बुधवार, 9 जुलाई 2014


(पुन्य तिथि के अवसर पर विशेष)
दलित साहित्य का सौन्दर्य-बोध और भिखारी ठाकुर
कॅंवल भारती
हीरा डोम और भिखारी ठाकुर दोनों ही बिहार से थे और दलित वर्ग से आते थे। दोनों ही भोजपुरी के कवि थे और समकालीन भी। 1914 में जब हीरा डोम की कविता अछूत की शिकायत’ ‘सरस्वतीमें छपी थी, तो भिखारी ठाकुर उस समय 27 साल के थे। सरस्वतीमें हीरा डोम की कविता के छपने का अर्थ था कि वह चर्चित कवि थे, क्योंकि सरस्वतीमें वह कविता हीरा डोम के किसी प्रशंसक द्वारा भेजी गयी थी और महावीरप्रसाद द्विवेदी पर उसे छापने का सामाजिक दबाव भी जरूर रहा होगा। इसलिये यह नहीं कहा जा सकता कि भिखारी ठाकुर हीरा डोम को न जानते हों। लेकिन मेरे सामने विचारणीय सवाल यह है कि हीरा डोम की जिस क्रान्तिकारी चेतना ने दलित साहित्य के सौन्दर्यशास्त्र के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी, वैसी कोई भूमिका भिखारी ठाकुर का विपुल लोक साहित्य भी नहीं निभा सका। निस्सन्देह भिखारी ठाकुर कला-साहित्य की एक पूरी संस्था थे। वह कवि, गायक, रंगकर्मी और कलाकार के साथ-साथ नाटककार भी थे। उन्होंने लगभग 29 लोककाव्य-नाटकों की रचना की, जो लोक में प्रतिरोध की महत्वपूर्ण दस्तक हैं। किन्तु जिस परिवर्तनवादी सौन्दर्य-चेतना उनसे अपेक्षा थी, वह उनके लोकनाटकों में अनुपस्थित है। भिखारी ठाकुर ने अपने नाटकों में वर्ण और जाति के सामन्ती ढाॅंचे पर कोई प्रहार नहीं किया है, वरन् वे उन समस्याओं को उठाते हैं, जो पिछड़े समाज में अपनी बेटियों को बेचने, विधवा स्त्रियों की उपेक्षा, नशाखोरी, जुआ, व्यभिचार, जिसे वे कलियुग-प्रेम कहते हैं, वृद्धों की बेकद्री और रोजगार के लिये गरीबों का गाँव से पलायन की समस्यायें थीं। वे कहीं भी वर्णव्यवस्था और जाति की समस्या पर प्रहार नहीं करते, ब्राह्यणवाद पर भी चोट नहीं करते और न सामन्तवादी दमन के खिलाफ आवाज उठाते हैं। यद्यपि, उनके नाटक इस आधार पर अवष्य ही लोक साहित्य में प्रतिरोध की भूमिका निभाते हैं कि पौराणिक नाटकों के उस युग में उन्होंने यथार्थवादी नाटकों का सृजन और मंचन किया, पर वे अपने नाटकों में उन समस्याओं के लिये उत्तरदायी धर्म-व्यवस्था पर कोई सवाल खड़ा नहीं करते हैं, जबकि दलित कवि हीरा डोम की एक मात्र उपलब्ध कविता अछूत की शिकायतन केवल वर्णव्यवस्था, बल्कि ईष्वर की भी पूरी सत्ता को कटघरे में खड़ा कर देती है। क्या कारण है कि शोषित वर्ग से आने वाले इन दोनों कवियों की सौन्दर्य चेतना अलग-अलग है? क्यों भिखारी ठाकुर अपने समय के सामाजिक परिवर्तनवादी आन्दोलन से भी परिचित दिखाई नहीं देते हैं? क्या इसका कारण यह माना जाय कि सामाजिक स्तर पर अस्पृष्यता के जिस अलगाववादी वातावरण में अछूत जातियाॅं रह रही थीं, पिछड़ी जातियाॅं उससे मुक्त थीं? अस्पृष्यता से मुक्ति की आकांक्षा ने ही हीरा डोम समेत उस दौर के सभी अस्पृष्य कवियों को वर्णव्यवस्था का विद्रोही बनाया, और इसीलिये उनका साहित्य समतावादी समाज के निर्माण का घोषणा-पत्र है। लेकिन यह आष्चर्यजनक ही है कि भिखारी ठाकुर अपने समय के दलित नवजागरण के उस आन्दोलन से, जो वर्णव्यवस्था के विरोध में था, कैसे बेखबर रहे, जबकि उसमें पिछड़ा वर्ग भी उतना ही सक्रिय था, जितना कि अस्पृष्य वर्ग था?
बताया जाता है कि भिखारी ठाकुर पर बंगाल के नवजागरण का प्रभाव पड़ा था। भिखारी ठाकुर रचनावलीके सम्पादक नागेन्द्र प्रसाद सिंह अपने सम्पादकीय में लिखते हैं-भिखारी ठाकुर बंगाल के पुनर्जागरण आन्दोलन से प्रभावित होकर जब अपने गाँव कुतुबपुर (सारण) लौटे, तो उन्होंने अपने समाज और उसकी विविध सामाजिक, आर्थिक एवं धार्मिक समस्याओं को बड़ी सूक्ष्मता तथा सम्वेदनशीलता से देखा। पहले से चल रहे किसी आन्दोलन की धारा में सम्मिलित हो विलीन हो जाने के बदले उन्होंने अपनी शैक्षिक क्षमता, जातीय स्थिति और अन्तर्निहित वैयक्तिक विषेषताओं पर चिन्तन किया तथा सकारात्मक ढंग से पुनर्जागरण को लोकनाटक, लोकभजन, गीत, कविता और तमासाके माध्यम से भोजपुरिया समाज में पहुँचाने का निर्णय लिया।लेकिन जब वह आगे लिखते हैं कि उस काल-खण्ड में भोजपुरी क्षेत्र के सामन्तों और जमींदारों ने भी भिखारी ठाकुर को सम्मान, संरक्षण और सहयोग प्रदान किया, तो साफ हो जाता है कि भिखारी ठाकुर का नाट्य-लेखन और रंग-कर्म समाज के मूल ढांचे को नहीं तोड़ रहा था, इसलिये सामन्तवाद-विरोधी नहीं था।
बेहतर होगा यदि हम भिखारी ठाकुर के सौन्दर्य-बोध को उनके नाटकों से ही समझें। उनका एक नाटक है बिरहा-बहार’, जिसमें धोबी-नाचऔर धोबी-कर्म की महिमा गायी गयी है। इस नाटक में भिखारी ठाकुर ने धोबी और धोबिन के मुख से जिस तरह ब्राह्यणवाद और देवी-देवताओं में अन्धविष्वास का प्रचार कराया है, उससे साफ हो जाता है कि वह सामन्तों के लिये कितने जरूरी कवि थे। नाटक आरम्भ होने से पहले सूत्रधार की कुछ पंक्तियों में हलके प्रतिरोध की एक झलक भी हमें मिलती है, पर वे पंक्तियां  भिखारी ठाकुर की नहीं हैं, बिहारी कवि की हैं। वे पंक्तियां  इस प्रकार हैं-
                सिन्धु की कुमारी, देख दीनता हमारी, वर्षा वो धूप, जाड़ा, तीनों सहना पड़ा।

