मंगलवार, 19 अगस्त 2014

ओमप्रकाश वाल्मीकि के पत्र—26
(पोस्ट कार्ड)

देहरादून
10-7-96

प्रिय भाई श्री कँवल भारती जी,
आपका पत्र दिनांक 5-7-96 मिला. ‘अम्मा’ कहानी पर आपकी समीक्षात्मक टिप्पणी एक संवाद को अंकुरित कर रही है. समाज में जो बदलाव आया है, उसके समूचे परिदृश्य को इस कहानी में भले ही अभिव्यक्ति न मिली हो, किन्तु एक पक्ष तो अवश्य उभरा है. वह पीढ़ी जो पारम्परिक कार्य छोड़ कर कार्यालयों या अन्य कार्यों तक पहुंचे, बदलाव की पहली पीढ़ी कहे जा सकते हैं. जहाँ तक आशावादी होने का सवाल है, ‘अम्मा’ की पीड़ा भी तो यही है कि उसकी संतति एक अनुकरणीय समाज की ओर नहीं बढ़ी. मात्र बाह्य परिवर्तन तक या सुविधाभोगी बन जाने का रास्ता अपनाया.
आपने बेबाक ढंग से अपनी बात कही, अच्छा लगा. अपनी कमजोरियों को समझने में इससे मदद मिलती है. दलित रचनाओं पर जितनी ज्यादा बातचीत होगी, रचनाधर्मिता के उतने (ही) सूक्ष्म आयाम परिभाषित होंगे. इसी दृष्टि को मद्देनजर रखते हुए, ‘अंधड़’ कहानी लिखी है, जो अगस्त 96 के ‘हंस’ में आ रही है. आशा है, इस कहानी पर आपकी प्रतिक्रिया मुझे मिलेगी. यह एकदम ताज़ा कहानी है. जून 96 में लिखी थी.
बस, शेष कुशल. सानन्द होंगे. भाभी कैसी हैं? ‘कविता-संग्रह’ की क्या प्रगति है? पत्र देते रहें.
आपका,
ह० (ओमप्रकाश वाल्मीकि)
ओमप्रकाश वाल्मीकि के पत्र—27
(पोस्ट कार्ड)

देहरादून
15-7-96

प्रिय भाई श्री कँवल भारती जी,
‘तब तुम्हारी निष्ठा क्या होती?’ कविता-संकलन की प्रतियाँ मिलीं. आभार.
कविता-संग्रह छपने पर हार्दिक बधाई. दलित-चेतना के विस्तार एवं उसे प्रगल्भता प्रदान करने में यह संग्रह अपनी विशिष्ट एवं सार्थक भूमिका निभायेगा.
प्रतियाँ निकलते ही आपको राशि भेज दी जायेगी. आज ही रजत रानी की पुस्तक ‘नवें दशक की हिंदी दलित कविता’ प्राप्त हुई है. ऐसी पुस्तकों की इस वक्त सचमुच आवश्यकता है. मेरे विचार से आलोचनात्मक यह पहली पुस्तक है.
वीर भारत तलवार शिमला में दलित साहित्य को लेकर एक सेमिनार करना चाहते हैं. शायद वे आपसे संपर्क करें. उन्होंने कुछ सूचनाएँ मांगी थीं. वे मैंने भेज दी हैं. मेरे साथ कुछ ऐसी समस्याएं जुड़ गयी हैं कि मेरा बाहर निकलना कठिन होने लगा है.
बस, शेष कुशल. सानन्द होंगे. शुभकामनाओं सहित,
आपका,
ह० (ओमप्रकाश वाल्मीकि)




