शुक्रवार, 15 अप्रैल 2016

डा. आंबेडकर और राष्ट्रवाद-4
कॅंवल भारती

यह आकस्मिक नहीं है कि डा. आंबेडकर के जन्मस्थल महू में प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी के कार्यक्रम की शुरुआत भारत माता की जयके नारों के साथ होती है। आकस्मिक यह भी नहीं है कि अब डा. आंबेडकर राष्ट्रवादी आंबेडकर हो गए हैं, और यह भी बिल्कुल आकस्मिक नहीं है कि डा. आंबेडकर और डा. हेडगेवार को समान सामाजिक मंच पर खड़ा कर दिया गया है। इस सबके पीछे निश्चित रूप से उत्तर प्रदेश में आने वाले विधान सभा के चुनावों में दलितों को भाजपा से जोड़ने का उद्देश्य दिखाई देता है। इस पर कोई आपत्ति भी हमें नहीं है, क्योंकि जब सभी राजनीतिक दलों ने आंबेडकर का राजनीतिकरण किया है, तो भाजपा क्यों नहीं कर सकती?
लेकिन, हमारी आपत्ति डा. आंबेडकर को हिन्दूवादी बनाने पर है। हमारी आपत्ति उन्हें राष्ट्रवाद से जोड़ने और डा. हेडगेवार के बराबर दर्जा देने पर है। आरएसएस की यह सोच कि डा. आंबेडकर ने डा. हेडगेवार के ही सामाजिक समरसता कार्यक्रम को आगे बढ़ाया है, न केवल डा. आंबेडकर के दर्शन का कुपाठ है, बल्कि उन्हें, उनकी जड़ों से उखाड़कर, हिन्दुत्ववादी बनाकर, उनकी विचारधारा को दफन करने का उपक्रम भी है। राष्ट्रवाद और हिन्दूवाद एक साथ नहीं चल सकते। कोई भी व्यक्ति या तो राष्ट्रवादी होगा, या फिर हिन्दूवादी होगा; वह दोनों एक साथ नहीं हो सकता। सैद्धान्तिक रूप से समरसतावाद भी हिन्दू-मुसलमान और हिन्दू-ईसाई में भेद नहीं करता, जबकि आरएसएस का हिन्दुत्व यह भेद करता है।  इसका मतलब है कि आरएसएस की समरसतावाद की व्याख्या कुछ दूसरी है। आइए, देखते हैं कि उसकी यह व्याख्या क्या है? यह जानने के लिए हमें पहले यह देखना होगा कि उसने यह नारा कब दिया था?
भारत में, 1990 का दशक और उसके बाद का समय मण्डल और कमण्डल की राजनीति का कालखण्ड है। यही समय पिछड़ी जातियों के उभार का है, और यही दौर आक्रामक हिन्दू आन्दोलन का भी है। इसी काल में बाबरी मस्जिद ध्वस्त की गई और इसी काल में तत्कालीन प्रधानमन्त्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मण्डल कमीशन की सिफारिशें लागू की थीं, जिसके विरोध में पूरा देश जल उठा था। संयोग से 1990 में ही डा. आंबेडकर की सौवीं जयन्ती मनाई गई थी, जिसमें सभी राजनीतिक दलों ने अपने-अपने आंबेडकर गढ़े थे। इसी राजनीतिक अभियान में, कांशीराम ने सामाजिक परिवर्तन, विश्वनाथ प्रताप सिंह ने सामाजिक न्याय और आरएसएस ने सामाजिक समरसता के शब्द डा. आंबेडकर के साथ जोड़े थे। कांशीराम के सामाजिक परिवर्तन के नारे के प्रतिरोध में विश्वनाथ प्रताप सिंह ने सामाजिक न्याय का नारा दिया था, जिसका अर्थ था मौजूदा समाज-व्यवस्था में ही न्याय की बात करना। किन्तु, आरएसएस को सामाजिक परिवर्तन और  सामाजिक न्याय के ये दोनों नारे रास नहीं आए, क्योंकि उसकी दृष्टि में ये दोनों नारे समाज में विघटन पैदा करने वाले थे। इसलिए, उसने उनके समानान्तर सामाजिक समरसता का नया नारा गढ़ा, जिसे उसने दीनदयाल उपाध्याय का मानव एकात्मवाद कहा। इसकी व्याख्या में उसने कहा कि जिस तरह हाथ की पाँचों  उंगलियां  समान नहीं होतीं, पर उनके बीच समरसता होती है, उसी तरह समाज में भी सब समान नहीं हो सकते, पर उनके बीच समरसता होनी चाहिए। यही सामाजिक समरसता है, जिसका अर्थ है, जो जैसा है, वह वैसा ही बना रहे, चमार चमार बना रहे, भंगी भंगी बना रहे, नाई नाई बना रहे, धोबी धोबी बना रहे, ब्राह्मण ब्राह्मण बना रहे, ठाकुर ठाकुर बना रहे और बनिया बनिया बना रहे, बस उनके बीच समरसता रहनी चाहिए। वस्तुतः यह सामाजिक समरसता निम्न जातियों को यथास्थिति में रखने का दर्शन है। इसलिए, आरएसएस इस बात की गारण्टी नहीं देता कि यदि निम्न जातियां  अपना पुश्तैनी धंधा छोड़कर, विकास की मुख्य धारा में आना चाहेंगी, तो उच्च जातियां  उनसे संघर्ष नहीं करेंगी? किन्तु अभी तक का अनुभव यही बताता है कि ऐसे मामलों में जातीय संघर्ष को उसने रोका नहीं है, बल्कि तेज ही किया है। ऐसी स्थिति में सामाजिक समरसता कैसे बनी रह सकती है? क्या निम्न जातियों के लिए हिन्दू धर्मगुरु और धर्मशास्त्र समरसता की बात करते हैं? या उनके विरुद्ध विषवमन करते हैं और उनकी गरिमा तथा प्रतिष्ठा को नकारते हैं? क्या इन सवालों पर विचार किए बिना, आरएसएस संगठनों के द्वारा डा. आंबेडकर की 125वीं जयन्ती को सामाजिक समरसता वर्ष के रूप में मनाने का क्या औचित्य है?
