्ठ 2)
ओमप्रकाश वाल्मीकि सरहपाद द्वारा ब्राह्मणवादी व्यवस्था को दी गयी इस चुनौती को दलित चेतना की पूर्व पीठिका मानने के बजाय उसे यह कर नकार देते हैं कि ‘एक लम्बे कालखण्ड में यह चेतना दबकर रह गयी।’ (वही, पृष्ठ 63) किन्तु वे यह नहीं देख सके कि सामाजिक क्रान्ति की यही चेतना लोकायत और बुद्ध से होकर सिद्धों तक आयी थी, और सिद्धों से दलित सन्तों के निर्गुवाद में विकसित होती हुई आंबेडकर तक पहुॅंची थी और इसी चेतना का विकास आधुनिक दलित साहित्य में हुआ है।
(12 जनवरी 2014)

















शनिवार, 25 जनवरी 2014

जाति, सम्प्रदाय और लोकतन्त्र
सामाजिक न्याय की दृष्टि से लोकतन्त्र पर एक विचार
(अर्थात लोकतन्त्र का दलित पाठ)
(कॅंवल भारती)
        लोकतन्त्र को सामन्तवाद से आगे की व्यवस्था माना जाता है, यानी उसके विरोध की स्वराज-व्यवस्था। परन्तु वह वह कभी भी स्वराज-व्यवस्था नहीं बन सकी। हालाँकि लोकतन्त्र स्वयं एक विचारधारा है, पर विचारधारा के आधार पर भी लोकतन्त्र की अवधारणायें अलग-अलग हैं। इसलिये जहाँ  उसकी एक वर्गीय अवधारणा बनी, वहाँ जाति तथा सम्प्रदाय की राजनीति में भी उसका अर्थ कम महत्वपूर्ण नहीं है। जिस तरह अलग-अलग विचारधाराओं के अलग-अलग गाँधी-आंबेडकर हैं, उसी तरह उनके अलग-अलग लोकतन्त्र भी हैं। विशुद्ध वर्ग की राजनीति करने वाली वामपंथी सरकार ने भी एक सम्प्रदाय विशेष के हित में तसलीमा नसरीन को कोलकाता में नहीं रहने दिया था। यह वर्गीय राजनीति में भी लोकतन्त्र की साम्प्रदायिक अवधारणा को तसलीम करना था। अभी मैं फेसबुक पर एक पोस्ट में पढ़ रहा था कि फासीवाद जातिवाद और साम्प्रदायिकतावाद का चोला पहनकर आता है। यह उस कम्युनिस्ट विचारधारा की पोस्ट थी, जिसने खुद साम्प्रदायिकतावाद के आगे घुटने टेके हैं और जिसकी उससे निपटने की कोई कार्ययोजना अब तक अमल में नहीं आयी है। किन्तु क्या जातिवाद और सम्प्रदायवाद वास्तव में फासीवाद की व्यवस्थायें हैं? मुझे लगता है कि जाति और धर्म तभी फासीवाद का चोला पहनते हैं, जब वे नस्लवाद की भूमिका में आते हैं और इस नस्लवाद में भी श्रेष्ठतावाद की चेतना काम करती है।
                मैं पूरी दुनिया की बात तो नहीं करता, पर अगर भारत के सन्दर्भ में ही बात करूॅं, तो इतिहास में अनार्यों, बौद्धों, जैनों, शूद्रों, दलितों और आजाद भारत में ईसाईयों और मुसलमानों पर जो अत्याचार हुए हैं, उसका मूल कारण श्रेष्ठतावाद से ग्रस्त यही नस्लवाद है, जिसे दलित चिन्तन ब्राह्मणवाद कहता है। आजाद भारत में इस ब्राह्मणवाद को समूल नष्ट किया जा सकता था, अगर साम्राज्यवाद-पूंजीवाद-विरोधी समाजवादी शक्तियां  कांग्रेस के खिलाफ एकजुट हो जातीं। लेकिन वे नहीं हुईं, यहाँ  तक कि एम0 एन0 राय और स्वामी सहजानन्द जैसे प्रखर सोशलिस्ट तक कांग्रेस से अलग होने को तैयार नहीं थे। इसका एक ही कारण आंबेडकर की दृष्टि में था कि वे समाजवादी तो थे, पर ब्राह्मणवादी ग्रन्थि से मुक्त नहीं थे। यही कारण था कि जब डा0 आंबेडकर ने कांग्रेस से पृथक वर्गीय आधार पर इंडिपेंडेंट लेबर पार्टीका गठन किया, तो उसका सबसे ज्यादा विरोध इन्हीं सोशलिस्टों ने किया था, जिनमें एम0 एन0 राय प्रमुख थे। इस पर आंबेडकर ने टिप्पणी की थी कि एम0 एन0 राय के इस स्टैण्ड से कब्र में लेनिन की आत्मा भी बेचैन हो गयी होगी। इन्हीं तथाकथित समाजवादियों की वजह से साम्राज्यवाद और पूॅंजीवाद के विरुद्ध कोई संयुक्त मोर्चा नहीं बन सका और भारत में अंगे्रजों ने ब्राह्मणों, पूंजीपतियों और सामन्तों के हाथों में ही शासन-सत्ता सौंप दी। शायद धनिकों के वर्ग से आये वे समाजवादी भी यही चाहते थे। इसलिये कहना न होगा कि जिस स्वतन्त्र भारत का प्रथम नागरिक 108 ब्राह्मणों के पैर धोकर राष्ट्रपति की कुर्सी पर बैठा हो, उस देश का लोकतन्त्र असाम्प्रदायिक और जातिविहीन चरित्र का हो भी नहीं सकता था।
भारत में जाति और धर्म की साम्प्रदायिक राजनीति की शुरुआत यहीं से होती है। आंबेडकर का दलित आन्दोलन जाति का आन्दोलन नहीं था, बल्कि मानवीय गौरव और अधिकारों से वंचित अस्पृश्य जातियों की आजादी का आन्दोलन था। इसे समझने की कोशिश न समाजवादियों ने की और न ब्राह्मणवादियों ने। इसलिये यह आन्दोलन शीघ्र ही जातिवादी आन्दोलन में बदल गया और नवें तथा दशवें दशकों में और भी उग्र हो गया, जब पिछड़े वर्गों ने मण्डल कमीशन को लागू करने के लिये आन्दोलन चलाया। इसे व्यापक बनाने का काम किया कांशीराम की बहुजन राजनीति और उसकी प्रतिक्रान्ति में भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी की रामरथ यात्रा ने। हालांकि यह आन्दोलन भी जन्म नहीं ले पाता, अगर कांग्रेस सरकार ने काका कालेलकर आयोग की सिफारिशों को लागू कर दिया होता। लेकिन तत्कालीन गृहमंत्री गोबिन्दबल्लभ पन्त ने इन सिफारिशों को यह कह कर खारिज कर दिया कि इनके आधार पर तो पूरा देश ही पिछड़ा हुआ है। वे यह नहीं समझ सके कि अगर वंचित वर्गों को आजादी में भागीदारी नहीं मिलेगी, तो उनके लिये गणतन्त्र का कोई भी अर्थ नहीं रह जायेगा। इस प्रकार कांग्रेस की ब्राह्मणवादी और पॅूंजीवादी ताकतों ने भारत में जातिवादी राजनीति का मार्ग प्रशस्त किया। परिणामत: विश्वनाथप्रताप सिंह ने देर से ही सही मण्डल आयोग को लागू किया, जिसके रथ पर सवार होकर सामाजिक न्याय और हिन्दूगर्व की राजनीति ने एक साथ देश की राजीनति में प्रवेश किया। इसने पूरे देश को गरमा दिया। फलतः,  जहाँ सामाजिक न्याय की राजनीति के तमाम नायक और पुरौधा पैदा हो गये, वहीं रातों-रात हिन्दुत्व की भी तमाम रक्षा-वाहिनियां पैदा हो गयीं। उत्तर प्रदेश में मण्डल-समर्थक मुलायमसिंह यादव और हिन्दुत्व-समर्थक कल्याण सिंह इसी राजनीतिक बवण्डर की देन हैं। इसमें सबसे बड़ा विद्रूप यह है कि कांग्रेस ने भी इस साम्प्रदायिक राजनीति में खूब हिन्दुत्व का कार्ड खेला। 1992 में कल्याण सिंह के नेतृत्व में अयोध्या में बाबरी मस्जिद तोड़ी गयी, और केन्द्र की कांग्रेस सरकार ने उसमें पूरी मदद की। उसकी प्रतिक्रिया में देश भर में दंगे हुए और उसने उत्तर प्रदेश में भारतीय राजनीति का इतिहास बदल दिया। परिणामतः दशकों से कांग्रेस के मजबूत पाये ऐसे भरभरा कर टूटे कि वह आज तक अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो पा रही है। भारतीय राजनीति के इतिहास का यह वह महत्वपूर्ण दौर है, जिसमें राजनीति के कई मिथक टूटे हैं और कई नये मिथक बने हैं। जो सबसे बड़ा मिथक टूटा, वह यह था कि दलित जातियों के लोग सरकारी ब्राह्मण कहे जाते थे और उन्हें कांग्रेस का जरखरीद गुलाम समझा जाता था। पर इसी दौर में कांशीराम के आन्दोलन ने इस मिथक को तोड़ दिया। वे न केवल कांग्रेस से अलग हुए, बल्कि उन्हें यह भी अहसास हो गया कि कांग्रेस उनकी ही जमीन पर खड़ी हुई थी। यह जादुई काम कांशीराम के वोट हमारा राज तुम्हारा नहीं चलेगाके नारे ने किया; और यह नारा लोकतन्त्र में बहुत महत्व रखता है। फलतः एक इंडिपेंडेन्ट बहुजन राजनीति अस्तित्व में आयी, जिसके गर्भ से कई जातिवादी राजनीतिक धारायें निकलीं। अब यहाँ  सवाल यह पैदा होता है कि लोकतन्त्र में इस जातिवादी और साम्प्रदायिक राजनीति की भूमिका रचनात्मक है या विनाशकारी? मतलब, तीन सवाल इस सन्दर्भ में उठाये जाते हैं-
1- इस राजनीति ने दलित जातियों का कितना भला किया?
2- इसने जातिवाद को कितना उभारा? और,
3- इस राजनीति ने लोकतन्त्र को मजबूत किया या कमजोर?
पहले सवाल के सन्दर्भ में मुझे लगता है कि अगर नवें दशक के बाद दलित या बहुजन राजनीति का उभार न होता, तो दलित कभी भी कांग्रेस को चुनौती देने की स्थिति में नहीं होते। इस चुनौती से ही यह मिथक टूटा कि कांग्रेस हमेशा सत्ता में बनी रहने वाली अजरामर पार्टी है। यहाँ सवाल दलितों के आर्थिक लाभ का नहीं है, वरन् उस राजनीतिक स्वतन्त्रता का है, जिसे इस आन्दोलन के जरिये उन्होंने हासिल किया है। उनके लिये यह प्राप्ति एक बड़ी क्रान्ति है। इसे अगर कोई जातिवाद कहता है, तो वह हजारों साल से सत्ता में मौजूद ब्राह्मणवाद को नकारने का अपराध करता है, जिससे लड़े बिना जातिवाद को खत्म किया ही नहीं जा सकता। दलित-पिछड़ी जातियों का सत्ता के केन्द्र में आना, उनमें नेतृत्व का उभरना, मण्डल कमीशन का लागू होना, जिसके कारण पिछड़े वर्गों को शिक्षा, चिकित्सा और अन्य संस्थानों में कानूनन प्रवेश मिलना, बड़ी संख्या में दलित वर्गों का प्रशासनिक और शिक्षा के केन्द्रों में नौकरियों में आना और राज्यों में अपने नेतृत्व में सरकारें बनाना दलित-पिछड़ी जातियों के लिये बहुत बड़ा राजनीतिक लाभ है। यह कोई कम बड़ा परिवर्तन नहीं है कि अनेक राज्यों में ब्राह्मण सत्ता से बेदखल हो गया है और दलित-पिछड़ी जातियों के हाथों में सत्ता का सूत्र आ गया है।
क्या इसने जातिवाद को उभारा? मेरी दृष्टि में यह सवाल कम और आरोप ज्यादा है। जातिवाद कब नहीं था, जो जाति की राजनीति ने उसे उभारा? जब जाति की राजनीति नहीं थी, तब भी जातिवाद था और ज्यादा भयानक था। दलितों पर अत्याचार के लोमहर्षक काण्ड सबसे ज्यादा इसी दौर में हुए। तब दलित अगर थोड़ा भी सिर उठाकर चलने और सवर्णों के खिलाफ जाने का साहस करते थे, तो तुरन्त उन्हें उनकी औकात दिखा दी जाती थी। अगर यह जातिवाद नहीं था, तो क्या था? आज भी जिन राज्यों में दलित राजनीति का उभार नहीं है,  वहाँ उन पर सबसे ज्यादा जुल्म होते हैं। लेकिन शायद ही वहाँ की राजनीति को जातिवादी कहा जाता हो। लेकिन उत्तर प्रदेश में दलित-पिछड़ों की राजनीति को जातिवादी कहा जाता है। ऐसा क्यों?  मुझे इसका एक ही कारण नजर आता है और वह यह है कि यहाँ दलित-पिछड़ी जातियां अपने सामाजिक और आर्थिक मुद्दों पर ज्यादा जागरूक और मुखर हो गयी हैं। वर्गीय राजनीति के पैरोकार उत्तर प्रदेश में दलित-पिछड़ों की इसी जागरूकता को जातिवाद का उभार समझने की भूल कर रहे हैं । यह भूल इसलिये है, क्योंकि वे यहाँ मार्क्सवाद की सैद्धान्तिकी से समाजवाद का अध्ययन करने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि भारत में उपेक्षित जातियों के उत्थान के मुद्दे ही लोकतन्त्र में कल्याण के अनिवार्य मुद्दे हैं।
क्या यह कहा जा सकता है कि दलित राजनीति ने लोकतन्त्र को कमजोर किया है? मुझे लगता है कि ऐसा बिल्कुल भी नहीं हुआ है। सच तो यह हैं कि सामाजिक न्याय की राजनीति ने लोकतन्त्र को और भी मजबूत किया है, क्योंकि जिस लोकतन्त्र में देश की विशाल आबादी की भागीदारी उपेक्षित रहती है, वहाँ लोकतन्त्र हमेशा कमजोर रहता है और देश की सीमायें भी। दलित राजनीति के विरोधियों को इतिहास से यह समझना चाहिए कि वह देश हमेशा अराजकता से ग्रस्त रहता है, जिसमें सत्ता पर अल्पसंख्यक वर्ग का वर्चस्व होता है और बहुसंख्यक वर्ग हाशिये पर रहता है।