                जोहना पड़ा आनन्दहिं दिमागदार लोगन को, अधम अबुधन को बोल सहना पड़ा।
                कहे बिहारीकवि, लक्ष्मी तुम्हारी हेतु, भारी-भारी चूतियन को चतुर कहना पड़ा।
                                            (भिखारी ठाकुर रचनावली, पृष्ठ 180)
इसके बाद अनेक देवी-देवताओं की आरती करते हुए धोबी और धोबिन नाचते हैं और एक-दूसरे से सम्वाद करते हैं। कुछ सम्वाद यहाँ  द्रष्टव्य हैं-
धोबी-  चलती बहुत बा तोहार मइया डांकनी, कि विद्या से बानी कमजोर।
                कहे भिखारी’  लाजे   मरत  बानीनईया   भइल चहूँ ओर।।
धोबिन- आमी के अम्बिका-भवानी के मनावत बानी, जहाँ  बहे गंगा के धार।
                कहे  भिखारी  दया  करिके देवी, भव-जाल से करहू  हमें  पार।।
धोबी-  साधू   पंडित   के   चरनन   में,    सदा    रहऽ    लवलीन।
                कहे  भिखारी’  तूं सेखी  देखइबूहो  जइबू कउड़ी के तीन।।
धोबिन- चार   वेद   जिनका   मुख  में,   चरनन   में   चारों   धाम।
                कहे   भिखारी’   ब्राह्यण-पद   के,   सुमिरऽ   आठों   जाम।।
                                                (वही, पृष्ठ 180-81)

धोबी और धोबिन के बीच यह सम्वाद लम्बा चलता है। आगे इसी सम्वाद में धोबी- शिव की शरण जाने, धोबिन- उमा उमा और फिर आगे राम राम, सीताराम, राधे रमन और कृष्ण-कृष्ण कहने में ही दानों प्राणी सकल पापों से मुक्ति मानते हैं। यहाँ भिखारी ठाकुर ब्राह्यणवाद में अपनी पूरी आस्था व्यक्त करते हुए ब्राह्यण के चरणों की वन्दना करने में ही चारों वेदों को पढ़ने और चारों धामों की यात्रा करने का पुण्य मानते हैं। ब्राह्यणवाद के प्रति जिस लोककवि का यह सौन्दर्यबोध हो, उसका विरोध ब्राह्यण और सामन्त क्यों करेंगे?
आगे चलकर इसी सम्वाद में वर्णकर्म का समर्थन और धोबी के जातीय पेशे का आध्यात्मीकरण भी मिलता है। धोबिन कहती है-
                जातिक के काम सब केहु छोड़ देतु बाटे, छोड़ऽ दऽ  धोअलाका के नेम।
                सेत छोड़ी के खेती करऽ, बोअऽ, तरकारी, फर हाट में बेचबऽ साग-सेम।।
                                                            (वही, पृष्ठ 182)

इस नाटक का रचना-काल 1924 का है। यह भारत में दलित आन्दोलन के चरम उत्कर्ष का दौर था। स्वतन्त्रता, समानता और स्वाभिमान की इस लड़ाई में अछूत जातियां सभी राज्यों में अपने पारम्परिक गन्दे पेशों का परित्याग कर रहीं थीं। भिखारी ठाकुर ने इसी के विरोध में इस नाटक की रचना की थी। धोबिन कहती है, सब लोग जाति के पेशे छोड़ रहे हैं। क्या हम भी अपने धोबन का काम छोड़ दें? परम्परा छोड़कर खेती करें और तरकारी बोकर हाट में जाकर बेचें? धोबी जवाब देता है- कोइरी (सब्जी उगाने वाली जाति)  साग को धोता है, तमोली पान को धोता है और पुरोहित कथा का ज्ञान बांच कर जजमान के मन को धोता है। यथा-
कोइरी   धोअत  साग  केधोवत  तमोली   पान।
                जजमानिका के पुरोहित धोवत, कर्मकाण्ड कथी ज्ञान।।
                                                    (वही)
धोबी के इन शब्दों से भिखारी ठाकुर सन्देश दे रहे थे कि धोबी का पेशा गन्दा नहीं है, क्योंकि सभी लोग धोने का काम करते हैं। अछूत जातियों को हिन्दू गांवों में सिर पर साफा, हाथ में घड़ी और नया कपड़ा पहनने की इजाजत नहीं थी। वे घुटनों से नीचे चुन्नट वाली धोती भी नहीं पहन सकते थे। इसका उल्लंघन अपराध माना जाता था। इस पर भिखारी ठाकुर एक हल्का सा विरोध धोबी से कराते हैं। वह कहता है-
                मथवा में बवडि़या जोडि़या, हथवा बान्हल घडि़या,
                अगवा लटकल बाटे धोतिया के चून।
                हमहू पहिरबऽ नया कपड़ा, देख लीह बिहान से।
                कहे भिखारीनेह लगाव, सीताराम भगवान से।।
                                              (वही)
धोबी धोबिन से कह रहा है कि देख लेना, वह कल से हाथ में घड़ी भी बांधेगा, नया कपड़ा भी पहनेगा और घुटनों के नीचे चुन्नट वाली धोती भी। अवष्य ही अछूत जातियां स्वाभिमान के साथ जीने का साहस कर रहीं थीं, पर भिखारी ठाकुर यहाँ धोबी को सीताराम भगवान से नेह लगाने की भी सीख दे रहे हैं, जिसका अर्थ है, ब्राह्यणों और सामन्तों के प्रति भक्ति-भाव बनाये रखना, अर्थात् उनकी व्यवस्था को बनाये रखना। भिखारी ठाकुर की यह सामन्तवादी सौन्दर्य-चेतना समकालीन दलित आन्दोलन के लिये कितनी घातक थी?

