रविवार, 19 जून 2016

अविस्मरणीय मुद्रा जी
कॅंवल भारती

                ‘जाने वाले लौटकर नहीं आते, जाने वालों की याद आती है।मेरे ही शहर के मशहूर शाइर दिवाकर राही का यह मकबूल शेर आज मुद्रा राक्षस के निधन पर रह-रहकर याद आ रहा है। सचमुच मुद्रा जी लौटकर नहीं आयेंगे, पर उनकी याद हमेशा आयेगी। जब भी लखनऊ जाना होगा, उनकी याद आयेगी और एक सूनापन महसूस होगा।
                मुद्रा जी को पढ़ते हुए उनसे मिलने की इच्छा होती थी, पर उनके घर का कोई पता-ठिकाना मेरे पास नहीं था। उस समय तक लखनऊ में मेरा किसी भी लेखक से खास परिचय नहीं हुआ था। एक दारापुरी जी से जरूर परिचय हो गया था, जिनसे कभी-कभार उनके इन्दिरा भवन स्थित आफिस में जाकर मिल भी लेता था। मैं सम्भवतः सुलतानपुर में तैनात था। मैं वहाँ से अपने निजी या सरकारी कार्य से विभाग के मुख्यालय में आता रहता था। मुख्यालय प्रागनारायण मार्ग पर कल्याण भवन में था। चारबाग से आते हुए मैं अक्सर जीपीओ, नरही, सिकन्दर बाग और गोखले मार्ग के रास्तों पर नजर रखता था कि शायद फ्रेंच कट दाढ़ी में कोई व्यक्ति नजर आ जाय, और वह मुद्रा जी हों। अखबारों में उनके लेख के साथ जो फोटो छपता था, उसमें उनकी फ्रेंच कट दाढ़ी होती थी, इसलिए उनका यही चित्र मेरे दिमाग में बसा हुआ था। एक बार गोखले मार्ग से ही एक फ्रेंच कट दाढ़ी वाला व्यक्ति विक्रम में चढ़ा, तो मैं बहुत देर तक उस व्यक्ति को देखता रहा और समझने की कोशिश करता रहा कि क्या यही मुद्रा जी हैं। पर वह नहीं थे, वह शरीर से भी भारी थे। एक बार अमीनाबाद के इलाके में भी मैं इसी पागलपन के साथ मुद्रा जी से अचानक मिलने की कोशिश कर रहा था। लेकिन इस तरह से कोई चमत्कार कभी नहीं हुआ, पर जब सालों बाद हकीकत में उनके घर जाना हुआ, तो पता चला कि वह तो सचमुच अमीनाबाद के ही करीब थे। लेकिन यह उनसे मेरी पहली मुलाकात नहीं थी, अलबत्ता उनके घर पहली बार ही जाना हुआ था।
                मुद्राजी से मेरी पहली मुलाकात काफी देर से हुई थी। वर्ष ठीक से याद नहीं है। शायद वह 2000 या उससे पहले का कोई वर्ष हो सकता है, जब कथाक्रम के किसी आयोजन में मैंने पहली दफा उनको देखा और सुना था। वर्णव्यवस्था, वेद, उपनिषद, कौत्स, मनु और प्रेमचन्द आदि पर उनका व्याख्यान विचारोत्तेजक था। मैंने देखा कि अपनी टिप्पणियों से दलित विमर्श को उरोज पर पहुंचा देने वाले गैर दलित वक्ताओं में वही एक मात्र वक्ता थे। रात को खाने से पूर्व वहाँ व्हिस्की और बीयर पीने की व्यवस्था थी। कुछ अपवादों कों छोड़कर, जिनमें अदम गोंडवी और एक-दो महिलायें थीं, सभी पी रहे थे। सच्ची कहूँ तो इस तरह के माहौल से मेरा वास्ता पहली दफा पड़ा था। अपनी जन्मजात हीनता की ग्रन्थी के कारण मैं उस माहौल में स्वयं को अनफिट सा महसूस कर रहा था। मुझे तब पीने का शऊर भी असल में नहीं था। साल में कभी-कभार कुछ देशी पीने वालों के साथ जरूर बैठ जाता था, एकाध गिलास आँख  मींचकर हलक में उतार भी लेता था। पर यहाँ पूरा बार ही सजा हुआ था। मैंने व्हिस्की का एक गिलास उठाया और उसमें पानी की जगह बीयर डालने के लिए जैसे ही बोतल उठाई, शैलेन्द्र जी ने तुरन्त टोक दिया, ‘अरे, न..न..! व्हिस्की में बीयर नहीं डाली जाती।और मैं, जो अपनी हीनता-ग्रन्थी से पहले से ही ग्रस्त था, झेंपकर रह गया था। दो-तीन पैग पीने के बाद काशीनाथ सिंह, राजेन्द्र यादव और श्रीलाल शुक्ल के बीच जो नानवेज डायलागशुरु हुआ, और जिस तरह काशीनाथ सिंह ने मुद्राजी की चांद बजाई और जिस तरह श्रीलाल शुक्ल आज की प्रख्यात, और तब की उदीयमान कथा लेखिका से बार-बार गले मिलने की स्थिति में पहुँच रहे थे, और किस तरह शशिभूषण द्विवेदी एक ग्लैमरस युवा लेखिका पर बाग-बाग हुए जा रहे थे, यह सब देखना मेरे लिए सचमुच एक नया अनुभव था। लेकिन मुद्राजी इस फूहड़पन का अपनी मुस्कान के साथ आनन्द ले रहे थे। अपनी चांद बजाए जाने पर भी वह मुस्करा ही रहे थे। पीना उनकी कमजोरी थी, पर बहकना उनकी आदत में शुमार नहीं था।