24 जनवरी 2014

गुरुवार, 9 जनवरी 2014

सब मदमाते कोई न जाग
(कँवल भारती)
      हमने रोम के शासक नीरो के बारे में सुना था कि रोम जल रहा था और नीरो बांसुरी बजा रहा था. कहानी कुछ इस तरह है कि राजमहल में पार्टी का आयोजन था, जिसमे रौशनी करने के लिए जेलों से कैदियों को निकाल कर उन्हें खंबों पर लटकाकर उनमें आग लगा दी गयी थी. लोग आग की लपटों में जल रहे थे, चीख रहे थे और राजमहल के लोग उसी आग की रौशनी में जश्न मना रहे थे. अखिलेश यादव का ‘सैफई महोत्सव’ भी ऐसा ही जश्न है, जो मुजफ्फरनगर दंगों की लपटों की रौशनी में मनाया गया है. जी-भर कर नाच-गाना हुआ, सरकारी खजाने से करोड़ों रूपये इस नाच-गाने पर उड़ाये गये, और करोड़ों रूपये बख्शीस में दिए गये. जैसे कोई बदचलन औलाद अपने बाप की दौलत को बरबाद करती है, वैसे ही नाच-गाने के शौक़ीन अखिलेश यादव और उनके मंत्री जनता के पैसे को अपने बाप का माल समझकर उड़ा रहे हैं. अफ़सोस कि जनता विरोध नहीं करती, और इसका कारण यही है कि तमाम सामाजिक आन्दोलन भी जनता को जागरूक नहीं कर पा रहे हैं. जनता सिर्फ वोट के समय जागती है और अगले चुनाव तक फिर सो जाती है. इस दौरान भी वह या तो जाति के नाम पर जागती है या धर्म के नाम पर; और यहाँ भी वह ऐसा जागती है कि एक-दूसरे के खून की प्यासी हो जाती है और इस जागरण में शासकों पर जरा भी आंच नहीं आती. लेकिन यह जाग भी उसकी अपनी नहीं है, शासक वर्ग की है. इसलिए शासक वर्ग वह अच्छी तरह जानता है कि जनता को कब जगाना है और कब सुलाना है. और उसे जगाने और सुलाने के लिए उसके पास जाति और धर्म ही सबसे बड़े अस्त्र हैं.
      पूरे उत्तर प्रदेश में कहीं भी विकास नहीं हो रहा है. मैं इस एक साल में बीसियो जिलों में गया हूँ, लखनऊ, इलाहबाद, गोरखपुर और बनारस जैसे नगरों में मैं पैदल और रिक्शों से घूमा हूँ, कहीं भी विकास दिखायी नहीं दिया. सड़कें इतनी खराब कि पैदल चलने में भी दिक्कत हो रही थी. जब बड़े शहरों का यह हाल है, तो छोटे शहरों का हाल कितना खस्ता होगा? मेरे अपने शहर में सड़कों में इतने गड्ढे हैं कि रिक्शे तक पलट जाते हैं. पर अखिलेश और उनके मंत्रियों को तो उन सड़कों पर चलना नहीं है, फिर क्यों बनवाएं वो सड़कें? उन्हें तो हवा में चलना है. आम आदमी पार्टी ने भले ही राजनीति को आम आदमी की सेवा का नाम दिया हो, पर अपने आप को आम आदमी से ऊपर मानने वाले उत्तर प्रदेश के मदमाते मंत्रियों पर इसका कुछ भी असर पड़ने वाला नहीं है. वे मोटी चमड़ी वाले इतने विशिष्ट श्रेणी के लोग हैं कि सरकारी खजाने से उनकी सुख-सुविधाओं और निजी यात्राओं पर एक वर्ष में लगभग एक हजार करोड़ रुपये से भी ज्यादा का खर्च होता है. क्या इसे विशिष्ट लोगों से यह उम्मीद की जा सकती है कि वे राजनीति को बदलेंगे?
      क्या सैफई महोत्सव मनाने वाले अखिलेश यादव और जनता के पैसे से पांच देशों में सैर-सपाटा करने के लिए विदेश जाने वाले मंत्रियों और विधायकों के चेहरों पर मुजफ्फरनगर दंगों में मारे गये बेकसूरों, टेंटों में ठंड से मरने वाले मासूम बच्चों और विस्थापितों का कोई रंजोगम दिखायी देता है? क्या दर्द की हल्की सी भी कोई शिकन है आज़म खां के माथे पर? अगर होती तो पूरे साल मातम मनाते और सारे महोत्सव और सैर-सपाटे स्थगित कर देते. पर ये तो नीरो हैं, मौतों पर जश्न मनाने का हक बनता ही है. विदेश यात्रा का औचित्य साबित करने वाला तर्क तो देखिये, कहा जा रहा है कि इस यात्रा का उद्देश्य, (जिस पर कम से कम 50 लाख रुपया रोजाना खर्च आयेगा,) दूसरे देशों में यह जाकर देखना है कि वहां लोकतान्त्रिक संस्थाएं किस तरह काम करती हैं? कुछ तो शर्म करो अखिलेश यादव ! जो आपके मंत्री अपने जिलों में लोकतंत्र की धज्जियाँ उड़ा रहे हैं, जो अपनी तानाशाही के आगे किसी नियम-कानून को नहीं मानते, जिनके लिए उनका हुक्म ही लोकतंत्र है, वे दूसरे देशों में जाकर लोकतंत्र सीखेंगे? किसे बेवकूफ बना रहे हैं आप? इस विदेश-यात्रा में वे क्या करने गये हैं यह अखिलेश जी आप अच्छी तरह जानते हैं. पर इस सैर-सपाटे को स्टडीज-टूर का नाम तो मत दीजिये.
      कबीर ने ऐसे ही लोगों के लिए कहा है—‘सब मदमाते कोई न जाग. ताथे संग ही चोर घर मुंसन लाग,’
(9 जनवरी 2013)



बुधवार, 1 जनवरी 2014

नयी राजनीति की सम्भावनाएॅं-
‘आप’ को जनता पार्टी बनने से रोकना होगा।
कॅंवल भारती
भारतीय राजनीति का इतिहास बताता है कि जनता ने हमेशा नयी राजनीति के विकल्प को पसन्द किया है। हम काॅंगे्रस से ही बात करें, तो लालबहादुर शास्त्री की मृत्यु के बाद इन्दिरा गाॅंधी जब प्रधानमन्त्री बनीं, तो उन्होंने 1969 में पूॅंजीवादी अर्थव्यवस्था के ढाॅंचे को तोड़ते हुए 14 निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया और 1970 में राजघरानों की सुविधाएॅं खत्म कर ‘गरीबी हटाओ’ का नारा दिया। इससे काॅंगे्रस की पूॅंजीवादी ताकतें नाराज हो गयीं और काॅंगे्रस के दो टुकड़े हो गये। सरकार गिरी और मध्यावधि चुनाव हुए। पर दलित और गरीब वर्ग ने इन्दिरा गाॅंधी की काॅंगे्रस का साथ दिया और परिणामतः 1971 में वे पुनः प्रधानमन्त्री बन गयीं। इसी अवधि में उन्होंने बीमा का राष्ट्रीयकरण किया, भूमि सुधारों को लागू कर भूमिहीनों को जमीनें बाॅंटीं और गरीबों के उत्थान के लिये बीस सूत्री कार्यक्रम बनाया। तब राजनीति में इस समाजवादी ढाॅंचा खड़ा करने की उनकी कोशिश को वंचित वर्ग ने बहुत सराहा था और वह उसका वोट बैंक बन गया था।
पर, 1975 में देश में आपातकाल लगाने के बाद इन्दिरा गाॅंधी का एक दूसरा ही चेहरा सामने आया, जो गरीब-विरोधी, लोकतन्त्र-विरोधी, फासीवादी और दमनकारी था। इसके विरुद्ध लोकतन्त्र की बहाली के लिये जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में एक देश-व्यापी आन्दोलन चला, जिसे उन्होंने ‘सम्पूर्ण क्रान्ति’ का नाम दिया। इसी आन्दोलन के गर्भ से ‘जनता पार्टी’ का जन्म हुआ, जिसमें इन्दिरा-काॅंगे्रस से अलग हुए धड़ों के साथ-साथ जनसंघ भी शामिल थी। चूॅंकि यह पार्टी गैर-काॅंगे्रसवाद के विकल्प के तौर पर अस्तित्व में आयी थी, इसलिये जनता ने इस नये विकल्प को अपना भरपूर समर्थन दिया। जनता पार्टी की सरकार बनी और मोरारजी देसाई प्रधानमन्त्री बने। पर जनसंघ की दोहरी सदस्यता को लेकर विवाद हुआ और दो साल बाद ही जनता सरकार का पतन हो गया। जनसंघ ने अलग होकर ‘भारतीय जनता पार्टी’ बना ली और जनता पार्टी भी खण्ड-खण्ड हो गयी। इसके बाद ‘समाजवादी पार्टी’ और ‘बहुजन समाज पार्टी’ के विकल्पों ने जन्म लिया। लेकिन इन सारे विकल्पों के नेता धर्म और जाति की राजनीति करने वाले ही नहीं थे, बल्कि तानाशाह और भ्रष्ट भी थे। इसलिये इनमें से एक भी जनता की आकांक्षा पर खरा नहीं उतर सका। साधारण परिवारों से आये ये नेता करोड़ों नहीं, अरबों रुपयों की सम्पत्ति के मालिक बन गये। और जनता बेरोजगारी, गरीबी और मॅंहगाई से त्रस्त होकर त्राहि-त्राहि कर उठी। ऊपर से निरंकुश शासकों ने जनता के प्रतिरोध को उभरने ही नहीं दिया। जो भी उसके खिलाफ बोला, उसे कुचल दिया गया।
एक लम्बे समय के बाद एक बार फिर जेपी की तर्ज पर अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार के खिलाफ एक बड़े देश-व्यापी जन-आन्दोलन को खड़ा किया, जिसके गर्भ से अरविन्द केजरीवाल निकले और ‘आम आदमी पार्टी’ का जन्म हुआ। राजनीति को उन्होंने एक नयी ‘चाल’ दी। हालाॅंकि उन्होंने अपनी चिन्ता के केन्द्र में मध्यवर्गीय समाज को रखा। मध्यवर्गीय समाज की समस्या रोजी-रोटी की नहीं है, बल्कि बिजली-पानी की है। उन्होंने उसे भरोसा दिलाया कि वे सत्ता में आने पर बिजली का बिल आधा कर देंगे और हर महीने 700 लीटर पानी मुफ्त देंगे। इन्हीं दो मुद्दों पर वे सत्ता में आ गये और उन्होंने यह साबित करके भी दिखा दिया। वे जानते हैं कि समस्याएॅं भ्रष्टाचार से पैदा होती हैं, और जब भ्रष्टाचार नहीं रहेगा, तो जनता की कोई भी समस्या ऐसी नहीं है, जो स्वतः हल न हो जाये। अगर केन्द्र की मनमोहन सरकार ने शरद पवार को हटा दिया होता, तो मॅंहगाई पर कभी का काबू पा लिया होता। पर उसने उन्हंे नहीं हटाया और वह बाकायदा घोषणा करके मॅंहगाई बढ़ाते रहे। क्या इसका मतलब यह नहीं है कि काॅंगे्रस सरकार की इच्छा-शक्ति ही मॅंहगाई कम करने की नहीं थी? अब भी अगर काॅंगे्रस यह नहीं सोच रही है कि इसी मॅंहगाई ने उसका दिल्ली, राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में सफाया किया है, तो इसका मतलब यही है कि वह अब भी जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारी को नहीं समझ रही है।
केजरीवाल की चिन्ता में अभी निम्नवर्ग नहीं है, जिसकी समस्या बिजली-पानी से ज्यादा रोजगार की है। इसलिये अभी उनके एजेण्डे में भी रोजगार नहीं आया है। लेकिन उसे आना ही होगा, क्योंकि निम्नवर्ग भी एक बेहतर विकल्प की तलाश में ‘आम आदमी पार्टी’ से ही आशा लगाये बैठा है। क्या उसकी वह आशा पूरी होगी? यह एक बड़ा सवाल है, लेकिन असम्भव बिल्कुल भी नहीं है। पर चिन्ता इस बात की है कि ‘आम आदमी पार्टी’ कहीं ‘जनता पार्टी’ न बन जाये और इतिहास की पुनरावृत्ति न हो जाये। इसकी सम्भावना इसलिये ज्यादा लगती है, क्योंकि स्थापित पार्टियों के शातिर लोग भी ‘आम आदमी पार्टी’ की पूॅंछ पकड़ कर लोकसभा चुनाव जीतने की इच्छा से उसमें शामिल होने की हर जुगत भिड़ाने में लग गये हैं। कुछ तो उसमें शामिल भी हो गये हैं और काफी संख्या में ऐसे लोग अरविन्द केजरीवाल के सम्पर्क में भी हैं। यह भी विद्रूप ही है कि कई भाजपाई नेता ‘आप’ के टिकट पर दिल्ली में चुनाव लड़े है और बरेली के तौकीर रजा जैसे घोर साम्प्रदायिक नेता को भी ‘आप’ से जोड़ने के लिये केजरीवाल ने उनसे मुलाकात की है। हो सकता है कि ‘आप’ में शामिल होने के लिये ही तौकीर रजा ने सपा से इस्तीफा दिया है। अगर केजरीवाल अपनी पार्टी में काॅंगे्रस, भाजपा, सपा, बसपा आदि पार्टियों से आने वाले लोगों के प्रवेश पर पाबन्दी लगाते हैं, तब तो आशा की जा सकती है कि वे भारत की राजनीति को नयी चाल में ढाल सकेंगे और यदि वे ऐसा नहीं कर सके तो ‘आप’ के भविष्य के बारे में कुछ भी नहीं कहा जा सकता।
(1 जनवरी 2014)  