भिखारी ठाकुर का एक नाटक है गंगा-स्नान’, जिसमें वह उस हिन्दू स्त्री के आदर्श को प्रतिष्ठित करते हैं, जिसके लिये पति-सेवा ही स्त्री-धर्म है। इस नाटक का रचना-काल 1934 का है। इस नाटक में, नागेन्द्र प्रसाद सिंह के अनुसार, 1934 में आयी गंगा की बाढ़ का संकेत मिलता है। (वही, पृष्ठ 132)  नाटक के आरम्भ में ही एक सखी दूसरी सखी से कहती है-
                हम ना जाइब गंगा का तीर।  घर हीं बाड़न श्री रघुबीर।।
                पतिब्रत छाडि़ धर्म नहीं दूजा। करब न और देव के पूजा।।
                                            (वही, पृष्ठ 133)
जिस तरह तुलसीदास ने कलियुग को अधर्म का युग कहा है और जिस तरह सारे हिन्दू धर्मगुरु भ्रष्टयुग के रूप में कलियुग की निन्दा करते हैं, उसी तरह के विचार भिखारी ठाकुर के भी थे। वे भी कलियुग को अधर्म का युग मानते थे, जिसमें सारी नैतिक मर्यादायें टूट जाती हैं, लोग शराबी, व्यभिचारी, हर तरह का पाप करने वाले, नास्तिक और अधर्मी हो जाते हैं, इत्यादि। इसी कलियुग-प्रेम पर उन्होंने एक नाटक लिखा था, जिसका शीर्षक है-पियवा निसइल’, यानी शराबी पति। शराबी भी ऐसा-वैसा नहींबल्कि चैबीसो घण्टे नशे में रहने वाला। नशे के लिये वह अपना सब-कुछ बेच देता है, खेत-जमीन, घर का सामान, यहाँ तक कि घर की चैखट-किबाड़ भी उखाड़ कर बेच देता है। पत्नी और दोनों बच्चे इतने दुखी हैं कि उन्हें दो वक्त की रोटी तक मयस्सर नहीं हो रही है। इसी बीच बड़ा बेटा भाग कर कलकत्ता चला जाता है। लेकिन इसी दरम्यान शराबी पति दूसरी औरत को रखैल बनाकर घर में ले आता है। उसकी पत्नी और भी दुखी होती है। पर सब्र करती है और उस औरत को भी रहने देती है। वह उस दूसरी औरत से विनती करती है कि वह उसके पति को नशा छोड़ने के लिये मनाये, पर वह औरत उल्टे उसी को बुरा-भला कह कर धमकाने लगती है। यह नाटक दलित स्त्री को मनु के कानून के तहत पति के चरणों में ही रहने की शिक्षा देता है, भले ही उसका पति कितना ही पतित और अत्याचारी क्यों न हो।
(पूरा लेख मेरी पुस्तक लोक में प्रतिरोधमें मौजूद है, जो प्रकाशनाधीन है)  





मंगलवार, 8 जुलाई 2014

भगवान दास जी का निधन एक बड़ी क्षति है.---कवंल भारतीरामपुर.
                                                   
