गुरुवार, 28 मई 2015

आत्मकथ्य-1
घर
(कॅंवल भारती)
बुकर टी. वाशिंगटन की आत्मकथा ‘अप फ्राम स्लेवरी’ को पढ़ते वक्त एक कथा मेरे अन्दर भी साथ-साथ चलने लगी। पहले ही अध्याय ‘ए स्लेव अमंग स्लेवस्’ से यह अन्तर्कथा शुरु हो गयी थी। उन्होंने लिखा है, ‘मैं वर्जीनिया के एक बागान में गुलाम पैदा हुआ था।’ वे कब और कहाॅं पैदा हुए थे, इसका भी उन्हें ठीक-ठीक पता नहीं था। वे अपने जन्म का न महीना जानते थे और न दिन। उन्हें बस यह याद था कि बागान में गुलामों के रहने के लिये बनाये गये क्वार्टरों में से ही किसी एक क्वार्टर में उनका जन्म हुआ था, जो गुलामों के केबिन थे, जिनमें वे रहते थे। उन्होंने लिखा है- ‘I was born in a typical log cabin, about fourteen by sixteen feet square. In this cabin I lived with my mother and a brother and sister till after the Civil War, when we were all declared free.’ बुकर टी. वाशिंगटन के इस पैरे को पढ़कर मेरे अचेतन में कुछ उबलने लगा। मैं अछूत पैदा हुआ था, उत्तर प्रदेश के रामपुर शहर में अछूत चर्मकारों की मलिन बस्ती में। लेकिन अपनी पैदाइश का दिन, महीना और वर्ष मुझे भी याद नहीं है। मेरे पिता का नाम भगवान दास था, जिन्हें मैं बाप कहता था। उन्होंने जब सरकारी मदरसे में, जो बस्ती के पास ही था, मेरा दाखिला कराया, तो उन्होंने अन्दाजे से मेरी जन्म-तिथि 4 फरवरी 1953 लिखवा दी थी। अब यही मेरी रिकार्डेड जन्म-तिथि है, जबकि मैं अच्छी तरह जानता हूॅं कि वह गलत है। मेरी माॅं का नाम गंगादेई था, जिन्हें मैं अम्मा कहता था। वह कहती थी कि मेरे जन्म वाले दिन खूब आॅंधी-तूफान आया था और मेह पड़ा था। इस लिहाज से मेरे जन्म का महीना जून-जुलाई का होना चाहिए। यह एक और आधार से भी सही प्रतीत होता है। स्कूल में कक्षा 2 में मेरा दाखिला कराया गया था। स्कूल जुलाई में खुलते हैं और जुलाई में ही मेरी उम्र पाॅंच साल की हुई थी। इसलिए मुझे लगता है कि मेरे जन्म का अनुमानित सही महीना जुलाई का होना चाहिए और अनुमानित सही सन् भी 1955 होनी चाहिए, क्योंकि कक्षा 2 मैंने 1960 में पास किया था, जिसका ‘पास का पर्चा’ (परीक्षा फल) मेरे पास अभी भी सुरक्षित है।
मेरे दादा का नाम छोटे लाल था, जिनकी मुझे धुंधली सी सूरत याद है। मैंने उन्हें अपने घर के सामने वाली एक कच्ची कोठरी में लेटे देखा था। वह क्या थे और क्या करते थे, इस बारे में बाप ने कभी कुछ नहीं बताया था। पर बस्ती के कुछ वृद्ध बताते थे कि उन्हें संगीत का शौक था। पर वह भी गठाई का काम करते थे, जो कोतवाली के आगे घुड़साल के पास बैठा करते थे। सम्भवतः मेरे स्कूल जाने से पहले ही वह चल बसे थे।  
                हमारे घर कहने भर को घर थे, पर असल में वे घरोंदे थे, जिनमें कोई बुनियादी सुविधा नहीं थी। वे केबिन तो नहीं थे, पर केबिन जैसे ही थे। छत के नाम पर खपरैल थी, तीन तरफ सेे मिट्टी की दीवारें थीं, सामने घर में प्रवेश के लिये भीतर की ओर खुलने वाला छोटा सा दरवाजा था, जिसमें सिर झुका कर ही घुसा जा सकता था। घर में घुसने से पहले उसारा पड़ता था। उसी में एक तरफ मिट्टी का चूल्हा रखा रहता था, चूल्हे पर लोहे का तवा खड़ा रहता था, एक कोने में खाना बनाने और खाने के कुछ बरतन एक परात में भरे रखे रहते थे। उसारे में ही पानी का घड़ा और बाल्टी रहती थी, और कोई दरवाजा उसारे में नहीं था। हम उसारे में ही खाते-पीते थे और उसी में मेरे बाप अपना चमड़े का काम भी करते थे। उसी में खटिया डालकर वे सोे भी जाते थे।
                ये घरोंदे एक बाखर का हिस्सा थे, जैसे बहुत से केबिनों में से एक केबिन में बुकर टी. वाशिंगटन पैदा हुए थे, वैसे ही बाखर के एक घरोंदे में मैं पैदा हुआ था। अब आप सोच रहे होंगे कि बाखर से मतलब क्या है? छह या आठ घरों को मिलाकर या जोड़कर एक बाखर या बखरी बनती थी। ऐसी दो बाखरें हमारी बस्ती में थीं, हांलाकि जाटवों के कुछ घर और भी थे। पर बाखरें दो ही थीं। ऐसी ही बाखरें बरवालों (ये अब अपने आप को वर्णवाल कहते हैं) की भी थीं, जो दक्षिण दिशा में हमारी दोनों बाखरों से सटी हुई थीें। अब मैं यह बताता हूॅं कि बाखर किस तरह की होती थी? ठीक घुड़साल की तरह बाखर में आमने-सामने घर होते हैं, बीच में नाली होती है, जो उसे दो भागों में विभाजित करती है। हमारी बाखर पूरब और पश्चिम दिशा में आमने-सामने थीं। बाखर के जिस घर में मेरा जन्म हुआ था, उसका मुॅंह पूरब की ओर था। यह भी कह सकते हैं कि बखरी में हमारा घर पश्चिम दिशा में था। हमारे घर की बगल में डोरीलाल का घर था, जो बस्ती के रिश्ते में दादा लगते थे। उनके दो बेटे चन्द्रपाल और राम औतार थे, जिनमें मेरा चन्द्रपाल हम-उम्र था, और इसी बजह से हम-ख्याल भी। 1972 के बाद हमारी बस्ती से बहुत से परिवार पलायन कर गए थे, जिनमें मेरे पिता भी शामिल थे। वह तो कुछ साल बाद वापिस आ गए थे, पर डोरीलाल सहित अनेक लोगों ने हमेशा के लिए रामपुर छोड़ दिया था। इस पलायन की दुखद कहानी मैं बाद में लिखूॅंगा। अभी मेरा ध्यान अपने ‘घर’ पर ही है।
                हमारी बाखर में घर के ठीक सामने एक कुॅंआ था, जिसका पानी बहुत मीठा था। उसी पानी से घर के सारे काम होते थे। गर्मियों में कुएॅं से पानी खींचकर माॅं घड़े में भरकर रख लेती थी। कुएॅं के पास ही चबूतरा बना था, जिस पर औरतें कपड़े धोती थी और मर्द लोग बैठकर नहाते थे। किसी के भी घर में तब गुसलखाना नहीं होता था, सब खुले में ही नहाते थे। औरतें और लड़कियाॅं दो खटियों को खड़ी करके उन पर दरी या चादर डालकर आड़ करने के बाद नहाती थीं। बाद में जब 1970 के आसपास नगरपालिका ने बस्ती में ‘चपाल द्वारे’ (बस्ती की पंचायत का स्थान) सरकारी नल लगवाया, तो कुएॅं का पानी मुॅंह लगना बन्द हो गया था।
प्रकृति ने जो चार ऋतुएॅं बनाई हैं, उनके बिना पृथ्वी पर जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। इन जीवन-दायिनी ऋतुओं में वर्षा ऋतु का अपना अलग ही महत्व है। कवियों ने भी इसके चित्रण में अपनी सुन्दरतम कल्पनाएॅं उकेरी हैं। आकाश में घुमड़ते हुए काले-भूरे बादलों को देखकर किसान कितना खुश होते हैं। जब वे बरसते हैं, तो नदी-नाले-ताल-तलैया सब भर जाते हैं, सूखे वृक्षों में जीवन आ जाता है; जिधर देखो, हरियाली ही नजर आती है। शायद यह कहाबत इसी से बनी है कि ‘सावन के अंधे को हरा ही हरा सूझता है।’ मैंने अपनी कक्षा दो या तीन की किताब में एक कविता पढ़ी थी, जिसमें लिखा था- ‘बरस रहा है घर आॅंगन, बाहर निकलूॅं मैं भी भीगूॅं, चाह रहा है मेरा मन।’ लेकिन मेरा मन बारिश के दिनों में बाहर निकल कर भीगने को नहीं करता था, क्योंकि हमारे लिए बारिश के दिन मुसीबत के दिन थे, जिसमें हमारा घर नरक बन जाता था। हमारे दर्द की अगर किसी कवि ने सही तस्वीर खींची है, तो वे कबीर साहेब हैं, जिन्होंने लिखा था-
इब न रहूॅं माटी के घर मैं, इब मैं जाइ रहूॅं मिलि हरि मैं।