सोमवार, 25 नवंबर 2013

मुस्लिम हित या पक्षपात की राजनीति
(कँवल भारती)
      उत्तरप्रदेश सरकार द्वारा मुजफ्फरनगर के दंगा पीड़ित मुसलमानों को पांच लाख रूपये प्रति परिवार मुआवजा देने सम्बन्धी जिस अधिसूचना को सुप्रीम कोर्ट ने पक्षपात पूर्ण बताते हुए वापस लेने के निर्देश दिए थे, उस अधिसूचना को सपा सुप्रीमो मुलायमसिंह यादव ने सही ठहराया है. उन्होंने पीड़ित मुसलमानों को मुआवजा देने का बचाव करते हुए कहा है कि उन मुस्लिम परिवारों के साथ अन्याय नहीं किया जा सकता, जिन्होंने अपने जान-माल को खोया है और जो राहत कैम्पों से अपने गाँव वापिस जाना नहीं चाहते हैं. उनका कहना सही है कि जो जानें गयी हैं, वे वापिस नहीं आ सकतीं, पर  मुआवजा देकर उन परिवारों की कुछ मदद जरूर की जा सकती है. बकौल मुलायमसिंह यादव 47 मुस्लिमों और 16 गैर-मुस्लिमों की जानें इस दंगे में गयी हैं. और यह पहली बार हुआ है, जब किसी राज्य-सरकार ने दंगा-प्रभावित परिवारों के लिए इतनी बड़ी धन राशि का पैकेज दिया है.
      ये सभी बातें सही हैं. पर दो सवाल यहाँ गौर-तलब हैं. पहला यह कि मुलायमसिंह यादव को तो पार्टी चलानी है, पर क्या अखिलेश यादव को भी पार्टी चलानी है, सरकार नहीं? पार्टी मुस्लिमवाद पर खड़ी हो सकती है, जैसाकि भाजपा हिन्दूवाद पर खड़ी है. यह लोकतंत्र में जायज भी है, जिसे जुड़ना होगा, वह जुड़ेगा और जिसे नहीं जुड़ना होगा, वह नहीं जुड़ेगा. पर ये पार्टियाँ जब सरकार बनायेंगी, तो किस तरह चलायेंगी, यह अनुमान मुस्लिमों को भी हो जाता है और हिन्दुओं को भी. इसलिए मुस्लिमों का सपा से जुड़ना स्वाभाविक है और हिन्दुओं का भाजपा से. दलितवाद पर खड़ी पार्टी से दलितों का जुड़ना भी स्वाभाविक है. अब वे लोग कहाँ जायें, जिनकी अपनी कोई हितैषी पार्टी नहीं है? अखिलेश सरकार की अधिसूचना को इस सन्दर्भ में क्यों नहीं देखा जाना चाहिए? पीड़ित मुस्लिम परिवारों को मुआवजा जरूर मिलना चाहिए, पर जो गैर-मुस्लिम पीड़ित परिवार हैं, उनके हित क्या इसलिए सरकार के लिए मायने नहीं रखते कि वे सपा के वोटर नहीं हैं? क्या बिगड़ जाता, अगर एकाध करोड़ का मुआवजा गैर-मुस्लिम पीड़ित परिवारों को भी मिल जाता? क्या इससे सपा के मुस्लिम वोटर नाराज हो जाते? आखिर अखिलेश अपनी जेब से तो पैसा दे नहीं रहे हैं. पैसा तो जनता का ही है, फिर पक्षपात क्यों? क्या यह ज्यादा अच्छा नहीं होता कि अखिलेश सरकार की  अधिसूचना में “मुस्लिम” शब्द आता ही नहीं, सिर्फ “पीड़ित परिवार” शब्द ही आता. जिले में मुआवजा बाँटने का काम तो आखिर उनकी ही मशीनरी को करना था, जैसा चाहे बंटवाते, या उसे अपनी ही मशीनरी पर भरोसा नहीं था. हालाँकि बेहतर तो यह होता कि समाजवादी पार्टी 90 करोड़ रूपये का मुआवजा अपनी पार्टी-फंड से देती.
      दूसरा सवाल यह गौर-तलब है कि लोकतंत्र में यह कब तक चलेगा कि पहले दंगा कराओ, फिर हत्यारों को खुली छूट दो, उसके बाद लाशें गिनो और मुआवजा देकर राजनीति करो?
(25 नवम्बर 2013)

   




     

गुरुवार, 21 नवंबर 2013


राहुल सांकृत्यायन और डा. आंबेडकर
(सन्दर्भ- बौद्धधर्म)


भारत में आधुनिक बौद्धधर्म तीन महान व्यक्तियों का ऋणी है। यानी, जिस बौद्धधर्म को ब्राह्मणवाद ने भारत की धरती से खदेड़ दिया था, उन्नीसवीं शताब्दी में उसका पुनरुद्धार तीन महान लोगों ने किया। ये महान लोग थे- अनागरिक धर्मपाल, महापंडित राहुल सांकृत्यायन और डा. आंबेडकर। धर्मपाल श्री लंका के थे। वे 1891 में भारत आये थे और यहां सारनाथ और बोधगया की दुर्दशा देख कर उनके उद्धार के लिये यहीं रुक गये थे। उन दिनों बौद्धों के तीर्थ स्थल ब्राह्मण महन्तों के कब्जे में थे। लम्बी कानूनी लड़ाई लड़ कर उन्होंने कई बौद्ध मन्दिरों को ब्राह्मणों के कब्जे से मुक्त कराये और बौद्धों को सौंपे थे। सारनाथ में उन्हीं के नेतृत्व में खुदाई कार्य किया गया था और उसी खुदाई के परिणाम स्वरूप आज के धम्मेख स्तूप का अस्तित्व सामने आया था। बोध गया का मन्दिर बौद्धों को सौंपे जाने की लड़ाई भी उन्होंने ही लड़ी थी, जो अभी तक जारी है। यही धर्मपाल जी 1893 में शिकागो में होने वाली विश्वधर्म संसद में स्वामी विवेकानन्द को अपने साथ लेकर गये थे। धर्मपाल जी दर्शन और इतिहास के लेखक नहीं थे, पर भारत में प्राचीन बौद्ध स्थलों को खोजने और उनका पुनरुद्धार करने का एक मात्र श्रेय उन्हीं को जाता है।1
आधुनिक भारत में बौद्धधर्म के पुनरुद्धार पर जब भी चर्चा चलती है, तो धर्मपाल जी का नाम राहुल और आंबेडकर से पहले आता है। धर्मपाल जी ने यदि बौद्ध स्तूपों, विहारों और मन्दिरों का उद्धार और निर्माण कराया, तो राहुल सांकृत्यायन को लुप्त बौद्ध साहित्य की खोज करने का श्रेय जाता है। उन्होंने तिब्बत की यात्रा की और वहां से 18 खच्चरों पर लाद कर बौद्ध साहित्य भारत लाये, जो पटना के संग्रहालय में आज भी सुरक्षित है। यह साहित्य तिब्बती भाषा में है, जिसका उन्होंने संस्कृत और फिर हिन्दी में अनुवाद किया। आज हिन्दी में अधिकांश त्रिपिटक राहुल जी की ही देन है। यदि राहुल जी ने यह महत्वपूर्ण कार्य न किया होता, तो भारत में हिन्दी में बौद्ध साहित्य का सचमुच अभाव होता।
लेकिन बौद्ध साहित्य और विहारों का तब तक कोई महत्व नहीं है, जब तक उनकी सुरक्षा के लिये आस्थावान बौद्ध समुदाय का अस्तित्व न हो। भारत में बौद्ध समुदाय के अभाव की पू£त डा. बाबासाहेब आंबेडकर ने की। उन्होंने 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर में बौद्धधर्म में धर्मान्तरण करकेे लाखों दलितों को बौद्धधर्म में दीक्षित होने की प्रेरणा दी। इसी प्रेरणा के परिणाम स्वरूप आज भारत में बौद्धों की संख्या लगभग दस लाख है।