 भगवान दास जी दलित साहित्‍य के सबसे बडे लेखक थे, पर भारत की मीडिया ने जिस तरह उनकी उपेक्षा की, उससे साबित होता है कि हमारा प्रचार तंत्र अपनी जातिवादी मानसिकता से अभी मुक्‍त नहीं हो सकता है। आज तीन दिन बाद भी किसी अखबार और समाचार चैनल ने उनकी मृत्‍यु का समाचार नहीं दिया।
      मैं भगवान दास जी के सम्‍पर्क में लेखक के रूप में स्‍थापित हो जाने के बाद ही आया था। पर, उनके साहित्‍य के सम्‍पर्क में 1970 के आस-पास अपने छात्र जीवन में ही आ गया था। उन दिनों हमारे शहर में आंबेडकर मिशन की नयी-नयी शुरूआत हुई थी। उससे पहले हमारे शहर में कोई जानता भी नहीं था कि कौन आंबेडकर और कैसी जय भीम। जो लोग इस मिशन का काम कर रहे थे, वे चन्द्रिका प्रसाद जिज्ञासु की पुस्‍तक बाबासाहेब का जीवन-संघर्ष और नकोदर रोड, जालंधर से निकलने वाली लाहौरी राम बाली कीभीम पत्रिका का वितरण करते थे। भीम पत्रिका में ही मैंने पहली दफा भगवान दास जी का नाम देखा और उनके लेख पढे। यह काफी बाद में पता चला कि भीम पत्रिका निकालने की प्रेरणा बाली साहब को भगवान दास जी से ही मिली थी और उसकी शुरूआत उर्दू में हुई थी। उर्दू अंकों की एक फाइल मैंने दारापुरी जी के यहॉं देखी थी। यह भी उन्‍हीं से पता चला कि जिस मैं भंगी हूँ पुस्‍तक से भगवान दास जी विख्‍यात हुए उसका धारावाहिक प्रकाशन उर्दू भीम पत्रिका में ही हुआ था।
      1973 में,नयी दिल्‍ली के रामलीला मैदान में एक विशाल ऐतिहासिक दीक्षा समारोह हुआ था, जिसमें तिब्‍बत के दलाईलामा के द्वारा भारत के दलितों को बौद्ध धर्म की दीक्षा दी गयी थी। मैंने भी उस दीक्षा-समारोह में भाग लिया था। वहां किताबों के स्‍टाल भी लगे थे, जहां से मैंने भगवान दास जी की एक पुस्‍तक दस स्‍पोक आंबेडकर खरीदी थी, जो उस श्रृंखला का पहला वाल्‍यूम था। वह क्राउन आकार में था और उसके कवर का रंग लाल था। वह पुस्‍तक 1984 तक मेरे पास रही। उस वर्ष मैं लालगंज अझारा,प्रतापगढ में तैनात था, जहॉं मेरे साथ एक ऐसा हादसा हुआ  कि मुझे अपनी बहुत सारी पुस्‍तकों और अन्‍य सामान को वहीं छोडकर आना पडा। उन्‍हीं में भगवान दास जी वह पुस्‍तक भी छूट गयी थी।
      मेरी कमजोरी है कि मैं डायरी नहीं लिखता। इसलिये किससे कब भेंट हुई, इसकी कोई प्रामणिक जानकारी मेरे पास नहीं रहती। भगवान दास जी से पहली दफा सम्‍भवत: दिल्‍ली में उनके निवास पर ही मैं मिला था।कानपुर के जिस कार्यक्रम में भगवान दास जी और मैं साथ-साथ थे, उसे के.नाथ ने आयोजित किया था। उसकी तारीख मैंने के.नाथ से पता की। वह दलित साहित्‍यकार सम्‍मेलन था, जो 10 नवम्‍बर,1999 को आयोजित हुआ था। कानपुर में मैं और भगवान दास जी जैंडिस क्‍लब में एक ही कमरे मे ठहराये गये थे। वहॉं उनके साथ कुछ समय गुजारना मेरे लिये गौरव की बात थी। दलित साहित्‍य और राजनीति के बहुत से मुद्दों पर मुझे उनसे बातचीत करने का मौका मिला था। हमारी बातचीत का मुख्‍य विषय भारत में समाजवाद की जरूरत से शुरू हुआ था और कांशीराम-मायावती की राजनीति पर खत्‍म हुआ था।
      मेरी और भगवान दास जी की खानपान की रूचियॉं कुछ अलग थी, यह मैं जानता था। इसलिये, रात का भोजन लेने से पहले का कार्यक्रम उनके सामने नहीं किया जा सकता था। अत: मैं अभी आया कहकर भगवान दास जी को कमरे में छोड,नीचे उतरा और बार में जाकर बैठ गया। बार क्‍लब के सदस्‍यों के लिये था, पर मुझसे बैरे ने कुछ नहीं पूछा और जो मैंने मॉंगा, उसने सर्व कर दिया। बार से निपटकर मैं ऊपर गया।भगवान दास जी से खाने पर चलने के लिये कहा। खाने की व्‍यवस्‍था भी नीचे थी, यह मैं देख आया था। हम दोनों डायनिंग रूम में गये। मैं दाल, सब्‍जी और रोटी का आर्डर देने ही वाला था कि भगवान दास जी बोले, मैं सिर्फ चावल लूँगा, रोटी नहीं। उन्‍हांने बताया, जब से पेसमेकर लगा है, मैं चावल ही लेता हूँ। मुझे उस दिन पता चला कि वे हार्ट के वे मरीज थे और उनकी बाईपास सर्जरी हुई थी। वे सचमुच बहुत साहसी और जीवट के व्‍यक्ति थे, जो इस बीमारी में भी यात्रा कर रहे थे और काम कर रहे थे।
      कानपुर मं एक दिन के साथ ने मुझे भगवान दास जी को ठीक-ठाक समझने का अवसर दिया था इससे पहले उनकी जो छवि मेरे दिमाग में थी, वह एक ऐसे लेखक की थी, जो भारत में कम और विदेश में ज्‍यादा रहता है, जो एकला चलने में विश्‍वास करता है और विदेशों से ढेर सारा रूपया लाकर ठाठ से रहता है। उन्‍होंने किसी को अपने साये में आगे नहीं बढने दिया और किसी दलित को अपनी किसी योजना में शामिल नहीं किया। उस मुलाकात ने इस छवि को तोड दिया था। वे एकला चलते थे, इसमें तो सच्‍चाई थी, पर वे काफी सहज,सरल और विनम्र ह्रदय इन्‍सान थे और मार्ग-दर्शन करने में हमेशा तैयार रहते थे। अपने लेखन के दौरान कई दफा ऐसा हुआ कि मैं डा. आंबेडकर के संबंध में कुछ चीजों को लेकर कन्‍फ्यूज हो जाता था, तो समाधान के लिये मैं भगवान दास जी को ही फोन करता था, उन्‍होंने हमेशा मेरे भ्रम का निवारण किया और पूरी प्रामाणिकता के साथ मुझे सही जानकारी दी।  कभी भी यह महसूस नहीं किया कि वे मुझसे डिस्‍टर्ब हुए हैं या उन्‍हांने मुझे टालने की कोशिश की है। मैंने अपनी सन्‍त रैदास-एक विश्‍लेषणपुस्‍तक उन्‍हीं को समर्पित की थी। मैंने लिखा था-दलित साहित्‍य के इतिहास-पुरूष श्री भगवान दास को समर्पित। जब यह पुस्‍तक उन्‍हें मिली तो उनका ध्‍यान समर्पण पर नहीं गया और इधर-उधर से पुस्‍तक को देखकर उसे रख दिया। काफी दिनों बाद जब उनकी निगाह अचानक समर्पण पर गयी, तो उन्‍होंने मुझे फोन किया और धन्‍यवाद दिया।
      तीसरी भेंट भगवान दास जी से मैंने अपने शहर में ही की, जहॉं वे मेरे निमन्‍त्रण पर हमारे एक कार्यक्रम में आये थे। जब वे रामपुर आये, तो कार्यक्रम के बाद वाल्‍मीकि धर्म समाज के कुछ युवकों ने महर्षि वाल्‍मीकि को लेकर उनके विचारों का विरोध किया अैर उनसे बहस करनी चाही।पर, जब भगवान दास जी ने उन युवकों से बातचीत की, तो युवकों के पास उनके किसी सवाल का जवाब नहीं था।