                इस पहली मुलाकात में उनसे कुछ खास बातचीत नहीं हो सकी थी। हाँ, उनका टेलीफोन नम्बर और घर का पता मैंने जरूर ले लिया था। अब मैं फोन पर उनसे बात कर लेता था। बहुत से विषयों पर उनसे चर्चा भी फोन पर हो जाती थी। मेरा लखनऊ आना लगा ही रहता था, जब भी आता और मेरे पास समय रहता तो मैं राजेन्द्र नगर में राजवैद्य माताप्रसाद सागर से जरूर मिलता था। लखनऊ में गर्दिश के दिनों में मेरे शरणदाताओं में भी वह प्रमुख थे। एक दिन वैद्य जी से ही मैंने दुर्विजय गंज का रास्ता पूछा, तो बोले, रानीगंज के चैराहे से बाएं मुड़ जाना, सीधे उनके घर पर ही पहुँच जाओगे। और, सचमुच, मैं उसी रास्ते से मुद्रा जी के घर पहुँच गया। उन दिनों मोबाइल फोन नहीं था, और लैंडलाइन फोन वैद्य जी के घर पर भी नहीं था, इसलिए उन्हें पूर्व सूचना देने या उनसे समय लेने का अवसर नहीं था। मैंने घर के बाहर लगी घण्टी बजाई। खिड़की में से एक युवा चेहरा नजर आया, पूछा, कौन? मैंने अपना परिचय दिया, और कुछ क्षण बाद दाहिनी तरफ के एक कमरे में मुझे बैठा दिया गया। कमरा बहुत साधारण था। दीवाल पर एक चित्र टंगा था, जिसमें दो विपरीत लिंगी छोटे बच्चे आपस में किस कर रहे थे। एकाध पेंटिंग भी थी। बैठने के लिए कुछ कुर्सियां और बीच में एक मेज थी। वह किधर से भी स्टडी रूम नहीं था, इसलिए कि उसमें कुछ किताबें आदि नहीं थीं। उसी समय मुद्रा जी ने कमरे में प्रवेश किया, कैसे हो कंवल?
मैंने कहा, ‘जी ठीक हूँ।
फिर बोले, ‘अरे तुम तो मेरे प्रिय लेखक हो, सारे दलित लेखकों में।
यह तो आपका बड़प्पन है।मैंने कहा था।
मैंने कहा, मैंने सुना है कि हिन्दी संस्थान के उपाध्यक्ष के लिए आपका नाम गया है। सुनकर उपेक्षा से बोले, ‘मैं अगर जाऊॅंगा, तो नाटक अकादमी में जाऊॅंगा,  इस वाहियात जगह क्यों जाऊॅंगा?’
इसके बाद दलित राजनीति पर चर्चा छिड़ गई। वह चर्चा आंबेडकर के पूना पैक्ट और भगत सिंह से होती हुई आज के कम्युनिस्टों तक चली गई। उन्होंने कांशीराम को बहुजन नायक माना, पर मायावती की तीखी आलोचना की। उन्होंने भारतीय इतिहासकारों, खासकर कम्युनिस्ट इतिहासकारों की भी आलोचना की, जिन्होंने उस सम्पूर्ण स्वतन्त्रता संग्राम के इतिहास की उपेक्षा की, जो फुले और आंबेडकर ने बहुजनों की मुक्ति के लिए लड़ा था। उनका कहना था कि इतिहास के इतने महत्वपूर्ण पक्ष को नकारने का एक ही मललब है कि ये सारे कम्युनिस्ट लेखक अपनी मानसिकता में ब्राह्मणवादी थे। उनके विचारों को सुनते हुए समय का पता ही नहीं चला, घड़ी देखी, तो एक घण्टा होने वाला था। उसी समय मैंने उनसे विदा ली।
इसके बाद तो उनसे मिलने के अनगिनत अवसर मिले। कई बार तो कथाक्रम के ही आयोजनों में मिलना हुआ। कथाक्रम 2014 के आयोजन में वे अस्वस्थ चल रहे थे, स्वयं से न खड़े हो सकते थे, और न चल सकते थे। लेकिन इसके बावजूद वे उसमें शामिल हुए थे। उन्होंने अपने वक्तव्य के आरम्भ में जो कहा था, वह बहुत मार्मिक है-मैं जब यहाँ आने के लिए तैयार हुआ, तो पोती बोली, आप को जो बोलना है, उसे बोल दीजिए, मैं लिख देती हूँ। उसे वहाँ भिजवा दीजिए, वहाँ कोई पढ़ देगा। मैंने कहा, नहीं! वहाँ जाने का मतलब सिर्फ बोलना ही नहीं है, लोगों को सुनना और लोगों से मिलना-जुलना भी होता है। और, मैं चला आया।सभागार में तालियां  बजीं, और बजनी ही चाहिए थीं, क्योंकि उन्होंने साहित्यिक आयोजनों के महत्व और उनकी अर्थवत्ता को रेखांकित किया था।
उनके साथ उसी अवसर की एक तस्वीर मेरे मोबाईल में कैद है, जिसमें सभागार में अग्रिम पंक्ति में वे मेरे साथ बैठे हुए हैं। इस तस्वीर को एक लेखक मित्र ने अपने मोबाइल से खींचकर मुझे मेल किया था। उस मित्र का नाम अब याद नहीं आ रहा है। जब हम बैठे थे, तो उन्हें पेशाब लगा। मुझसे बोले, ‘वह कहाँ  है, जो मेरे साथ आया था? मैंने कहा, मैं नहीं जानता, पर आप मुझे बताइए, क्या करना है?’ उन्होंने कहा, ‘बाथरूम जाना है।मैंने तुरन्त उन्हें उठाया, और उनका हाथ पकड़कर उन्हें टायलेट ले गया। उस समय मैंने जाना कि रोग और बुढ़ापा आदमी को कितना बेबस बना देता है!