इंडियन एक्सप्रेस (14 अप्रैल 2016) में आरएसएस चिन्तक और भाजपा के महासचिव श्री राम माधव का लेख व्हाट दलितस् वान्टप्रकाशित हुआ है, जिसमें वह लिखते हैं कि दलित चार चीजें चाहते हैं-सम्मान, सहभागिता, समृद्धि और सत्ता। पहली दो की जिम्मेदारी, वह समाज पर डाल देते हंै, और अन्तिम दो के बारे में कहते हैं कि उसे सरकार पूरा कर सकती है। वे जोर देकर कहते हैं कि दलितों की सम्मान और सहभागिता की भूख’ (वह अधिकार को भूख कहते हैं) के लिए सामाजिक और धार्मिक संगठनों को काम करना चाहिए, तभी सामाजिक समानता आएगी। किन्तु, अन्तिम दो के लिए उनकी सरकार क्या काम कर रही है, उस पर उन्होंने कोई प्रकाश नहीं डाला है।
सामाजिक संगठनों की बात तो समझ में आती है, परन्तु धार्मिक संगठनों से उनका क्या अभिप्राय है? भारत के अधिकांश हिन्दू धार्मिक संगठन जातिव्यवस्था में अटूट विश्वास करते हैं। ऐसे धार्मिक संगठनों से, जो आज भी दलितों के मन्दिर-प्रवेश के विरोधी हैं और स्त्रियों को भी समान अधिकार देने को तैयार नहीं हैं, क्या यह अपेक्षा की जा सकती है कि वे दलितों को सम्मान और सहभागिता का अधिकार देंगे? क्या यह सच नहीं है कि किसी भी हिन्दू धार्मिक संगठन का मकसद जातिव्यवस्था को समाप्त करना नहीं है, बल्कि उसे और मजबूत करना है। शंकराचार्य जैसे अनेक धर्मगुरु तो खुलकर जातिव्यवस्था का पक्ष लेते हैं। क्या यह इसी शिक्षा का परिणाम नहीं है कि अनेक गांवों में दलित अध्यापक, दलित प्रधान और दलित रसोइया तक को अपमानित किया जाता है।
राम माधव ने अपने लेख में स्वयं स्वीकार किया है कि डा. आंबेडकर को स्वतन्त्रता, समानता और भ्रातृत्व की प्रेरणा भगवान बुद्ध से मिली थी। सवाल यह गौरतलब है कि उन्हें  यह प्रेरणा हिन्दूधर्म से क्यों नहीं मिली थी? क्या कोई भी यह मानने से इन्कार करेगा कि समानता की शिक्षा हिन्दूधर्म देता ही नहीं है, और स्वतन्त्रता तथा भ्रातृत्व के शब्द उसके शब्दकोश में है ही नहीं? लेकिन आरएसएस के विचारक इसे पूरी तरह नकारते हैं। राम माधव लिखते हैं कि किसी भी हिन्दू धर्मशास्त्र में विघटनकारी और भेदभावपूर्ण शिक्षा नहीं मिलती है। उनका कहना है कि जन्मना जातिव्यवस्थाकी जड़ें भले ही प्राचीन समय की वर्णाश्रमव्यवस्था में हैं, परन्तु वर्णाश्रमव्यवस्था ने कभी भी जातिभेद को मान्यता नहीं दी थी। उनके अनुसार जातिव्यवस्था उसके बाद आरम्भ हुई। इसके समर्थन में वह ऋग्वेद के एक मन्त्र (मण्डल 5, सूक्त 60, मन्त्र 5) का सन्दर्भ देते हैं-कोई छोटा-बड़ा नहीं है; सभी भाई-भाई हैं; हमें सबकी भलाई के लिए मिलकर कार्य करना चाहिए।अगर शिक्षा यह थी, तो फिर विघटनकारी और भेदभावपूर्ण जातिव्यवस्था कैसे आरम्भ हो गई? लेकिन इसका वह कोई खुलासा अपने लेख में नहीं करते हैं। सभी आरएसएस विचारक इसी तरह ऋग्वेद के हवाले से जातिव्यवस्था को नकारते हैं, और उसे मुगलों की देन बताते हैं। इस तरह वे न केवल अपने हिन्दूधर्म का गलत पाठ करते हैं, बल्कि इतिहास का भी कुपाठ करते हैं। राम माधव जिस ऋग्वेद के मन्त्र का हवाला देते हैं, वह रुद्रपुत्र मरुतों के सन्दर्भ में कहा गया है। उस मन्त्र का सही अर्थ इस प्रकार है-समान शक्ति वाले मरुत गण आपस में छोटे या बड़े नहीं हैं, वे सौभाग्य के लिए भ्रातप्रेम के साथ बड़े हुए हैं। मरुतों के पिता रुद्र नित्य युवा एवं शोभन कर्मों वाले हैं। इनकी माता पृश्नि गाय के समान दुहने योग्य है। ये दोनों मरुतों को कल्याणकारी हों।हैरानी की बात है कि राम माधव को ऋग्वेद में असुरों और दासों के विवरण नहीं मिले, जिन्हें मारने का खुला आवाहन उसमें किया गया है।
आइए, अब इस सवाल पर आते हैं कि दलित क्या चाहते हैं? लेकिन, क्या पहले यह नहीे जान लेना चाहिए कि आरएसएस क्या चाहता है? और हिन्दू क्या चाहते हैं? आरएसएस और उससे जुड़े तमाम हिन्दू अस्पृश्यता को जरूर नकारते हैं, और यह दिखाने के लिए वे दलितों के बीच सहभोज के आयोजन भी करते हैं। लेकिन वे हिन्दूसमाज का विघटन करने वाली जातिव्यवस्था को नहीं नकारते। तब, क्या जातिव्यवस्था का समूल नाश किए बिना वे अस्पृश्यता को मिटा सकते हैं? क्या जातिव्यवस्था का समूल नाश किए बिना वे हिन्दू समाज में एकता ला सकते हैं? कोई भी इन प्रश्नों का उत्तर हाँ’ में नहीं दे सकता। फिर सामाजिक समरसता एक आडम्बर नहीं है, तो क्या है?
भारत के दलित निश्चित रूप से स्वतन्त्रता, समानता और भ्रातृत्व चाहते हैं, सम्मान, सहभागिता, समृद्धि और सत्ता इसी के अंग हैं। किन्तु आरएसएस ने कभी उनके पक्ष में यह आवाज नहीं उठाई। इसके उलट, उसने हमेशा दलितों के स्वतन्त्र विकास को रोकने के लिए अपनी भाजपा सरकार पर राजनीतिक दबाव बनाया। उसी के दबाव में दलितों को उच्च शिक्षा से वंचित करने के लिए उन्हें मिलने वाली फैलोशिप (छात्रवृत्ति) रोकी गई। स्पष्ट है कि आरएसएस का मकसद दलितों का विकास करना नहीं है, बल्कि उनको अपने हिन्दूराष्ट्र से जोड़ना है, जो भारतीय लोकतन्त्र के लिए एक घातक विचारधारा है।