      भगवान दास जी का जन्‍म 27 अप्रैल,1927 को जतोग कैंट शिमला में हुआ था। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा शिमला में ही हुई थी, और उच्‍च शिक्षा पंजाब और दिल्‍ली में। उन्‍हांने1968 में आंबेडकर मिशन सोसाइटी की स्‍थापना की थी, जिसकी शाखाऍं भारत के बाहर कनाडा, जर्मनी और इंग्‍लैण्‍ड में भी कायम हुई। कहा जाता है कि जब वे और एल.आर.वाली जिस देश में जाते थे, वहॉं आंबेडकर मिशन की शाखा खोलकर आते थे। वे दलित सालिडेरिटी पीपुल्‍स के संस्‍थापकों में थे। यह संस्‍था भारत, पाकिस्‍तान, बंगलादेश, नेपाल, जापान,श्रीलंका, मलेशिया और ऐशिया के अन्‍य देशोंमें विभिन्‍न धर्मों को मानने वाले अछूतों को जोडने के लिये बनायी गयी थी। यह उनकी विद्वता का ही प्रभाव था कि वे 1981में एशियन सेन्‍टर फार हयूमन राइट्स के निदेशक चुने गये थे। वे 1957 में भारतीय बौद्ध महासभा, 1964 में बौद्ध उपासक संघ और 1978 में समता सैनिक दल से जुडे थे। उन्‍हांने 1991 तक समता सैनिक दल के पुनरूत्‍थान के लिये काम किया। उन्‍होंने अपनी पुस्‍तक डॉ. बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर एक परिचय,एक सन्‍देश समता सैनिक दल के कार्यकर्ताओं को बाबासाहेब के जीवन, और विचारों से परिचित कराने के लिये ही लिखी थी, जिसे समता सैनिक दल,नयी दिल्‍ली ने 1981 में प्रकाशित किया था।
      1981 में ही उनकी बहुचर्चित पुस्‍तक ‘’मैं भंगी हूँ’’ भीम पत्रिका कार्यालय,जालंधर से प्रकाशित हो गयी थी, जो अब दलित साहित्‍य में एक कालजयी कृति बन चुकी है। यह एक धारावाहिक लेख माला थी, जो भीम पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। यह पत्रिका आरम्‍भ में उर्दू में ही छपती थी, हिंदी में उसका प्रकाशन बाद में हुआ था। बाद में, भगवान दास जी के सम्‍पादन में इसके कुछ अंक दिल्‍ली से अंग्रेजी में भी छपे थे। जिस समय भगवान दास जी ने मैं भंगी हूँ लिखना शुरू की थी, मेहतर समाज पर कोई भी पुस्‍तक उपलब्‍ध नहीं थी। हालांकि रिचर्ड ग्रीव द्वारा दि चूहडा और एफ.फनिन्‍जार द्वारा दि भंगीज पुस्‍तकें लिखी जा चुकी थीं, परंतु वे उपलब्‍ध नहीं थीं। अत:एक तरह से भगवान दास की पुस्‍तक ही भंगी जाति पर हिन्‍दी में पहला काम था। यह भंगी जाति का सांस्‍कृतिक इतिहास था, जो उन्‍होंने लिखा था। हिन्‍दी में जब दलित लेखकों ने अपनी आत्‍मकथाऍं लिखना आरम्‍भ किया और आत्‍मकथा इतिहास की खोज का सिलसिला चला, तो मैं भंगी हूँ को पहली आत्‍मकथा का दर्जा मिल गया। बहुत से लोगों ने इसे भगवान दास जी की आत्‍मकथा समझ लिया, जबकि यह एक अछूत जाति की आत्‍मकथा है। पहली बार भगवान दास ने ही इस पुस्‍तक में भंगी समुदाय को वाल्‍मीकि नाम दिये जाने का खण्‍डन किया है।
      इसी विषय पर उनकी दूसरी महत्‍वपूर्ण पुस्‍तक बाबासाहेब भीमराव आंबडकर और भंगी जातियॉं है। बहुधा कुछ लोगों  द्वारा यह प्रचार किया जाता है कि बाबासाहेब ने जो कुछ किया वह या तो महारों के लिये किया या चमारों के लिये, मेहतर समुदाय के लिये उन्‍होंने कुछ नहीं किया था। भगवान दास जी ने इसी आरोप के खण्‍डन में इस पुस्‍तक को लिखा था। यह सचमुच पहली पुस्‍तक है, जिसमें उन्‍होंने स्‍पष्‍ट किया है कि किस तरह मेहतर समुदाय को डॉ. आंबेडकर के आन्‍दोलन से दूर रखने के मकसद से वाल्‍मीकिबनाया गया। यह पुस्‍तक बाबासाहेब और वाल्‍मीकि समुदाय कें संबंध में दुर्लभ सामग्री का स्‍त्रोंत ग्रन्‍थ है।
      भगवान दास जी मूलत:उर्दू और अंग्रेजी के लेखक थे। हिन्‍दी उन्‍हें ज्‍यादा नहीं आती थी। पर, हिन्‍दी के व्‍यापक क्षेत्र को देखते हुए ही उन्‍होंने हिन्‍दी में लेखन किया था। अंग्रेजी में उनका सबसे महत्‍वपूर्ण काम है- दस स्‍पोक आंबेडकर जो पॉंच खण्‍डों में है। डॉ. आंबेडकर की मूल रचनाओं के संकलन और सम्‍पादन का यह काम उन्‍होंने उस समय किया था, जब आज की तरह उनकी रचनाऍं आसानी से उपलब्‍ध नहीं थीं।
      भगवान दास जी ने जिस दौर में लेखन शुरू किया, वह मुख्‍यधारा के साहित्‍य से दलित साहित्‍य के संघर्ष का दौर था। यह वह दौर भी, था, जिसमें तथाकथित प्रगतिशील और धर्मवादी लेखक डॉ. आंबेडकर की वैचारिकी को मार्क्‍सवाद-विरोधी बताकर दलित पाठकों को भ्रमित कर रहे थे। दलित लेखकों की ओर से भी इसका ठीक-ठीक प्रतिरोध नहीं हो पा रहा था, ऐसे समय में भगवान दास जी ही थे, जिन्‍होंने मार्क्‍सवाद,समाजवाद और मजदूर वर्ग के विषय में डॉ. आंबेडकर को सही परिप्रेक्ष्‍य में प्रस्‍तुत किया और दलित चिन्‍तन समाजवाद को किस अर्थ मे लेता है, इस पर प्रकाश डाला। इस दृष्टि से उनकी बाबासाहब भीमराव आंबेडकर एक परिचय, एक सन्‍देश पहली पुस्‍तक है, जिसमें वे यह बताते है कि  डॉ. आंबेडकर मार्क्‍स के विरोधी नहीं थे, बल्कि उसके समर्थक थे और उसके दर्शन को वे भारत के करोडों दलितों और गरीबों की मुक्ति का दर्शन मानते थे।
      भगवान दास जी का बहुत-सा साहित्‍य अप्रकाशित है। किसी समय उनकी कहानियॉं सरिता में छपा करती थीं। उन्‍होंने विश्‍व के लगभग एक दर्जन विश्‍वविद्यालयों, विश्‍वधर्म सभाओं और संगठनों में महत्‍वपूर्ण व्‍याख्‍यान दिये थे। ये सारे व्‍याख्‍यान और पेपर ही पॉंच सौ से ज्‍यादा हो सकते हैं। कुछ साल पहले उन्‍हांने वाल्‍मीकि पर एक बडी पुस्‍तक लिखने की योजना बनायी थी, जिसमें वे पाकिस्‍तान से एकत्र किये गये कुर्सीना मे भी संकलित करनेवाले थे। कह नहीं सकते कि इस योजना पर वे कितना काम कर गये थे? पर,मुझे लगता है कि स्‍वास्‍थ्‍य उनका साथ नहीं दे रहा था और वह उसे पूरा नहीं कर पाये थे। अब तो इस पुस्‍तक की पूरी रूपरेखा भी उनके साथ ही चली गयी।आज यदि उनकी कहानियों, अप्रकाशित लेखों और व्‍याख्‍यानों का ही संकलन कर दिया जाय, तो दलित साहित्‍य में यह एक बडा काम होगा। उनका जाना सचमुच एक आघात है। वे दलित साहित्‍य में बुनियाद के पत्‍थर थे। दलित साहित्‍य उनका हमेशा ऋणी रहेगा।