अन्तिम बार मेरा उनसे मिलना 23 अगस्त 2015 को उमा राय प्रेक्षागार, लखनऊ में हुआ था, जहाँ  वे भगवानस्वरूप कटियार द्वारा सम्पादित रामस्वरूप वर्मा समग्रके लोकार्पण के आयोजन में मुख्य वक्ता के रूप में आए थे। संयोग से वहाँ  भी मुझे उनके ही साथ बैठने का सुयोग मिला था। उस समय उनका स्वास्थ्य मुझे पहले से भी ज्यादा खराब लग रहा था। उन्हें तब बोलने में भी कठिनाई हो रही थी। लेकिन इसके बावजूद वे वहाँ  रामस्वरूप वर्मा के प्रति अपना सम्मान व्यक्त करने के लिए आए थे। उनका यही गुण हम जैसे लोगों को, जो थोड़ी सी तकलीफ में भी आराम करना पसन्द करते हैं, बहुत प्रेरणा देता है। इस अवसर पर मुद्रा जी ने रामस्वरूप वर्मा के बारे में बोलते हुए कुछ बेबाक टिप्पणियां  कीं थीं, जिन पर चर्चा बेहद जरूरी थी, पर हुई नहीं। उन्होंने कहा था-वह अपने दौर के महत्वपूर्ण व्यक्ति थे, जिन्होंने राजनीति के साथ-साथ दलित-पिछड़ी जातियों को ब्राह्मणवाद के खिलाफ जगाने का काम किया। उस दौर में उन्होंने जिस अर्जक वैचारिकी को स्थापित करने का आन्दोलन खड़ा किया, वह आगे स्थिर नहीं रह सका, क्यों? जिस विचारधारा की आज सबसे ज्यादा जरूरत है, वह उन्होंने दी, पर वह जीवित क्यों नहीं रही? कहीं न कहीं इसके जिम्मेदार स्वयं वर्मा जी भी थे।लेकिन इस बात को वे खुलकर नहीं कह सके थे। इसका कारण या तो उनकी अस्वस्थता थी या फिर वे रामस्वरूप वर्मा के भक्तों को नाराज नहीं करना चाहते थे, जिनका आचरण उनकी वैचारिकी के ठीक विपरीत था। कार्यक्रम के बाद मैंने अपनी शंका उन पर प्रकट की, तो उनका दर्द छलक आया था। मुद्रा जी इस बात को लेकर दुखी थे कि दलित-पिछड़ी जातियाॅं उसी ब्राह्मणवाद को अपने कंधों पर ढो रही हैं, जिसका आजीवन विरोध वर्मा जी ने किया था।
मुद्रा जी से एक अचानक मुलाकात इलाहाबाद में लालबहादुर वर्मा जी के आवास पर हुई थी, जिसका वर्ष याद नहीं आ रहा है, पर, वह इक्कीसवीं सदी का आरम्भिक वर्ष हो सकता है। वह मुलाकात दो मायने में महत्वपूर्ण थी, एक, इसलिए कि वहीं पहली दफा सुभाष गताड़े, विकास राय और रवीन्द्र कालिया से मिलना हुआ था, और, दो, इसलिए कि मुझे मुद्रा जी और कालिया जी के बीच चल रही बातचीत में, जिसमें वे अपनी अन्तरंग यादें साझा कर रहे थे, मुझे साक्षी बनने का अवसर मिला था। उनकी वे सादें बहुत दिलचस्प थीं, इसलिए बीच-बीच में हॅंसी के ठहाके भी लग रहे थे। वहाँ हम सभी समान विचारधारा के लोग थे, पर इसके बावजूद,  मुद्रा जी समकालीन वामपंथ के आलोचक थे। उनकी आलोचना के केन्द्र में वह वामपंथ था, जो जातिचेतना से लड़ना नहीं चाहता था। एक प्रसंग में उन्होंने इस विचार को वहाँ  भी पूरी शिद्दत से रखा था, जिसे मैं देख रहा था कि विकास जी ने उनके विचार को किसी उदाहरण से आगे बढ़ाया था।
यह वह दौर था, जब मुद्रा जी राष्ट्रीय सहारामें अपने नियमित स्तम्भ-लेखन से दलित-पिछड़े वर्गों के हीरो बने हुए थे। वे आंबेडकर और फुले की विचारधारा को अपने लेखन से निरन्तर धार दे रहे थे। उन्होंने चन्द्रिकाप्रसाद जिज्ञासु, ललईसिंह यादव और रामस्वरूप वर्मा के रिक्त स्थान को बहुत जल्दी भर दिया था। वे दलित वर्गों के आदर्श बन गए थे, और उस मुकाम पर पहुँच गए थे, जहाँ  कोई दलित लेखक भी आज तक नहीं पहुंचा। यह उन्होंने ही हिन्दी जगत को बताया था कि अवसर मिलने पर चाण्डाल जाति में जन्मे रवीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविख्यात कवि बने, और हेला यानी भंगी जाति में जन्मे बिस्मिल्लाह खां विश्व के मशहूर शहनाई वादक बने। इसलिए यह मामूली घटना नहीं है कि लखनऊ की एक संस्था (विश्व शूद्र सभा) ने उन्हें शूद्राचार्यकी उपाधि दी थी। यह गौरव फिर किसी दूसरे लेखक को हासिल नहीं हुआ। यह अलग बात है कि हिन्दी जगत में इसकी बहुत तीखी प्रतिक्रिया हुई थी, और वे रातोंरात जातिवादीकरार दे दिए गए थे। लेकिन वे नहीं जानते थे कि यही जातिवाददलित वर्गों को उत्तिष्ठित और जागृतकर रहा था।