इसलिए यह आकस्मिक नहीं है कि आज राष्ट्रवाद और भारत माता दोनों को आरएसएस और भाजपा ने अपना मुख्य राजनीतिक एजेण्डा बनाया हुआ है। जो भारत माता की जय नहीं बोल रहा है, उसे वे देशद्रोही घोषित कर रहे हैं; और, सरे आम पीट रहे हैं। उनके नेता, सन्त, बाबा और योगी उनको सरेआम कत्ल करने की धमकियां दे रहे हैं। यह कैसा राष्ट्रवाद है, जो भारत माता की जय बोलने से बनता है? आज जिस तरह वे डा. आंबेडकर को राष्ट्रवादी घोषित करके, भारत माता के जयकारे के साथ उनकी जयन्ती मना रहे हैं, उससे समझा जा सकता है कि उन्होंने किस चालाकी से देश को राष्ट्र में बदल दिया है, और देशभक्ति को राष्ट्रवाद में बदल दिया है। वे इस छद्म राष्ट्रवाद के सहारे, जो हिन्दूराष्ट्रवाद का ही प्रछन्न रूप है, पूरे देश में दो काम करना चाहते हैं, एक-दलितों को भाजपा से जोड़ना, और दो-उनको डा. आंबेडकर की क्रान्तिकारी विचारधारा से काटना। लेकिन भारत के दलित वर्गों को डा. आंबेडकर की इस चेतावनी को सदैव स्मरण रखना है कि-यदि राष्ट्रवाद जीवन के पुनर्निमाण और पुनर्गठन के रास्ते में बाधक बनकर खड़ा होता है, तो उस राष्ट्रवाद को अस्वीकार करना होगा। राष्ट्रवाद तभी अच्छा है, जब लोकतन्त्र के तीनों पहिए-संसद, कार्यपालिका और संवैधानिक संस्थाएं राष्ट्रीय सम्वेदनाओं के साथ सभी समुदायों के हित में चलते हैं।
(15 अप्रैल 2016)




मंगलवार, 12 अप्रैल 2016

डा. आंबेडकर और राष्ट्रवाद-3
(डा. आंबेडकर को मुस्लिम-विरोधी बनाने की संघी साजिश)
कॅंवल भारती
                आरएसएस किस तरह डा. आंबेडकर को ठिकाने लगाने का काम कर रहा है, उसकी एक बानगी है उसकी दलित आन्दोलन पत्रिकाका 125वें जन्मशती पर प्रकाशित विशेषांक, जिसके प्रधान सम्पादक डा. विजय सोनकर शास्त्री और सम्पादक संजय दीक्षित हैं। इसमें मुस्लिम समाज और डा. आंबेडकरशीर्षक से एक लेख छापा गया है, जिसमें बड़ी-बड़ी सुर्खियों में लिखा गया है-डा. आंबेडकर दुखी थे तुष्टीकरण की राजनीति से।इस लेख के लेखक का नाम नदारद है। जाहिर है कि सम्पादकों का ही संकलन है। हालांकि इस लेख का स्रोत नहीं दिया गया है, पर निश्चित रूप से इसकी सामग्री डा. आंबेडकर के ग्रन्थ पाकिस्तान ऑर दि पार्टिशन आॅफ इंडियाके ग्यारहवें अध्याय से ली गई है। लेख में मुसलमानों की उन 14 मांगों की सूची दी गई है, जिनमें साम्प्रदायिक निर्णय का विरोध न करने, मुसलमानों को गोवध की स्वतन्त्रता देने, वन्दे मातरम का त्याग करने और उर्दू भाषा को सुरक्षित रखने की संवैधानिक गारण्टी देने की मांग भी शामिल है।
                लेख के संकलनकर्ताओं ने डा. आंबेडकर की इस पूरी पुस्तक को नहीं पढ़ा है, और मुझे यकीन है, उन्होंने उस अध्याय को भी पूरी तरह नहीं पढ़ा है, जिसमें यह सूची दी गई है; और यदि पढ़ा है, तो इतिहास का गलत पाठ करना आरएसएस के लोगों की आदत बन चुकी है। इस लेख को लेकर मेरी दो आपत्तियां  हैं। पहली आपत्ति यह है कि आरएसएस की इस दलित आन्दोलन पत्रिका में इस लेख को क्यों दिया गया, जिसका सन्दर्भ स्वतन्त्रता-पूर्व का कालखण्ड है? यह सन्दर्भ आज प्रासंगिक नहीं है। ये दो राजनीतिक प्रतिद्वन्द्वियों-कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच की सत्ता-संघर्ष की लड़ाई थी। इस सत्ता-संघर्ष में हिन्दुओं की ओर से कांग्रेस और मुसलमानों की ओर से मुस्लिम लीग आमने-सामने थी। हिन्दुओं की ओर से राष्ट्रवाद का नारा चल रहा था, जिसमें हिन्दू महासभा का हिन्दू राष्ट्रवाद भी शामिल था। इसके विरोध में न केवल मुस्लिम लीग थी, बल्कि डा. आंबेडकर भी थे। मुसलमान और दलित दोनों कांग्रेस की हिन्दूवादी राजनीति से आक्रान्त थे, और वे उसे अपने ऊपर हिन्दू राज के रूप में देख रहे थे। डा. आंबेडकर ने यहाँ  तक कहा था, कि अगर ऐसी स्थिति में कांग्रेस के हाथों में सत्ता आती है, तो वे हिन्दू राज कायम करेंगे, जिसमें दलित वर्गों को हिन्दुओं के रहमोकरम पर रहना होगा। उन्होंने अत्यन्त तीखे शब्दों में यहाँ  तक कहा था कि भारत में दलित वर्ग अल्पसंख्यक हैं और हर तरह से कमजोर हैं। उनमें इतनी ताकत नहीं है कि वे हिन्दुओं के हाथों में से उनका भोजन भरा थाल छीन लें। पर वे मुट्ठीभर धूल फेंककर उनका भोजन खराब जरूर कर सकते हैं। अगर इन परिस्थितियों में कांग्रेस से मुस्लिम लीग द्वारा अपने मुस्लिम कौम के हित में कुछ संवैधानिक गारण्टी मांगना किस तरह से गलत था? डा. आंबेडकर ने कहीं भी मुस्लिम मांगों के सन्दर्भ में अपना मुस्लिम-विरोधी परिचय नहीं दिया है। अगर मुस्लिम मांगों की आलोचना भी की है, तो वह सिर्फ राजनीतिक आलोचना है। उसे उनकी उस नफरत का नाम नहीं दिया जा सकता, जो मुसलमानों के प्रति कांग्रेस  और हिन्दू महासभा के हिन्दुओं के दिलों में भरी हुई थी। और उसी नफरत को अब आरएसएस इस लेख के जरिए यहाँ  फैला कर डा. आंबेडकर को मुस्लिम-विरोधी बनाने की फूहड़ कोशिश का रही है।
                मेरी दूसरी आपत्ति यह है कि सौ साल पुरानी मुस्लिम मांगों को दलित आन्दोलन पत्रिका में छापकर, आरएसएस ने एक तीर से दो शिकार करने की सोची है। उनका पहला मकसद डा. आंबेडकर को मुस्लिम-विरोधी साबित करने का है, और दूसरा मकसद दलितों को मुस्लिम-विरोधी बनाने का है। और इस नफरत के साथ वे भारत को कहाँ  ले जाना चाहते हैं, यह हम सबको समझने की जरूरत है, और खासकर दलितों को आरएसएस की इस खतरनाक चाल से सावधान रहने की आवश्यकता है।
                डा. आंबेडकर ने अपने पाकिस्तान....ग्रन्थ में हिन्दू और मुस्लिम दोनों पक्षों की साम्प्रदायिक राजनीति का विश्लेषण किया है, और दो राष्ट्र के सिद्धान्त के आधार पर ही उन्होंने पाकिस्तान के विकल्प का समर्थन किया है। अगर पाकिस्तान नहीं बनता, तो डा. आंबेडकर का मत था कि क्या दो राष्ट्र सहअस्तित्व के साथ रह सकते थे? जब हिन्दुओं ने किसी दलित को प्रधानमन्त्री नहीं बनने दिया, तो इसकी कल्पना कैसे की जा सकती है कि अगर पाकिस्तान नहीं बनता, तो वे एक मुसलमान को प्रधानमन्त्री पद पर स्वीकार कर लेते?