सोमवार, 2 जून 2014


हिन्दू-मुसलमान में विभाजित राजनीति

(कॅंवल भारती)

 

 

लोकसभा के चुनावों में जिस तरह साम्प्रदायिकता की चेतना उभर कर आयी है, उससे पक्का लग रहा है कि भारतीय राजनीति में हिन्दू-मुसनमान के दो स्पष्ट ध्रुव बन चुके हैं। स्थिति यह भी लग रही है कि आगामी विधानसभा के चुनावों में भी यही साम्प्रदायिक चेतना हावी रहेगी,  क्योंकि अनुच्छेद 370, कामन सिविल कोड और राम-मन्दिर के उठाये जा रहे विवाद यही माहौल बनाने जा रहे हैं। इसका अर्थ है कि रोजी-रोटी के सवाल पीछे छूटने वाले हैं और हिन्दू-मुस्लिम अस्मिताओं के संघर्ष अहम सवाल बनने वाले हैं। राष्ट्रवाद की इस राजनीति में अस्मिता और सुरक्षा के काल्पनिक अस्त्र एक ओर मुसलमानों को लामबन्द करेंगे, तो दूसरी ओर हिन्दुओं को। ऐसी स्थिति में मुस्लिम-दलित जातियां तो मुसलमानों के साथ रहेंगी ही, पर जो दलित जातियां हिन्दू फोल्ड में हैं, उनका हिन्दुत्व के साथ ध्रुवीकृत होना तय है। यह इस लिहाज से चिन्ताजनक है कि ये दोनों ध्रुव दक्षिणपंथी ही होंगे। अतः राष्ट्रवाद के इस राजनीतिक परिवेश में क्या वाम और दलित वैचारिकी कुछ बदलाव ला सकेगी? जवाब मैं नहीं दे सकता,  पर उनके लिये यह एक गौरतलब सवाल जरूर है। 

मुझसे कुछ मित्र सवाल करते हैं कि मैं राष्ट्रवाद के खिलाफ क्यों हूँ? ये लोग इस तरह का सवाल इसलिये करते हैं, क्योंकि वे राष्ट्रवाद को देशवाद के अर्थ में समझने की गलती करते हैं। मैं डा. आंबेडकर के हवाले से बताना चाहता हूँ कि राष्ट्रीयता एक सामुदायिक अनुभूति है। यह एक समानकौम होने की सामूहिक चेतना भी है। यह चेतना जिनमें होती है, वे सभी एक दूसरे से जुड़े अनुभव करते हैं। पर वह एक दुधारी अनुभूति भी है, जो एक ओर अपने सगे-सम्बन्धियों से भ्रातृत्व की भावना से जोड़ती है, तो दूसरी ओर उन लोगों के प्रति शत्रुता की भावना रखती है, जो उनके सगे-सम्बन्धी नहीं हैं। यह एक ऐसी सामुदायिक चेतना की है, जो लोगों को इतनी मजबूती से बाँधती है कि वे आर्थिक संघर्षों और सामाजिक मतभेदों को भी भुला देते हैं, जबकि वे दूसरे समुदायों के लोगों से अपने सम्बन्ध विच्छेद कर लेते हैं। यही राष्ट्रीयता है और यही राष्ट्रवाद का सारतत्व है। हिन्दूवादी लोग इसी राष्ट्रवाद को भारतीय राष्ट्र से जोड़ते हैं। जबकि भारतीय राष्ट्र जैसी कोई चीज नहीं है। इस राष्ट्र में हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, सिख सभी एक-दूसरे के विरुद्ध दूसरेसमुदाय हैं,  जिनकी अपनी-अपनी राष्ट्रीयताएँ हैं। वे हरेक के राष्ट्र में शत्रु वर्गमें आते हैं। राष्ट्र से एक पहचान उभरती है, जैसे हिन्दू राष्ट्र में हिन्दू की, और मुस्लिम राष्ट्र में मुसलमान होने की। लेकिन क्या भारतीय या हिन्दुस्तानी होने की कोई पहचान उभर पायी? यदि ऐसी कोई पहचान उभरती तो बाल ठाकरे हिन्दी भाषियों पर कहर क्यों ढाते? इसलिये न तो भाषा, न धर्म, न जाति राष्ट्र का निर्माण करते हैं, बल्कि यदि कोई चीज है, जो भारतीयों को राष्ट्र बना सकती है, तो वह भारतीयता की भावना है। इसके सिवा अन्य कोई भी भावना उन्हें राष्ट्र नहीं बना सकती।