ओमप्रकाश वाल्मीकि के पत्र—28

कलालों वाली गली,
देहरादून
दिनांकः 31 अगस्त 1996


प्रिय भाई कँवल भारती जी,

आपका आलेख मिला. ‘दलित साहित्य और प्रेमचंद’ शीर्षक इस आलेख में जहाँ आपने दलित साहित्य की अंतर्धारा का विवेचन किया है, वहीँ प्रेमचन्द की विशिष्ट कहानियों—‘कफन’, ‘ठाकुर का कुआँ’, ‘मुक्ति मार्ग’, ‘सद्गति’, ‘मंदिर’ एवं उपन्यास ‘रंगभूमि’ पर भी गहरी छानबीन की है. आलेख कई प्रकार के सवालों को खड़ा करता है, जिनके उत्तर हिंदी आलोचकों को देने हैं. आपने काफी श्रम किया है. बधाई.
कार्यक्रम कैसा रहा? जानने की उत्सुकता है. कौन-कौन लेखक आये थे? चर्चा कैसी रही? विस्तार से जानकारी मिले तो अच्छा होगा.
रजत जी का पत्र आया था, ‘अम्मा’ कहानी पर आपकी टिप्पणी को लेकर उन्होंने लिखा है. मैंने उन्हें लिख दिया है कि कँवल भारती जी के नजरिये पर बहस की गुंजाईश है. यदि उन्हें ‘अम्मा’ का पात्र प्रेरणादायी नहीं लग रहा है, तो क्यों? शायद चर्चा से कुछ नये विचार सामने आयें, जो हमारे लेखन को नयापन देंगे. आपने ‘अम्मा’ को ‘भावाधस’ के किसी अखबार (शायद ‘आदि सत्य’) के 14-21 जुलाई के अंक में भी छापा था. पाठकों की प्रतिक्रिया यदि ‘अम्मा’ पर आई हो तो, अवगत करें.
अंधड़’ देख ली होगी ‘हंस’ में. आपकी राय जानने की उत्सुकता है.
‘बस्स ! बहुत हो चुका’ (कविता-संग्रह) वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली से तथा ‘जूठन’ (आत्मकथा) राधाकृष्ण प्रकाशन, नयी दिल्ली से, अक्टूबर तक छपकर आ जायेंगे, ऐसी उम्मीद है.
बस, शेष लुश्ल. आपकी पुस्तक की सहयोग राशि शीघ्र ही भेजूंगा.
सानन्द होंगे. आपके पत्र की प्रतीक्षा है.
आपका,
ह० (ओमप्रकाश वाल्मीकि)



ओमप्रकाश वाल्मीकि के पत्र—29
(पोस्ट कार्ड)

देहरादून
30-11-96

प्रिय भाई श्री कँवल भारती जी,
आपके आलेख ‘क्या निराला प्रगतिवादी थे?’ की प्रति मिली. नि:संदेह एक गंभीर आलेख है, जो हिंदी समीक्षकों के मानदंडों को धराशायी करता है. दलित-साहित्य में वर्णव्यवस्था के लिए कोई स्थान नहीं है. वर्णव्यवस्था का समर्थक दलितों की पीड़ा को नहीं समझ सकता. निराला भी अपवाद नहीं हैं.
मुजफ्फरनगर एक कार्यक्रम में गया था. दलित-साहित्य की अवधारणाओं पर चर्चा हुई. रपट शीघ्र भेजूंगा.
इलाहबाद कार्यक्रम की विस्तृत रपट हो तो भेजें. क्या लिम्बाले जी आये थे?
मेरी कहानियों पर आपका आलेख ‘पूर्वदेवा’ के जुलाई-सित. ’96 अंक में छपा है. यदि प्रति न हो तो लिखें. फोटो प्रति मैं भेज दूंगा.
डा. एन. सिंह द्वारा सम्पादित पुस्तक ‘दलित-साहित्य चिंतन के विविध आयाम’ में आपका लेख है- ‘दलित कविता का अर्थ’. बधाई. पुस्तक मिल गयी होगी.
बस, शेष कुशल. सानन्द होंगे. शुभकामनाओं सहित,
आपका,
ह० (ओमप्रकाश वाल्मीकि)



ओमप्रकाश वाल्मीकि के पत्र—30
(पोस्ट कार्ड)