                डा. विजय सोनकर शास्त्री ने यदि डा. आंबेडकर के ग्रन्थ को ठीक से पढ़ा होता, तो उन्होंने मुस्लिम दावे को भी ठीक से समझा होता। इसी ग्रन्थ में वे लिखते हैं कि 1915 में सिन्ध के हिन्दू सिन्ध को बम्बई प्रेसीडेंसी से अलग करना चाहते थे, परन्तु 1929 में उन्होंने साइमन कमीशन के समक्ष बम्बई प्रेसीडेंसी से सिन्ध के अलग होने का विरोध किया था। क्यों? इसका कारण बताते हुए डा. आंबेडकर लिखते हैं कि 1915 में सिन्ध में कोई प्रतिनिधि सरकार नहीं थी। अगर वहाँ  सरकार बनती, तो वह मुस्लिम सरकार होती। इसलिए हिन्दुओं ने अलग होने की वकालत की थी। किन्तु 1929 में हिन्दुओं ने अलग होने का विरोध इसलिए किया था, क्योंकि वे जानते थे कि सिन्ध में मुस्लिम सरकार बनेगी, जो उनके एकाधिकार अर्थात् वर्चस्व को खत्म कर देगी। यही नहीं, बंगाल के बारे में भी डा. आंबेडकर कहते हैं कि अपने इसी वर्चस्व को कायम रखने के लिए हिन्दुओं ने बंगाल के विभाजन का विरोध किया था। वे लिखते हैं, बंगाली हिन्दुओं की सम्पूर्ण इजारेदारी बंगाल और आसपास के संयुक्त प्रान्त तक में थी। यहाॅं सभी सिविल सेवाओं पर उनका कब्जा था। वह पूरा क्षेत्र उनका चारागाह था। अतः बंगाल के विभाजन का मतलब था उनकी वह इजारेदारी कम हो जाती। पूर्वी बंगाल से हिन्दुओं को वंचित होना पड़ता और उनका स्थान बंगाली मुसलमान ले लेते, जिनका बंगाल की सिविल सेवाओं में अब तक कोई स्थान नहीं था। एक अन्य स्थान पर डा. आंबेडकर ने कहा है-राष्ट्रवाद का मतलब धन, शिक्षा और सत्ता पर कब्जा करना है।
किन्तु, डा. आंबेडकर ने अपने इसी ग्रन्थ में हिन्दुओं को चेतावनी देते हुए कहा है-अपने हाथों में स्थान और ताकत का एकाधिकार रखने के दिन अब लद चुके हैं। राष्ट्रवाद के नाम पर वे हिन्दू समाज के निम्न वर्गों को धोखा दे सकते हैं, किन्तु वे मुस्लिम बहुमत को धोखा देकर सत्ता पर एकाधिकार नहीं बनाए रख सकते। अगर हिन्दू यह मानते हैं कि वे मुसलमानों को मूर्ख बनाकर स्थान और सत्ता पर कब्जा बनाए रखेंगे, तो यह उनकी मूर्खता होगी। अब्राहम लिंकन कह चुके हैं कि तमाम लोगों को हर समय मूर्ख बनाना सम्भव नहीं है।
(अभी इसके आगे और भी है.)
               



डा. आंबेडकर और राष्ट्रवाद-2
कॅंवल भारती
               
भारत एक राष्ट्र है, यह राष्ट्रीय कांग्रेस के नेता साबित नहीं कर सके। किन्तु इस दावे में मुस्लिम लीग की दस्तक से हिन्दूमहासभा (सभा) ने हिन्दू राष्ट्र की बे-सिर-पैर की एक परिकल्पना गढ़ ली, जिसे अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) पास-पोस रहा है। ठीक अंधे के हाथ बटेर लग जाने जैसा ही यह राष्ट्रवाद है। सभा ने इसे ऐसे लपका, जैसे उसे अलादीन का जादुई चिराग हाथ लग गया है, जिसे घिसकर वह उससे मनचाहे नतीजे निकाल लेगा। आरएसएस भी इसी उम्मीद में 90 सालों से इसे घिसे जा रहा है कि इसका जिन अब बाहर निकले और पूरे भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने की उसकी ख्वाइश पूरी हो जाये, पर, उसकी ख्वाइश कभी पूरी नहीं हुई।
इस बे-सिर-पैर के हिन्दू राष्ट्र पर जो घटाटोप भारतीय राजनीति में हिन्दूसभा ने उत्पन्न किया था, उसे डा. आंबेडकर ने किस दृष्टि से देखा था, इस पर कुछ चर्चा करते हैं। राष्ट्रवाद के सवाल पर डा. आंबेडकर कांग्रेस और सभा के विचारों में कोई खास अन्तर नहीं करते थे। उनकी दृष्टि में वे दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू थे। वे कांग्रेस को भी एक हिन्दू संगठन ही मानते थे। वे लिखते हैं, ‘यह कहने का कोई फायदा नहीं है कि कांग्रेस हिन्दू संगठन नहीं है। कांग्रेस अपने गठन में ही हिन्दू संगठन है, और वह हिन्दू मानस की ही अभिव्यक्ति करता है। कांग्रेस और सभा में अन्तर सिर्फ इतना है कि जहां सभा अपनी अभिव्यक्ति में क्रूर और अशिष्ट है, वहाँ कांग्रेस अपनी नीतियों में चतुर और अभिव्यक्ति में शिष्ट है। इसके सिवा दोनों में कोई अन्तर नहीं है।
उस समय के एक हिन्दू नेता लाला हरदयाल, जो अमेरिका में गदर पार्टी की संस्थापक थे, बाद में आर्यसमाजी हुए, और फिर बाद में वी. डी. सावरकर (विनायक दामोदर सावरकर) के सम्पर्क में आकर पक्के हिन्दू राष्ट्रवादी हो गए थे। उन्होंने 1925 में बाकायदा अपना राजनीतिक वसीयतनामा जारी किया था, जिसमें उन्होंने हिन्दूराष्ट्र की अपनी परिकल्पना को मूत्र्त रूप देने के लिए घोषणा की थी कि हिन्दू जाति का भविष्य मुसलमानों की शुद्धि, अर्थात्, उनका धर्मपरिवर्तन कर उन्हें हिन्दू बनाने में है। इस पर डा. आंबेडकर ने चुटकी ली थी कि हिन्दूधर्म मिशनरी धर्म ही कहाँ है, जो वह धर्मपरिवर्तन का काम करेगा? और अगर मुसलमानों की शुद्धि करके उन्हें हिन्दू बनाया भी गया, तो वे उन्हें किस जाति या वर्ण में रखेंगे?