वे हिन्दी साहित्य के उन आलोचकों में थे, जिन्होंने आलोचना के मठ तोड़े थे, और साहित्य का पुनर्मूल्यांकन किया था। इसी पुनर्मूल्यांकन में उन्होंने प्रेमचन्द को दलितविरोधी कहा था। उन्होंने यहाँ  तक कहा कि प्रेमचन्द आज होते, तो दलित उन्हें जिन्दा जला देते। उनके इस विचार की अत्यन्त तीखी आलोचना हुई। वीरेन्द्र यादव ने उनके विरुद्ध तद्भवमें लम्बा लेख लिखा। सम्भवतः उसी समय दिल्ली में दलित साहित्य अकादमी के अध्यक्ष डा. सोहनपाल सुमनाक्षर ने प्रेमचन्द के उपन्यास रंगभूमिको जलाने का अभियान शुरु किया था। इस प्रश्न पर मैं मुद्राजी से पूरी तरह सहमत नहीं था, और प्रेमचन्द के साहित्य जलाना तो हद दर्जे की मूर्खता ही थी।
मुद्रा जी का पूर्व नाम चाहे जो रहा हो, और चाहे वे किसी भी वर्ण या जाति के रहे हों, पर बहुजन समाज ने उन्हें अपना आदर्श मान लिया था। यह इसी का परिणाम था कि मऊ की चमार समाज परिषदके मुखिया पी. डी. टण्डन ने उन्हें अपने राष्ट्रीय अधिवेशन में बतौर मुख्य अतिथि आमन्त्रित किया था। यह अधिवेशन 9 अप्रैल 2006 को मऊ में दाढ़ी चक्की, आंबेडकर पार्क में हुआ था। संयोग से विशिष्ट अतिथि के रूप में मैं भी उसमें उपस्थित था। उनके साथ इस मौके की मुलाकात मेरी सबसे यादगार मुलाकात है। लखनऊ से 8 अप्रैल को हम दोनों को एक ही ट्रेन से मऊ नाथभंजन जाना था। यहाँ  मैं उनकी सादगी और आम आदमी की प्रवृति का जिक्र करना चाहूँगा, जिसने मुझे बौना बना दिया था। वह गरमी की संध्या थी। प्लेटफार्म पर मैं उनका इन्तजार कर रहा था, पर वे कहीं दिखाई नहीं दे तहे थे। ट्रेन  आई, और मैं अपने आरक्षित दूसरे दरजे के वातानुकूलित कोच में बैठ गया, तब मैंने उन्हें फोन किया, (उस वक्त तक वे मोबाईल फोन रखने लगे थे), पूछा कि आप कहाँ  हैं? उनका जवाब था, ‘मैं ट्रेन में हूँ।मैंने कहा, ‘पूरे डिब्बे में मैंने देख लिया, आप यहाँ  तो नहीं हैं।क्योंकि मैं एसी कोच में ही उनके होने की अपेक्षा कर रहा था, और उस ट्रेन में एसी का एक ही डिब्बा था। वे बोले, ‘मैं स्लीपर क्लास में हूँ।मैं सन्न रह गया। उनसे कोच नम्बर पूछकर तुरन्त उनसे मिलने गया। मैं अपनी बर्थ पर खिड़की के पास बैठे हुए पसीने-पसीने हो रहे थे। मैं स्तब्ध था। इतना महान लेख इस अंधेरे कोच में गरमी में बैठा है। मैंने उनसे एसी कोच में चलने की प्रार्थना की कि आप मेरे साथ चलें, मैं सारी व्यवस्था करा दूंगा।पर वे इसके लिए तैयार नहीं हुए। बोले, ‘मैं ठीक हूँ।
पर क्यों?’, मैंने पूछा।
उन्होंने अपने सामने बैठे व्यक्ति की तरफ देखकर कहा, ‘इन्हीं को मुझे ले जाने की जिम्मदारी सौंपी गई है। इन्हें इसी श्रेणी के टिकट मिले हैं। अब इन्हीं के साथ जाना है और इन्हीं के साथ आना है।
दूसरे दिन भोर में ट्रेन मऊ पहुंची। शाम को कार्यक्रम था। हजारों की भीड़ थी, जो मुद्राजी को सुनने आई थी। उस दिन महापंडित राहुल सांकृत्यायन का जन्मदिवस भी था। मुद्रा जी ने राहुल जी के प्रति अपने उदगार प्रकट करते हुए वेद, स्मृतियों, पुराणों और अन्य शास्त्रों से हवाले देकर भारतीय समाज व्यवस्था का जो ब्राह्मणवादी चरित्र उजागर किया, उसे जनता ने मन्त्रमुग्ध होकर सुना। उनके मुख से इतना धाराप्रवाह और विचारोत्तेजक भाषण सुनना स्वयं मेरे लिए भी नया अनुभव था।
दूसरे दिन रात में सम्भवतः 9 बजे की टेªन से हमें वापिस जाना था। रात के भोजन से निवृत्त होकर हम समय से स्टेशन पहुँच गए थे। लेकिन टेªन पांच घण्टे के विलम्ब से दो बजे के भी बाद आई। प्लेटफार्म पर शायद बिजली नहीं थी, इसलिए पंखे भी नहीं चल रहे थे। विकट गरमी और मच्छरों से बचने के लिए हमने वह पांच घण्टे प्लेटफार्म पर ही, कभी बैठकर, तो कभी टहलते हुए, गुजारे थे। उस रात प्लेटफार्म पर टहलते हुए हमारे बीच बहुत सी साहित्यिक और राजनीतिक बातों के अलावा घर-परिवार की बातें भी हुई थीं। उस समय तक मैं उनकी पुस्तक धर्मग्रन्थों का पुनर्पाठको पढ़ चुका था। मैंने उनसे पूछा, ‘आपकी आर्य-थियरी सबसे अलग है। आपने लिखा है कि भारत में केवल ब्राह्मण बाहर से आया है, और वह यहाँ  घुलमिल कर रहने के लिए नहीं आया। इसीलिए उसने अपनी अलगाववादी व्यवस्था स्थापित की और अपनी पृथक पहचान बनाकर रहता है। लेकिन, डा. आंबेडकर की थियरी बिल्कुल अलग है। वह आर्य को भारत का ही मूलनिवासी माने हैं। क्या उनसे इतिहास को समझने में भूल हुई थी?’ उन्होंने बेहिचक कहा था, ‘हाँ, आंबेडकर से भूल हुई थी।