देहरादून
11-12-96

प्रिय भाई श्री कँवल भारती जी,
आपका पत्र दिनांक 4-12-96 मिला. आभार.
‘कांशीराम के दो चेहरे’ पुस्तक मुझे नहीं मिली. हाँ, गत दिनों डा. श्यौराजसिंह बेचैन यहाँ आये थे, तो उन्होंने पुस्तक का जिक्र किया था. ‘डा. आंबेडकर : एक पुनर्मूल्यांकन’ की प्रतीक्षा रहेगी.
आप कार्यक्रम की रूपरेखा बनाइए. मैं पूरी कोशिश करूँगा इसमें सहभागी होने की. यह अलग बात है, कई बार चाह कर भी कई कार्य(क्रम) छूट जाते हैं.
कार्यक्रम दिल्ली में भी रखा जा सकता है. एक कर्यक्रम की रूपरेखा मुजफ्फरनगर में भी बन रही है. गत दिनों मैं वहां ‘वाणी’ संस्था के निमंत्रण पर गया था. कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार होते ही मैं आपको लिखूंगा.
गत माह कुछ घंटों के लिए मैं दिल्ली गया था. रात में ही वापस लौट आया था. राजेन्द्र यादव जी से चर्चा हुई थी. दलित-साहित्य की गतिविधियों से साहित्यिक हलकों में बौखलाहट है. शायद ‘हंस’ के सम्पादकीय में कुछ जिक्र आये.
बस, शेष कुशल. सानन्द होंगे. पत्नी के स्वास्थ्य ने अस्त-व्यस्त कर रखा है. पत्र देते रहें.
आपका,
ह० (ओमप्रकाश वाल्मीकि)












सोमवार, 18 अगस्त 2014

ओमप्रकाश वाल्मीकि के कुछ और पत्र
पत्र—21
(पोस्टकार्ड)

देहरादून
16-3-96
प्रिय भाई श्री कँवल भारती जी,
आपका पत्र दिनांक 13-3-96 मिला. इससे पूर्व कल ही मैंने आपके लेख की कार्बन प्रति तथा साथ में एक पत्र डाक में छोड़े थे, मिल गये होंगे. आपका लेख पसंद न आने का कोई कारण नहीं है, बल्कि मैं तो आपका आभारी हूँ कि आपने इन कहानियों को इस तल्लीनता से पढ़ा, एक सटीक टिप्पणी की. मेरा आशय सिर्फ इतना ही था कि भाषा में थोड़ा-बहुत काम आप कर सकते तो लेख का स्तर उठ जाता, क्योंकि यह लेख एक दस्तावेज की तरह आने वाले समीक्षकों को एक दृष्टि, एक सोच देगा, जिसकी इस वक्त आवश्यकता है. जिस तरह लेख आपने तैयार किया है, वह अपने आप में एक विश्लेषणात्मक दृष्टि देने में सक्षम है, बल्कि दलित कहानियों पर एक साथ इतना बड़ा, विस्तृत लेख अभी सामने भी नहीं आया है. आपके काम के प्रति मेरे मन में गहरा आदर है. इसमें कोई लागलपेट नहीं है. क्योंकि हमारे बीच औपचारिकता को कोई गुंजाईश नहीं है, बल्कि आन्दोलन की सक्रियता बढ़ाने के लिए परस्पर सहयोग और संवाद की महत्ता है. मैंने जो कुछ भी पत्र में लिखा, इसी नजरिये से लिखा. लेख पसंद है, बल्कि कुछ मुद्दे तो आपने ऐसे भी उठाये हैं, जिन पर पाठकों का अभी ध्यान भी नहीं गया है, जो दलित सौन्दर्यशास्त्र के लिए भूमि बन रहे हैं. मैं मानता हूँ आप जितना लिखते हैं, उसके लिए समय कम पड़ता है. लेकिन भाई, कुछ कार्य, जिनका सम्बन्ध भविष्य के लिए मार्ग बनाना है, उन पर अतिरिक्त ध्यान देना और सजग (रहना) भी तो जरूरी है. खैर, पुस्तक के लिए तो आप रखें ही, लेकिन ‘पूर्वदेवा’ (उज्जैन) को भी दें. शायद ‘अंगुत्तर’ भी छापे. ‘हंस’ या ‘अमर उजाला’ न भी छापे तो कोई बात नहीं. लड़ाई हमें अपने ही ढंग से लड़ना है. लड़ भी रहे हैं. मेरे विचार से ‘पूर्वदेवा’ को यह लेख भेज ही दें.
बस, शेष फिर. सानन्द होंगे.
आपका,
ह० (ओमप्रकाश वाल्मीकि)   