छिनहर घर अरु झिरहर टाटी, घन गरजत कंपै मेरी छाती।।

                बरसात के दिनों में एक गरीब अपने माटी के घर को देखकर बादलों के गरजने की आवाज सुनकर सिहर जाता है, क्योंकि छप्पर में छेद ही छेद हैं और दरवाजे की टाटी भी जर्जर है। बादल बरसते हैं, तो घर में भी बरसात ही होती है। ऐसे में उसका मन जीने का नहीं, मरने का करता है।
                हमारा घर भी माटी का था, जो खपरैल और छप्पर से छाया हुआ था। उसमें बरसात के दिन हमारे लिए बहुत डरावने होते थे। बाहर बादल गरजते थे और भीतर हम कई प्राणी काॅंपते थे। माॅं आसमान की तरफ अपने दोनों हाथ जोडकर कहती थी, ‘राम जी रहम करो।’ पर रामजी कहाॅं रहम करते। बादल रात भर बरसता और घर भी रात भर बरसता। हम एक जगह सहमे-सिकुड़े बैठकर रात गुजारते। घर में जितने भी बरतन होते- पतीली, परात, कढ़ाई, बेला, लोटा, कटोरदान- माॅं उन सबको टपकने वाली जगहों पर रखती जाती थी। जो बरतन पानी से भर जाता, उसका पानी बाहर फेंककर, उसे फिर से वहीं रख दिया जाता था। यह सिलसिला बारिश रुकने तक चलता था। लेकिन दीवालों के पास बरतन रखना नामुमकिन था, क्योंकि दीवालों के ऊपर, जहाॅं छप्पर रोका जाता था, वहाॅं से भल-भल करके तेज बहाव में पानी आता था और कुछ ही समय में खटियों और पलंग के नीचे इतना पानी भर जाता था कि पैरों की एडि़याॅं डूब जाती थीं। जब बरसात खत्म होती- जिसका कोई टाइम निश्चित नहीं था- तो सिलसिला शुरु होता, पानी उलीचने का। यह काम माॅं ही करती थी। बाप भी कुछ हाथ बॅंटाते थे। लेकिन ज्यादातर माॅं ही निर्विकार मन से पानी उलीचती रहती थी। मैं उस समय छह या सात साल का था। माॅं का हाथ बॅंटाने की कोशिश करता, तो वह मना कर देती थी, ‘तू रैन दे बेटा, मैं तो अपने नसीब में लिखवा के लाई हूॅं ये।’ नसीब ऊपर से ही लिख कर आता है, इस पर हमारी पूरी बस्ती का अटूट विश्वास था।
                यह सिर्फ मेरे घर की ही कहानी नहीं थी, बल्कि हमारी बस्ती के अधिकांश घरों की यही नियति थी। घरों के पीछे पाखाने थे। पाखाने क्या थे, चार-चार ईंटों की कुछ खुड्डियाॅं थीं। मल-त्याग के बाद उस पर राख डाल दी जाती थी। बाद में मेहतर उसे झाडूं-पंजे से उठाकर डलिया में रखकर, जहाॅं गिल्लाघर होता था, वहाॅं फेंक आता था। फ्लश की आधुनिक लैटरीनों का दौर अभी पूरे शहर में ही नहीं आया था। इसलिए हाथ से मैला उठाने की प्रथा थी। बस्ती के पाखाने साफ करने के लिए कैलासो नाम की एक मेहतरानी आती थी, कभी-कभी उसका लड़का भी आ जाता था, जिसका नाम रामभरोसे था। लेकिन कभी-कभी वे कई-कई दिन तक नहीं आते थे और मल से खुड्डियाॅं भर जाती थीं। गरमी के दिनों में उसमें सफेद सूडि़याॅं पड़ जाती थीं और वो सूडि़याॅं खुड्डियों में से निकल कर पूरी गली में फैल जाती थीं। बरसात के दिनो में तो और भी बुरा हाल होता था, जिसका वर्णन करना ही जुगुप्सापूर्ण होगा। लेकिन हम इस जुगुप्सा के अभ्यस्त हो चुके थे। मुझे याद है, एक बरसात में सड़क की तरफ की हमारे घर की दीवाल गिर गई थी, जिसके फिर से बनने का नम्बर महीनों बाद आया था। आॅंधी-तूफान के दिन भी बरसात जैसे ही डरावने थे। एक बार इतनी जोर की आॅंधी आई थी कि आधा छप्पर ही उड़ गया था। तब बाप ने कहीं से कर्जा लेकर दूसरे छप्पर का इन्तजाम किया था।
                 सावन के महीने की एक कटु स्मृति भी है। सलूनो (रक्षा बन्धन) के लिए सिवईयाॅं तोड़ी जाती थीं। सिवईयाॅं दो तरह से तोड़ी जाती थीं- एक, मिट्टी के घड़े को उल्टा करके उस पर मंैदे की बड़ी सी लोई रखकर उसे दोनों हाथों से रूई की बत्ती की तरह बटा जाता था। ऐसा करने से घड़े के दोनों तरफ सिवईयाॅं गिरती थीं, जिसे तोड़कर सुखाने के लिए खाट पर चादर बिछाकर झउआ रखकर उस पर डाल दी जाती थीं। मेरी माॅं इसी तरीके से सिवईयाॅं तोड़ती थी। दूसरा तरीका मशीन से सिवईयाॅं तोड़ने का था। यह एक बड़ी सी लकड़ी की मशीन थी, जिसका आकार आज की नीबू निचोड़ने वाली मशीन जैसा था। यह मशीन या तो किराए पर लाई जाती थी, या मुहल्ले में ही किसी की थी, इसकी मुझे कोई स्मृति नहीं है, क्योंकि एक हादसे के बाद वह मशीन फिर कभी नहीं देखी गई। उस मशीन को खाट के पंयाते पाए से कसकर बाॅंध दिया जाता था, ताकि हिले नहीं। फिर ऊपर के पट्टे को उठाकर एक बड़े से होल में, जिसके अन्दर एक जाली लगी होती थी, एक किलो वजनी मैंदे की लोई रखकर ऊपर के पट्टे पर एक-दो भारी बच्चों को बैठा दिया जाता था। बच्चों के भार से पट्टा नीचे आता था और नीचे जाली में से सिवईयाॅं निकलती थीं, जिन्हें तोड़कर खाट पर बिछे झउओं पर डाल दिया जाता था। इसी मशीन में एक दिन पता नहीं कैसे दोनों पाटों के बीच मेरा बायाॅं हाथ आ गया था और जबरदस्त दबाव के कारण मेरी एक उंगली कुचल गई थी। उसका नाखून आज तक खराब है।
हमारी बखरी के बीचोबीच में नीम का एक बहुत पुराना पेड़ था, जिसके मोटी-मोटी डालियाॅं इतनी ऊॅंची थीं कि घरों की खपरैलों के ऊपर से गुजरती थीं। सावन के महीने में उन डालियों में मोटा रस्सा डालकर औरतें झूला झूलती थीं और लड़के लम्बी-लम्बी पेंगे भरते थे। मुझे झूले से डर लगता था, इसलिए मैं नहीं झूलता था। यह डर आज भी है और आज भी मैं झूला नहीं झूलता हूॅं। तीजों के दिन कई झूले डाले जाते थे, जिन पर औरतें और लड़कियाॅं झूलते हुए लोकगीत गाया करती थीं।
                बरसात के दिन फाके के दिन होते थे। फाके का मतलब उपवास नहीं है, जो भगवान को खुश करने के लिए रखा जाता है, बल्कि फाका पैसे और भोजन के अभाव में भूखा रहने का नाम है। मेरे बाप जिस कारखाने में जूता बनाने का काम करते थे, वह बरसात में बन्द हो जाता था। बाप को कारखाने से दो रुपए रोज मिलते थे और हफ्ते में हिसाब होता था, जिसमें कभी चार-पाॅंच रुपए मिल जाते थे, तो कभी धेला भी नहीं निकलता था। यह कारखाना-मालिक का अजब क्रूर खेल था, (जिस पर मैं बाद में लिखूॅंगा) जिसने न जाने कितने जाटवों को बरबाद किया था। मेरे बाप अकेले कमाने वाले थे, इसलिए बरसात से निपटने का इंतजाम नहीं कर पाते थे, जबकि बिरादरी के वे लोग, जिनके घर में कई जने कमाने वाले होते थे, बरसात के लिए कुछ इंतजाम करके रख लेते थे। लेकिन मेरे बाप को बरसात के दिनों में मोची बनकर पुराने जूतों की मरम्मत का काम करने के लिए बाध्य होना पड़ता था। उन दिनों जूतों पर पालिश और मरम्मत के लिए दस-पाॅंच पैसे से ज्यादा कोई नहीं देता था। इस तरह दिन भर की उनकी कुल कमाई आठ-दस आने से ज्यादा नहीं होती थी, जिस दिन एक रुपया कमाते, उस दिन दाल या सब्जी के साथ रोटी मिल जाती थी। लेकिन जिस दिन दिनभर बारिश होती, उस दिन बाप काम पर नहीं जाते थे और उस दिन हमें दोनों वक्त कुछ खाए बिना ही भूखा रहना पड़ता था। इसी को हम फाका कहते थे। जब फाकाकशी को दो दिन हो जाते थे, तो हमारे सामने के घर के सामने रहने वाली एक दादी, जिसे बखरी के रिश्ते में मेरी माॅं ‘अम्मा’ कहती थी, तरस खाकर मेरी माॅं को पाॅंच रुपए उधार देती थी, तो कभी माॅं भी उधार ले लेती थी। उन पाॅंच रुपयों में ढाई रुपए का ढाई सेर आटा आ जाता था और ढाई रुपए दाल, मसाला, तेल और ईंधन में खर्च हो जाता था। घर की यह स्थिति 1968 से शुरु हुई थी, जब महंगाई दुगुनी हो गई थी, यानी आटा आठ आना किलो से एक रुपए किलो हो गया था और परिवार बढ़ गया था। 