पर मुझे नहीं लगता कि इस बात को वे लोग समझेंगे,  जिन्होंने राजनीति के दो ध्रुव बना दिये हैं। क्या लोकतन्त्र में आस्था रखने वाले लोग इस साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के खिलाफ जागरण-अभियान चलायेंगे?

(2 जून 2014)

 

 

शनिवार, 17 मई 2014

सपा, बसपा और हमारी भूमिका
(कॅंवल भारती)
                उत्तर प्रदेश में लोकसभा-2014 के चुनाव-परिणाम इसलिये नहीं चैंकाते हैं कि भाजपा की इतनी बड़ी जीत अप्रत्याशित थी, बल्कि इसलिये चैंकाते हैं कि इसने बसपा का सूपड़ा साफ कर दिया है और सपा को पाॅंच सीटों पर समेट दिया है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में सपा-बसपा की इस शर्मनाक पराजय के दूरगामी अर्थ हैं। कुछ चिन्तकों का कहना है कि मोदी की लहर ने जाति और धर्म की राजनीति को खत्म का दिया है। किन्तु यदि ऐसा सचमुच होता, तो भाजपा को इतनी बड़ी जीत कभी हासिल नहीं हो सकती थी। जाति-धर्म से मुक्त राजनीति की जीत तब तो मानी जा सकती थी, जब यदि आम आदमी पार्टी को यह सफलता हासिल हुई होती। पर भाजपा की इस जीत का अर्थ ही यह है कि जनता ने जाति और धर्म के नाम पर भाजपा के पक्ष में मतदान किया है। क्या यह इस बात का संकेत नहीं है कि संघ परिवार और मोदी की टीम ने मिलकर उत्तर प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मणवाद का पुनरुद्धार किया है? किन्तु इस पुनरुद्धार के लिये अगर कोई जिम्मेदार है, तो वह है सपा-बसपा का नेतृत्व, जिसके पास भाजपा से लड़ने के लिये कोई कारगर राजनीतिक हथियार नहीं था। मुलायमसिंह यादव ने मोदी को मुस्लिम-विरोधी बताकर राजनीति की, तो मायावती ने उन्हें दलित-विरोधी बताकर, और इसी राजनीति ने हिन्दू मतदाताओं को भाजपा के पक्ष में ध्रुवीकृत करने का काम किया। सवाल यह नहीं है कि भाजपा और मोदी मुस्लिम-दलित-विरोधी नहीं हैं, सचमुच वे हैं। पर बात सिर्फ इतनी भर नहीं है। यह बहुत ही छोटा नजरिया है, उन्हें देखने का। भाजपा, मोदी और संघपरिवार को इससे बड़े नजरिये से देखा जाना चाहिए था। यह नजरिया सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का होना चाहिए था, जो एक फासीवादी अवधारणा है। दलित और मुस्लिम-विरोध तो इस राष्ट्रवाद का छोटा-सा हिस्सा भर है। यदि इस नजरिये से मायावती और मुलायम सिंह ने भाजपा, मोदी और संघपरिवार के विरुद्ध जनता में एक वैचारिकी विकसित की होती, तो शायद भाजपा के लिये दिल्ली अभी आसान नहीं होती। लेकिन यह काम वे इसलिये नहीं कर सके, क्योंकि इसके लिये जिस पढ़ाई-लिखाई की जरूरत है, वह न सपा-मुखिया मुलायमसिंह यादव के पास है और न बसपा-सुप्रीमों मायावती के पास है। दोंनों पार्टियों के नेता जब रैलियों और अन्य मंचों पर बोलते हैं, तो वे कहीं से भी पढ़े-लिखे नजर नहीं आते। वैचारिकी तो एकदम सपा नेताओं के पास नहीं है। वे सिर्फ नाम के समाजवादी हैं, उसकी ए, बी, सी तो दूर, ‘भी ठीक से नहीं जानते हैैं। उन्हें सुनकर लगता ही नहीं कि वे समाज और राजनीति में कोई बदलाव चाहते हैं। जिस निर्भया के बहाने बलात्कार के विरुद्ध कड़े कानून बनाने के लिये देश-व्यापी जनान्दोलन हुआ, वहाॅं मुलायमसिंह यादव अपनी चुनावी रैलियों में यह कह रहे थे कि बच्चे हैं, गलती हो जाती है, तो क्या उन्हें फाॅंसी दे दी जाय?’ पूरे देश की महिलाओं ने मुलायमसिंह के इस बेहूदे और शर्मनाक बयान को स्त्री-विरोधी बयान के रूप में लिया और उन्हें एक सम्वेदनहीन अयोग्य शासक के रूप में देखा। इसी तरह जब सपा नेता आजम खाॅं ने कारगिल की जीत को मुस्लिम सैनिकों की जीत कहकर इस इरादे से अपनी पीठ ठोकी कि मुसलमान  खुश होकर उन्हें अपने कन्धों पर बैठा लेंगे, तो वहाॅं उनकी तालीमी जहालतही ज्यादा नजर आ रही थी, जो यह नहीं समझ सकती थी कि उन्होंने अपनी समाजवादी राजनीति की ही कब्र नहीं खोद दी है, बल्कि मुसलमानों को भी मुख्यधारा से दूर कर दिया है। यह इसी का परिणाम हुआ कि न सिर्फ मुसलमानों में इसकी अच्छी प्रतिक्रिया नहीं हुई, बल्कि सपा-समर्थक हिन्दू मतदाता भी सपा के खिलाफ ध्रुवीकृत हो गये। इतना ही नहीं, प्रदेश की जनता यह भी देख रही थी कि सपा-बसपा के नेता संसद में काॅंग्रेस की जन-विरोधी नीतियों में काॅंगे्रस का खुलकर समर्थन कर रहे थे और संसद के बाहर काॅंगे्रस का विरोध करके जनता की आॅंखों में धूल झोंक रहे थे। वे उस काॅंगे्रस सरकार के संकट-मोचक बने हुए थे, जिसने आम आदमी को जीने-लायक हालात में भी नहीं छोड़ा था। इन सपा-बसपा नेताओं की आॅंखों पर अज्ञानता की इतनी मोटी पट्टी चढ़ी हुई है कि उन्हें यह तक दिखाई नहीं दे रहा है कि कम्प्यूटर युग की जनता न सिर्फ सब जानती है, बल्कि उनके खेल को समझती भी है। इस जनता ने यह जान लिया था कि सपा-बसपा के ये मुखिया केन्द्र में अपनी राजनीतिक शक्ति का इस्तेमाल सिर्फ अपने निजी हित में सौदेबाजी करने के लिये करते हैं। 