     

पत्र—22
(पोस्टकार्ड)

देहरादून
20-3-96
प्रिय भाई श्री कँवल भारती जी,
आपके कविता संग्रह का प्रूफ मिला. भूमिका लिखने के लिए आपने समय बांध दिया है, क्योंकि लिखने में मेरी गति बहुत धीमी है. लम्बी प्रक्रिया. अपने ही लिखे को कई दफा ख़ारिज कर देता हूँ. ऊपर से मार्च का महीना, कारखाने में काम करने वालों के लिए थका देने वाला होता है. लगभग सभी रविवार, शनिवार कारखाने में ही बीत रहे हैं. रात 8-9 बजे से पहले घर भी नहीं पहुचते हैं. जो लिखना-पढ़ना छुट्टी के रोज होता था, वह भी छूट जाता है. इसलिए अप्रैल के प्रथम सप्ताह तक भूमिका लिखना, वह भी विस्तार से संभव नहीं हो पायेगा. इस तारीख को थोड़ा आगे बढ़ाइए....मैं पूरी कोशिश करूँगा कि जल्दी-से-जल्दी भूमिका लिखकर आपके पास भेज सकूँ. संग्रह का शीर्षक क्या है? लिखें.
बस, शेष कुशल. सानन्द होंगे. शीर्षक से शीघ्र अवगत करें.
आपका,
ह० (ओमप्रकाश वाल्मीकि)


पत्र—23

कलालों वाली गली, देहरादून
दिनांकः 30 मार्च, 1996
प्रिय भाई श्री कँवल भारती जी,
आलेख जैसा भी बन पड़ा, भेज रहा हूँ. समय कम दिया है आपने. इसलिए हो सकता है, आपकी आशा के अनुरूप न हो. फिर भी, देख लें. यदि उपयोगी लगे, तो रख लें, वरना वापिस कर दें. फिर कुछ नये सिरे से सोचा जायेगा. मात्र आपके संग्रह पर ही बात करने के बजाय समूची दलित-कविता पर एक दृष्टि डालने का प्रयास किया है, वह भी संक्षेप में. क्योंकि आपने पृष्ठ संख्या भी सीमित कर दी थी.
जल्दी से अपनी राय से अवगत करें. पृष्ठ- 4 की प्रथम पंक्ति में ‘संग्रह’ के आगे ....... में अपने संग्रह का नाम लिख दें. (यह आलेख मेरे एकमात्र कविता-संग्रह ‘तब तुम्हारी निष्ठा क्या होती?’ में भूमिका के रूप में मौजूद है.)
बस, शेष फिर.
‘पश्यन्ति’ (जन.-मार्च- 96) अंक में मेरी कहानी ‘खानाबदोश’ छपी है. ईंट-भट्टों के मजदूरों की पृष्ठभूमि पर है. मिले तो देख लें.
पत्र शीघ्र दें.
आपका, ह० (ओमप्रकाश वाल्मीकि)




पत्र—24
(पोस्टकार्ड)