                तब घर-घर में मिट्टी के ही चूल्हे थे। ‘घर-घर मिट्टी के चूल्हे’ वाली कहाबत भी तब अच्छी लगती थी, पर आज तो घर-घर में गैस के चूल्हे हैं। आज उन मिट्टी के चूल्हों को याद करके लोग कहते हैं कि गैस की रोटी में वह मजा कहाॅं, जो मजा मिट्टी के चूल्हे पर ‘घए’ में सिकी पानी की रोटी का होता था, और वे फुलके जो मिट्टी के चूल्हे पर बनते थे, वो आज कहाॅं नसीब होते हैं। लेकिन ऐसा सोचने वाले मिट्टी के चूल्हे पर अपने फेफड़ों में अधगीली लकडि़यों का धुआॅं भरती हाॅंफती-खाॅंसती स्त्री की वेदना का अनुभव बिल्कुल नहीं करते। गैस के चूल्हे ने स्त्रियों के लिए कितनी बड़ी क्रान्ति की है, इसका एहसास उन्हें नहीं है। लेकिन मैं जानता हूॅं कि मेरी माॅं दमा और तपेदिक की जिस बीमारी से मरी थी, वह उसे चूल्हे में जलने वाली लकडि़यों के धुएॅं से ही हुई थी।
                घर में जाड़े का मौसम चैन से कट जाता था। पर, जाड़े के बाद जैसे ही गर्मियाॅं आतीं, हमारी मुसीबतें शुरु हो जाती थीं। गर्मियों के बाद चार महीने की बरसात आती थी, इस तरह हमारी मुसीबतें पूरे आठ महीने की होती थीं। गर्मियों की रातें मच्छरों के प्रकोप से दहशत भरी होती थीं। मच्छर भी छोटे-मोटे नहीं, बड़े-बड़े, दस-बीस की संख्या में नहीं, करोड़ों की संख्या में। शाम होते ही झुण्ड के झुण्ड मच्छर सिर के ऊपर भिन-भिन करते मंडराया करते थे। आज जालीदार दरवाजे हैं, खिड़कियों में भी जालियाॅं लगी हैं, हर कमरे में बिजली के पंखें चलते हैं, इसके सिवा भी मच्छरों से बचाव के लिए आलआउट जलता है। लेकिन तब इनमें से कुछ भी नहीं था। रात को नीम की सूखी पत्तियाॅं जलाकर मच्छरों से बचाव करते थे, पर यह बचाव तभी तक था, जब तक पत्तियाॅं जलती थीं, उसके बाद मच्छरों का भनभनाना फिर शुरु हो जाता था। बखरी में सभी घरों के आगे आॅंगन थे। हमारी रौ में इन आॅंगनों की एक लम्बी पट्टी बनती थी, जिसमें शाम से ही खटियाॅं बिछ जाती थीं। आॅंगन में थोड़ी राहत गर्मी से जरूर मिलती थी, पर मच्छरों से कोई राहत नहीं मिलती थी। मच्छरों से बचने के लिए मैं सिर से पैर तक चादर ओढ़कर सोता था, पर यह चादर तभी तक थी, जब तक नींद नहीं आती थी। जब नींद आ जाती, तो कहाॅं-कहाॅं से बदन उघड़ा, इसका पता सुबह ही चलता था, जब हाथ-पैर और मुॅंह पर मच्छरों के काटे के बड़े-बड़े ददोरे पड़े होते थे। खुजाने से ये ददोरे, जो नींद में भी खुजाए गए होते थे, पक जाते थे और मेरे हाथ-पैरों में फुडि़याॅं (फुंसियाॅं) निकलनी शुरु हो जाती थीं, जिनमें पीली पीप भरी होती थी और बहुत तर्राती थीं। फुडि़यों को नोचकर पीप निकालने से कुछ देर को चैन मिलता था। बाद में वो फिर फूल जाती थीं। इलाज के नाम पर सिवाजोल की गोली खाता था और फुडि़यों पर मल्लम लगाता था। कुछ फुडि़याॅं ठीक होतीं, तो नई निकल आती थीं। ये फुडि़याॅं चेहरे को छोड़कर हाथों की उंगलियों में, हथेलियों में, बाहों में, घुटनों में, एडि़यों म,ें यहाॅं तक कि पैरों की उंगलियों तक में निकलती थीं। मेरे जिस्म के ये सारे हिस्से मल्लम से लिथड़े रहते थे। फुडि़यों की इस भयानक पीड़ा में मैं किस तरह चलता-फिरता था, किस तरह खाता-पीता था और किस तरह रात को सोता था, यह मेरे सिवा कौन जान सकता है। उस हालत में जो भी मुझे देखता, पता नहीं मेरी माॅं से क्या-क्या कहता और मुॅंह बिचका लेता था। एक बार मैंने सुना, कोई कह रहा था- ‘कमल की माॅं, तुम्हारे लौण्डे को कोढ़ हो गया लगता है।’ माॅं घबरा गई। उसका सबसे बड़ा बेटा, और उसे भी कोढ़! गरीबी और अज्ञानता की वजह से हमारी बस्ती में मुल्ला-भगतों ने डेरा जमा रखा था। ज्यादातर हारी-बीमारी में उन्हीं को पूछा जाता था। मेरा इलाज भी उन्हीं से चला, जिसने कभी फायदा नहीं किया। खैर, यह विषय किसी अगले अध्याय में आयेगा।
                एक तरफ घर में घोर गरीबी थी और दूसरी तरफ बाप परिवार बढ़ाए जा रहे थे। गरीबी और बढ़ते परिवार ने घर को साक्षात नरक में बदल दिया था। भुखमरी से खून की कमी होने लगी थी, जिससे माॅं अक्सर बीमार रहने लगी थी। दूध और पौष्टिक आहार न मिलने से परिवार के दो सदस्य कुपोषण से ग्रस्त होकर तीन साल की उम्र में ही मौत के मुॅंह में चले गए थे। उनकी दशा देखी नहीं जाती थी- बड़ा सा सिर, अन्दर को धॅंसी हुई आॅंखें, ढोल की तरह फूला हुआ पेट, हड्डियों से चिपकी हुई खाल, सीने और कमर की एक-एक हड्डी, अकाल-ग्रस्त अफ्रीका के कंकाल बन चुके बच्चों की तरह दिखाई देती थी। अभी कुछ दिन पहले किसी ने फेसबुक पर अफ्रीका के ऐसे ही एक बच्चे की तस्वीर लगाई थी, जिसके पास ही उसके शिकार के लिए एक गिद्ध बैठा था। उस तस्वीर को देखकर मेरी स्मृति में अपने दोनों भाई- राजू और रूप- घूम गए थे।
अशिक्षा और गरीबी आदमी को भाग्यवादी बना देती है। लेकिन गरीबों का भाग्यवाद भी स्थिर नहीं होता है। वे भाग्य बदलने की आस के साथ जीते हैं। अगर उनमें यह आस न रहे, तो जीवन का संघर्ष ही खत्म हो जाएगा। पर, इसी का फायदा उठाकर कुछ ठेकेदार ज्योतिषी, साधु-सन्त और मुल्ला गरीबों के भाग्य को बदलने का पेशा अख्तियार कर लेते हैं। ऐसे ही कुछ पेशेवर ज्योतिषी, साधु-सन्त और मुल्ला हमारी बस्ती में भी आकर भाग्य बदलने के नाम पर कुछ लोगों को बरबाद कर जाते थे। ऐसी दो घटनाएॅं मुझे याद आती हैं। हमारी बाखर के पीछे वाली बाखर में पूरनलाल रहते थे, जिसकी ऋषिकेश से नई-नई शादी हुई थी। पत्नी की खूबसूरती बेमिसाल थी। एक दिन एक साधु बस्ती में आया और उसने पूरन पर न जाने क्या ‘मनतर’ पढ़ा, कौन सा ब्रह्मजाल फेंका और कौन सा अलख जगाया कि वह मूरखचन्द पूरन उससे ‘एकान्त पूजा’ कराने को तैयार हो गया। यह कोई विशेष पूजा थी, जो साधु को पूरन लाल और उसकी पत्नी के साथ एक दिन और पूरी एक रात बन्द कमरे में बैठकर करनी थी। साधु ने किसी अनिष्ट का भय दिखाकर आस-पड़ोस के लोगों को दूर रहने के लिए बाध्य कर दिया था। जब पूजा समाप्त हुई, तो पूरन लाल और उसकी पत्नी दोनों की हालत ठीक नहीं थी और साधु घर का माल-पत्ता समेटकर रफू चक्कर हो चुका था। इस घटना के कुछ दिनों बाद पूरन लाल की पत्नी अपने मायके ऋषिकेश चली गई थी और फिर कभी वापिस नहीं आई थी। मजबूरन कुछ साल के बाद पूरन ने भी दूसरी शादी कर ली थी।