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राहुल सांकृत्यायन सनातनी हिन्दू साधु (रामोदार स्वामी) के रूप में घुमक्कड़ी करते हुए, आर्य समाजी हो गये थे। एक आर्य समाजी के रूप में वे वेद और निराकार ईश्वर में सारी समस्याओं का हल देखते थे। इस सम्बन्ध में उनके विचार इस प्रकार थे- ‘‘उस समय मैं आर्य समाज के गर्मदली विचारों का समर्थक था, इसके सिवाय वेद के ईश्वरीय होने में किसी की आपत्ति को मैं सहन करने के लिये तैयार न था। वेद में रेल, तार, विमान की बातें मुझे सच्ची मालूम होतीं, यद्यपि अभी तक मैंने उनकी पूरी छानबीन न की थी। आर्य समाजी को अपने लिये हिन्दू कहना मैं शर्म की बात समझता था। आर्य धर्म हिन्दूधर्म से उतना ही दूर है, जितना ईसाई और इस्लामधर्म, यह मैं बराबर कहा करता। भारत पर आर्यधर्म का विशेष अधिकार है। उसकी उन्नति और स्वतन्त्रता आर्यधर्म और एक जातीयता की स्थापना से ही हो सकती है, इसके साथ मैं यह भी समझता था कि आज यद्यपि सभी धर्मानुयायियों का एक हो जाना असम्भव मालूम होता है, किन्तु आर्यधर्म की सत्यता को रोका नहीं जा सकता। विज्ञान के साथ कुछ झूठे विज्ञान भी संसार में खोटे सिक्कों की भांति चल रहे हैं, ऐसे ही झूठे विज्ञानों में डा£वन के विकासवाद को भी मैं समझता था। जब पंडित आत्माराम अमृतसरी की विकासवाद के खण्डन पर लिखी गयी पुस्तक मिली, तो मुझे बड़ी खुशी हुई।’’2 वे आर्यसमाज के सिद्धान्त को ध्रुव सत्य और दयानन्द के एक-एक वाक्य को वेदवाक्य मानते थे।3
ये विचार 22 वर्ष के एक तरुण (1915) के थे, पर 27 वर्ष के होते-होते बौद्धधर्म को जानने की जिज्ञासा उनमें पैदा हो गयी थी। उन्हीं के शब्दों में, (1921) ‘‘आर्य समाज का प्रभाव रहने से सिद्धान्त में मैं द्वैतवादी हो रामानुज का समर्थक रहा। इसी दार्शनिक ऊहापोह में बौद्ध दर्शन के लिये अधिक जिज्ञासा उत्पन्न हो गयी, रामानुज और शंकर की ओर से, अन्ततः वर्णाश्रम धर्म का श्राद्ध करके दार्शनिक खंडन द्वारा ही बौद्धों का विरोध किया जाता था। और दार्शनिक सिद्धान्तों में रामानुजीय शंकर को प्रच्छन्न बौद्ध कहते थे, फिर बौद्ध दर्शन क्या है, इधर ध्यान जाना जरूरी था, और पूर्वपक्ष के तौर पर उद्धृत कुछ वाक्यों से मेरी तृप्ति नहीं हो सकती थी।’’4
यह जिज्ञासा और तृप्ति 34 वर्ष की अवस्था में तब पूरी हुई, जब वे (1927) लंका गये और वहां के विद्यालंकार विहार में 19 मास तक रहे। वहां उन्हें पाली त्रिपिटक में बुद्ध वचनों को पढ़ने का अवसर मिला। उस मनः स्थिति का वर्णन उन्होंने इन शब्दों में किया है- ‘‘फिर राख में छिपे अंगारों या पत्थरों से ढँके रत्न की तरह बीच-बीच में आते बुद्ध के चमत्कारिक वाक्य मेरे मन को बलात् अपनी ओर खींच लेते थे। जब मैंने कालामों को दिये गये बुद्ध के उपदेश- किसी ग्रन्थ, परम्परा, बुजुर्ग का ख्याल कर उसे मत मानो, हमेशा खुद निश्चय करके उस पर आरूढ़ हो- को सुना, तो हठात् दिल ने कहा- यहां है एक आदमी, जिसका सत्य पर अटल विश्वास है, जो मनुष्य की स्वतन्त्र बुद्धि के महत्व को समझता है। जब मैंने मज्झिम निकाय में पढ़ा- बेड़े की भाँति मैंने तुम्हें धर्म का उपदेश किया है, वह पार उतरने के लिये है, सिर पर ढोये-ढोये फिरने के लिये नहीं; तो मालूम हुआ, जिस चीज को मैं इतने दिनों से ढूँढ़ता फिर रहा था, वह मिल गयी।’’5
अब ईश्वर और वेद भी उनसे छूट गये थे। मन की इस दशा पर उन्होंने आगे लिखा है- ‘‘अब मेरे आर्य सामाजिक और जन्मजात विचार छूट रहे थे। अन्त में, इस सृष्टि का कत्र्ता भी है, सिर्फ इस पर मेरा विश्वास रह गया था। किन्तु अब तक मुझे यह नहीं मालूम था कि मुझे बुद्ध और ईश्वर में से एक को चुनने की चुनौती दी जायगी। मैंने पहिले पहिल कोशिश की, ईश्वर और बुद्ध दोनों को एक साथ ले चलने की, किन्तु उस पर पग-पग पर आपत्तियां पड़ने लगीं। दो-तीन महीने के भीतर ही मुझे यह प्रयत्न बेकार मालूम होने लगा। ईश्वर और बुद्ध साथ नहीं रह सकते, यह साफ हो गया, और यह भी स्पष्ट मालूम होने लगा कि ईश्वर सिर्फ काल्पनिक चीज है, बुद्ध यथार्थवक्ता हैं। तब, कई हफ्तों तक हृदय में एक दूसरी बेचैनी पैदा हुई- मालूम होता था, चिरकाल से चला आता एक भारी अवलम्ब लुप्त हो रहा है। किन्तु मैंने हमेशा बुद्ध को अपना पथप्रदर्शक बनाया था, और कुछ ही समय बाद उन काल्पनिक भ्रान्तियों और भीतियों का ख्याल आने से अपने भोलेपन पर हँसी आने लगी। अब मुझे डा£वन के विकासवाद की सच्चाई मालूम होने लगी, अब माक्र्सवाद की सच्चाई हृदय और मष्तिष्क में पेबस्त जान पड़ने लगी।’’6
इस प्रकार राहुल जी 1915 से 1927 तक आर्य समाजी रहे। पर, लंका में रहते ही वे बुद्ध के अनुयायी हो गये थे। उनमें तिब्बत जाकर बौद्ध साहित्य को खोज कर लाने की भी जिज्ञासा पैदा हो गयी थी। अतः तिब्बत में सवा वर्ष बिताने के बाद, जब वे 1930 में दूसरी बार लंका गये, तो वे विधिवत उपसम्पदा लेकर बौद्धधर्म में प्रब्रजित हो गये थे। अपनी प्रब्रज्या का वर्णन उन्होंने इन शब्दों में किया है- ‘‘उपसम्पदा के लिये कांडी जाने से पहले विद्यालंकार विहार में नायकपाद के उपाध्यायत्व में मेरी प्रब्रज्या (22 जून) हुई। मैं लंका में रामोदार स्वामी के नाम से प्रसिद्ध था, और लंका छोड़ने से पूर्व ही अपने गोत्र को जोड़कर अपने को रामोदार सांकृत्यायन बना चुका था। मैं समझता था, यही नाम बना रहेगा, क्योंकि इस नाम से मैं साहित्यिक क्षेत्र में अवतीर्ण हो चुका था, किन्तु प्रब्रज्या संस्कार शुरु होने के चन्द ही मिनट पहले नायकपाद की आज्ञा हुई नये नामकरण की। समय होता, तो मैं समझाने की कोशिश करता, किन्तु अब कुछ करना आज्ञा भंग होता। नाम शायद एकाध और पेश किये गये थे, किन्तु मैंने रामोदार के ‘रा’ की साम्यता के देखते हुए राहुल नाम का प्रस्ताव किया और वह स्वीकृत हुआ। इस प्रकार राहुल सांकृत्यायन के नाम से मैं प्रब्रजित (श्रामणेर) हुआ।’’7
ऊपर राहुल जी का वक्तव्य बताता है कि उन्हें बुद्ध के दर्शन ने इतना प्रभावित किया कि न केवल डा£वन के विकासवाद में उनको सच्चाई नजर आने लगी थी, बल्कि माक्र्सवाद की सच्चाई भी उनके हृदय और मस्तिष्क में पेबस्ता जान पड़ने लगी थी। उस समय तक वे समाजवादी व्यवस्था के महत्व को समझने लगे थे और बद्ध उन्हें स्वतन्त्रता, समानता और करुणा (भ्रातृत्व) के समर्थक एवं जनतन्त्र के पक्षधर के रूप में दिखायी देने लगे थे। वे बुद्ध के प्रजातांत्रिक विचारों से बहुत ज्यादा प्रभावित हुए थे। उन्होंने एक जगह लिखा है- ‘‘बुद्ध का जन्म एक प्रजातन्त्र (शाक्य) में हुआ था, और मृत्यु भी एक प्रजातन्त्र (मल्ल) ही में हुई। प्रजातन्त्र प्रणाली उनको कितनी प्रिय थी, यह इसी से मालूम है कि अजातशत्रु के साथ अच्छा सम्बन्ध होने पर भी उन्होंने उसके विरोधी वैशाली के लिच्छवियों की प्रशंसा करते हुए राष्ट्र को अपराजित रखने वाली (ये) सात बातें बतलायीं- (1) बराबर एकत्रित हो सामूहिक निर्णय करना, (2) निर्णय के अनुसार कर्तव्य को एक हो करना, (3) व्यवस्था (कानून और विनय) का पालन करना, (4) वृद्धों का सत्कार करना, (5) स्त्रियों पर जबरदस्ती नहीं करना, (6) जातीय धर्म का पालन करना, (7) धर्माचार्यों का सत्कार करना।’’8
लेकिन राहुल माक्र्सवादी दर्शन का भी इस काल में बराबर अध्ययन कर रहे थे और बुद्ध का विचार-स्वतान्त्रय इस अध्ययन में उनकी सहायता कर रहा था। इसलिये, उन्होंने बौद्धधर्म का द्वन्द्वात्मक अध्ययन किया और वे माक्र्सवाद की ओर मुड़ गये। हालांकि, बुद्ध और उनके धर्म के प्रति उनका अनुराग कभी खत्म नहीं हुआ था, पर भिक्षुवेश उन्होंने त्याग दिया था।9 भदन्त बोधानन्द के प्रति अपने संस्मरण लेख में इसका जिक्र उन्होंने इन शब्दों में किया है- ‘‘त्रिपिटक में कुछ अधिक प्रवेश करते ही वेद, ईश्वर और आर्यसमाज ने साथ छोड़ दिया, मैं अनीश्वरवादी नास्तिक बन गया। बुद्ध और उनकी शिक्षाओं के प्रति मेरा अनुराग हो गया। उसके बाद तो कोई धर्म मुझे आकृष्ट नहीं कर सका। बुद्ध से अगली मंजिल में माक्र्स मुझे मिले। भौतिकवाद मेरा दर्शन हो गया। पर, बुद्ध के मधुर व्यक्तित्व का आकर्षण मेरे मन से कभी नहीं गया।’’10
राहुल की जीवन-यात्रा एक स्थान या एक विचार पर स्थिर रहने वाली नहीं थी। वे ऐसे प्रगतिशील थे, जो खूंटे से बँधकर नहीं रह सकते थे। अतः बौद्धधर्म के प्रति अपने लगाव के भविष्य को वे जानते थे। इसलिये, जब अनागारिक धर्मपाल ने उन्हें धर्म प्रचारक बनाने के लिये उन पर दबाव डालने के लिये कई पत्र लिखे, तो उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। उस स्थिति का वर्णन करते हुए उन्होंने अपनी ‘जीवन यात्रा’ में लिखा है- ‘‘कोई समय था कि जब मैं धर्मप्रचारक बनने का तीव्र अनुरागी था, लेकिन अब अवस्था बिल्कुल बदल गयी थी। बौद्धधर्म के साथ भी मेरा कच्चे धागे का ही सम्बन्ध था। हाँ बुद्ध के प्रति मेरी श्रद्धा कभी कम नहीं हुई। मैं उन्हें भारत का सबसे बड़ा विचारक मानता रहा हूँ और मैं समझता हूँ कि जिस वक्त दुनिया के धर्म का नामोनिशान न रह जायगा, उस वक्त भी लोग बड़े सम्मान के साथ बुद्ध का नाम लेंगे।’’11 उन्होंने आगे लिखा है- ‘‘मैंने उनके वचनों के पढ़ने के बाद समझा कि वह भी दुनिया के साम्यवादी बनने का सपना देखते थे।’’12
राहुल ने बुद्ध के धर्म का बेड़े की तरह पार उतरने के लिये ही उपयोग किया। वे विचारों से माक्र्सवादी हो चुके थे, पर अभी भिक्षुवेश उन्होंने नहीं त्यागा था। उसका उपयोग उन्होंने लन्दन, नेपाल और बौद्ध देशों की यात्राओं के लिये किया और उसके बाद भिक्षुवेश भी त्याग दिया था।
वे सामन्तवाद और पूंजीवाद की चक्की में पिस रही आम जनता की मुक्ति के दृष्टिकोण से धर्म को देखने लगे थे। इस दृष्टिकोण से बौद्धधर्म के भी अनेक सिऋान्तों से उनकी असहमति बन गयी थी। वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि बुद्ध तत्कालीन समाज व्यवस्था में हस्तक्षेप नहीं करना चाहते थे।13 उनका मत था कि ‘‘(बुद्ध ने) दुःख और उसकी जड़ को समाज में न ख्याल कर व्यक्ति में देखने की कोशिश की। भोग की तृष्णा के लिये, राजाओं, क्षत्रियों, ब्राह्मणों, वैश्यों, सारी दुनिया को झगड़ते मरते-मारते देख भी उस तृष्णा को व्यक्ति से हटाने की कोशिश की।’’14
बुद्ध के क्षणिकवाद के दर्शन से राहुल जी सहमत थे, पर उनकी टिप्पणी थी कि इस क्षणिकवाद को उन्होंने समाज की आ£थक व्यवस्था पर लागू नहीं किया था।15 वे इसका कारण बताते हैं कि ऐसा उन्होंने राजाओं और सेठों को अप्रसन्न करने के उद्देश्य से नहीं किया। वे लिखते हैं- ‘‘पुरोहित वर्ग के कूटदंत, सोणदंत जैसे धनी प्रभुताशाली ब्राह्मण उनके (बुद्ध के) अनुयायी बनते थे, राजा लोग उनकी आवभगत के लिये उतावले दिखायी पड़ते थे। उस वक्त का धन कुबेर व्यापारी-वर्ग तो उससे भी ज्यादा उनके सत्कार के लिये अपनी थैलियाँ खोले रहता था, जितने कि आज के भारतीय महासेठ गाँधी के लिये। दक्षिण और दक्षिण-पश्चिम भारत के साथ व्यापार के महान केन्द्र कौशाम्बी के तीन भारी सेठों ने तो विहार बनवाने में होड़ सी कर ली थी। सच तो यह है कि बुद्ध के धर्म को फैलाने में राजाओं से भी अधिक व्यापारियों ने सहायता की। यदि बुद्ध तत्कालीन आ£थक व्यवस्था के खिलाफ जाते, तो यह सुभीता कहाँ से हो सकता था।’’16