देहरादून
27-5-96
प्रिय भाई कँवल भारती जी,
आपके पत्र की प्रतीक्षा करके ही लिख रहा हूँ? आपकी पुस्तक की भूमिका के लिए एक आलेख भेजा था, उसकी प्राप्ति-सूचना भी आपने नहीं दी. न लेख पर कोई प्रतिक्रिया ही. यदि लेख उपयोगी नहीं था, तो छोड़ सकते थे या लिख देते.....पर चुप्पी का कारण समझ में नहीं आ रहा है. कोई नाराजगी है तो बता सकते हैं, ताकि समाधान हो सके. (प्राप्ति-सूचना और लेख पर प्रतिक्रिया वाला मेरा पत्र उन्हें डाक की गड़बड़ी से मिल नहीं सका था.)
भाभी जी के स्वास्थ्य के विषय में श्योराजसिंह बेचैन ने लिखा था. आशा है, सुधार हुआ होगा. अब ठीक होंगी.
आपकी पुस्तकें कब तक आ रही हैं? प्रतीक्षा है. ‘जनमत’ के ‘वेदना और विद्रोह’ अंक में आपका आलेख पढ़ा. एक सशक्त लेख के लिए बधाई स्वीकारें.
बस, शेष कुशल. सानन्द होंगे.
पत्र शीघ्र दें. इंतज़ार है. शुभकामनाओं सहित,
आपका,
ह० (ओमप्रकाश वाल्मीकि)



पत्र—25


कलालों वाली गली,
देहरादून
दिनांकः 2 जुलाई 1996

प्रिय भाई श्री कँवल भारती जी,

सानन्द होंगे. भाभी जी का स्वास्थ्य कैसा है?
आपकी पुस्तकें कब तक आ रही हैं?
‘बसुधा’ के कहानी विशेषांक में ‘अम्मा’ शीर्षक से मेरी एक कहानी छपी है. आपके अवलोकनार्थ कहानी की फोटो प्रति भेज रहा हूँ. आपकी प्रतिक्रिया जानना चाहूँगा,
‘बसुधा’ रीवा से निकलती है. हरिशंकर परसाई जी इसके संस्थापक, संपादक थे. आजकल कमला प्रसाद जी संपादक हैं. कहानी विशेषांक में चालीस कहानियां हैं, आठ-दस लेख, चर्चा, पत्र आदि हैं. लगभग 500 पृष्ठों का यह विशेषांक कई अर्थों में विशिष्ट है. अतिथि संपादक हैं महेश कटारे.
‘बस्स ! बहुत हो चुका’ (काव्य-संग्रह) की पाण्डुलिपि वाणी प्रकाशन को दी है. उम्मीद है वे इसे जल्दी ही छापेंगे, 1996 में ही.
बस, शेष फिर. पत्र दें.
शुभकामनाओं के सहित,
आपका,
ह० (ओमप्रकाश वाल्मीकि)






शनिवार, 16 अगस्त 2014

ओमप्रकाश वाल्मीकि के पत्र—16

कलालों वाली गली, देहरादून
दिनांकः 13-2-96
प्रिय भाई श्री कँवल भारती जी,
आपका पत्र 6-2-96 मिला. कुछ कहानियां इससे पूर्व आपको भेज दी थीं. मिल गयी होंगी. उस लिफाफे में भय, बिरम की बहू, कुचक्र, सपना, और बैल की खाल थीं. सलाम, कहाँ जाये सतीश, गौहत्या, पच्चीस चौका डेढ़ सौ, भेज रहा हूँ.
कल 12-2-96 के ‘राष्ट्रीय सहारा’ में नैमिशराय जी का आलेख है, दलित अस्मिता और पत्रकारिता पर. देख लें. लेख अच्छा बना है.
25-2-96 को कार्यक्रम प्रेसक्लब, परेड ग्राउंड, देहरादून में तीन बजे से है. संगोष्ठी का विषय है—‘हिंदी क्षेत्रों में दलित चिंतन एवं लेखन की चुनौतियाँ एवं सीमाएँ’.
26-2-96 को भी आपको रुकना है. अस्मिता अध्ययन केंद्र के कार्यकर्ताओं से कुछ चर्चा रख देंगे.
बस, शेष कुशल, सानन्द होंगे.
आपका,
ह० (ओमप्रकाश वाल्मीकि)