वी. डी. सावरकर, जो हिन्दूमहासभा के अध्यक्ष थे, हिन्दूराष्ट्रवाद के भी उद्भावक थे। सम्भवतः पहली दफा उन्होंने ही हिन्दुइज्म, हिन्दुत्व और हिन्दूडम को परिभाषित किया था। डा. आंबेडकर के अनुसार, सावरकर की परिभाषा इस प्रकार है-हिन्दू शब्द से ही अंग्रेजी में हिन्दुइज्म बना है, जिसका अर्थ वह धर्म-व्यवस्था है, जिसे हिन्दू मानते हैं। दूसरा शब्द हिन्दुत्व है, जिसका अर्थ कहीं ज्यादा व्यापक है। इसके अन्तर्गत सिर्फ हिन्दुओं का धर्म ही नहीं आता है, बल्कि उनके सांस्कृतिक, सामाजिक, भाषाई और राजनीतिक पहलु भी आते हैं। यह हिन्दूपोलिटी अर्थात् हिन्दूराजतन्त्र के ज्यादा निकट है, और इस दृष्टि से इसका सही अनुवाद हिन्दूपन हो सकता है। तीसरा शब्द हिन्दूडम है, जो हिन्दूजगत का सामूहिक नाम है, जैसे इस्लाम मुस्लिम जगत का सामूहिक नाम है।
हालांकि सावरकर, डा. आंबेडकर के अनुसार, इस बात को स्वीकार नहीं करते कि हिन्दू महासभा का गठन मुस्लिम लीग के प्रतिरोध में किया गया है; किन्तु वे अपने हिन्दूडम में ऐसे स्वराज की जरूर कल्पना करते हैं, जिसमें सिर्फ हिन्दुत्व प्रभावी हो और उसमें गैर-हिन्दू लोगों का प्रभुत्व न हो, चाहे वे भारत की सीमा में रहने वाले हों या उसकी सीमा के बाहर। सावरकर के लिए औरंगजेब ही नहीं, बल्कि टीपू सुल्तान जैसे सुशासक भी हिन्दूजगत के शत्रु थे। उनके आदर्श शिवाजी, गोबिन्द सिंह, राणाप्रताप और पेशवा राजा थे, जिन्होंने हिन्दू स्वराज कायम करने के लिए मुस्लिम प्रभुत्व के विरुद्ध लड़ाई लड़ी थी। सावरकर ने हिन्दू स्वराज के लिए दो बातों पर जोर दिया था। एक यह कि देश का नाम हिन्दुस्तान रखा जाना चाहिए, भारत नहीं; और, दो, ‘संस्कृत हमारी देवभाषा और संस्कृतनिष्ठ हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा होगी। यानी, सावरकर को हिन्दी में उर्दू भाषा के शब्द भी स्वीकार नहीं थे।
डा. आंबेडकर ने दिखाया है कि सावरकर के हिन्दू स्वराज में गैर-हिन्दुओं के लिए एक उदार खिड़की खुली थी, कि उनके स्वराज की योजना में अल्पसंख्यकों को समान अधिकार देने की घोषणा की घोषण की गई थी, जैसा कि वे उनका यह उद्धरण देते हैं-हिन्दुस्तान में मुस्लिम अल्पसंख्यकों को यह अधिकार होगा कि उन्हें समान नागरिक समझा जायगा और उन्हें उनकी जनसंख्या के अनुपात में समान संरक्षण और समान अधिकार प्राप्त होंगे।
किन्तु, यहाँ आंबेडकर ने बहुत सही सवाल उठाया है कि मुसलमानों के प्रति शत्रुता का बीज बो देने के बाद वे ऐसे स्वराज में हिन्दू विधान के तहत कैसे रह सकते हैं, जहां उन्हें सत्ता में प्रतिनिधित्व और कानून बनाने का अधिकार ही प्राप्त नहीं होगा?
डा. आंबेडकर लिखते हैं कि हिन्दू महासभा ने भारत को एक राष्ट्र मानने की बजाए हिन्दुओं को एक राष्ट्र मानने पर जोर दिया था। सावरकर ने 1939 में महासभा के नागपुर अधिवेशन में अपने अध्यक्षीय भाषण में भारत को एक राष्ट्र मानने की कांग्रेस की थियरी का खण्डन करते हुए कहा था कि कांग्रेस की की विचारधारा शुरु से ही गलत थी कि केवल प्रादेशिक एकता, और एक क्षेत्र में रहने मात्र से राष्ट्र का निर्माण हो जाता है। उन्होंने अनेक राष्ट्रों के हवाले से कहा कि वे सभी राष्ट्र बिखर गए, जो सन्धियों के आधार पर बनाए गए थे। किन्तु, उन्होंने आगे कहा कि हिन्दू सन्धि से बने राष्ट्र नहीं हैं, बल्कि वे एक सहज नैसर्गिक राष्ट्र हैं।
इस सन्दर्भ में डा. आंबेडकर का कहना है कि मामला वस्तुतः केवल प्रादेशिक एकता अथवा एक क्षेत्र में रहने मात्र से राष्ट्र बनने का नहीं है। यह सच है कि केवल प्रादेशिक एकता, और एक क्षेत्र में रहने मात्र से राष्ट्र नहीं बनता है, और यह भी सच है कि सन्धि के आधार पर भी राष्ट्र नहीं बनते हैं, परन्तु उनका कहना था कि सावरकर ने काॅंगे्रस की धारणा का खण्डन इस आधार पर किया है, क्योंकि वे अपने राष्ट्र में गैर-हिन्दुओं को शामिल करना नहीं चाहते थे। हालांकि हिन्दू भी नैसर्गिक राष्ट्र नहीं हैं। हिन्दू स्वयं में कोई जाति नहीं है, वरन् यह हजारों जातियों और उपजातियों में विभाजित समूह है, जिनके बीच में एकता का कोई सूत्र नहीं है और उनको परस्पर जोड़ने वाला वह हिन्दूपन भी उनमें नहीं है, जिसकी सावरकर वकालत करते हैं।
इस बे-सिर-पैर के राष्ट्रवाद ने भारत में कितना खून-खराबा किया, उसके इतिहास में मैं जाना नहीं चाहता और न उसे कुरेदने का कोई लाभ है। इतिहास सबक लेने के लिए होते हैं। पर, हिन्दूराष्ट्र के हिमायतियों के लिए इतिहास आज भी कोई मायने नहीं रखता। वे अतीत के मिथ्या स्वर्णकाल के इतिहास में जीते हैं, और यह जानते हुए भी वह केवल अतीत है, उसका पुनरुत्थान सम्भव नहीं है, लोकतन्त्र में उसका सपना देख रहे हैं।
किन्तु, डा. आंबेडकर की भविष्यवाणी सच साबित हुई। भारत में हिन्दूमहासभा का स्वराज तो कायम नहीं हुआ, पर आजाद भारत की शासन सत्ता कांग्रेस के राष्ट्रवादी हिन्दुओं के हाथों में आई। मुसलमानों को उनका पाकिस्तान मिल गया। परिणामत यह हुआ कि आजादी के केक का सबसे बड़ा हिस्सा हिन्दुओं ने ही खाया। थोड़ा सा नाममात्र का टुकड़ा दलितों के संघर्ष के कारण उनको मिला। पर, आदिवासियों, पिछड़ों और यहाँ रह गए देशभक्त मुसलमानों को वह भी नहीं मिला।
(तीसरी किश्त में-राष्ट्रवाद से जनता को सावधान करते हुए आंबेडकर ने कहा था: हमारा राष्ट्रवाद अन्तरराष्ट्रवाद है)


                 





डा. आंबेडकर और राष्ट्रवाद—(1)