अंधविश्वास की दूसरी घटना मेरे घर की है। मेरे तीसरे छोटे भाई हरीश को टीबी हो गई थी। यह तब की बात है, जब घर बहुत ज्यादा गरीबी से गुजर रहा था। माॅं और बाप दोनों ने सरकारी अस्पताल में इलाज कराने के बजाए सरायगेट के एक मुल्ला से, जो हमारी बस्ती में आता रहता था, भाई की कलाई पर गंडा बॅंधवा दिया और उससेे प्लेटें लिखवा कर, जो वह पीले रंग से उर्दू में लिखता था, घोलकर भाई को पिलाना शुरु कर दीं। कोई दस दिन के बाद भाई की हालत बिगड़ गई। मैंने अम्मा को खूब सुनाईं और मुल्ला की प्लेट तोड़कर फेंक दी। किसी तरह बन्दोबस्त करके मैं भाई को डा. पृथ्वीराज गुप्ता की क्लीनिक (जो तब बैजनाथ हलवाई के सामन थीे) पर ले गया। डाक्टर ने भाई को चेक करके कहा कि इसमें अब कुछ नहीं बचा है। घर ले जाओ। घर पर दो-चार दिन जीवित रहने के बाद ही उसकी मृत्यु हो गई थी।
हमारी बस्ती में एक तोतला पंडित आता था, जो लोगों का हाथ देखकर भविष्य बताता था और  पत्रा देखकर शुभ मुहूर्त निकालता था। उसका नाम पंडित रामप्रसाद था, और पुराना गंज का रहने वाला था। चूॅंकि वह तुतलाकर बोलता था, इसलिए सब उसे तोतला पंडित ही कहते थे। मेरी माॅं उससे अक्सर हाथ दिखवाती थी, सिर्फ अपना ही नहीं, मेरा भी। मेरा हाथ देखकर वह मेरी माॅं को कहता था कि इसके हाथ में तो राजयोग है। उस वक्त न माॅं राजयोग का अर्थ जानती थी और न मैं जानता था। आज वह पंडित इस दुनिया में नहीं है, वरना मैं उसे बताता कि उसकी बात कितनी गलत निकली। लेकिन हमारी बस्ती के लिए वह बहुत काम का पंडित था। वह दस पैसे से लेकर सवा रुपए तक में और मुट्ठी भर आटे में ही हाथ देख लेता था। बस्ती में शादी-ब्याह से लेकर जितने भी मंगल कार्य होते थे, उन सबका मुहूर्त रामप्रसाद पंडित ही निकालता था। उसी को नवजात बच्चे के नामकरण के लिए बुलाया जाता था। बाप बताते थे कि मेरे नामकरण में उसने मेरे दो नाम सुझाए थे-छत्रपाल सिंह और कमल किशोर। ‘कमल’ चूॅंकि आसान था, इसलिए घर में कमल किशोर नाम ही चल पड़ा। ‘कमल’ से ‘कॅंवल’ कैसे हुआ, इसकी कहानी यह है कि जब स्कूल में मेरा नाम लिखवाया गया, तो कक्षा में एक कमल किशोर पहले से ही था, तब अध्यापक ने मुझे ‘कॅंवल’ बनाकर समानता खत्म कर दी थी।
                धार्मिक रूप से हमारा घर परम आस्तिक तो था ही, वह अनेक पंथों, देवताओं और सन्तों का अजायबघर भी था। पिता मस्जिद में अजान की आवाज सुनकर दोनों हाथ माथे से लगाकर परमात्मा को याद कर लेते थे और जुम्मेरात के दिन मजार पर किसी से फातिया पढ़वाकर इलायची दाने भी बॅंटवा देते थे। वे गुरु नानक को भी पूजते थे और गुरु गोरखनाथ को भी। इनके अलावा ‘बूढ़े बाबा’ भी पूजे जाते थे, जिसे पूजने के लिए किसी कुम्हार को बुलाया जाता था। गुरु गोरखनाथ की ‘मानता’ हमारी पूरी बस्ती में थी। दीवाली की रात घरों को मिट्टी के दियों से जगमग किया जाता था और गुरु गोरखनाथ का टिक्का पड़ता था। टिक्के का मतलब एक मोटी रोटी होती थी, जिसे अंगारों पर सेका जाता था। दूसरे दिन तड़के ही घर का कोई एक सदस्य छाज बजा कर यह कहता हुआ घूरे तक जाता है कि ‘निकर दरिद्दर गोरख आया।’ उस वक्त यह उक्ति मेरी समझ से परे थी। लेकिन, इसका अर्थ दशकों बाद जाकर खुला, जब लेखक बनने के बाद मैंने गोरखनाथ के बारे में पढ़ा कि उनके गुरु सिंहलद्वीप की रानी पर आसक्त होकर उनके महल में जाकर रहने लगे थे और वे अपने गुरु मच्छेन्द्रनाथ को सिंहलद्वीप से वापिस लाने के लिए सिंहलद्वीप गए थे, जहाॅं उन्होंने रानी के महल के सामने आवाज लगाई थी- ‘निकल मच्छन्दर, गोरख आया।’ हमारी बाखर में मोहनिया नाम की एक स्त्री भी गोरखनाथ और मच्छेन्दर नाथ की यही कहानी सुनाया करती थी, पर भिन्न अन्दाज में। उस वक्त उसकी कहानियाॅं मुझे बकवास लगती थीं, पर मेरे अध्ययन ने उसे सही साबित किया। अन्तर यह था कि मोहनिया की कहानी में गोरखनाथ के गुरु को सिंहलद्वीप की रानी ने जादू से मेढ़ा बनाकर अपने महल में कैद कर लिया था। मोहनिया बस्ती के रिश्ते में मेरी माॅं की बहिन लगती थी और मैं उसे मौसी कहता था। वह नितान्त अशिक्षित थी, जैसी कि बस्ती की सारी स्त्रियाॅं थीं, पर वह गुरु गोरखनाथ और मच्छेन्दर नाथ, और जाहर वीर के अलावा बहुत से अन्य देवताओं की भी कहानियाॅं सुनाती रहती थी, जिसकी वजह से उसे भक्तिन का खिताब मिला हुआ था। सुनते हैं, उसके मायके में कोई ज्ञानी पुरुष था, शायद उसका दादा, जिससे वह ज्ञान उसे मिला था।
मेरे पिता सारे हिन्दू भगवानों को प्रसन्न करने के लिए साल में एक बार होली वाली रात में कीर्तन करवाते थे और उसी रात में गुरु नानक के नाम का कड़ा प्रसाद भी बनवाकर बॅंटवाते थे। कीर्तन के लिए आॅंगन में दरी बिछाई जाती, दीवाल पर सारे हिन्दू देवताओं की तस्वीरें लगाई जातीं, लकड़ी की चैकी पर दिया बाती की जाती और भजन गाने-बजाने के लिए बृजरतन की पूरी टीम आती, दूसरी ओर एक भट्टी पर रवा (सूजी) भूनकर कड़ा प्रसाद के लिए हलुवा बनाने की तैयारी चल रही होती। रात दस बजे आरती होती और उसके बाद न्यौते गए बिरादरी के लोगों को पत्ते के दोने में रखकर कड़ा प्रसाद दिया जाता था। घर में एक कोने में मिट्टी की चैंतरी (चबूतरी) बनी हुई थी, जिस पर गुरु नानक का चित्र रखा रहता था और उसके बगल में कपड़े में लिपटी ‘जपुजी’ किताब रखी रहती थी। बाप रोज नियम से नहाकर चैंतरी पर बैठकर दिया जलाते, जो देशी घी से जलता था, फिर जपुजी से पाठ पढ़ते थे। उसे वे अरदास करना कहते थे। जब बाप कई महीनों के लिए पंजाब चले गए थे, तो पोथी घर पर ही रह गई थी। तब अरदास की रस्म रोज सुबह मुझे निभानी पड़ती थी। उसी ‘जपुजी’ पोथी में कहीं मैंने ये पंक्तियाॅं पढ़ी थीं- ‘मन मन्दर तन भेस कलन्दर, घट ही तीरथ नावा, एक सबद मेरे प्राण बसत है, बाहुड जनम न पावा।’ आगे चलकर तीर्थ और पुनर्जन्म का यही खण्डन मैंने कबीर साहेब के पदों में भी देखा।
इसके अलावा, घर में जाहर वीर या पीर की भी पूजा होती थी, जिसके दो विशेषज्ञ भगत चपटा गाॅंव से आते थे। जाहर पीर का ‘स्थान’ राजस्थान के ‘बागड़’ में बताया जाता है। कबीर साहेब ने शायद इसी बागड़ के बारे में कहा है, ‘बागड़ देस लूअन का घर है’। वहाॅं हर साल किसी खास महीने में मेला लगता है, जिसमें दूर-दूर से लोग ‘जात’ देने के लिए आते हैं। यह ‘जात’ देना क्या होता है, यह मैं आज तक नहीं समझ पाया। जाहर के अलावा किसी बूजपुर वाली देवी की जात भी लगती थी। मेरी माॅं बताती थी कि मेरे बालों का मुण्डन बूजपुर में ही हुआ था। इस देवी का मन्दिर मुरादाबाद के बूजपुर गाॅंव में है। इन दोनों में समानता यह थी कि दोनों पशुबलि से प्रसन्न होते थे- जाहर पीर के नाम पर बकरे की और बूजपुर वाली के नाम पर बकरे के बच्चे की बलि चढ़ाई जाती थी। चपटा से आने वाले जाहर पीर के वे दोनों भगत शराब पीकर ढफली बजाकर गा-गाकर जाहर की गाथा सुनाते थे। इस अवसर पर अक्सर कोई स्त्री खेलना शुरु कर देती थी, जिसके बारे में कहा जाता था कि उस पर जाहर पीर आ गए हैं। जैसे ही वह स्त्री खेलना शुरु करती, कुछ औरतें उसके आगे हाथ जोड़कर बैठ जाती थीं और अपने घर की दुख-तकलीफों और घर में कोई अगर बीमार होता, तो उसके बारे में दरयाफ्त करने लगती थीं। खेलने वाली औरत, जो उन सब औरतों से जहनी तौर पर वाकिफ रहती थी, मरदानी आवाज में ऊलजलूल कुछ भी बोलती, जैसे तेरे आदमी ने चैराहे पर थूक