ओमप्रकाश वाल्मीकि के पत्र—17

कलालों वाली गली, देहरादून
दिनांकः 2-3-96
प्रिय भाई कँवल भारती जी,
आपके दोनों पत्र मिले. एक, जो आपने शांति यादव जी के हाथ भेजा था, दूसरा पोस्टकार्ड. भाभी जी का स्वास्थ्य कैसा है? लिखें. मैं स्वयं भी आजकल इन्हीं हालात से गुजर रहा हूँ. इसीलिए 21 जनवरी के कवि-सम्मेलन के लिए दिल्ली नहीं जा पाया था, जिसके लिए दिल्ली के साथी मुझसे नाराज हैं. लेकिन मेरी जिम्मेदारियां जितनी सामाजिक हैं, उतनी ही पारिवारिक भी हैं.
इसलिए आपके न आने से मैंने कमी महसूस तो की, लेकिन नाराजगी कुछ नहीं.
कार्यक्रम उत्तेजक रहा. बहस भी जोरदार थी. लेकिन दलित साहित्य के पक्ष में बोलने वाले मात्र हम दो थे और वे पूरे दल-ब-दल थे. मंच भी उनके ही हाथ में था. लेकिन इस बहस को हमने उनके बीच उतार कर एक ऐसा काम कर दिया है कि इसके परिणाम दिखायी देंगे.
दूसरे रोज ‘अस्मिता अध्ययन केंद्र’ का कार्यक्रम था. कुछ अख़बारों की फोटो प्रति भेज रहा हूँ. देख लें.
रामपुर के मलखान सिंह आये थे, जो दलित हैं, लेकिन वामपंथी विचारों से प्रभावित. उनसे भी चर्चा हुई है. उनकी पुस्तक ‘सुनो ब्राह्मण’ का लोकार्पण भी हुआ था. (वे) दलित साहित्य से लगभग अपरिचित हैं. आपका प्रसंग आने पर भी चुप ही रहे. वैसे तो मैंने अपनी ओर से ऐसा बीज उनके विचारों में रोप दिया है कि वे जल्दी ही दलित चेतना की ओर मुड़ेंगे. फिर भी यदि आपसे मिलें, उनसे विमर्श जारी रखें. ‘सुनो ब्राह्मण’ भी वे आपको देंगे.
यहाँ बहस उत्तेजक रही. कार्यक्रम तो सफल था. लेकिन मीडिया ने वही छापा, जो उन्हें छापना है. आप स्वयं ही देख लेंगे. मैंने बहस की रपट तैयार की है, जो मैं श्योराज सिंह बेचैन को भेज रहा हूँ.
कहानियों पर आलेख की प्रतीक्षा है. आपके आलेख (अमर उजाला) की काफी चर्चा है. दोनों कविताओं की तुलना करके दिखाने पर लोगों का ध्यान गया है.
दिनेश मानव की पत्रकारिता से मैं हतप्रभ हूँ. उसका यह हश्र देख कर मन दुखी है. क्या आपसे संवाद नहीं होता? उससे संवाद बनाइए, ताकि वह कुछ सार्थक काम करे. ‘मूकरागनी’ के बाद ‘वाल्मीकि प्रकाश’ आखिर वह करना क्या चाह रहा है? उम्मीद है, इस विषय उससे बात करेंगे और दलित-चेतना के संघर्षशील स्वरूप से उसे अवगत भी करेंगे. वह एक प्रतिभा-संपन्न व्यक्ति है, जो वैचारिकता के अभाव में उलझ गया है.
बस, शेष फिर,
भाभी जी कैसी हैं? शीघ्र लिखें.
आपका,
ह० (ओमप्रकाश वाल्मीकि)
  