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लेनिन के इस सिद्धान्त को कि धर्म व्यक्ति का निजी मामला है या उसे निजी मामला होना चाहिए, हम आम आदमी पर तो लागू कर सकते हैं, पर विशिष्ट व्यक्ति पर इस सिद्धान्त को लागू नहीं किया जा सकता और लागू किया जाना चाहिए भी नहीं, क्योंकि विशिष्ट व्यक्ति या वह व्यक्ति, जिससे लाखों करोड़ों लोग प्रेरणा लेते हों, जिसके अनुयायी हों, अगर वह धर्मगुरु नहीं है और दुनिया को बदलने की शिक्षा देता है, तो वह, धर्म को अपना निजी मामला नहीं बना सकता। राहुल सांकृत्यायन एक धर्मगुरु या धर्मप्रचारक की भूमिका त्याग कर दुनिया को बदलने की भूमिका में उतरे थे, तो धर्म को देखने की उनकी दृष्टि वही नहीं रह गयी थी, जो एक सनातनी और आर्य समाजी प्रचारक की होती है। वे लाखों दीन-दुखियों के हित में धर्म के सिद्धान्तों को अलौकिक नहीं, लौकिक आधार पर परखने लगे थे। इसलिये जनता के सामाजिक और आ£थक शोषण पर जीवित रहने वाले धर्म उनके लिये घृणास्पद थे।
डा. आंबेडकर भी धर्म को अछूतों की दृष्टि से देखते थे। वे हिन्दूधर्म का विरोध इसी आधार पर करते थे कि वह सामाजिक अलगाववाद का समर्थन करता है और मानवता के एक विशाल समुदाय को समस्त मानवाधिकारों से वंचित रखता है। वे दलितों के साथ अमानवीय व्यवहार करने की शिक्षा देने वाले हिन्दूधर्म को धर्म के नाम पर कलंक मानते थे।17 उन्होंने लिखा है, ‘‘अछूतों की समस्या का सीधा सम्बन्ध हिन्दुओं के सामाजिक व्यवहार से है। अस्पृश्यता तभी मिटेगी, जब हिन्दू अपनी मनोवृत्ति बदलेंगे। समस्या यह है कि वह कौन सा तरीका है, जिससे हिन्दू जीवन-शैली को भुला दें। यह कोई छोटी-मोटी समस्या नहीं है कि कोई समूचा राष्ट्र अपनी बंधी-बंधायी जीवन-शैली को त्याग दे। हिन्दू जिस जीवन-शैली के आदी हैं, वह ऐसी है, जिसे उनका धर्म प्रमाणित करता है। अतः उनकी जीवन-शैली को बदलना उनके धर्म को बदलने जैसा ही है।’’18
यहां आंबेडकर स्पष्ट रूप से इस मत के हैं कि हिन्दूधर्म को सुधारा नहीं जा सकता, उसे छोड़ा जा सकता है।19 उन्होंने हिन्दूधर्म में सुधार के लिये लम्बे समय तक संघर्ष किया, पर उन्हें सफलता नहीं मिली और अन्ततः उन्हें हिन्दूधर्म को छोड़ने की घोषणा करनी पड़ी। उन्होंने 1935 में (15 अक्टूबर) बम्बई में कहा, ‘‘हमने अभी यह तय नहीं किया है कि कौन सा धर्म हम अपनायेंगे, पर यह हमने तय कर लिया है कि हिन्दूधर्म हमारे लिये अच्छा नहीं है।’’20
यह निर्णय आंबेडकर ने कवीथा काण्ड के प्रतिरोध में लिया था। पूना-पैक्ट के तीन साल बाद 1935 में यह काण्ड हुआ। बम्बई सरकार ने उस समय सार्वजनिक स्कूलों में अछूतों के बच्चों को प्रवेश देने के आदेश जारी किये थे। 8 अगस्त 1935 को कवीथा गांव के अछूत अपने चार बच्चों को स्कूल में दाखिल कराने के लिये ले गये। इसके विरोध में सभी हिन्दुओं ने अपने बच्चों को स्कूल से हटा लिया और रात में घात लगा कर अछूतों की बस्ती पर डंडों, भालों और तलवारों से हमला कर दिया। बाद में हिन्दुओं ने सभी अछूतों का सामाजिक बहिष्कार भी कर दिया। इसका नतीजा यह हुआ कि अछूत पीने के पानी तक के लिये तरस गये। इसके विरुद्ध अछूतों ने मजिस्ट्रेट के यहां मुकदमा दायर कर दिया। इस घटना ने अछूतों में दहशत भर दी। वल्लभ भाई पटेल हिन्दुओं को यह समझाने गये कि वे अछूतों पर जुल्म न करें, पर उन्होंने उनकी एक न सुनी। गांधी जी ने अछूतों को यह सलाह दी कि वे गांव छोड़ दें।21 इस प्रकार, इस संघर्ष में अछूतों को ही दबाया गया। आंबेडकर लिखते हैं कि जब भी हिन्दू अराजकता पर उतर आते हैं, तो अछूत हमेशा ही असहाय हो जाते हैं।22
आंबेडकर की घोषणा की प्रतिक्रिया में गांधी ने नासिक में कहा कि धर्म कोई मकान या वस्त्र नहीं है, जिसे बदला जा सके, धर्म आदमी का जरूरी अंग है। इसका उत्तर आंबेडकर ने इन शब्दों में दिया, ‘‘मैं गांधी जी से सहमत हूँ कि धर्म जरूरी है, परन्तु मैं इस बात से सहमत नहीं हूँ कि आदमी को अपने उस पुश्तैनी धर्म से चिपटा रहना चाहिए, जो उसके लिये घृणास्पद हो, अपमानजनक हो और उसे आगे बढ़ने की कोई प्रेरणा न देता हो।’’23 उन्होंने आगे कहा कि कवीथा में जो हुआ, वह अनोखी घटना नहीं है, वह हिन्दुओं के पुश्तैनी धर्म में मौजूद व्यवस्था पर आधारित है।24 इस धर्म को दलितों को छोड़ना ही होगा।25
राहुल के सामने उनका कोई जातीय समाज नहीं था, जिसे वे बदलना चाहते थे। वे ब्राह्मण थे, पर ब्राह्मणों को सुधारने या उनकी मुक्ति के (किसी कार्यक्रम के) दायित्व से मुक्त थे। किन्तु आंबेडकर इस दायित्व से मुक्त नहीं थे। उनके सामने उनका विशाल अछूत समाज था, जिसे हिन्दुओं और उनके धर्म ने मानवीय गरिमा और अधिकारों से वंचित करके रखा था। इसलिये, आंबेडकर आरम्भ से ही इस खोज में रहे कि धर्म का अर्थ क्या है, हिन्दूधर्म से अछूत समुदाय का क्या सम्बन्ध है? और कोई दूसरा धर्म उनकी स्थिति को बदल सकता है या नहीं?
राहुल भले ही यह नहीं देख सके थे कि ब्राह्मण हिन्दूधर्म और उसकी व्यवस्था को क्यों पसन्द करते थे और क्यों उसमें कोई सुधार नहीं चाहते थे? किन्तु, आंबेडकर ने यह अच्छी तरह देख लिया था कि हिन्दुओं की वर्णव्यवस्था ब्राह्मणों के लिये स्वर्ग की व्यवस्था है, जिसमें वे सबसे श्रेष्ठ और सबसे पूज्य बने हुए हैं। वे यह भी देख रहे थे कि हिन्दू अछूतों पर इसलिये अत्याचार नहीं करते हैं कि वे क्रूर हैं, बल्कि इसलिये करते हैं, क्योंकि उनका धर्म उन्हें ऐसा करने की शिक्षा देता है।26 एक स्थान पर आंबेडकर ने लिखा है, ‘‘हिन्दू चाहे स्त्री हो या पुरुष, वह जो कुछ करता है, धर्म के अनुसार करता है। वह खाता धर्म के अनुसार है, पीता धर्म के अनुसार है, नहाता धर्म के अनुसार है, पहनता धर्म के अनुसार है, उसका जन्म धर्म के अनुसार होता है, विवाह धर्म के अनुसार होता है और धर्म के अनुसार ही उसे जलाया जाता है। उसके सारे कार्य धर्मानुसार होते हैं। धर्मनिरपेक्षता के दृष्टिकोण से येे काम गलत हो सकते हैं, पर ये इसलिये पापपूर्ण नहीं हैं, क्योंकि ये धर्म द्वारा स्वीकृत हैं। इसलिये यदि कोई हिन्दू पाप का अभियुक्त होता है, तो वह गर्व से कहता है कि यदि मैं पाप करता हूँ तो पाप भी धर्म के अनुसार कर रहा हूँ।’’27
आंबेडकर अपने अध्ययन में इस निष्कर्ष पर पहुँचे थे कि अछूतों के लिये हिन्दूधर्म इसलिये अमानवीय है, क्योंकि अछूत हिन्दू समाज के अंग नहीं हैं। दूसरे शब्दों में वे हिन्दूधर्म के बाड़े से बाहर के हैं। आंबेडकर लिखते हैं, ‘‘हिन्दुओं और अछूतों के बीच क्या सम्बन्ध है, इसकी सटीक व्याख्या बम्बई के एक सम्मेलन में सनातनी हिन्दुओं के नेता ऐनापुरे शास्त्री ने की है। उन्होंने कहा कि हिन्दुओं के साथ अछूतों का सम्बन्ध वैसा ही है, जैसा किसी मनुष्य का उसके जूतों के साथ होता है। आदमी जूते पहनता है, इस दृष्टि से वह मनुष्य के साथ है और कहा जा सकता है कि वह मनुष्य के हैं। लेकिन जूते शरीर का अंग नहीं है, क्योंकि जिन दो चीजों को किसी इकाई से अलग किया जा सकता है, उन्हें उस इकाई का अंग नहीं कहा जा सकता।’’28
आंबेडकर की दृष्टि में यह एक अत्यन्त सटीक उपमा थी।29 उनके पास इसका मजबूत आधार भी है। उनके अनुसार, अछूत वर्णव्यवस्था के अंग नहीं है। वे उसके बाहर के हैं, अर्थात् अवर्ण हैं। वे लिखते हैं, ‘‘हिन्दू विधान के निर्माता मनु ने अपने नियम में कहा है कि वर्ण केवल चार हैं और पांचवाँ वर्ण नहीं होगा। मनु अछूतों को उस भवन में प्रवेश दिलाने को तैयार नहीं थे, जिसे प्राचीन हिन्दुओं ने वर्णव्यवस्था में विस्तार कर उसे पांच वर्णों के लिये बनाना चाहा था। मनु ने अछूतों को वर्ण बाह्य कह कर वर्णव्यवस्था से बाहर रखा है। आदिम और जरायम पेशा जातियों के विरुद्ध हिन्दू समाज में प्रवेश के लिये कोई निश्चित वर्जना नहीं है। वे कालान्तर में उसके सदस्य बन सकते हैं। फिलहाल वे हिन्दू समाज से जुड़े हैं और उसके बाद वे उसमें घुलमिल सकते हैं तथा उसका अंग बन सकते हैं। लेकिन अछूतों की स्थिति अलग है। हिन्दू समाज में उनके विरुद्ध निश्चित वर्जना है। उसके सुधार की कोई गुंजाइश नहीं है। उन्हें अलग-थलग ही रहना होगा और वे हिन्दू समाज का अंग न हैं और न बन सकते हैं।’’30 वे अन्यत्र कहते हैं हिन्दू भी यह जानते हैं कि अछूत उनके समाज के अंग नहीं हैं। यही कारण है कि हिन्दुओं में नैतिक दृष्टि से अछूतों के प्रति कोई चिन्ता या ममत्व नहीं होता है।’’31