कॅंवल भारती
भारत में राष्ट्र और राष्ट्रवाद की अवधारण पर डा. आंबेडकर ने काफी विस्तार से चर्चा की है। इस चर्चा में उन्होंने उसके हर पहलु से विचार किया है। उनके अनुसार, ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेसकी स्थापना के साथ ही इस विषय पर बहस शुरु हो गई थी कि भारत एक राष्ट्र है या नहीं? वे लिखते हैं, कि आँग्ल भारतीय इस मत के थे कि भारत एक राष्ट्र नहीं है, पर हिन्दू नेताओं का कहना था कि भारत एक राष्ट्र है। उन्होंने राष्ट्रीय कवि रबीन्द्रनाथ टैगोर के विरोध की भी परवाह नहीं की। आंबेडकर कहते हैं कि उनका सिद्धान्त दरअसल स्वराज के दावे से जुड़ा था, जो 19वीं सदी के अन्त तक यह सिद्धान्त प्रचलित हो गया था कि एक राष्ट्र के रूप में रहने वाले लोग ही स्वराज के दावे के अधिकारी हैं। इसलिए, भारतीयों को स्वराज माँगने के लिए अपने को एक राष्ट्र कहना जरूरी था। डा. आंबेडकर लिखते हैं कि ऐसी स्थिति में हिन्दुओं के लिए राष्ट्र और राष्ट्रवाद को नकारने का मतलब अपने कपड़े उतार कर नंगा होने के समान था। उनके अनुसार, इसी कारण से किसी भारतीय ने राष्ट्रवाद का खण्डन नहीं किया, और जिसने किया, उसे उन्होंने अंगे्रजों के पिट्ठू और देश के शत्रु की संज्ञा दी। जैसा कि आज उन्हें देशद्रोही कहा जा रहा है। आंबेडकर के अनुसार, इससे भयभीत विरोधियों ने तो जवाब देना बन्द कर दिया, पर उसी वक्त मुस्लिम लीग ने मुस्लिम राष्ट्र की घोषणा करके हिन्दू राजनीतिज्ञों के पैरों के नीचे से जमीन खिसका दी। यह राष्ट्रीय कांग्रेस के हिन्दुओं के लिए बहुत बड़ा विस्फोट था, जिसे कुछ नेताओं ने पीठ में छुरा घोंपे जाने की संज्ञा भी दी थी।
राष्ट्र और राष्ट्रवाद के सन्दर्भ में डा. आंबेडकर ने हिन्दू और मुस्लिम दोनों राष्ट्रों का तार्किक विश्लेषण किया है। राष्ट्रीयता के बिना न राष्ट्र सम्भव है और न राष्ट्रवाद। राष्ट्रीयता क्या है? डा. आंबेडकर लिखते हैं, राष्ट्रीयता एक सामाजिक भावना है, जो लोगों में यह भाव जगाती है कि वे एक हैं और परस्पर सजातीय हैं। लेकिन यह राष्ट्रीय अनुभूति दोधारी है। एक तरफ यह अपने लोगों के प्रति अपनत्व दिखाती है, तो दूसरी तरफ यह उन लोगों के प्रति, जो उनके अपने नहीं हैं,  नफरत का भाव पैदा करती है। इस प्रकार यह वह जातीय चेतना है, जो लोगों को भावात्मक रूप से इतनी मजबूती से बांधे रखती है कि सामाजिक और आर्थिक विषमता की समस्याएं भी उनके लिए महत्वपूर्ण नहीं रहतीं; पर, अपने से भिन्न समुदायों के प्रति यह घोर अलगाववादी चेतना है और शत्रुतापूर्ण भी। सार रूप में, राष्ट्र और राष्ट्रीयता, असल में, यही है।
लेकिन आगे डा. आंबेडकर इस चेतना का खण्डन करते हुए कहते हैं कि यह दुधारी राष्ट्रीयता भारत को एक राष्ट्र नहीं बना सकती। भारत एक राष्ट्र उन्हीं परिस्थितियों में हो सकता है, जब या तो भारतीय समाज जातिविहीन हो, या एक ही जाति-समुदाय का हो अथवा, वे सभी भारतवासी एक भारतीयता के भाव से मजबूती से बॅंधे हों। किन्तु सच्चाई यह है कि न भारतीय समाज जातिविहीन है, न वह एक ही जाति-समुदाय का है, और न भारत के लोग एक भारतीयता के भाव से मजबूती से बॅंधे हुए हैं।
डा. आंबेडकर एक और मत व्यक्त करते हैं कि राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद में अन्तर है। वे कहते हैं कि यह सच है कि राष्ट्रीयता के बिना राष्ट्रवाद का निर्माण नहीं हो सकता, परन्तु यह कहना हमेशा सच नहीं होता। लोगों में राष्ट्रीयता की भावना उपस्थित हो सकती है, पर जरूरी नहीं है कि उनमें राष्ट्रवाद भी उपस्थित हो। दूसरे शब्दों में, राष्ट्रीयता हमेशा राष्ट्रवाद को जन्म नहीं देती है। वे कहते हैं कि राष्ट्रीयता को राष्ट्रवाद में बदलने के लिए दो शर्तें जरूरी हैं। पहली, लोगों में एक राष्ट्र के रूप में रहने की इच्छा का जाग्रत होना, क्योंकि, राष्ट्रवाद इसी इच्छा की गतिशील अभिव्यक्ति है। और, दूसरी शर्त, एक ऐसे क्षेत्र का होना, जो एक राष्ट्र का सांस्कृतिक घर बन सके।
किन्तु आजादी के बाद का भारत और पाकिस्तान का इतिहास बताता है कि यह राष्ट्रवाद न भारत में पैदा हुआ और न पाकिस्तान में। मुसलमानों ने पाकिस्तान का निर्माण अपने सांस्कृतिक घर के रूप में किया था, पर वहाँ भी एक राष्ट्र के रूप में रहने की इच्छा जाग्रत नहीं हो सकी, और भाषाई राष्ट्रीयता के आधार पर वह विभाजित हो गया। भारत में भी जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्रीयता की इतनी सारी राष्ट्रीयताओं के रहते एक राष्ट्र के रूप में रहने की इच्छा कहाँ  जाग्रत हो सकी है?
(कल, इसी विषय पर डा. आंबेडकर के हवाले से कुछ और बातें)

                 




गुरुवार, 24 मार्च 2016

होली : एक असुर महिला को जिन्दा जलाने का जश्न
(कँवल भारती)
      डा. आंबेडकर ने अपनी पुस्तक “फिलोसोफी ऑफ हिन्दुइज्म” में एक जगह लिखा है, “आज के हिंदू सबसे प्रबल विरोधी मार्क्सवाद के हैं. और इसलिए हैं, क्योंकि वे उसके वर्ग-संघर्ष के सिद्धांत से भयभीत हैं. लेकिन वे भूल जाते हैं कि भारत न केवल वर्ग-संघर्ष की भूमि रहा है, बल्कि वर्ग-संग्राम की भी भूमि रहा है.”
      अब एक साक्षी ऋग्वेद (१०,२२-८) से लेते हैं, “हे इंद्र! हमारे चारों ओर यज्ञ-कर्म से शून्य, किसी (ईश्वरीय सत्ता) को न मानने वाले, वेद-स्तुति के प्रतिकूल कर्म करने वाले दस्यु हैं, वे मनुष्य नहीं हैं. उनका नाश करो.”