ओमप्रकाश वाल्मीकि के पत्र—18

कलालों वाली गली, देहरादून
दिनांकः 9 मार्च, 1996
प्रिय भाई श्री कँवल भारती जी,
आपका पत्र एवं लेख मिले. आभार.
आलेख में आपने मेहनत की है. लगभग सभी कहानियों का विश्लेषण यथार्थपरक है, दलित चेतना के अनुरूप भी आलेख में जो सवाल उठाये गये हैं, उनसे दलित साहित्य को रू-ब-रू होना है. 8-3-96 के ‘अमर उजाला’ में छपा मनोज मिश्र या ऐसा ही कोई नाम (भूल रहा हूँ) का दलित साहित्य के विरोध में लेख देख ही लिया होगा. बिना तर्क के लेखक ने अपनी भड़ास निकाली है. कोई तथ्यपूर्ण तर्क लेखक के पास नहीं है. न ही लेखक ने दलित रचनाएँ पढ़ी हैं. सुनी-सुनायी तर्कहीन, पूर्वाग्रही आक्षेप लगाये हैं. अकेले मिश्र को ही नहीं, सवर्ण लेखकों के उस तबके को भी राजेन्द्र यादव फूटी आँख नहीं सुहाता है, जो प्रगतिशील, जनवादी और वामपंथी हैं.
खैर, आप लेख छपने भेजिए. लेकिन यदि उचित समझें, तो आलेख की भाषा को और अधिक गंभीर और तर्कपूर्ण बनाइये, क्योंकि यह आलेख दलित आलोचना का आधार बनेगा. अत: उत्तरदायित्व बढ़ जाता है. इसे विद्वानजन पढ़ेंगे. आलोचना की भाषा के प्रति दलित-समीक्षकों को सचेत होना पड़ेगा. मैं एक आलेख भेज रहा हूँ, जो ‘आजकल’ (युवा रचनाकार विशेषांक) में छपा था. कहानियों पर ही है. इस आलेख की चर्चा भी हुई है. पढ़ कर देख लें. भाषा पर विशेष ध्यान दें. आशा है, इस साथी की सलाह को अपनेपन के साथ लेंगे, बिना किसी आक्षेप या आग्रह के, क्योंकि दलित साहित्य की इस जद्दोजहद में हमें हर प्रकार के मुकाबले में उतरने की तैयारी करना है. एक-दूसरे के विमर्श के साथ चलना है.
कुछ अख़बारों की फोटोप्रतियाँ भेजी थीं, मिल गयी होंगी.
कल 8-3-96 को 95/-+5/- (डाकखर्च)=100 रु. का M.O. किया था. मिलते ही सूचना दें.
बस, शेष कुशल.
सानन्द होंगे.
आपका.
ह० (ओमप्रकाश वाल्मीकि)
पुनश्च:
कहानियों के इस आलेख के शीर्षक पर भी पुनर्विचार करें—‘दलित अस्मिता और मुक्ति-संघर्ष की कहानियां’ या ऐसा ही कुछ हो तो मेरे विचार से सार्थक होगा.
‘अंगुत्तर’, ‘पूर्वदेवा’ (उज्जैन), ‘प्रज्ञा-साहित्य’ (फरुक्खाबाद), ‘न्याय चक्र’, ‘अमर उजाला’, ‘आम आदमी’ (युद्धरत आम आदमी), ‘दलित टुडे’ आदि को यह आलेख भेज सकते हैं. ‘परिवेश’ को भी एक प्रति भेज दीजिये.



ओमप्रकाश वाल्मीकि के पत्र—19
(पोस्ट कार्ड)

देहरादून
10-3-96
प्रिय भाई श्री कँवल भारती जी,
आपका पत्र दिनांक 4-3-96 मिला. आपका लेख मिल गया है. उस पर प्रतिक्रिया और राय मैंने कल ही डाक में छोड़ी है. इस पत्र से पहले मिल चुका होगा. लेख कुछ विलम्ब से मिला. मलखान सिंह ने रामपुर पहुँच कर अभी कोई पत्र नहीं लिखा है. इंतज़ार है.
विमल थोरात के लेख पर मैंने आपकी प्रतिक्रिया भेजी थी. लेख अच्छा था. लोगों में गजब की सुगबुगाहट पैदा की है उस लेख ने. समीक्षक/साहित्यकारों को ही नहीं, पाठकों को भी प्रभावित किया है आपके विश्लेषणों ने. रघुवीर सहाय की कविता के साथ ‘दीया’ को आमने-सामने रखकर जो तर्क दिया (है), वह लोगों को झनझना देने के लिए काफी (हैं). यह काम आप ही कर सकते थे. बधाई.
समय आने दीजिये, मैं दि. मा. (दिनेश मानव) से बात करूँगा. उम्मीद है, एक और साथी को हम इस कारवां में जोड़ सकेंगे. ‘बैंडिट क्वीन’ वाला लेख पढ़ा था. लेकिन ‘वाल्मीकि’ (फिल्म) वाली टिप्पणी न जाने क्यों कुछ निरर्थक थी. हो सकता है, इस विषय पर हमें दलित-चेतना के विस्तार से अपने आप को जोड़कर देखने (की) जरूरत है. खैर, कभी मिल बैठकर चर्चा होगी. भावाधस के अनेक सदस्यों से चर्चा हुई, लेकिन वे चर्चा से बचते हैं. उनके पास प्रमाणिकता के स्थान पर केवल आस्था है. मैं आस्था को भटकाव मानता हूँ, जो विवेक और बदलाव को रोकती है.
शेष फिर, पत्र दें. सानन्द होंगे. आपकी पत्नी अब ठीक होंगी. उन्हें मेरी ओर से शुभकामनाएं दें.
ह० (ओमप्रकाश वाल्मीकि)