दिया था, इसलिए तेरा बालक बीमार है, आदि-आदि, तो वे बेवकूफ औरतें उसे सच मान लेती थीं और इस प्रकार उन दोनों भगतों के लिए कुछ ‘खास पूजा’ का इंतजाम हो जाता था। यह खास पूजा ‘कन्दूरी’ कहलाती थी, जिसमें जाहर वीर या पीर के नाम पर बकरे की बलि दी जाती थी और पूरी बिरादरी को दावत दी जाती थी। पूजा वाले दिन बकरे को नहला-धुलाकर उसका कान पूज कर उसे कसाई के हवाले कर दिया जाता था। ऐसी ही एक पूजा में मैंने परात में रखी बोटियों को फड़कते हुए देखकर मेरा दिल उचट गया था। मेरे पिता से ज्यादा मेरी माॅं जाहर पर श्रद्धा रखती थी। घर पर वह उन दोनों भगतों को बुलाकर पूजा करा चुकी थी। लेकिन मेरे घर में बकरे की बलि वाली पूजा कभी नहीं हुई। पता नहीं इसका कारण घर की आर्थिक स्थिति थी या बलि में उनका अविश्वास? होश संभालने के बाद जब तक मैं घर में रहा, मैंने बकरे की बलि वाली पूजा क्या, जाहर की सादी पूजा भी कभी नहीं होने दी थी। हालांकि मेरे पिता मेरे तर्कों से कुछ विचलित जरूर होते थे, पर माॅं की तरह असर उन पर भी कोई नहीं पड़ता था।
                 शायद 1958 की बात है, मैं पाॅंच साल का रहा होऊॅंगा। मेरे सिर पर दो चुटियाॅं थीं, जिसकी वजह से बस्ती के मेरे हमउम्र दोस्त मुझे दो चुटियों वाला कहकर चिढ़ाते थे। वो चुटियाॅं नानक जी के नाम पर बोली हुई थीं, जिन्हें देहरादून में झण्डेजी के दरबार में अर्पित किया जाना था। चुटियों का नानक जी क्या करते? वह उम्र यह सोचने की नहीं थी। जिस दिन हमें देहरादून जाना था, उस से पिछली रात को घर में कीर्तन हुआ था, कड़ा प्रसाद बनाकर बाॅटा गया था और पूरी बिरादरी को लड्डू-पूड़ी का पक्का खाना दिया गया था। लड्डू इतने ज्यादा बन गए थे कि बचे हुए लड्डुओं को माॅं ने एक मलसिया में भरकर उसे अच्छी तरह ढककर चैंतरी के पास रख दिया था, (जिनका सपना मुझे आज भी आता है) पर, देहरादून से लौटकर उसमें एक भी लड्डू नहीं था, पता नहीं कौन खा गया था? माॅं का शक चन्द्रपाल पर था, क्योंकि पड़ोस में उसी का घर था और माॅं ने उसी के बाप को घर की देखभाल करने के लिए कहा था। खैर, जिस दिन हमें देहरादून जाना था, उस दिन मुझे सफेद कुरता-पायजामा पहिनाया गया था, कंधे पर दोनों तरफ लटकने वाला एक झोला (थैला) सिलवाकर मेरे कंधे पर डाला गया था, जिसमें क्या-क्या रखा गया था, उसकी कोई याद मुझे अब नहीं है। मैं पहली बार रेल में बैठने जा रहा था, इसकी खुशी थी, लेकिन इससे बड़ी खुशी यह थी कि मुझे दो चुटियों से छुटकारा मिलने वाला था। शाम को पूरी बस्ती ने हमें सड़क तक विदा किया, जहाॅं से हम रिक्शा में बैठकर स्टेशन पहुॅंचे। रात की किसी गाड़ी से हमें देहरादून जाना था। उस समय रेल में तीसरा दर्जा होता था, जो आज के जनरल डिब्बे की तरह ही खचाखच भरा होता था। उसी में ठेलठाल कर हम अन्दर घुसे और फर्श पर बैठकर किसी तरह देहरादून तक गए। देहरादून के स्टेशन की कोई याद उस वक्त की नहीं है और न ही वापसी की कोई स्मृति है। मुझे लगता है, घटना की प्रक्रिया का मानस पर ज्यादा प्रभाव पड़ता है, उसके समापन का नहीं। झण्डे जी की स्मृति में सिर्फ इतना ही याद है कि एक बड़े से हाल में पिता ने फर्श पर बिस्तर बिछाकर बैठने-सोने का बन्दोबस्त किया था। हाल के बाहर एक बड़ा सा तवा जल रहा था, जिसके चारों ओर औरतें बैठी हुईं रोटियाॅं सेक रही थीं। मेरी माॅं ने भी उसी तवे पर जाकर रोटियाॅं बनाई थी। इतनी सारी रोटियाॅं एक साथ बनाने का तरीका मेरे लिए एक कुतूहल से कम नहीं था। मैंने झण्डे जी को भी देखा था। वह एक काफी ऊॅंची बल्ली थी, जो रंगीन कपड़ों से मंढ़ी हुई थी। उस दिन पुराने कपड़े उतार कर झण्डे जी को नए कपड़े पहिनाए जाते हैं।
मैं अपने लेखक-जीवन में कई बार देहरादून जा चुका हूॅं, पर अपने बचपन में देखे गए झण्डे जी को दुबारा देखने जाना कभी नहीं हो सका। इच्छा अब भी है कि उस खास अवसर को फिर से जाकर उसी माहौल में देखा जाए।
(22 मई 2015)
                 
               












सोमवार, 11 मई 2015

कबीर की जाति
(कंवल भारती)
मैंने 1968 के आसपास ‘वैदिक संस्कृति में स्त्री और शूद्र’ नाम से एक छोटी सी किताब लिखी थी, जो तथ्यात्मक से ज्यादा उत्तेजनात्मक थी। 1971 में मैं उसके प्रकाशन के लिए चन्द्रिकाप्रसाद जिज्ञासु के पास लखनऊ गया था। पाण्डुलिपि को सरसरी निगाह से देखने के बाद उन्होंने मुझसे कहा था, ‘इसमें परिपक्वता दिखाई नहीं है। अगर तथ्यों के साथ बात कहोगे, तो विजन स्पष्ट होगा।’ फिर उसके बाद उन्होंने एक वाकया सुनाया कि एक बार एक आर्य समाजी पंडित उनके पास आकर बोला, ‘आपको इस विषय पर एक किताब छापना है।’ जिज्ञासुजी ने पूछा, ‘क्या विषय है?’ उस आर्य समाजी पंडित ने कहा, ‘विषय यह है कि बुद्ध और उनके धर्म की वजह से भारत गुलाम हुआ है और देश में यौनाचार बढ़ा है।’ जिज्ञासु जी ने उस पंडित को जवाब दिया, ‘आपका दोषारोपण निराधार है। बहुजन कल्याण प्रकाशन से ऐसी किताबें नहीं छापी जाती हैं। इस घटना का उल्लेख उन्होंने अपनी एक किताब में भी किया है। यह घटना मुझे ‘फारवर्ड प्रेस’ के साहित्य वार्षिकी अंक-2015 को देखकर याद आ गई। ‘फारवर्ड प्रेस’ की बहुजन वैचारिकी को देखते हुए उसमें कबीर पर कमलेश वर्मा का लेख नहीं छपना चाहिए था। अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता अपनी जगह सही हो सकती है, पर ‘फारवर्ड प्रेस’ अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का मंच नहीं है। वह एक खास वैचारिकी की पत्रिका है, जिसकी स्थापना उसका मिशन भी है।
मुझे कमलेश वर्मा के लेख ‘कबीर की जाति’ में भी तथ्यात्मक अपरिपक्वता दिखाई दे रही है। बहुजन वैचारिकी की दृष्टि से तो यह लेख लेखक की समझ पर प्रश्न चिह्न लगाता ही है, प्रत्युत दलित विमर्श की दृष्टि से भी कबीर का उन्होंने गलत अध्ययन किया है। वे दलित को अछूत के अर्थ में लेते हुए कहते हैं कि कबीर अछूत नहीं थे। उनके अनुसार, ‘कबीर ने स्वयं को कहीं भी अछूत नहीं कहा है। यदि कबीर में ब्राह्मण रक्त था, तब भी, यदि वे जुलाहा परिवार में जन्मे थे, तब भी- वे अछूत नहीं थे।’
कमलेश वर्मा दलित और अछूत के शब्दजाल में उलझकर कबीर की उस पूरी विचारधारा के विरोध में चले गए हैं, जिसने भक्तिकाल में ब्राह्मणवाद के खिलाफ सबसे निर्णायक लड़ाई लड़ी थी। कबीर ने स्वयं को अछूत नहीं कहा है, तो दलित भी नहीं कहा है। इससे कोई फर्क भी नहीं पड़ता है, फर्क इस बात से पड़ता है कि ब्राह्मण समाज की नजर में कबीर क्या थे? क्या ब्राह्मण समाज उनसे छूतछात करता था कि नहीं? अगर करता था, तो वे अछूत थे कि नहीं? अब अगर कोई यह कहे कि ब्राह्मण समाज कबीर से छूतछात नहीं करता था, तो वह हद दर्जे का अज्ञानी है, तब छूतछात के खण्डन वाले कबीर के पद भी कोई मायने नहीं रखते, क्योंकि जब कबीर ने छूतछात को अनुभव ही नहीं किया, तो वे कैसे कह सकते थे-‘काहे को कीजै पाण्डे छोति बिचार, छोति ही तैं उपजा सब संसार।’