अप्रैल, 2011 में, मैंने मुद्रा जी को अपनी पुस्तक स्वामी अछूतानन्दजी हरिहरऔर हिन्दी नवजागरणभेजी थी। उन्होंने इसकी चर्चा राष्ट्रीय सहारा में 3 जुलाई 2011 के अपने स्तम्भ में की। इस समीक्षा को पढ़कर धर्मवीर आग-बबूला हो गए थे, जिसके जवाब में उन्होंने एक लम्बा खत मुद्राजी को भेजा था। खैर, मैं उस अंश को यहाँ  उद्धृत कर रहा हूँ,  जो यह था-हिन्दी में हाल में एक महत्वपूर्ण दलित विचारक कंवल भारती की एक किताब आई है स्वामी अछूतानन्द हरिहरऔर हिन्दी नवजागरण। मगर ज्यादा बड़ी बात यह है कि जहाँ  भारतेन्दु जैसे लेखक हिन्दी में एंलाइटेनमेंट के अग्रदूत मानकर पूजे जा रहे हैं, वहीं कंवल ने ज्ञानोदय की वास्तविक प्रतिभाओं में से एक अछूतानन्द हरिहरके जीवन, कृतित्व और विचारों पर एक व्यवस्थित और गवेषणात्मक किताब लिखी है, जिसमें हरिहरजी का अन्य हिन्दी लेखकों और विचारकों से तुलनात्मक अध्ययन है। इस पुस्तक का यह तुलनात्मक भाग चकित करने की हद तक संतुलित और विचार गहन है। इसमें धर्मवीर की तरह दुर्भाषा का नाहक इस्तेमाल नहीं है। कंवल जानते हैं कि आलोचना तभी प्रभावी होती है, ज बवह गाली-गलौंच से बचती है।
एक और अविस्मरणीय घटना है। यह घटना 2005 की है। दलित शोध संस्थान की ओर से रामपुर में एक सेमिनार का आयोजन किया गया था। माता प्रसाद जी की स्वीकृति मिल गई थी, पर संस्थान के अध्यक्ष धीरज शील का मुद्रा जी से सम्पर्क नहीं हो पा रहा था। मैंने मुद्राजी को फोन किया और रामपुर में सेमिनार करने की सूचना देते हुए उसमें उन्हें आने का निवेदन किया। उनकी तबीयत तब भी खराब चल रही थी। बोले, ‘कंवल! तबीयत ठीक नहीं चल रही है। पर खैर! तुम्हारे शहर में जरूर आऊॅंगा।उनकी स्वीकृति मिलते ही मैंने उन्हें एसी द्वितीय श्रेणी के रिटर्न टिकिट भेज दिए। निश्चित तारीख पर वे और माता प्रसाद जी दोनों सुबह ही रामपुर आ गए। पर, दस बजे के बाद से जो आँधी-तूफान और उसके बाद मूसलाधार बारिश शुरु हुई, तो उसने थमने का नाम नहीं लिया। ऐसे में न श्रोता आए, और न सेमिनार हो सका। मुद्रा जी का दोपहर का खाना और पीना धीरज शील के घर पर रखा गया था। आँधी-तूफान और बारिश में उन्हें शहर में भी कहीं ले जाना सम्भव नहीं था। उसी दिन, उनकी शाम की टेªन से वापसी थी, अतः, हमने भारी मन से दोनों विभूतियों को विदा किया। मुद्रा जी का मैं आभार ही व्यक्त कर सका था कि अपनी अस्वस्थता में भी उन्होंने मेरा निमन्त्रण स्वीकार किया था। ऐसे थे मुद्रा जी।
19 जून 2016





शनिवार, 30 अप्रैल 2016

आईआईटी में संस्कृत
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कॅंवल भारती

भारत सरकार की मानव संसाधन विकास मन्त्री श्रीमती स्मृति ईरानी ने भारतीय प्रोद्योगिकी संस्थानों (आईआईटी) में संस्कृत पढ़ाने पर जोर दिया है। जाहिर है कि यह फैसला स्मृति ईरानी का नहीं है, क्योंकि संस्कृत भाषा से उनका कोई सम्बन्ध कभी नहीं रहा;  वे न खुद संस्कृत पढ़ी हैं और न उनके बच्चे पढ़े हैं।  उनकी शिक्षा का माध्यम भी उसी तरह अंग्रेजी रहा है, जिस तरह तमाम भारतीय नेताओं का रहा है। निश्चित ही इस निर्णय के पीछे आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) का एजेण्डा है, जिसे वह अपनी सरकार में लागू कराना चाहता है। आइए, इस बहाने संस्कृत, हिन्दी और अंग्रेजी पर कुछ चर्चा करते हैं।