      स्पष्ट है कि यह वर्गसंघर्ष और वर्गसंग्राम भारत के लिए नया नहीं हैं. वैदिक काल में जो देवासुर संग्राम शुरू हुआ, वह आज तक, इस इक्कीसवीं सदी के लोकतंत्र में भी, चल रहा है. देवों ने न केवल अपने विरोधी असुरों को मारा, बल्कि उसे उन्होंने अपने धर्म की जीत भी घोषित किया और व्यापक स्तर पर उसका जश्न मनाया. लगभग सभी हिंदू त्यौहारों की बुनियाद में यही देवासुरसंग्राम है, चाहे वह दुर्गापूजा हो, दशहरा हो, दिवाली हो, या होली हो. ये सारे त्यौहार असुरों की मौत पर देवों अर्थात ब्राह्मणों के जश्न हैं. ब्राह्मणों ने अपने विरुद्ध चलने वाली विचारधारा को पसंद नहीं किया. भारत के जनजातीय क्षेत्रों में ब्राह्मणों ने अपना ब्राह्मण राज्य कायम करने की हर संभव कोशिश की. इस योजना में वे सबसे पहले अपने धर्मगुरुओं को वहाँ भेजते थे, जो वहाँ अपने आश्रम बनाकर यज्ञयागादि की गतिविधियों आरंभ करते थे, उनका जो विरोध करते, उनको वे मरवा देते थे, कुछ जन जातीय लोगों को वे प्रलोभन देकर मिशन से भी जोड़ लेते थे. ऐसा वे आज भी करते हैं. आज भी दलित-पिछड़े समुदायों के बहुत से बुद्धिजीवी ब्राह्मणवाद के फोल्ड में हैं. उन्हीं की मदद से उन्होंने अपनी योजना को आगे बढ़ाया और विरोधियों का राज्य समाप्त करके वहाँ अपना उपनिवेश कायम किया. बलि, हिरण्यकश्यप, शम्बर, दिवोदास, रावण से लेकर मौर्य राज्य की स्थापना तक उनका यही मिशन चला. किसी ने ठीक ही कहा है, इतिहास अपने को दुहराता है. ठीक उसी मिशनरी रास्ते से मुगलों और ब्रिटिश ने भी भारत को अपना उपनिवेश बनाया. हालाँकि उन उपनिवेशों में भी ब्राह्मण ही प्रभुत्त्वशाली थे.
      आज जिस तरह हिन्दूराष्ट्रवादी वर्ग ने अपनी विद्यार्थी परिषद के द्वारा देशभर के शिक्षण संस्थानों में दलित-वाम शक्ति के खिलाफ वर्गयुद्ध छेड़ा हुआ है, ठीक वैसा ही वर्गयुद्ध हमें पुराणों में असुर राजाओं और उनकी संस्थाओं के खिलाफ मिलता है. मैं यहाँ हिरण्यकशिपु और प्रह्लाद की कथा का विश्लेषण करूँगा. महाभारत के अनुसार, प्रह्लाद ने देवासुरसंग्राम में इंद्र को परस्त कर उसके राज्य पर कब्जा कर लिया था. वह अपनी जनता में अपने धार्मिक सद्गुणों से इतना लोकप्रिय था कि इंद्र उससे अपना राज्य वापिस नहीं ले सकता था. अत: इंद्र ब्राह्मण का भेष बनाकर प्रहलाद के पास गया, और उससे अपना धर्म सिखाने की प्रार्थना की. इंद्र की प्रार्थना पर प्रह्लाद ने इंद्र को अपने सनातन धर्म की शिक्षा दी. अपने शिष्य से प्रसन्न होकर प्रह्लाद ने इंद्र से वरदान मांगने को कहा, और ब्राह्मण भेष बनाए हुए इंद्र ने कहा, ‘मेरी इच्छा तुम्हारे सद्गुण पाने की है,’ इंद्र प्रहलाद का गुण और धर्म अपने साथ लेकर चला गया. और प्रह्लाद के धर्म पर चलकर इंद्र ने उसकी सारी कीर्ति खत्म कर दी.
      देव-विरोधी असुरों के साथ ब्राह्मण-छल की यह कोई पहली घटना नहीं है, हिंदू कथाओं में, जिसे वे इतिहास कहते हैं, ब्राह्मणों के छल की ऐसी अनेक कहानियां हैं. यही छल एकलव्य के साथ किया गया था, जिसका अंगूठा मांगकर गुरु द्रोणाचार्य ने उसको विद्या-रहित कर दिया था. ठीक उसी तरह प्रहलाद से उसका धर्म लेकर उसका सर्वस्व ले लिया गया था. प्रहलाद ने जिस सनातन धर्म की शिक्षा दी थी, वह वैदिक वर्णव्यवस्था वाला धर्म नहीं था, क्योंकि इंद्र उसे क्यों सीखता, जबकि वह उसी धर्म से आता था? दरअसल, इंद्र ने प्रहलाद से देव-विरोधी असुर धर्म को त्यागने का वरदान माँगा था. अपने धर्म को त्यागने के बाद प्रह्लाद अपने समुदाय की नजर में गिर गया था, और इंद्र ने अपना खोया राज्य पुनः प्राप्त कर लिया था. ठीक यही तरीका हमें बलि की कहानी में मिलता है, जिसमे विष्णु ने बौने वामन का रूप धारण करके एक वरदान के जरिये उसका समस्त राज्य छीन लिया था. बलि राजा से जुड़े अनेक मिथकों से पता चलता है कि प्रह्लाद ने, जो रिश्ते में बलि का दादा था, बलि को सावधान किया था कि यह बौना वामन असल में विष्णु है. एक अन्य कथा में प्रह्लाद बहुत ही तीखे शब्दों में प्रतिवाद करता है कि विष्णु ने बौना बनकर उसके पोते बलि के साथ धोखा किया है और उसे लूटा है. (देवीभागवतपुराण). एक और मिथक, जो एकलव्य से जुड़ा है, बताता है कि किस तरह स्वयं इंद्र ने बलि के पिता विरोचन से भी वरदान के जरिये उसका सिर मांग लिया था. इंद्र ने कहा था, “मुझे अपना सिर दे दो.” और विरोचन ने तुरंत अपना सिर काटकर इंद्र को सौंप दिया था. (स्कन्दपुराण).
मिथक इतिहास नहीं हैं, यह सच है, पर उनमें भारत के मूल निवासी असुरों के साथ हुए वर्गयुद्धों और उस युद्ध में शहीद हुए असुर राजाओं की नृशंस हत्याओं का पूरा राजनीतिशास्त्र है. कोई भी व्यक्ति न अपने हाथ से अपना अंगूठा काटकर किसी को देगा, और न अपना सिर काटकर देगा. किसी का भी अपने हाथ से अपना सिर काटना, और फिर, उस कटे सिर को अपने ही हाथ में लेकर दूसरे को सौंपना—ये दोनों ही बातें अविश्वसनीय है. हकीकत में एकलव्य का जबरन अंगूठा काटा गया था, और विरोचन की हत्या की गयी थी. आज भी धर्म के लिए की गयीं हत्याओं को मिथकीय रंग दे दिया जाता है, पुराणों ने भी यही काम किया था. पर उसने एक कदम आगे बढ़कर देव-विरोधी असुरों को जनता का खलनायक बनाने का भी काम किया.
प्रह्लाद के पिता हिरण्यकशिपु की हत्या तो और भी बड़ी क्रूरता है. उसे उसी के महल में घुसकर नरसिंह ने मारा था. ऐसा प्रतीत होता है कि इस असुर राजा का पूरा वंश ही ब्राह्मणों के निशाने पर था, और उसका बीजनाश करके ही उन्होंने दम लिया था. इसकी जो मिथकीय कथा विष्णु पुराण और भागवत पुराण में मिलती, उसके अनुसार, देवविरोधी हिरण्यकशिपु को ब्रह्मा से यह वरदान मिला हुआ था कि वह न मनुष्य के द्वारा, न देवताओं के द्वारा, न पशु के द्वारा, न भीतर, न बाहर, न दिन में, न रात में, न पृथ्वी पर, न आकाश में, न शस्त्र से, न अस्त्र से मारा जायेगा. अपनी अमृत्यु से निश्चिंत होकर उसने पृथ्वी और स्वर्ग में उत्पात मचाना शुरू कर दिया. किन्तु, उसका पुत्र प्रह्लाद विष्णु का भक्त था. सो, हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद को मारने की धमकी दी, जो विष्णु को सर्वव्यापी ईश्वर मानने पर जोर देता था. तब हिरण्यकशिपु ने एक खम्बे में लात मारकर पूछा, “क्या वह इसमें भी है?” अचानक उसी समय खम्बा फाड़कर शेर जैसा मनुष्य (नरसिंह) प्रगट हुआ. और उसने हिरण्यकशिपु को अपने घुटनों पर रखकर अपने लम्बे नाखूनों से फाड़कर मार डाला. उसके बाद विष्णु-भक्त प्रह्लाद असुरों का राजा बना और अपनी देवविरोधी प्रकृति को त्यागकर देवों के प्रति समर्पित हो गया.