कमलेश वर्मा यह सामान्य बात नहीं जान सके कि ‘दलित’ शब्द सातवें दशक में हिन्दी में आया और ‘अछूत’ शब्द दलितों का दिया हुआ नहीं है। किसी दलित ने अपने को अछूत नहीं कहा है, और कहेगा भी क्यों, जबकि वह अछूत है ही नहीं। कबीर स्वयं को क्यों ‘अछूत’ कहेंगे? यह तो ब्राह्मण समाज था, जो उन्हें अछूत मानता था। इसका प्रमाण हमें ‘भक्तकल्पद्रुम’ में मिलता है। उसमें लिखा है- ‘इस बात की पुकार, कि कबीर अपने को रामानन्द का चेला कहता है, रामानन्दजी तक पहुॅंची, रामानन्दजी ने आज्ञा दी कि कबीर को पकड़ लाओ। हमने कब उनको चेला किया है? कबीरजी गए, रामानन्दजी ने परदा डलवा कर वृतान्त पूछा।’ (पृष्ठ 316) अगर कबीर को अछूत नहीं समझा जा रहा था या बकौल कमलेश वर्मा कबीर अछूत नहीं थे, तो परदा डलवाकर बात करने का क्या मतलब है? इतनी बात तो वह जानते ही होंगे कि जिसे देखना नहीं होता है, परदा वहीं डलवाया जाता है।
कमलेश वर्मा का कहना है कि पिछड़ी जातियाॅं अस्पृश्य नहीं रही हैं, इसलिए कबीर दलित नहीं थे। यह अस्पृश्यता का वैज्ञानिक सिद्धान्त नहीं है और न यह अनुसूचित जातियों का वैज्ञानिक मापदण्ड है। इधर कई नई जातियाॅं अनुसूचित जातियों में शामिल की गई हैं, जो अस्पृश्यता की शिकार जातियाॅं नहीं हैं, लेकिन वे ब्राह्मणवाद से पीडि़त जातियाॅं जरूर हैं। ब्राह्मणों ने सिर्फ दलितों का ही मन्दिर-प्रवेश वर्जित नहीं किया था, बल्कि यह प्रतिबन्ध शूद्र पर भी लागू किया था, जिन्हें पिछड़ी जाति कहा जाता है। आज भी कुछ मन्दिरों में ‘शूद्रों का प्रवेश निषेध’ का बोर्ड लगा मिल जायगा। अगर यह अस्पुश्यता नहीं है, तो फिर क्या है? हिन्दू समाज में चमार-कोरी अछूत जातियाॅं मानी जाती हैं। कोरी और जुलाहा एक ही जाति है, कोरी हिन्दू धर्म में है और जुलाहा मुस्लिम समाज में आता है। जुलाहा आज भी मुसलमानों में अछूत माना जाता है। कमलेश वर्मा का यह कथन सही है कि इस्लाम में अस्पृश्यता की अवधारणा नहीं है। लेकिन मुस्लिम समाज में मौजूद अस्पृश्यता को वे क्यों नहीं देख सके? अगर वे इससे इन्कार करते हैं, तो बहुत बड़े भ्रम में हैं। मुस्लिम समाज में सवर्ण मुस्लिम ‘अशराफ’ और दलित मुस्लिम ‘अजलाफ’ कहलाता है। मुसलमानों में जुलाहा को निम्न जाति का मुसलमान माना जाता है। अगर कमलेश वर्मा भारत में धर्मान्तरण के इतिहास पर एक नजर डाल लेते, तो उन्हें इस सवाल का भी जवाब मिल जाता कि कबीर का परिवार हिन्दू से इस्लाम में धर्मान्तरित हुआ था और उनके पूर्वज कोरी थे, जो अनुसूचित जाति में आती है। उनके पूर्वजों ने चाहे जिन परिस्थिति में धर्मान्तरण किया हो, पर उनकी सामाजिक हैसियत में कोई बदलाव नहीं आया था। वे मुस्लिम की हैसियत से भी ब्राह्मण और मुस्लिम दोनों समाजों में इज्जत से नहीं देखे जाते थे। ब्राह्मण और मुल्ला से उनकी लड़ाई यों ही नहीं थी, वरन् उसके पीछे उन्हे सदियों से दबाकर रखने का दर्द था। कमलेश वर्मा यह सब जानते हुए भी अनजान बने हुए हैं और केवल यह साबित करने के लिए निरर्थक जाति-प्रश्न में उलझ गए हैं कि गैर दलित भी दलित साहित्य लिख सकता है, जैसे कि उनके अनुसार, कबीर ने लिखा, जो दलित नहीं थे। इसीलिए वे कहते हैं, ‘दलित विमर्श का सिद्धान्त कबीर की चैखट पर टूट जाता है कि दलित साहित्य केवल दलित ही रच सकता है।’ यह बकवास का सवाल है। जिस गैर दलित को लिखना होता है, वह लिखता है और जिसे नहीं लिखना होता है, वह सिर्फ गाल बजाता है।
कमलेश वर्मा कहते हैं कि ‘दलित विमर्श को जातिवादी वर्चस्व का घुन लग गया है’, लेकिन दूसरी ओर वे स्वयं कबीर को एक दूसरे जातिवादी वर्चस्व का घुन लगा रहे हैं, कि कबीर को पिछड़ी जाति जुलाहा घोषित करके उनकी दलितवादी व्याख्याएॅं खारिज कर देनी चाहिए। क्या खारिज करने से विमर्श बदल जाएगा? क्या दलित विमर्श की वैचारिकी पिछड़ी जाति के विमर्श की वैचारिकी से भिन्न है? अगर भिन्न है, तो किस मायने में भिन्न है? दलित और पिछड़े वर्ग को यदि मिलाकर बात करें, जो जरूरी भी है, तो वह बहुजन-विमर्श और बहुजन-साहित्य ही हो सकता है, जिसकी एक ही वैचारिकी है- वर्णव्यवस्था और जातिभेद का विरोध और समतामूलक समाज की स्थापना पर जोर। किसने कबीर को किस निगाह से देखा है, यह छोडि़ए। रामचन्द्र शुक्ल से लेकर हजारीप्रसाद द्विवेदी और पुरुषोत्तम अग्रवाल तक के कबीर वैष्णववादी हैं। इन लोगों ने एक तरह से कबीर को उनकी मौलिकता में स्थापित करने का नहीं, बल्कि उन्हें, ओशो के शब्दों में, ठोकपीट कर ठिकाने लगाने का ‘प्रायेजित काम’ किया है। धर्मवीर के कबीर भी दलित विमर्श में पूरी तरह स्वीकार्य नहीं हैं। कबीर का वर्णव्यवस्था और जातिभेद के विरोध का काव्य प्रथम रचना-कर्म नहीं है। वह पूर्ववर्ती कई शताब्दियों से चली आ रही परम्परा का अंग है, जिसकी जड़ें बौद्धधर्म में मिलती हैं। वेद, शास्त्र, कतेब, ब्राह्मणवाद, वर्णव्यवस्था और परलोकवाद के खण्डन की यह धारा आजीवकों, बुद्ध, अश्वघोष, सिद्धों और नाथों से होती हुई कबीर तक पहुॅंची थी। कबीर इसी परम्परा आते हैं। इस पूरी परम्परा को एक ही नाम दिया जा सकता है- ‘बहुजन-चिन्तन-परम्परा’। यह न जातिवादी है, न वर्णवादी, और न हिन्दूवादी है, मुस्लिमवादी। इसलिए क्षत्रिय बुद्ध भी इसी परम्परा में हैं और अश्वघोष ब्राह्मण भी। इसीलिए कबीर ने अपने को ‘न हिन्दू-न मुसलमान’ कहा है। और, मेरी दृष्टि में बहुजन अवधारणा भी यही होनी चाहिए।

(11-5-2015)

शनिवार, 2 मई 2015


1927 में प्रकाशित कैथरीन मेयो की बहुचर्चित पुस्तक “मदर इंडिया” से उसका ‘परिचय’ यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ. यह वह पुस्तक है, जिसने पहली बार भारत में दासप्रथा का खुलासा किया गया था. भारतीय राजनीति में इस किताब ने इतनी जबरदस्त दस्तक दी थी कि लालपत राय को इसके जवाब में “अनहैप्पी इंडिया” के नाम से किताब लिखनी पड़ गयी थी. डा. आंबेडकर ने इस किताब का जिक्र अपने कई लेखों में किया है. यह किताब की प्रस्तावना का अनुवाद है,

कलकत्ता का काली घाट
(कैथरीन मेयो)
                कलकत्ता, ब्रिटिश साम्राज्य का दूसरा बड़ा शहर, जो बंगाल की खाड़ी के शिखर पर हुगली कही जाने वाली गंगा तक फैला हुआ है। कलकत्ता, विशाल, पश्चिमी, आधुनिक इमारतों से भरापूरा, राष्ट्रीय स्मारक, पार्क, बगीचे, अस्पताल, संग्रहालय, विश्वविद्यालय, न्यायालय, होटल, कार्यालय, दुकानें, और वह सब कुछ, जो एक समृद्ध अमेरिकी शहर में होता है; और उसके उलट यह भारतीय नगर, मन्दिरों, मस्जिदों, बाजारों तथा उलझे हुए आंगनों और गलियारों से भरपूर, जो किसी तरह अपने आप बनने के बावजूद नक्शे में आयताकार दिखाई देते हैं। चौराहों और गलियों तथा बाजारों में छोटे-छोटे बुकस्टाल्स हैं, जहाँ सुस्त चाल वाले, कमजोर नजर वाले और बीमार कदकाठी के नौजवान भारतीय छात्र अपनी देशज पोशाक में किताबों में डूबे हुए, ऐसे दिखाई दे रहे हैं, जैसे लोग रूसी साहित्य पढ़ते हुए खो जाते हैं.