अतीत में ब्राह्मणों ने संस्कृत को सार्वजनिक भाषा नहीं बनने दिया, उसे उन्होंने अपने वर्ग तक ही सीमित रखा, और आम जनता को हमेशा उससे दूर रखा। इसका कारण कुछ भी रहा हो-आम जनता को अनपढ़ बनाए रखना या वर्णव्यवस्था के अनुसार शूद्र वर्ण को शिक्षा से वंचित कर ब्राह्मणी वर्चस्व कायम करना-उस पर बहस करना इस लेख का विषय नहीं है, बल्कि इस लेख में मैं दो सवाल रखना चाहता हूॅं-पहला, जब जनता संस्कृत पढ़ना चाहती थी, तब उसे पढ़ने क्यों नहीं दिया गया, और, दूसरा, आज जनता जब संस्कृत पढ़ना नही चाहती, तो उसे पढ़ने पर जोर क्यों दिया जा रहा है? माना कि भारतीय लोकतन्त्र ने वर्णव्यवस्था को कानूनी रूप से समाप्त कर दिया है, और शिक्षा के दरवाजे सब के लिए खोल दिए हैं, परन्तु यह संस्कृत को सार्वजनीन बनाने का कारण नहीं हो सकता। अगर इसे एक कारण मान भी लिया जाय, तो सवाल यह पैदा होता है कि केन्द्र में, या जिन-जिन राज्यों में आरएसएस और भाजपा (भारतीय जनता पार्टी) सत्ता में आते हैं, तो उन्हीं को संस्कृत की चिन्ता क्यों होती है? हालांकि भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल संस्कृत के विकास के लिए आज भी केन्द्र में राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान और लगभग सभी राज्यों में संस्कृत अकादमियां  तथा शिक्षण संस्थान काम कर रहे हैं, जो प्रतिवर्ष करोड़ों रुपए खर्च करते हैं। देशभर में चल रहे आरएसएस के स्कूलों में भी संस्कृत अनिवार्य रूप से पढ़ाई जा रही है। परन्तु, इसके बावजूद संस्कृत भारत की जनता के दिलों पर राज नहीं कर सकी। क्यों? इतने संसाधनों और संस्थानों के बाद भी अगर संस्कृत की स्थिति दयनीय है, तो क्या आईआईटी में उसे लागू करने से वह जनभाषा बन जाएगी?
अब मैं इस सवाल पर आता हूँ कि संस्कृत के प्रति आरएसएस की मुख्य चिन्ता क्या है? दरअसल ब्राह्मणों ने अतीत में, और उस अतीत में, जिसे वे अपना स्वर्णयुगकहते हैं, संस्कृत को राजभाषा बनाया था, और चूँकि तब उनके समक्ष अन्य किसी अभारतीय भाषा-अर्थात् समानान्तर विदेशी धर्म और उसकी भाषा-की कोई बड़ी चुनौती नहीं थी, इसलिए उन्होंने संस्कृत पर अपनी इजारेदारी कायम रखी थी, और यह उनके लिए इसलिए भी जरूरी था, क्योंकि राजभाषा हमेशा आर्थिक संसाधन अर्थात रोजी-रोटी की भाषा होती है। चूँकि वर्णव्यवस्था में अन्य वर्णों की जीविका सुनिश्चित थी, और बौद्धिक जीविका केवल ब्राह्मण के लिए तय की गई थी, इसलिए उसने संस्कृत पर अपना वर्चस्व बनाकर ठीक ही अपना भविष्य सुरक्षित करने का काम किया था।
हिन्दुओं के स्वर्णयुगके बाद, भारत में, मुस्लिम सल्तनत और मुगल राज कायम हुआ। भारतीय समाज में एक नए अभारतीय धर्म इस्लाम का प्रवेश हुआ, और फारसी भाषा राजभाषा बन गई। यह ब्राह्मण बौद्धिक वर्ग के लिए एक बड़ी चुनौती थी-न केवल उनके धर्म के लिए, बल्कि उनकी जीविका के लिए भी। वह अब मात्र संस्कृत आधारित धार्मिक अनुष्ठानों और पठन-पाठन के बल पर जिन्दा नहीं रह सकता था, बल्कि उसे सरकारी नौकरियां भी चाहिए थीं, जिसके लिए फारसी का ज्ञान अनिवार्य था। इसलिए जीविका के भावी संकट को देखते हुए, ब्राह्मण बुद्धिजीवी वर्ग फारसी सीखने में सबसे आगे आया। लेकिन, इसके साथ ही इस्लाम भी एक बड़ी चुनौती के रूप में उसके सामने था, क्योंकि उसके सामाजिक समानता और भाईचारे के दर्शन ने वर्णव्यवस्था और जातिभेद से पीडि़त शूद्र-अछूत जातियों के लिए मुक्ति का दरवाजा खोल दिया था। उनमें हिन्दू वर्णव्यवस्था के खिलाफ विद्रोह पैदा हो गया। इससे निपटने के लिए दक्षिण से ब्राह्मण सन्तों ने भक्ति आन्दोलन चलाया, जिसके प्रतिरोध में उत्तर में निम्न जातियों के सन्तों ने हिन्दू वर्णव्यवस्था के विरुद्ध जनभाषा में निर्गुण आन्दोलन चलाया। पहली दफा जनता की अभिवयक्ति को जनता की भाषा में आने का अवसर मिला। ब्राह्मण सन्तों ने भी संस्कृत को छोड़कर, हिन्दी को अपनाया, और मजबूरी में ही सही, निम्न जातियों को भी अपने साथ लेने का प्रयास किया, हालांकि वहाँ  उन्हें सम्मान और समता का स्थान कभी नहीं मिला। ब्राह्मण बौद्धिक वर्ग फारसी का ज्ञान प्राप्त करके, मुस्लिमों के अधीन सरकारी नौकरियों में ही नहीं आ गया था, बल्कि वह मुस्लिम सत्ता को, काजियों और उलेमाओं (धर्मगुरुओं) के मार्फत, हिन्दुओं के धार्मिक मसलों-विशेषकर, वर्णव्यवस्था और परम्पराओं में दखल न देने के लिए राजी करने में भी सफल हो गया था। इस्लाम की बड़ी चुनौती को कमजोर करने में इस सन्धि ने सचमुच बड़ी भूमिका निभाई थी।