आंबेडकर की सबसे बड़ी चिन्ता थी कि अछूत अनेकों जातियों-उपजातियों में विभाजित हैं और उनके बीच मौजूद सामाजिक भेदभाव उन्हें एक नहीं होने देता। हिन्दू समाज में ब्राह्मण एक वर्ग है, क्षत्रिय एक वर्ग है और वैश्य एक वर्ग है। प्रत्येक वर्ग में अनेक जातियाँ होने के बावजूद उनके बीच सामाजिक अलगाव नहीं है, वरन् रोटी-बेटी का सम्बन्ध है। इनमें से प्रत्येक वर्ग में अपनी ही जाति में विवाह व£जत है। (मिश्रा-मिश्रा में नहीं, शुक्ला में विवाह करेगा।) किन्तु यही वर्ण चेतना शूद्रों और अछूतों में नहीं है, जिसके कारण उनमें सामाजिक एकता का सदैव अभाव रहता है।
इसलिये आंबेडकर ऐसे धर्म की तलाश में थे, जो निम्न जातियों को एक वर्ग में संगठित कर दे और उनका सांस्कृतिक विकास करे। वे इस मत के नहीं थे, जैसा कि कुछ लोग मानते हैं कि धर्म समाज के लिये आवश्यक नहीं है। वे जीवन और सामाजिक आचरण के लिये धर्म को आवश्यक मानते थे।32 वे कहते थे कि धर्म अफीम नहीं है, जैसा कि कुछ लोगों द्वारा कहा जाता है। पर, वे धर्म के नाम पर पाखण्ड को स्वीकार करने के लिये तैयार नहीं थे।33 वे कहते थे कि आदमी सिर्फ रोटी खाकर जीवित नहीं रह सकता। उसके पास एक मन भी है, जिसे विचार के लिये आहार चाहिए। यह आहार उसे धर्म से ही मिलता है। धर्म ही उसे आशावादी बनाता है और आगे बढ़ने की शक्ति देता है।34 उनकी दृष्टि में धर्म और दासता दो परस्पर विरोधी चीजें थीं। कोई भी धर्म, जो आदमी को दास बनाता है, वह उनके लिये धर्म नहीं था।35
आंबेडकर ने अपने सिद्धान्त के आधार पर सभी धर्मों पर विचार किया- न केवल ईसाई और इस्लाम धर्मों पर, बल्कि आर्य समाज और सिख धर्म के बारे में भी।36 मई 1936 में कोलम्बो से एक इटैलियन बौद्ध भिक्षु लोकनाथ ने भारत आकर आंबेडकर से भेंट की और उन्हें इस बात पर सहमत करने की कोशिश की कि यदि अछूत लोग बौद्धधर्म ग्रहण कर लेते हैं, तो वे समाज में नैतिक, धा£मक और सामाजिक रूप से उच्चतर स्तर प्राप्त कर लेंगे। यद्यपि आंबेडकर ने उन्हें कोई जवाब नहीं दिया था,37 पर बौद्धधर्म के प्रति उनमें सम्मान का भाव पहले ही से था।38
इस विषय पर आंबेडकर का अध्ययन निरन्तर चल रहा था। वे अस्पृश्यता के उद्गम के ऐतिहासिक आधार को भी देखना चाहते थे, ताकि जिस धर्म को वे स्वीकार करें, उसमें अछूतों की ऐतिहासिक संगति भी बैठ सके। शीघ्र ही उन्होंने अपना एक लम्बा साक्षात्कार ‘दि बाम्बे क्राॅॅनिकल’ को दिया, जो उसके 24 फरवरी 1940 के अंक में प्रकाशित हुआ।39 इस साक्षात्कार में उन्होंने रहस्योद्घाटन किया कि वैदिक काल में और उसके बाद शताब्दियों तक अस्पृश्यता का अस्तित्व नहीं मिलता है। इसका बहुत बाद में उद्गम हुआ और इसका सम्बन्ध बौद्धधर्म के बाद परिवर्तनों से पैदा हुई परिस्थितियों से है। उन्होंने उस युग का उल्लेख किया, जब कुछ लोग अपने ऋषि आधारित जीवन के लिये एक जगह बस गये थे, पर बहुत से दूसरे लोग अपने पशुओं के चारे के लिये जगह-जगह घूमते रहते थे। बसे हुए किसानों को अपनी भूमि, मकान और फसल की सुरक्षा घुमन्तु लोगों से करनी होती थी। इससे बचने और शान्ति पूर्ण जीवन जीने के लिये उन्होंने कुछ घुमन्तु लोगों की सेवाएं लीं। उन्हें कुछ जमीनें और घर देकर गांव के बाहर बसा दिया और उनको गांव की सुरक्षा का काम सौंप दिया। वे पीढि़यों तक इस काम को करते रहे। गांव के भीतर और गांव के बाहर किनारों पर रहने वाले इन लोगों के बीच सामान्य मानवीय सम्बन्ध थे- किसी तरह की अस्पृश्यता नहीं थी।40 तब, अस्पृश्यता कैसे पैदा हुई? आंबेडकर कहते हैं कि इसके लिये भारत में बौद्धधर्म के उदय को देखना होगा।
आंबेडकर के अनुसार, भारत के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ, जब बौद्धधर्म ने सम्पूर्ण पृथ्वी को जीत लिया था। देश की जनता और सारा व्यापारी वर्ग बौद्धधर्म में चला गया था। ब्राह्मणवाद का पतन हो गया था, जो शताब्दियों से राज कर रहा था। बुद्ध ने तीन शिक्षाएं दीं- सामाजिक समानता की, वर्णव्यवस्था के उन्मूलन की और अहिंसा के सिद्धान्त की, जिसमें धर्म के नाम पर पशु बलि व£जत थी। आंबेडकर ने कहा कि उस समय तक ब्राह्मण शाकाहारी नहीं हुए थे, वे गौओं और अन्य पशुओं की बलि देते थे और उनका मांस खाते थे। जब बुद्ध ने बलि का निषेध किया और गाय को ऋषि और दूध के लिये उपयोगी पशु बताते हुए उसकी सुरक्षा की शिक्षा दी, तो जनता ने उसे अपना लिया। तब, ब्राह्मणों के सामने शाकाहारी बनने के सिवा कोई चारा नहीं था।41
आगे आंबेडकर लिखते हैं कि ब्राह्मणों ने क्षत्रियों को बौद्धधर्म में जाने से रोकने के मकसद से उन्हें समानता का दर्जा देने की पेशकश की और दोनों ने मिलकर वैश्य और शूद्रों को रोकने के लिये उन दो पुलिस वालों की तरह काम किया, जो कैदी के दोनों तरफ खड़े होकर उसे भागने से रोकते हैं।42 अब गाय पवित्र हो गयी थी और उसकी बलि देने की प्रथा समाप्त हो गयी थी। बहुत सारी बुद्ध शिक्षाएं हिन्दूधर्म में समाहित कर लीं गयी थीं। जो जनता बौद्धधर्म में चली गयी थी, वह भी धीरे-धीरे वापिस आने लगी थी। बुद्ध की जो सबसे बड़ी शिक्षा ब्राह्मणों ने स्वीकार नहीं की, वह थी समानता की शिक्षा और वर्णव्यवस्था का उन्मूलन। पर, उन्होंने यह जरूर किया कि कुछ समय के लिये क्षत्रियों को अपने समान दर्जा दिया और ब्राह्मण देवताओं को हटा कर उनके स्थान पर क्षत्रिय देवताओं को स्थापित कर उनके साथ अन्य समयानुकूल समझौते कर लिये।43
आगे आंबेडकर कहते हैं, न तो बुद्ध ने और न ब्राह्मणों ने मृतक पशु के मांस को खाने पर रोक लगायी थी। रोक सिर्फ जीवित गाय का वध करने पर थी। पर, आज के अछूतों का एक बड़ा अपराध यह है कि वे गरीबों में सबसे गरीब और सामाजिक रूप से सबसे निचले स्तर के होने के कारण बौद्धधर्म में लम्बे समय तक बने रहे और मृतक पशु का मांस खाते रहे। उनको सुधारने के लिये एक बड़ी शक्ति की जरूरत थी, जो उनके लिये लम्बे समय तक काम करती। पर ऐसा कोई काम तो नहीं हुआ, उलटे, सामाजिक बहिष्कार और अस्पृश्यता उन पर लागू कर दी गयी।44
आंबेडकर का निष्कर्ष था कि उनकी मृतक गाय का मांस खाने की आदत ही उनके शोषण का कारण बनी। यही वह चीज थी, जिससे स्वाभाविक रूप से हिन्दुओं को उनसे घृणा हुई। इसी वजह से उस पूरे वर्ग पर अस्पृश्यता थोप दी गयी। यह वास्तव में वह दण्ड था, जो ब्राह्मणों ने उन्हें बौद्धधर्म में बने रहने के लिये दिया था, जबकि अन्य लोगों ने बौद्धधर्म छोड़ दिया था। आंबेडकर कहते हैं कि इसलिये शिक्षा और स्वतन्त्रता तथा सामाजिक समानता के सभी आधुनिक विचारों के बावजूद आज तक अस्पृश्यता बनी हुई है।45
आंबेडकर ने अपने इस शोध को ‘दि अनटचेबिल्स’ नाम से प्रकाशित कराया, जो अछूतपन के ऐतिहासिक आधार को रेखांकित करने वाली एक महत्वपूर्ण पुस्तक के रूप में च£चत है। यह सिद्ध करने के बाद कि आज के अछूत किसी समय बौद्ध थे, उनका बौद्धधर्म में जाने का रास्ता आसान हो गया था। अतः आंबेडकर ने 2 मई 1950 को नयी दिल्ली में, बुद्ध जयन्ती के अवसर पर भारत के अछूतों से बौद्धधर्म ग्रहण करने की अपील की।46 इस अपील पर दूसरे दिन 15 अछूतों ने दिल्ली में बौद्धधर्म ग्रहण किया।47 इस अवसर पर, डा. आंबेडकर ने हिन्दी में तीस मिनट का संक्षिप्त व्याख्यान दिया था, जिसमें उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत में पुनः बौद्धधर्म का उदय होगा। उन्होंने आगे कहा कि न राम और न ही कृष्ण बुद्ध का मुकाबला करते हैं, बुद्ध के बराबर कोई भगवान नहीं है और न आगे ऐसा कोई महान धर्मगुरु और शास्ता पैदा होगा।48 6 जून 1950 को उन्होंने कोलम्बो में कहा था, ‘‘यह आम धारणा बन गयी है कि बौद्धधर्म भारत से लुप्त हो गया है। मैं मानता हूँ कि यह भौतिक रूप में लुप्त हुआ है, पर एक अमूर्त (बौद्धिक) शक्ति के रूप में यह अभी भी अस्तित्व में है।’’49
आंबेडकर ने देश के बहुत से भागों में जाकर अछूतों की सभाएं कीं और उन्हें बौद्धधर्म के विषय में जानकारी दी। उन्होंने स्वयं को पूरी तरह बौद्धधर्म के विस्तार के लिये सम£पत कर दिया था।50 अन्ततः उन्होंने 14 अक्टूबर 1956 को विजया दशमी के दिन नागपुर में अपने लाखों अनुयायियों के साथ पूज्य महास्थविर चन्द्रमणि जी के नेतृत्व में बौद्धधर्म की दीक्षा ली और भारत में बौद्धधर्म के पुनरुद्धार का झण्डा गाड़ दिया। बाद में, उन्होंने बाइबिल और कुरान की तरह बौद्धों के लिये भी एक धर्मग्रन्थ की रचना की, जो ‘बुद्ध और उनका धम्म’ नाम से प्रसिद्ध है।