                समृद्ध कलकत्ता, विश्व व्यापार के लिए भारत का विशाल मुक्त द्वार, सोने-चाँदी का व्यापार, जूट का व्यापार, काटन का व्यापार, और उन सब चीजों का व्यापार, जिसकी जरूरत भारत और विश्व को एक-दूसरे से रहती है। सुरुचिपूर्ण, कृत्रिम कलकत्ता, जहाँ सभी धर्मों, सभी वर्णों और सभी प्रथाओं के सुरुचिपूर्ण और बनावटी लोग गवर्नमेंट हाउस की गार्डेन पार्टीज में जाते हैं, अपने महामहिमों को फर्शी सलाम बजाते हैं, और उन्हें प्रसन्न करने के लिए अच्छी अंग्रेजी बोलते हैं, जबकि वे अपनी चाय और बर्फ लेते हैं और सेना के बैंड को सुनते हैं।
                आप गवर्नमेंट हाउस गार्डेन से सड़क नहीं देख सकते, क्योंकि दीवालें काफी ऊॅंची हैं। किन्तु यदि आप देख सकते हैं, तो आप देखेंगे कि वह सड़क मोटर यातायात, खासकर कारों, टैक्सियों और प्राइवेट मशीनों से भरी पड़ी हैं। और कभी-कभी उनमें अकेले ही एक ‘फिफ्थ एवेन्यू’ बस घूमती हुई दिखती है, जिस पर बड़े अक्षरों में लिखा होता है, ‘काली घाट’।
                यदि आपने ध्यान दिया हो, तो अकेली यही बस इम्पायर थिएटर के पीछे पार्क, अनेकों क्लबों, सेंट पौल केथेड्रल, बिशप हाउस के पीछे, सामान्य चिकित्सालय, और लंदन मिशन सोसाइटी संस्थान से गुजरकर चलती है, और अब वर्तमान में यह एक घनी बस्ती तक भी आकर रुकती है, जैसाकि इसके स्टापेज का विज्ञापन किया गया है।
                ‘काली घाट’ अर्थात् ‘काली का स्थान’ , यह कलकत्ता का उद्गम शब्द है। हिन्दू देवी ‘काली’ विनाश के महान देवता शिव की पत्नी है, जिसकी पिपासा जीवों की बलि चढ़ाकर उनके रक्त से शान्त होती है। विश्व में उसका आध्यात्मिक शासन पिछले लगभग पांच हजार वर्षों से आरम्भ होता है, और लगभग चार सौ बत्तिस हजार साल के बाद तक रहेगा, ऐसा माना जाता है.
                भारत में काली के छोटे-बड़े हजारों मन्दिर हैं। कलकत्ता का काली मन्दिर ब्राह्मणों के एक परिवार की निजी सम्पत्ति है, जो तीन शताब्दियों से उनके पास है। जिनके कब्जे में आज यह है, वे सौ के करीब एक ही पिता के पुत्र हैं। उन सौ में से एक ने मुझे एक ब्राह्मण मित्र के साथ मन्दिर परिसर दिखाने की कृपा की है। मैं उसे मि. हलदार कहूँगी, क्योंकि यह उसका पारिवारिक नाम है।
                किन्तु सफेद तहमद और सफेद चोगे की वजह से, जो आम बंगाली पहिनावा है, मि. हलदार एक सुन्दर सजधज के साथ उत्तरी इटैलियन सज्जन ज्यादा लग रहे थे। उसकी अंग्रेजी परिमार्जित है और उसका आचरण पूरी तरह पसन्द आने वाला।
                उसने मुझे बताया, यह मन्दिर 590 एकड़ में फैला हुआ है. यहाँ नजदीक और दूर सब जगह से श्रद्धालु आते हैं, जिससे यहाँ हमेशा भीड़ रहती है.  वे यहाँ  पूजा करते हैं, पैसा चढ़ाते हैं। यहाँ पुरोहित को भी दक्षिणा दी जाती है। यहाँ बहुत-सारे मण्डप हैं, जो एक-दूसरे के समीप और ऊपर-नीचे हैं. इनमें मिठाईयां,  प्रतिमायें,  गेंदा के फूल, तावीज, और मन्नत का चढ़ावा बेचा जाता है। इससे भारी आय होती है।
                आते-जाते श्रद्धालुओं की भीड़ को तेजी से चीर कर आगे बढ़ते हुए मि. हलदार हमें पूरा मन्दिर दिखाते हैं। एक ऊॅंचा चबूतरा, उसकी लम्बाई और चैड़ाई को तीन तरफ से घेरते छत और स्तम्भ। एक छोर पर, एक गहरा, आधा-घेरा हुआ समाधि-स्थल, जिसमें, देवियों की धुंधली, आधी नजर आने वाली, अस्पष्ट मूर्ति। वह है, काला चेहरा, बाहर को निकली हुई जीभ और टपकता हुआ खून। उसके चार हाथों में से, एक हाथ में खून से टपकते हुए आदमी का सिर है, दूसरे हाथ में खड्ग, तीसरे में रक्त से भरा पात्र और चौथा धमकाने में उठा हुआ, खाली है। उसके पैरों की परछाईं के पास एक पुरोहित खड़ा है।
                देवी के सामने वाले एक लम्बे चबूतरे पर, स्त्री और पुरुष लेटे हुए जोर-जोर से प्रार्थना कर रहे हैं। उनमें मटरगश्ती करते हुए और लोलीपाप चूसते हुए लड़के हैं। एक सफेद बछड़ा भी भ्रमण कर रहा है, जबकि इस सबके बीच में एक श्रद्धालु वृद्ध पालथी मारकर बैठा हुआ एक मोटी किताब के आगे जोर-जोर से बुदबुदा रहा है।
                ‘वह’, मि. हलदार ने कहा, ‘हमारे हिन्दू पुराण से श्लोक पढ़ रहा है। काली का इतिहास।’
                अचानक, एक कर्णभेदी मिमियाने की मार्मिक चीख जैसी आवाज आई। हम मन्दिर के छोर के पीछे की तरफ खुले बरामदे की ओर गए। वहाँ दो पुरोहित खड़े हैं, एक के हाथ में तलवार है, और दूसरा एक युवा बकरे को पकड़े हुए है। बकरे की चीख से अभी भी हवा में सिहरन भरी है। देवी के सामने बजते हुए ढोल-नगाड़े। पुरोहित ने बकरे को पकड़कर उसकी गर्दन को (अंग्रेजी के ‘V’ आकार में बने) एक खूंटे में फॅंसा दिया है। दूसरा पुरोहित अपनी तेज धार की तलवार से उस नन्ही जान का सिर काट देता है। खून की धार जैसे ही फर्श पर गिरी, देवी की मूर्ति के आगे घण्टे-घडि़याल बजने लगे और सारे पुरोहित और भक्त साथ-साथ चिल्लाए- ‘काली! काली! काली!’ कुछ तो मन्दिर के फर्श पर अपने सिर पटकने लगे।
                इसी समय, एक औरत, जो बकरी की हत्या करने वाले पुरोहित के पीछे खड़ी प्रतीक्षा कर रही थी, आकर फर्श पर लेट गई और अपनी जीभ से नीचे गिरे हुए उस खून को ‘बच्चा पैदा होने की आस  में’ चाटने लगी, तो दूसरी औरत झपट्टा मार कर उस खून पर अपना कपड़ा डाल देती है और उसे  खून में सानकर अपने वक्ष में घुसेड़ लेती है, जबकि अनजान रोगों से ग्रस्त आधा दर्जन बीमार, भयंकर कुरूप और जख्मी कुत्ते, जो अपनी भूख सहते हुए निर्जीव हो गए हैं, फर्श पर जमे हुए खून में जीवन तलाश रहे हैं।
                ‘हम यहाँ इसी तरीके से प्रतिदिन 150 से 200 तक शिशु बकरों को मारते हैं’, मि. हलदार ने कुछ गर्व के साथ कहा, ‘बलि के लिए इन शिशुओं को पूजा करने वाले लोग ही यहाँ लाते हैं।’
                अब वह हमें कुछ छोटी देवियों के मन्दिरों में ले जाता है- उन छोटी देवियों में एक लाल देवी है, जो चेचक की देवी है, वह लाल जोड़े में है. यह चेचक से छुटकारा दिलाती है या नहीं, पर अफवाह है; एक अन्य प्रतिमा पांच सिरों वाले काले कोबरा सांप की है,  जिसकी ठोढ़ी के नीचे पुरोहित की नन्हीं आकृति है, इसकी पूजा वे लोग करते हैं, जो सर्प-दंश से डरते हैं.  आगे एक और प्रतिमा लाल कपीश है, जिसकी पूजा पहलवान करते हैं, जब अखाड़े में जाते हैं.  धनी व्यापारी और विश्वविद्यालय के छात्र भी इस देवता से परीक्षा में पास होने या व्यापार में घाटा न होने के लिए प्रार्थना करते हैं, आगे एक ‘सार्वभौम देवता’ का चेहरा है, Alaskan totem की तरह। और उसके बाद अंत में सर्वत्र विद्यमान काली के पति शिव का लिंग चिह्न है। उन सबसे पहले, गेंदे के फूलों या टोकरियों में भरकर लाई गई लाल रंग की किसी चीज का छोटा चढ़ावा, ये दोनों चीजें मन्दिर की दूकानों पर, खरीदने के लिए उपलब्ध थीं, उसके साथ ही मन्दिर के वृषभों के गोबर से बनी पवित्र टिक्की भी बिक रही थी।