लेकिन, ब्राह्मण बौद्धिक वर्ग का खेल तब बिगड़ गया, जब भारत में अंगे्रज आ गए। वे भी एक धर्म (ईसाईयत) और एक भाषा (अंगे्रजी) लेकर आए, जो उसके लिए इस्लाम से भी बड़ी चुनौती साबित हुई। अंगे्रजों ने शिक्षा को सार्वजनिक बनाया और उसका माध्यम बनाया अंगे्रजी को। उन्होंने फारसी के स्थान पर अंगे्रजी को अदालतों और राजकाज की भाषा बनाया। अब वकालत और दूसरे पेशों में जाने के लिए अंगे्रजी की पढ़ाई जरूरी थी। अब फारसी के ज्ञान से ब्राह्मण बौद्धिक वर्ग की जीविका चलने वाली नहीं थी। लिहाजा, फारसी छोड़कर अंग्रेजी पढ़ने के लिए भी यही वर्ग सबसे आगे आया। हालांकि, मुस्लिम बौद्धिक वर्ग ने अपने धार्मिक कारणों से अंगे्रजी का विरोध जारी रखा था, क्योंकि फारसी उनकी संस्कृति से जुड़ी भाषा थी, जिसे वे छोड़ना नहीं चाहते थे, पर बाद में उनका भी एक तबका अंगे्रजी के समर्थन में खुलकर सामने आ गया था। किन्तु, ब्राह्मण बौद्धिक वर्ग ने अंग्रेजी पढ़कर न केवल ब्रिटिश के अधीन शासन-प्रशासन और न्यायपालिका में महत्वपूर्ण पद हासिल किए; न केवल अपनी भावी पीढ़ी की जीविका की सुरक्षा के लिए अपने बच्चों को विलायती शिक्षा और तौर-तरीके सीखने के लिए इंग्लैण्ड पढ़ने भेजा, बल्कि अपनी धार्मिक अंधी परम्पराओं के समर्थन में अंगे्रजों का विरोध करते हुए वे रूढि़वादी भी बने रहे। अंगे्रजी को उन्होंने सिर्फ अपनी रोजी-रोटी के लिए अपनाया, ज्ञान की एक नई रोशनी के रूप में वे उसे कभी नहीं अपना सके। कुछ ने अंग्रेजी को हिन्दूधर्म की आधुनिक व्याख्या का हथियार बनाया, और विदेशों में जाकर, अंगे्रजी में हिन्दूधर्म समझाया। पर, भारत में वे अपने धार्मिक अंधविश्वासों से कभी मुक्त नहीं हुए। उन्होंने बालविवाह, आजीवन वैधव्य, सतीप्रथा, वर्णव्यवस्था और अस्पृश्यता का हमेशा समर्थन किया, यहाॅं तक कि शास्त्रों के आधार पर उनका औचित्य भी साबित किया। यह शिक्षा उसे वस्तुतः संस्कृत से मिली थी, जबकि अंगे्रजी शिक्षा इस रूढि़वाद के एकदम खिलाफ थी।
अतः, इसी ब्राह्मण बौद्धिक वर्ग में से, एक कट्टर हिन्दूवादी वर्ग निकलकर सामने आया, जिसके अब दो-दो दुश्मन थे- इस्लाम और ईसाईयत। उनका दूसरा दुश्मन ईसाई धर्म, दुर्भाग्य से कट्टरवादी मुसलमानों का भी था। हिन्दू जिन्हें अछूत कहकर गुलाम बनाए हुए थे, इस्लाम उनमें से काफी लोगों को अपने फोल्ड में समा चुका था, और अब ईसाई मिशनरी भी दलित इलाकों में स्कूल, अस्पताल और चर्च कायम करके उन्हें ईसाई बना रहे थे। इससे हिन्दूवादी ब्राह्मण बौद्धिक वर्ग ज्यादा चिन्तित था। दलितों को केवल संख्या में हिन्दू गिनने वाले इस ब्राह्मण बौद्धिक वर्ग की चिन्ता यह थी कि अगर दलितों का इस्लाम और ईसाईयत में धर्मान्तरण होता रहा, तो हिन्दू अल्पसंख्यक हो जायेंगे, और संख्या के आधार पर राजसत्ता पर कभी काबिज नहीं हो पायेंगे।
इसी सोच ने हिन्दूराष्ट्र के विचार को जन्म दिया, और भारत को हिन्दूराष्ट्र बनाने वाला एक आक्रामक हिन्दू संगठन हिन्दू महा सभाअस्तित्व में आया। इसी की उग्र राजनीति की प्रतिक्रिया में मुस्लिम राष्ट्र का मुद्दा भी सक्रिय हुआ। इन दो राष्ट्रों के परस्पर संघर्ष का भयंकर परिणाम भारत के इतिहास में दर्ज है, जिसने भारत की धरती को ही लाल नहीं कर दिया था, वरन् दोनों समुदायों के दिलों में कभी न मिटने वाली नफरत भी भर दी थी, जो आज तक कायम है। इसी के कारण, भारत का विभाजन हुआ, और अंग्रेज दोनों टुकड़ों को आजाद करके चले गए।
उसी हिन्दूराष्ट्रवाद की संकीर्ण विचारधारा पर आज आरएसएस काम कर रहा है। यह संस्कृत का मुद्दा इसी इतिहास के गर्भ से निकला है। 1 दिसम्बर 1939 को, हिन्दू महासभा के कलकत्ता अधिवेशन में उसके अध्यक्ष वी. डी. सावरकर ने संस्कृत को राष्ट्रभाषा बनाने के पक्ष में कहा था-