4
हमने देखा कि राहुल सांकृत्यायन और डा. आंबेडकर दोनों बौद्धधर्म तक पहुंचे, पर अलग-अलग रास्तों से और अलग-अलग कारणों से। राहुल भारत में बौद्ध समाज नहीं बना पाये। पर, आंबेडकर ने इसी कमी को पूरा किया। लेकिन इस बात को लेकर दोनों एक मत के थे कि बौद्धधर्म हिन्दूधर्म का अंग नहीं है। राहुल की दृष्टि में बौद्ध हिन्दू नहीं थे।51 किन्तु, बुद्ध के जीवन, सिद्धान्तों और दर्शन के सम्बन्ध में दोनों विद्वानों के विचार समान नहीं हैं। उदाहरण के लिये आंबेडकर ने बुद्ध के जीवन और दर्शन को उसी रूप में स्वीकार नहीं किया, जिस रूप में वह परम्परा में मौजूद था। किन्तु, राहुल काफी हद तक परम्परा में प्रचलित बुद्ध के जीवन-दर्शन को ही स्वीकार करते हैं। बुद्ध के जन्म की इस कहानी पर राहुल और आंबेडकर एक मत हैं कि बुद्ध ने अपने जन्म के बारे में सोच कर यह तय किया कि कपिलवस्तु में राजा शुद्धोधन मेरे पिता होंगे और मेरी माता महामाया नामक देवी होंगी। तब उन्होंने महामाया को स्वप्न में आकर बताया कि क्या तुम मेरी माता बनना स्वीकार करोगी? उसका उत्तर था, बड़ी प्रसन्नता से। और उसी समय बोधिसत्त्व ने महामाया के गर्भ में प्रवेश किया।52
लेकिन बुद्ध ने गृहत्याग की कहानी पर राहुल के विचार परम्परागत हैं, जबकि आंबेडकर उसको तर्क की कसौटी पर कसते हैं और उसके मूल में राजनैतिक कारण मानते हैं। राहुल का वही (परम्परागत) मत है- ‘‘वृद्ध, रोगी, मृत और प्रव्रजित ;संन्यासीद्ध के चार दृश्यों को देखकर उनकी (सिद्धार्थ की) संसार से विरक्ति पक्की हो गयी और एक रात वह चुपके से घर से भाग निकले।’’53 राहुल भी घर छोड़कर भागे थे, अपने पिता, माँ और ब्याहता किसी का भी मोह उन्होंने नहीं पाला था। पर, आंबेडकर को बुद्ध का इस तरह पलायन करना ठीक नहीं लगा था। यह उनके गले भी नहीं उतरा था। वे लिखते हैं- ‘‘जिस समय सिद्धार्थ (बुद्ध) ने प्रव्रज्या (गृहत्याग) ग्रहण की, उस समय उनकी आयु 29 वर्ष की थी। यदि सिद्धार्थ ने इन्हीं तीन दृश्यों (वृद्ध, रोगी और मृतक) को देखकर प्रव्रज्या ग्रहण की, तो यह कैसे हो सकता है कि 29 वर्ष की आयु तक सिद्धार्थ ने कभी किसी बूढ़े, रोगी तथा मृत व्यक्ति को देखा ही न हो? ये जीवन की ऐसी घटनाएं हैं, जो रोज ही सैकड़ों, हजारों घटती रही हैं और सिद्धार्थ ने 29 वर्ष की आयु होने से पहले भी इन्हें देखा ही होगा। इस परम्परागत मान्यता को स्वीकार करना असम्भव है कि 29 वर्ष की आयु होने तक सिद्धार्थ ने एक बूढ़े, रोगी और मृत व्यक्ति को देखा ही नहीं था और 29 वर्ष की आयु होने पर ही प्रथम बार देखा। यह व्याख्या तर्क की कसौटी पर कसने पर खरी उतरती प्रतीत नहीं होती।’’54
डा. भदन्त आनन्द कौसात्यायन का मत है कि वृद्ध, रोगी और मृत व्यक्ति को देखकर गृहत्याग की मान्यता ‘‘वे अट्टकथाएँ हैं, जिन्हें बुद्धघोष तथा अन्य आचार्यों ने भगवान बुद्ध के एक हजार वर्ष बाद परम्परागत सिंहल अट्टकथाओं का आश्रय ग्रहण कर पाली भाषा में लिखा।’’55 उनके अनुसार त्रिपिटक के किसी भी ग्रन्थ में गृहत्याग के इस कथानक का कहीं उल्लेख नहीं है।56
आंबेडकर ने परम्परागत मान्यता के विरुद्ध ‘खुद्दक निकाय’ के ‘सुत्तनिपात’ के अट्ठकवग्ग में अत्तदण्डसुत्त की इन गाथाओं को बुद्ध के गृहत्याग का आधार बनाया- ‘‘शस्त्र धारण भयावह लगा। मुझमें वैराग्य उत्पन्न हुआ, यह मैं बताता हूँ। अपर्याप्त पानी मैं जैसे मछलियां छटपटाती हैं, वैसे एक-दूसरे से विरोध करके छटपटाने वाली प्रजा को देखकर मेरे मन में भय उत्पन्न हुआ। चारों ओर का जगत असार दिखायी देने लगा, सब दिशाएं काँप रही हैं, ऐसा लगा और उसमें आश्रय का स्थान खोजने पर निर्भय स्थान नहीं मिला, क्योंकि अन्त तक सारी जनता को परस्पर विरुद्ध हुए देखकर मेरा जी ऊब गया।’’57
आंबेडकर का मत है कि शाक्यों और कोलियों में रोहिणी नदी के पानी को लेकर झगड़े होते थे। शाक्य संघ ने कोलियों के विरुद्ध युद्ध का प्रस्ताव पारित किया, जिसका सिद्धार्थ गौतम ने विरोध किया। शाक्य संघ के नियम के अनुसार बहुमत के विरुद्ध जाने पर दण्ड का प्राविधान था। संघ ने तीन विकल्प रखे- (1) सिद्धार्थ सेना में भर्ती होकर युद्ध में भाग लें, (2) फांसी पर लटक कर मरने या देश छोड़कर जाने का दण्ड स्वीकार करें या (3) अपने परिवार के लोगों का सामाजिक बहिष्कार और उनके खेतों की जब्ती के लिये राजी हों। संघ का बहुमत सिद्धार्थ के विरुद्ध था। सिद्धार्थ के लिये सेना में भर्ती होकर युद्ध में भाग लेने की बात को स्वीकार करना असम्भव था। अपने परिवार के सामाजिक बहिष्कार पर भी वह विचार नहीं कर सकते थे। अतः उन्होंने दूसरे विकल्प को स्वीकार किया और वे स्वेच्छा से देश त्याग कर जाने के लिये तैयार हो गये।58
राहुल सांकृत्यायन ने इसी परम्परागत मान्यता के साथ लिखा है कि सिद्धार्थ गौतम ने अपनी पत्नी और बच्चे को सोता हुआ छोड़कर चुपके से गृहत्याग किया था।59 किन्तु, आंबेडकर इस मान्यता से सहमत नहीं हैं। उनके अनुसार, उन्होंने पूरी तरह अपने पिता शुद्धोधन, अपनी माता प्रजापति गौतमी और पत्नी यशोधरा से सहमति और अनुमति लेकर घर से अभिनिष्क्रमण किया था।60 राहुल ने सिद्धार्थ की परिवार-विमुखता को गम्भीरता से नहीं लिया, शायद इसलिये कि वे स्वयं भी परिवार-विमुख थे। पर, आंबेडकर ने इसे बहुत गम्भीर प्रश्न माना था। उनकी दृष्टि में कोई भी व्यक्ति, जो परिवार-विमुख है, समाज-विमुख भी होगा, वह समाज-उन्मुख नहीं हो सकता। इसलिये आंबेडकर ने इस बात को रेखांकित करना ज्यादा जरूरी समझा कि सिद्धार्थ जैसा जनवादी और जागरूक व्यक्ति परिवार-विमुख कैसे हो सकता है? वह परिवार के सदस्यों को धोखा देकर घर छोड़ ही नहीं सकते थे। इस तरह के विश्वासघात की अपेक्षा उनसे नहीं की जा सकती थी। आंबेडकर ने लिखा है कि जब सिद्धार्थ ने कपिलवस्तु छोड़ा, तो अनोमा नदी तक जनता उनके पीछे-पीछे आयी थी, जिसमें उनके पिता शुद्धोधन और उनकी माता प्रजापति गौतमी भी उपस्थित थे।61
वाराणसी के ऋषिपतन मृगदाव (सारनाथ) में पंच वर्गीय ब्राह्मण भिक्षुओं को दिया गया बुद्ध का पहला धर्मोपदेश ‘धर्मचक्र प्रवर्तन सूत्र’ के नाम से विख्यात है। इसमें बुद्ध ने चार आर्य सत्यों की शिक्षा दी है। पहला आर्य सत्य ‘दुख है’, दूसरा आर्य सत्य ‘दुख का कारण है’, तीसरा आर्य सत्य ‘दुख का निरोध है’, और चैथा आर्य सत्य ‘दुख निरोध का उपाय है।’62 दुख सत्य की व्याख्या करते हुए बुद्ध ने कहा है- ‘‘जन्म भी दुख है, बुढ़ापा भी दुख है, मरण, शोक, रूदन, मन की खिन्नता, हैरानगी दुख है। अप्रिय से संयोग भी, प्रिय से वियोग भी दुख है, इच्छा करके जिसे नहीं पाता, वह भी दुख है। संक्षेप में पांचों उपादान स्कन्ध (रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार, विज्ञान) दुख हैं।’’63 बुद्ध ने दुख का कारण तृष्णा को माना है और तृष्णा के निरोध (विनाश) को दुख का निरोध कहा है। तृष्णा से उपादान (वासना) पैदा होती है, उपादान से जन्म, जन्म से बुढ़ापा, मृत्यु, शोक आदि पैदा होते हैं। दुख-निरोध का मार्ग है, आर्य आष्टांगिक मार्ग, जो ये हैं- सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वचन, सम्यक कर्म, सम्यक जीविका, सम्यक प्रयत्न, सम्यक स्मृति और सम्यक समाधि।64
राहुल और आंबेडकर दोनों ने चार आर्य सत्यों पर अपने-अपने ढंग से विचार किया है। बुद्ध ने दुख सत्य की जो लौकिक-अलौकिक व्याख्या की है, उसे उसी रूप में राहुल ने भी स्वीकार नहीं किया है और आंबेडकर ने भी। राहुल लिखते हैं, ‘‘यहां उन्होंने (बुद्ध ने) दुख और उसकी जड़ को समाज में न ख्याल कर व्यक्ति में देखने की कोशिश की। भोग की तृष्णा के लिये राजाओं, क्षत्रियों, ब्राह्मणों, वैश्यों सारी दुनिया को झगड़ते, मरते-मारते देख भी उस तृष्णा को व्यक्ति से हटाने की कोशिश की। उनके मतानुसार मानो, काँटों से बचने के लिये सारी पृथ्वी को तो नहीं ढका जा सकता है, हाँ अपने पैरों को चमड़े से ढाँक कर काँटों से बचा जा सकता है। वह समय भी ऐसा नहीं था कि बुद्ध जैसे प्रयोगवादी दार्शनिक सामाजिक पापों को सामाजिक चिकित्सा से दूर करने की कोशिश करते। तो भी, वैयक्तिक सम्पत्ति की बुराइयों को वह जानते थे, इसीलिये जहाँ तक उनके अपने भिक्षु-संघ का सम्बन्ध था, उन्होंने उसे हटा कर भोग में पूर्ण साम्यवाद स्थापित करना चाहा।’’65
राहुल ने बुद्ध के दुख-विनाश के मार्ग की भौतिकवादी व्याख्या की है। उनके अनुसार, ‘‘बुद्ध तत्कालीन आ£थक व्यवस्था के खिलाफ इसलिये नहीं गये, क्योंकि बुद्ध के धर्म को फैलाने में राजाओं से भी अधिक व्यापारियों ने उनकी सहायता की थी।’’66
किन्तु डा. आंबेडकर ने इस तरह की भौतिक व्याख्या नहीं की है। उनका मत है कि बुद्ध ने परिनिर्वाण के बाद बुद्ध वचनों में ब्राह्मणों ने भारी हेर-फेर की है। उन्होंने बुद्ध और उनके वचनों को अपने अनुकूल बनाने का काम इसलिये किया, ताकि आम जनता के लिये वे दुष्कर हो जायें। उन्होंने बुद्ध वचनों को ही अलौकिक नहीं बनाया, वरन् बुद्ध को भी लोकोत्तर सत्ता का रूप दिया। जैसा कि भदन्त आनन्द कौसात्यायन का मत है, ‘‘भगवान बुद्ध के बारे में एक बात बड़े ही विश्वास के साथ कही जा सकती है कि वे कुछ नहीं थे, यदि उनका कथन बुद्धिसंगत, तर्क-संगत नहीं होता था।67 आंबेडकर ने इसी आधार पर बुद्ध वचनों को स्वीकार किया। उन्होंने स्वयं लिखा है कि जब हम पाली ग्रन्थों के आधार पर बुद्ध का जीवन चरित्र लिखने का प्रयास करते हैं, तो हमें यह कार्य सहज प्रतीत नहीं होता और उनकी शिक्षाओं की सुसंगत अभिव्यक्ति तो और भी कठिन हो जाती है।68 वे लिखते हैं कि बुद्ध की चर्या का लेखा-जोखा हमारे सामने कई ऐसी समस्याएं पैदा करता है, जिनका निराकरण यदि असम्भव नहीं, तो कठिन अवश्य है। इसलिये, उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि उन समस्याओं पर खुल कर विचार किया जाय। ऐसी उन्होंने चार समस्याओं को रेखांकित किया, जिनमें हम पहली समस्या बुद्ध के गृहत्याग पर ऊपर चर्चा कर चुके हैं। दूसरी समस्या चार आर्य सत्यों से उत्पन्न होती है। इस समस्या पर विचार करते हुए आंबेडकर लिखते हैं, ‘‘जीवन स्वभावतः दुख है, यह सिद्धान्त जैसे बुद्धधर्म की जड़ पर ही कुठाराघात करता प्रतीत होता है। यदि जीवन भी दुख है, मरण भी दुख है, पुनरुत्पत्ति भी दुख है, तब तो सभी कुछ समाप्त है। न धर्म ही किसी आदमी को इस संसार में सुखी बना सकता है और न दर्शन ही। यदि दुख से मुक्ति ही नहीं है तो फिर धर्म भी क्या कर सकता है और बुद्ध भी किसी आदमी को दुख से मुक्ति दिलाने के लिये क्या कर सकते हैं, क्योंकि जन्म ही स्वभावतः दुखमय है? ये चारों आर्यसत्य, जिनमें प्रथम आर्यसत्य ही दुख-सत्य है, अबौद्धों द्वारा बौद्धधर्म ग्रहण किये जाने के मार्ग में बड़ी बाधा है। ये उनके गले आसानी से नहीं उतरते। ये सत्य मनुष्य को निराशावाद के गढ़े में ढकेल देते हैं। ये सत्य बुद्ध के धम्म को एक निराशावादी धर्म के रूप में उपस्थित करते हैं।’’69 आंबेडकर चार आर्यसत्यों को बुद्ध की मूल शिक्षा के विपरीत और परवर्ती भिक्षुओं द्वारा किया गया प्रक्षिप्तांश मानकर पूरी तरह अस्वीकार कर देते हैं।70