                मि. हलदार हमें एक गली में ले गए, जहाँ पंक्तियों में लगभग नंगे साधु और भिखारी बैठे थे, ज्यादातर मोटे-मुस्टन्डे और बड़े केशों वाले, और पूरे शरीर पर राख लपेटे हुए, भीख मांगते हुए। वे सभी फोटो खिंचवाने के लिए आतुर हैं। उन साधुओं ने उठ खड़े होकर फोटो खिंचवाए। एक, पागल तो एक लड़की को बुरी तरह डराते हुए, खुद हम पर ही गिर गया. उस लड़की को एक युवक खींच कर ले गया, जिसकी कलाई पर बंधा स्कार्फ का दूसरा सिरा लड़की की नन्हीं कलाई से बंधा है। ‘ये पति- पत्नी है’, मि. हलदार बताता है, ‘ये यहाँ पुत्र के लिए प्रार्थना करने आए हैं।‘
                अब हम मन्दिर के श्मशान घाट पहुँचते हैं। एक चिता की तैयारी चल रही है। एक खुली जगह के बीच में एक आयताकार गड्ढा है। गड्ढा अभी लकडि़यों से आधा भरा है। पास में ही जमीन पर, एक खूबसूरत जवान भारतीय स्त्री लेटी हुई है, शान्त जैसे अचेत हो, उसके लम्बे काले बाल उसके चारों ओर बिखरे हुए हैं, कुछ फूल भी उनमें थे। उसका माथा, उसके हाथ और उसके पैरों के लाल रंग से पुते तलवे बताते थे कि वह सौभाग्यवती स्त्रियों में थी, यानी वह विधवा होने से बच गई थी, उसका पति जीवित था। उसके दो-तीन सम्बन्धी और एक दस वर्ष का बालक पास में ही खड़े थे, जो उदास लग रहे थे। कुछ दूरी पर एक बूढ़ी स्त्री बैठी रो रही थी। पांच या छह घुड़मक्खियों जैसे भिखारी भी वहां थे।
                अब उन्होंने लाश को उठाया और गड्ढे में लकड़ियों पर रख दिया। स्त्री का सिर घूमता है और एक हाथ लटक जाता है, जैसे उसने सोते में करवट बदली हो। लगता है, वह कुछ ही घण्टे पहले उसकी मृत्यु हुई है। उन्होंने उस पर ऊपर तक लकड़ियों का ढेर लगा दिया है। अब वह छोटा बालक, जो शायद उसका बेटा है, हाथ में जलती आग लेकर चिता के सात चक्कर लगाता है। उसके बाद वह उस आग को लकड़ियों पर फेंक देता है, लकड़ियों सुलगती हैं और धुंआ उठने लगता है. इस तरह अन्तिम संस्कार सम्पन्न होता है।
‘अच्छी आग से सब कुछ जल जाता है’, मि. हलदार समझाता है, ‘मन्दिर के चाकरों द्वारा चुनी गई चिता की राख को, सोने के सिक्के के साथ, जो मृतक के परिवार द्वारा दिया जाता है, मिट्टी के एक गोले में रखकर गंगा में बहा दिया जाता़ है। अब हम गंगा दिखायेंगे।’
वह पुनः हमें मन्दिर से नीचे की ओर ले गया, जहाँ एक कींचड़-युक्त छोटी नदी थी, जो उसमें नहाने वाले लोगों से भरी हुई थी। मि. हलदार ने कहा, ‘यह अत्यन्त प्राचीन गंगा का अवशेष द्वार है। इसलिए यह बहुत गुणवान मानी जाती है। यहाँ हर वर्ष हजारों बीमार लोग स्नान करने आते हैं और अपनी बीमारियों से मुक्ति पाते हैं, जैसा कि अब आप यहाँ देख रही हैं। कुछ लोग अपने पापों से मुक्ति के लिए भी देवी की शरण में आते हैं और इसमें स्नान करके उनके पाप धुल जाते हैं।’
 जो लोग उसमें नहा रहे थे, उन्होंने अपना स्नान खत्म करने के बाद उस पानी को न सिर्फ पिया, बल्कि अपने घुटनों पर भी मला। उसके बाद उनमें से बहुतों ने उसकी तलहटी में से अपने हाथों से गन्दगी तलाशी, और मुट्ठीभर कीचड़ निकालकर उसे सावधानी से अपनी हथेली पर रखकर उसमें कुछ ढूँढने लगे। मि. हलदार ने बताया, ‘वे चिता की इस राख में से सोने का सिक्का ढूंढ रहे हैं। उन्हें सिक्का मिलने की उम्मीद रहती है।’
इसी वक्त, नदी के पुश्ते पर आगे-पीछे कुछ पुरोहित आए, हरेक तीन या चार बकरी के बच्चे लिए हुए थे, जिन्हें उन्होंने उसी नदी में स्नान कराकर उन्हें खींचते हुए वापिस मन्दिर के अहाते में ले गए, वे चीखते और छटपटाते रहे. इसी बीच उस नदी में से पानी भरकर ले जाने वाले स्त्री-पुरुषों का आना-जाना बदस्तूर जारी रहा, जो जिस रास्ते से आते थे, उसी रास्ते से गायब हो जाते थे.
‘हरेक बच्चा’, मि. हलदार ने कहना जारी रखा, ‘बलि देने से पहले पवित्र नदी में स्नान कराकर शुद्ध किया जाता है। जहां तक पानी लाने की बात है, वे पानी प्रसाद के रूप में लाते हैं। उसे काली के चरणों पर और उसके बाद पुराहितों के चरणों पर प्रवाहित किया जाता है।’
जैसे ही मि. हलदार ने हमें मन्दिर के बाहर दीवार तक छोड़ा, मेरा ध्यान आदमी के हाथ के आकार के बराबर एक गटर जैसे होल पर गया, जो जमीन की सतह पर था। इस होल से, एक छोटे सपाट पत्थर पर, कुछ गेंदे के फूल, कुछ गुलाब-दल और कुछ सिक्के गिराए गए थे। उसे देखते ही, अचानक होल में से बहुत तेजी से गन्दा पानी बाहर आया, और एक औरत भागती हुई आई, और उसमें से एक कप से पानी लेकर पी गई।
मि. हालदार ने बताया--‘वह हमारी गंगा का पवित्र जल है, जो काली और पुरोहितों के चरणों पर से बहकर और ज्यादा पवित्र हो गया है। मन्दिर के फर्श से यह इसी तरह इस प्राचीन नाली से यहाँ आता है। यह आंव और आँतों के बुखार में बहुत बढि़या फायदा करता है। बीमार लोग ही यहाँ आकर पहले गंगा में स्नान करते हैं, फिर इस जल को पीते हैं। इस जल को वे अपने परिचित बीमार लोगों के लिए भी बर्तनों में भर कर ले जाते हैं।’
खैर, अब हमें अपनी प्रतीक्षित मोटर मिल गई और हमने जनरल अस्पताल, बिशप हाउस, अनेक क्लबों, इम्पायर थिएटर होते हुए, कुछ ही मिनटों में कलकत्ता के हृदय का भ्रमण कर लिया।
‘तुम काली घाट क्यों गईं थीं? वह भारत नहीं है। केवल नीच, अज्ञानी और अनपढ़ भारतीय ही काली की पूजा करते हैं’, एक अंग्रेज थियोसोफिस्ट ने दुखी होकर अगले दिन मुझसे कहा।
मैंने एक प्रकाण्ड विद्वान और प्रख्यात बंगाली ब्राह्मण के शब्दों को दुहरा दिया। उन्होंने कहा था-
‘तुम्हारे अंग्रेज मित्र गलत हैं। यह सही है कि नीची जातियों में काली को पूजने वालों का प्रतिशत ज्यादा है और विष्णु को पूजने वालों का प्रतिशत कम है, शायद इसलिए कि वे आत्मसंयमी हैं, जैसे वे मांस-मदिरा से परहेज करते हैं। किन्तु हजारों ब्राह्मण, हर जगह काली की पूजा करते हैं, और काली घाट पर आने वाले श्रद्धालुओं में सभी जातियों के हिन्दू शामिल होते हैं, जिनमें बहुत से अत्यन्त उच्च शिक्षित और इस शहर व भारत के महत्वपूर्ण गणमान्य व्यक्ति होते हैं।’
(30 अप्रैल 2015)
अनुवाद : कँवल भारती
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