संस्कृत हमारी देवभाषा और संस्कृतनिष्ठ हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा होगी। संस्कृत हम हिन्दुओं के लिए सभी भाषाओं में सबसे ज्यादा पवित्र है, क्योंकि हमारे प्राचीन धर्मग्रन्थ, इतिहास, दर्शन, सभी की जड़ें संस्कृत-साहित्य में इतनी गहरी जमी हुई हैं कि वह हमारी जाति का मस्तिष्क और बुद्धि बन गया है। इसलिए संस्कृत भाषा हमेशा ही हिन्दू युवकों के लिए शास्त्रीय पाठ्यक्रम का अभिन्न अंग होनी चाहिए।
                उल्लेखनीय है कि आरएसएस भी शिक्षण संस्थानों में संस्कृत को लगाए जाने की बात इसीलिए कर रहा है, ताकि (हिन्दू) युवक शास्त्रीय पाठ्यक्रम का अध्ययन कर, उसके ज्ञान को अपना मस्तिष्क और बुद्धि बनाएँ। अपना मस्तिष्क और बुद्धि बनाने का मतलब है, हिन्दू युवक हिन्दूधर्म की उन सभी व्यवस्थाओं पर गर्व करें, जो आज असंवैधानिक और अमानवीय घोषित की जा चुकी हैं। लेकिन आरएसएस को इसकी जरूरत क्यों पड़ रही है? अब मैं इस सवाल पर आता हूँ।
                भारत के विभाजन के बाद, हिन्दू संगठनों की समस्या और उलझ गई। अंग्रेज चले गए थे, पर उनके लिए चुनौती के रूप में कुछ मिशनरी रह गए थे, जो दलित आदिवासियों के बीच शिक्षा-प्रसार का काम कर रहे हैं। मुसलमानों का पाकिस्तान बन गया था, पर एक बड़ी मुस्लिम आबादी के भारत में ही रह जाने के कारण मुसलमान भी उनके हिन्दूराष्ट्र के लिए एक बड़ी चुनौती बने हुए हैं। ईसाई और इस्लाम भारत में हिन्दुत्व के लिए चुनौती इसलिए नहीं है कि लोकतन्त्र में हिन्दू संगठनों अर्थात् आरएसएस का विश्वास नहीं है, लोकतन्त्र में उनका विश्वास है, पर उनका विश्वास अल्पसंख्यक समुदायों की धार्मिक स्वतन्त्रता में नहीं है, जिसका अधिकार भारत का संविधान देता है। इसलिए आरएसएस की चिन्ता यह है कि मुसलमान अपने मदरसों में अपनी धार्मिक  अरबी पढ़ा रहे हैं, कुरान पढ़ा रहे हैं और पूरा इस्लामी इतिहास पढ़ा रहे हैं, जिसे पढ़कर मुस्लिम लड़के उग्रवादी-यानी, उनकी दृष्टि में, हिन्दूविरोधी बन रहे हैं, जबकि हिन्दू युवा संस्कृत न पढ़कर हिन्दू इतिहास से अपरिचित हैं। बस,  इसी एक चिन्ता के कारण आरएसएस संस्कृत को सरकारी संस्थानों में पढ़ाने पर जोर दे रहा है।
                लेकिन,  यहाँ  यह सवाल उठना लाजमी है कि आरएसएस हिन्दू युवाओं को संस्कृत का शास्त्रीय साहित्य पढ़ाकर क्या मुसलमानों के विरुद्ध एक बिना सिर-पैर का हिन्दू राष्ट्र खड़ा करना चाहता है? क्या संस्कृत के शास्त्रीय साहित्य का अध्ययन इस्लामी साहित्य का मुकाबला कर सकता है, जिनका ज्ञान, दर्शन और इतिहास कुछ भी एक-दूसरे से मेल नहीं खाता है? क्या अरबी के मुकाबले संस्कृत रोजगारोन्मुख भाषा बन गई है? जिस तरह कोई अरबी सीखकर सऊदी अरब में रोजगार पा सकता है, क्या उसी तरह कोई संस्कृत सीखकर भारत या विदेशों में भी, कोई रोजगार नहीं पा सकता है। संस्कृत भाषी व्यक्ति तो गाईड के रूप में भी कहीं नौकरी नहीं पा सकता, क्योंकि वह कहीं बोली ही नहीं जाती है। शि़क्षक के रूप में संस्कृत जरूर कुछ लोगों को रोजगार दे रही है, पर संस्कृत को विज्ञान और चिकित्सा की भाषा बनाए बिना, जो असम्भव है, संस्कृत के शिक्षण पर भी धन खर्च करना अपव्यय ही है।
                एक भाषा के रूप में संस्कृत से हमारा कोई विरोध नहीं है। दलित-पिछड़ी जातियों को, अलबत्ता, यह जानते हुए भी कि संस्कृत साहित्य उनके विरोध का साहित्य है, संस्कृत से कोई गिला नहीं है। डा. आंबेडकर ने भी एक समय, संस्कृत को राजभाषा बनाने का प्रस्ताव रखा था, ताकि शूद्र वर्ग संस्कृत पढ़कर यह जान जाय कि ब्राह्मणों ने उन्हें किस तरह कुचला है? इस अर्थ में संस्कृत का स्वागत है, पर अगर उसके माध्यम से हिन्दू युवकों को, भारत के अल्पसंख्यकों के विरुद्ध, हिन्दूराष्ट्र से जोड़ने का निहितार्थ है, तो आरएसएस को समझना चाहिए कि उसे अपने 91 वर्ष के लम्बे समय में यह कामयाबी आज तक नहीं मिली, और तो आगे भी मिलने वाली नहीं है, क्योंकि लोकतन्त्र और हिन्दू राष्ट्रवाद साथ-साथ नहीं चल सकते।
(30 अप्रैल 2016)