यह बहुत ही सामान्य कहानी है, जो अनेक असुरों पर दुहराई गयी है. महाभारत में वर्णित इंद्र और असुर वृत्र (अथवा नमुची) की कहानी भी इसी तरह की है, जिसे गोधूलि (न दिन और रात) में समुद्र के किनारे (न भूमि और न समुद्र) मारा गया था. रावण और महिष की हत्याओं की कहानी भी कुछ इसी तरह की है.
इस कहानी में प्रकृति को ही चुनौती दी गयी है. सभी वस्तुएं और जीवजन्तु मरणशील हैं, कोई भी अमर नहीं है. इस पौराणिक कहानी में इसी प्रकृति का खंडन किया गया है. यह माया हिन्दूधर्म में ही है कि देवता मनुष्यों को अमर होने का वरदान देते हैं, पर इसके बावजूद कोई अमर नहीं रहता है. दूसरी बात यह विचारणीय है कि जो प्रह्लाद राजा बलि को चेता रहा है, वह खुद विष्णु-भक्त कैसे हो सकता है? तीसरी बात यह कि अगर प्रह्लाद इतना परम विष्णु-भक्त था कि उसके लिए वह खम्बा फाड़ कर नरसिंह के रूप में प्रगट हुए, तो उसने अपने पिता को बचाने को क्यों नहीं कहा? उसने अपने पिता की हत्या कैसे बर्दाश्त कर ली? यह कहानी यह साबित करने की कोशिश है कि प्रह्लाद ने अपनी ब्राह्मण-भक्ति में अपने असुर-धर्म, अपनी असुर-संस्कृति और अपने पिता तक को कुर्बान कर दिया.
हकीकत यह है कि हिरण्यकशिपु ने बलि और विरोचन की तरह ब्राह्मणों के आगे घुटने नहीं टेके थे, और उसने अंत तक असुरों के हित में संघर्ष और युद्ध किया था. जब उसके पुत्र प्रहलाद को ब्राह्मणों ने राज्य का लालच देकर अपने ब्राह्मण राष्ट्रवाद में शामिल कर लिया था, तो भी हिरण्यकशिपु ने हथियार नहीं डाले थे. किन्तु यही विष्णु-भक्ति प्रह्लाद के भी पतन का कारण बनी थी. ब्राह्मण-भक्ति की जो भूमिका विभीषण ने निभाई थी, वही प्रह्लाद ने निभाई थी.
इस सम्बन्ध में महात्मा जोतिबा फुले का मत भी गौरतलब है. सम्भवतः फुले पहले व्यक्ति हैं, जिन्होंने हिन्दू मिथकों का बहुत ही वैज्ञानिक विश्लेषण किया है. वे नरसिंह के विषय में “गुलामगीरी” में लिखते हैं, ‘वराह के मरने के बाद द्विजों का मुखिया नरसिंह बना था. सबसे पहले उसके मन में हिरण्यकशिपु की हत्या करने का विचार आया. उसने यह अच्छी तरह समझ लिया था कि उसको मारे वगैर उसका उसे मिलने वाला नहीं था. उसने अपने एक द्विज शिक्षक के माध्यम से हिरण्यकशिपु के पुत्र प्रह्लाद के अबोध मन पर अपना धर्म-सिद्धांत थोपना शुरू किया. इसकी वजह से प्रह्लाद ने अपने हरहर नाम के कुलस्वामी की पूजा करनी बंद कर दी. प्रह्लाद पर द्विज रंग ऐसा चढ़ा कि हिरण्यकशिपु की उसे समझाने की सारी कोशिशें बेकार गयीं. तब नरसिंह ने प्रह्लाद को अपने पिता की हत्या करने को उकसाया. पर ऐसा करने की प्रह्लाद की हिम्मत नहीं हुई. अंत में नरसिंह ने अपने शरीर को रंगवाकर मुंह में नकली शेर का मुखोटा लगाकर अपने शरीर को साड़ी से ढककर प्रह्लाद की मदद से हिरण्यकशिपु के महल में एक खम्बे की आड़ में छिपकर खड़ा हो गया. और जब हिरण्यकशिपु आराम के लिए पलंग पर लेटा, तो शेर बना नरसिंह उस पर टूट पड़ा, और बखनखा से उसका पेट फाड़कर उसकी हत्या कर दी.’ महात्मा फुले ने यह भी लिखा है कि हिरण्यकशिपु की हत्या के बाद नरसिंह सभी द्विजों को साथ लेकर अपने मुल्क भाग गया. जब क्षत्रियों को पता चला तों वे आर्यों को द्विज कहना छोड़कर ‘विप्रिय’ (अप्रिय, धोखेबाज़, दुष्ट) कहना शुरू कर दिया. बाद में इसी ‘विप्रिय’ शब्द से उनका नाम ‘विप्र’ पड़ा.
हिरण्यकशिपु के प्रकरण में अभी होलिका का प्रवेश होना बाकी है. यह शायद किंवदंती है, जिसमें कहा जाता है कि हिरण्यकशिपु की बहिन होलिका को अग्नि से बचने का वरदान प्राप्त था. उसको वरदान में एक ऐसी चादर मिली हुई थी, जो आग में नहीं जलती थी. हिरण्यकशिपु ने अपनी इसी बहिन की सहायता से प्रह्लाद को मारने की योजना बनाई. होलिका प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर धू-धू करती आग में जा बैठी. किन्तु विष्णु की कृपा से प्रह्लाद को कुछ भी नहीं हुआ, और होलिका जलकर भस्म हो गयी. कहते हैं कि तभी से होली का त्यौहार मनाया जाने लगा.
क्या इस कहानी पर यकीन किया जा सकता है? वास्तव में इसकी अंतर्कथा यह है कि हिरण्यकशिपु की हत्या के बाद उसकी बहिन ने देवों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था और प्रह्लाद को भी उसने चेताया था कि ब्राह्मण राष्ट्रवाद समस्त असुर संस्कृति के विनाश का दर्शन है. वह देवों और ब्राह्मणों के रास्ते की अंतिम बाधा थी, जिसे हटाकर ही वे प्रह्लाद के मुखोटे से ब्राह्मण-राज्य कायम कर सकते थे. अत: एक दिन अवसर पाकर लाठी-डंडों से लैस ब्राह्मणों ने होलिका को जिन्दा जलाकर मार डाला. उसकी मौत पर ढोल-नगाड़े बजाए गए. आज उसी तर्ज पर हिंदू हर वर्ष होलिका के रूप में होली जलाकर ब्राह्मणवाद की विजय का जश्न मनाते हैं. आज लाठी-डंडों की जगह उनके हाथों में गन्ने होते हैं, पर ढोल-डीजे का शोर तो होता ही हैं.
(23 march 2016)