ओमप्रकाश वाल्मीकि के पत्र—20


कलालों वाली गली, देहरादून
दिनांकः 15-3-96
प्रिय भाई श्री कँवल भारती जी,
आपका पत्र दिनांक 9-3-96 तथा कहानियों पर लेख की कार्बन प्रति कल मिले. इससे पूर्व इस लेख की मूल प्रति मिल चुकी थी तथा उस पर मैंने अपनी राय भी लिख दी थी. उम्मीद है, वह पत्र अब तक आपको मिल चुका होगा. कार्बन प्रति वापस भेज रहा हूँ.
मनोज कुमार मिश्र के लेख पर मैंने अपनी प्रतिक्रिया टिप्पणी सहित ‘अमर उजाला’ को भेज दी है. लेकिन ‘अमर उजाला’ मेरे लेख या अन्य सामग्री छापता नहीं नही. इसलिए आप अपनी ओर से सटीक लेख उन्हें भेज दें. ’हिमालय-दर्पण’ भी अन्य अख़बारों से भिन्न नहीं है. वहां त्रिनेत्र जोशी जैसे तथाकथित वामपंथी (?) बैठे हैं, साथ में अवधेश कुमार भी हैं, जो दलित चेतना के घोर विरोधी हैं. ‘परिवेश-सम्मान-समारोह की गोष्ठी में मैंने त्रिनेत्र जोशी के वक्तव्य को ही आधार बनाकर अपने तर्क दिए थे. वे सब यथास्थितिवादी हैं.
मलखान सिंह की प्रतिबद्धता का रुख वामपंथी है. दलित-चेतना के प्रति अभी उनमें हिचकिचाहट है. शायद डर भी, जो उन्हें खुलने नहीं देता. गोष्ठी में भी वे दलित-चेतना के नकारात्मक पहलुओं को ही देख रहे थे. उन्हें इस ओर मोड़ना जरूरी है. इतने लम्बे समय में भी वे इस विचार(धारा) से तटस्थ रहे हैं. बाबा साहेब (डा. आंबेडकर) के प्रति भी उनका नजरिया वामपंथियों जैसा ही है. नि:संदेह (उनकी) कविताओं में तल्ख अनुभव है, लेकिन वर्गीय विषमता की अभिव्यक्ति हावी है, जबकि दलित साहित्य वर्णव्यवस्था पर टूट पड़ना चाहता है. वर्ग-विहीन समाज से ज्यादा उसकी प्राथमिकता वर्ण-विहीन समाज की है. यही प्रमुख अंतर है वामपंथी सोच और दलित-चेतना में.
खैर, आप जब उनसे मिलें, तो अपने अनुभवों से मुझे भी अवगत करें. मैं स्वयं चाहता हूँ, वे दलित-आन्दोलन के वैचारिक विमर्श से जुड़ें.
पत्र दें !
सानन्द होंगे. शुभकामनाएं.
आपका,
ह० (ओमप्रकाश वाल्मीकि)