आंबेडकर की तीसरी समस्या आत्मा, कर्म तथा पुनर्जन्म के सिद्धान्त को लेकर है। किन्तु, पहले हम यह देखेंगे कि इस सम्बन्ध में राहुल सांकृत्यायन का मत क्या है? बुद्ध अनात्मवादी और अनीश्वरवादी थे। अर्थात् वे आत्मा और परमात्मा के अस्तित्व को नहीं मानते थे। इस सम्बन्ध में ‘प्रतीत्य-समुत्पाद’ (क्षणिकवाद) बुद्ध का बहुत ही क्रान्तिकारी दर्शन है। पर, राहुल लिखते हैं, ‘‘तो भी इस क्रान्तिकारी दर्शन ने अपने भीतर से उन तत्वों (धर्म) को हटाया नहीं था, जो समाज की प्रगति को रोकने का काम देते हैं। पुनर्जन्म की यद्यपि बुद्ध ने नित्य आत्मा का एक शरीर से दूसरे शरीर में आवागमन के रूप में मानने से इनकार किया था, तो भी दूसरे रूप में परलोक और पुनर्जन्म को माना था। जैसे इस शरीर में जीवन विच्छिन्न प्रवाह (नष्ट-उत्पत्ति-नष्ट-उत्पत्ति) के रूप में एक तरह की एकता स्थापित किये हुए है, उसी तरह वह शरीरान्त में भी जारी रहेगा। पुनर्जन्म के दार्शनिक पहलू को और मजबूत करते हुए पुनर्जन्म का पुनर्जन्म प्रतिसन्धि के रूप में किया अर्थात् नाश और उत्पत्ति की संधि (श्रृंखला) से जुड़कर जैसे जीवन-प्रवाह इस शरीर में चल रहा है, उसी तरह उसकी प्रतिसन्धि (जुड़ना) एक शरीर से अगले शरीर में होती है। अविकारी ठोस आत्मा में पहले के संस्कारों को रखने का स्थान नहीं था, किन्तु क्षणपरिवर्तनशील तरल विज्ञान (जीवन) में उसके वासना या संस्कार के रूप में अपना अंग बनकर चलने में कोई दिक्कत न थी। क्षणिकता सृष्टि की व्याख्या के लिये पर्याप्त थी, किन्तु ईश्वर का काम संसार में व्यवस्था, समाज में व्यवस्था ;शोषित को विद्रोह से रोकने की चेष्टाद्ध कायम करना भी है। इसके लिये बुद्ध ने कार्य के सिद्धान्त को और मजबूत किया। आवागमन, धनी-निर्धन का भेद उसी कर्म के कारण है, जिसके कर्ता कभी तुम खुद थे, यद्यपि आज वह कर्म तुम्हारे लिये हाथ से निकला तीर है।’’71
राहुल आगे लिखते हैं, ‘‘बुद्ध के प्रतीत्य-समुत्पाद को देखने पर, जहां तत्काल प्रभुवर्ग भयभीत हो उठता, वहां प्रतिसंधि और कर्म का सिद्धान्त उन्हें बिल्कुल निश्चिन्त कर देता था। यही वजह थी, जो कि बुद्ध के झण्डे के नीचे हम बड़े-बड़े राजाओं, सम्राटों, सेठ-साहूकारों को आते देखते हैं, और भारत से बाहर लंका, चीन, जापान, तिब्बत में तो उनके धर्म को फैलाने में राजा सबसे पहले आगे बढ़े। वे समझते थे कि यह धर्म सामाजिक विद्रोह के लिये नहीं, बल्कि सामाजिक स्थिति को स्थापित रखने के लिये बहुत सहायक साबित होगा।’’72 राहुल ने माक्र्सवादी दृष्टिकोण से बौद्ध दर्शन का अध्ययन किया था। इसलिये उन्होंने कहा, ‘‘वर्गदृष्टि से देखने पर बौद्धधर्म शासक वर्ग के एजेन्ट की मध्यस्थता जैसा था, वर्ग के मौलिक स्वार्थ को बिना हटाये वह अपने को न्याय-पक्षपाती दिखलाना चाहता था।’’73
डा. आंबेडकर ने बौद्धधर्म का अध्ययन इस दृष्टि से नहीं किया था। उनका देखने का नजरिया यह था कि बौद्धधर्म का उदय, उसका विकास और प्रभाव ब्राह्मणवाद के लिये घातक था। इसलिये, बौद्धधर्म को विकृत करने का काम ब्राह्मणवाद की विजय के लिये उन ब्राह्मणों ने किया था, जो छद्म रूप से बौद्धधर्म में चले गये थे। आत्मा, कर्म तथा पुनर्जन्म के सिद्धान्त भी उन्हीं छद्म बौद्धों की देन हैं। इसलिये आंबेडकर लिखते हैं, ‘‘बुद्ध ने आत्मा के अस्तित्व से इनकार किया। लेकिन साथ ही उन्होंने कर्म तथा पुनर्जन्म के सिद्धान्त का भी समर्थन किया है। प्रश्न पैदा हो सकता है कि आत्मा ही नहीं, तो कर्म कैसा? आत्मा ही नहीं, तो पुनर्जन्म कैसा? ये सचमुच टेढ़े प्रश्न हैं। बुद्ध ने ‘कर्म’ तथा ‘पुनर्जन्म’ शब्दों का प्रयोग किन विशिष्ट अर्थों में किया है? क्या बुद्ध ने इन शब्दों का किन्हीं ऐसे विशिष्ट अर्थों में प्रयोग किया, जो अर्थ उन अर्थों से सर्वथा भिन्न थे, जिन अर्थों में बुद्ध के समकालीन ब्राह्मण इन शब्दों का प्रयोग करते थे? यदि हां, तो वह अर्थभेद क्या था? अथवा, उन्होंने उन्हीं अर्थों में इन शब्दों का प्रयोग किया, जिन अर्थों में ब्राह्मण जन इनका प्रयोग करते थे? यदि हां, तो क्या ‘आत्मा’ के अस्तित्व को अस्वीकार करने तथा ‘कर्म’ और ‘पुनर्जन्म’ के सिद्धान्त को मान्य करने में भयानक असंगति नहीं है?’’74
आंबेडकर ने कर्म के सिद्धान्त को स्वीकार किया है, पर उसे कर्म के हिन्दू सिद्धान्त से अलग रखा है। उनका कहना है कि कर्म का बौद्ध सिद्धान्त और कर्म का हिन्दू सिद्धान्त न एक है और न एक हो सकता है। उन्होंने इस शाब्दिक मायाजाल से सावधान रहने की आवश्यकता पर जोर दिया है। उनके अनुसार, कर्म का हिन्दू सिद्धान्त शरीर से पृथक एक आत्मा पर निर्भर करता है, शरीर मरता है तो आत्मा उसके साथ नहीं मरती। आत्मा फुर्र से उड़ जाती है। किन्तु, बुद्ध के कर्म के सिद्धान्त का सम्बन्ध मात्र कर्म से है और वह भी वर्तमान जन्म के कर्म से।75
आबेडकर ने बुद्ध के पुनर्जन्म के सिद्धान्त की व्याख्या इस प्रकार की है, ‘‘बुद्ध के अनुसार चार भौतिक पदार्थ हैं- पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु। जब शरीर का मरण होता है, तो क्या वे भी मर जाते हैं? बुद्ध ने कहा कि ‘नहीं’। आकाश में जो समान भौतिक पदार्थ सामूहिक रूप से विद्यमान हैं, वे उनमें मिल जाते हैं। इस विद्यमान राशि में से जब इन चारों भौतिक पदार्थों का पुन£मलन होता है, तो पुनर्जन्म होता है।’’76 आगे आंबेडकर इस प्रश्न पर विचार करते हुए कि क्या मृत आदमी का ही पुनर्जन्म होता है, लिखते हैं, ‘‘यदि मृत आदमी के देह के सभी भौतिक अंश पुनः नये सिरे से मिलकर एक नये शरीर का निर्माण कर सकें, तभी यह मानना सम्भव है कि उसी आदमी का पुनर्जन्म हुआ। यदि भिन्न-भिन्न मृत शरीरों के अंशों के मेल से एक नया शरीर बना, तो यह पुनर्जन्म तो हुआ, लेकिन यह उसी आदमी का पुनर्जन्म नहीं हुआ।’’77 इस प्रकार, आंबेडकर ने बुद्ध के कर्म और पुनर्जन्म के सिद्धान्त को खारिज नहीं किया, वरन् उसकी वैज्ञानिक व्याख्या की, अलौकिक व्याख्या से बचते हुए, जो त्रिपिटक केे ग्रन्थों में मिलती है।
राहुल और आंबेडकर की वैचारिक असमानताएं इस कारण से हैं कि राहुल ने एक माक्र्सवादी आलोचक के रूप में धर्म की व्याख्या की है। वे इतिहास के आलोचक थे और भारत में समाजवादी व्यवस्था को स्थापित करने के स्वप्न द्रष्टा। किन्तु, डा. आंबेडकर इतिहास के आलोचक के साथ-साथ इतिहास के निर्माता भी थे। भारत में बौद्धधर्म का पुनरुद्धार और बौद्ध समाज का निर्माण उनकी सबसे बड़ी चिन्ता थी। बीसवीं सदी की वैज्ञानिक विचारधारा और माक्र्सवादी आ£थक व्याख्याओं की चुनौतियाँ भी उनके सामने थीं। राहुल धर्म को मनुष्य के लिये अनावश्यक कह सकते थे, पर आंबेडकर, जो बौद्धधर्म के पुनरुद्धारक होने जा रहे थे, धर्म को अनावश्यक कैसे ठहरा सकते थे? उन्होंने धर्म की भी धर्म, अधर्म और सद्धर्म के रूपों में व्याख्या की78 और बुद्ध वचनों को भी, जो विकृत हो चुके थे, झाड़-पोंछ कर तर्कसंगत और वैज्ञानिक स्वरूप प्रदान किया। वे एक विशाल मानव समुदाय को अधा£मक बनाये जाने के पक्ष में नहीं जा सकते थे। नैतिक दृष्टि से भी किसी समुदाय का धर्म-विमुख होना उनके लिये अनुचित था। वे बौद्धधर्म को एक क्रान्ति मानते थे। उनके अनुसार, ‘‘यह उतनी ही महान क्रान्ति थी, जितनी कि फ्रान्स की क्रान्ति थी। यद्यपि यह धा£मक क्रान्ति के रूप में आरम्भ हुई, तथापि यह धा£मक क्रान्ति से बढ़कर थी। यह सामाजिक और राजनैतिक क्रान्ति बन गयी थी।’’79 वे लिखते हैं कि इस क्रान्ति के महत्व को तभी समझा जा सकता है, जब क्रान्ति से पहले के भारतीय समाज की भयानक स्थिति और सामाजिक, धा£मक और आध्यात्मिक रूप से निकृष्ट, विलासिता में डूबे हुए बुद्धकालीन आर्य समुदाय का चित्र आपके सामने होगा।80
सन्दर्भ
 1. अंधकार में ज्योति (अनागरिक धर्मपाल का जीवनवृत्त तथा उपदेश), लेखक-महास्थविर संघरक्षित, नौरफोक (इंगलैण्ड), अनुवादक- कँवल भारती, प्रकाशक-त्रिरत्न ग्रन्थमाला, पुने, संस्करण: 1991 (प्रथम)
 2. मेरी जीवन यात्रा, प्रथम खण्ड, राहुल सांकृत्यायन, किताब महल, इलाहाबाद, संस्करण 1946, पृष्ठ 258
 3. वही, पृष्ठ 267
 4. वही, पृष्ठ 364
 5. वही, द्वितीय खण्ड, संस्करण 1950, पृष्ठ 7-8
 6. वही, पृष्ठ 8-9
 7. वही, पृष्ठ 106-07
 8. दर्शन-दिग्दर्शन- राहुल सांकृत्यायन, किताब महल, इलाहाबाद, संस्करण 1998, पृष्ठ 393
 9. जिनका मैं कृतज्ञ- राहुल सांकृत्यायन, किताब महल, इलाहाबाद, संस्करण-1957, पृष्ठ 128
10. वही, पृष्ठ 127
11. मेरी जीवन यात्रा, द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 155-56
12. वही, पृष्ठ 156
13. दर्शन-दिग्दर्शन, पृष्ठ 393
14. वही, पृष्ठ 394
15. वही
16. वही
17. डा. आंबेडकर सम्पूर्ण वाङमय, खण्ड-14, डा. आंबेडकर प्रतिष्ठान कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार, नयी दिल्ली, संस्करण  जून 1998, पृष्ठ-1 (प्रस्तावना)
18. वही, खण्ड-10, संस्करण 1996, पृष्ठ 37
19 वही, पृष्ठ 66
20. सोर्स मेटेरियल आन डा. बाबा साहेब आंबेडकर एण्ड दि मूवमेन्ट आफ दि अनटचेबुल्स, वाल्यूम-1, शिक्षा विभाग, महाराष्ट्र सरकार, बम्बई, संस्करण प्रथम, दिसम्बर 6, 1982, पृष्ठ 135
21. डा. आंबेडकर सम्पूर्ण वाङमय, खण्ड-10, पृष्ठ 173
22. वही
23. सोर्स मेटेरियल...... पृष्ठ 135
24. वही, पृष्ठ 136
25. वही, पृष्ठ 276-77
26. डा. आंबेडकर सम्पूर्ण वाङमय, खण्ड-9, संस्करण द्वितीय 1998, पृष्ठ 144
27. डा. बाबा साहेब आंबेडकर- राइटिंगस एण्ड स्पीचेस, वाल्यूम-12, एजूकेशन डिपार्टमेंन्ट, महाराष्ट्र गर्वनमंेन्ट, संस्करण पहला 1993, पृष्ठ 115
28. डा. आंबेडकर वाङमय, खण्ड-10, पृष्ठ 66
29. वही 30. वही
31. वही, खण्ड-9, पृष्ठ 156
32. धनंजय कीर, आंबेडकरः लाइफ एण्ड मिशन, पापुलर प्रकाशन, बम्बई, दूसरा संस्करण, 1961, पृष्ठ 58
33. वही, पृष्ठ 304 34. वही, पृष्ठ 499
35. वही, पृष्ठ 92
36. सोर्स मेटेरियल... पृष्ठ 139
37. वही, पृष्ठ 141-42
38. वही, पृष्ठ 422
39. वही, पृष्ठ 212
40. वही 41. वही, पृष्ठ 213
42. वही, पृष्ठ 214
43. वही 44. वही
45. वही
46. वही, पृष्ठ 366
47. वही
48. वही
49. वही, पृष्ठ 371
50. वही, पृष्ठ 410
51. मेरी जीवन यात्रा, द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 303
52. कृपया देखें, राहुल सांकृत्यायन की ‘बुद्धचर्या’ (भारतीय बौद्ध समिति, लखनऊ, संस्करण 1995) पृष्ठ 1-2, एवं डा. आंबेडकर की पुस्तक ‘बुद्ध और उनका धम्म’ (समता प्रकाशन, नागपुर, संस्करण उल्लेख नहीं) पृष्ठ 2-3
53. दर्शन-दिग्दर्शन, पृष्ठ 386 और ‘बुद्धचर्या’ भी देखें, पृष्ठ 6 से 12
54. बुद्ध और उनका धम्म, परिचय
55. वही, देखिए भदन्त आनन्द कौसात्यायन ;अनुवादकद्ध का नम्र निवेदन (पृष्ठ संख्या उल्लेख नहीं)
56. वही
57. वही, यह भी देखें, ‘सुत्तनिपात’, मूलपाली तथा हिन्दी अनुवाद, भिक्षु धमरत्न, प्रकाशक महाबोधि सभा, सारनाथ, बनारस, संस्करण प्रथम 1951, पृष्ठ 201
58. वही, पृष्ठ 14-17
59. बुद्धचर्या, पृष्ठ 9-10
60. बुद्ध और उनका धम्म, पृष्ठ 17-18
61. वही, पृष्ठ 19-20
62. कृपया देखें, मेरी पुस्तक ‘धम्मचक्कपवत्तन सुत्त’ (मूल, अनुवाद एवं व्याख्या), बोधिसत्त्व प्रकाशन, रामपुर, दूसरा संस्करण 1997
63. दर्शन-दिग्दर्शन, पृष्ठ 389 (बुद्धचर्या, पृष्ठ 22)
64. वही, पृष्ठ 390 (बुद्धचर्या, पृष्ठ 23)
65. वही, पृष्ठ 394
66. वही
67. बुद्ध और उनका धम्म, नम्र निवेदन, पहला पृष्ठ
68. वही, परिचय
69. वही
70. वही
71. दर्शन-दिग्दर्शन, पृष्ठ 415
72. वही
73. वही, पृष्ठ 415-416
74. बुद्ध और उनका धम्म, नम्र निवेदन, दूसरा पृष्ठ
75. वही, पृष्ठ 160
76. वही, पृष्ठ 156
77. वही, पृष्ठ 157
78. वही, पृष्ठ 107 से 147 तक
79. डा. आंबेडकर सम्पूर्ण वाङमय, खण्ड-7, पृष्ठ 17
80. वही