                वे लोकतन्त्र की दुहाई जरूर देते हैं, पर खुद फासीवादी चरित्र से मुक्त नहीं हैं। यही कारण है कि वे भाजपा और संघपरिवार के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को समझने का वैचारिक स्तर नहीं रखते। याद कीजिए, नोएडा में एक मस्जिद का अवैध निर्माण गिराने के आरोप में सपा-सरकार ने एक आईएएस अधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल को निलम्बित कर दिया था, पर जब वही गलत काम आजम खाॅं ने रमजान के महीने में मदरसा गिराकर रामपुर में किया, तो फेसबुक पर उसका विरोध करने पर उसी सरकार ने मुझे गिरफ्तार करा लिया। इस घटना के विरोध में देश-व्यापी प्रदर्शनों के बावजूद सरकार ने मेरे विरुद्ध दायर मुकदमा वापिस नहीं लिया। क्या यह सपा का फासीवादी चरित्र नहीं है? यही नहीं, जब मायावती ने भी इस सम्बन्ध में मौन रहकर सपा सरकार का समर्थन किया और लोकतन्त्र का गला घोंटने वाली सपा सरकार की तानाशाही के खिलाफ कोई आवाज नहीं उठायी, तो उत्तर प्रदेश की जागरूक जनता ने यह समझने में जरा जरा भी देर नहीं लगायी कि मायावती भी सांस्कृतिक फासीवाद को ही पसन्द करती हंै और लोकतन्त्र में अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का सवाल उनके लिये बिल्कुल भी महत्वपूर्ण नहीं है।
                बहुत से दलित विचारक और राजनीतिक विश्लेषक 2007 में बसपा की पूर्ण बहुमत की सरकार के लिये मायावती की सोशल इंजीनियरिंग को श्रेय देते हैं। पर मैंने उस समय भी इसका खण्डन करते हुए लिखा था कि यह सोशल इंजीनियरिंग नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक लम्बे समय से हाशिए पर बैठे ब्राह्मणों ने सत्ता में आने के लिये मायावती का साथ पकड़ा था, क्योंकि यह वह समय था, जब उनकी प्रिय पार्टियों--काॅंगे्रस और भाजपा--का पतन हो चुका था और सपा को वे पसन्द नहीं करते थे। इस तरह मायावती उनके डूबते जहाज के लिये तिनके का सहारा भर थीं। अतः, कहना न होगा कि ब्राह्मण स्वार्थवश बसपा से जुड़ा थे, न कि दलितों के प्रति उनका हृदय-परिवर्तन हुआ था। इसलिये जैसे ही मोदी ने भाजपा का रास्ता साफ किया, ब्राह्मणों ने अपनी घर-वापसी करने में तनिक भी देर नहीं लगायी। अगर सच में कोई सोशल इंजीनियरिंग होती, तो क्या बसपा का सूपड़ा साफ होता?
                मैं लगभग 1996 से ही डा. आंबेडकर की जातिविहीन और वर्गविहीन वैचारिकी के सन्दर्भ में कांशीराम और मायावती की राजनीति को कटघरे में खड़ा करता आ रहा हॅंू, जिसके लिये मैं दलित चिन्तकों और बुद्धिजीवियों की निन्दा का पात्र भी हूॅं। पर, मैं जातिवादी तरीके से नहीं सोच सकता। मेरे लिये दलित-विमर्श सामाजिक परिवर्तन का विमर्श है। इस नजरिये से मैं जब भी मायावती की राजनीति को देखता हूॅं, तो वह मुझे उनकी जाति को भुनाने वाली राजनीति ही दिखायी देती है। वह मुझे कहीं से भी परिवर्तन की राजनीति नजर नहीं आती है। इसलिये वर्तमान लोकसभा में बसपा की शर्मनाक अनुपस्थितिपर हमारे दलित चिन्तक मायावती के पक्ष में चाहे कितने ही किन्तु-परन्तुकरके बात करें, पर मेरा आज भी यही मानना है कि उन्होंने डा. आंबेडकर के आन्दोलन को गर्त में ढकेल दिया है। उनकी राजनीति का सबसे बड़ा विद्रूप यह है कि उसका कोई सांस्कृतिक आन्दोलन नहीं है। अगर होता, जिस दलित वोट पर मायावती सबसे ज्यादा आत्ममुग्ध होती हैं और जिसकी पूरी कीमत वसूल कर वे सवर्णों को टिकट देती हैं, वह वोट आज उनसे खिसका नहीं होता। यह जानकर तो उनको जरूर तगड़ा झटका लगा होगा कि उनके चमार और जाटव वोटर ने इस बार मोदी के पक्ष में भाजपा को वोट दिया है। शायद मायावती इस अनहोनी को नहीं समझ सकंेगी, क्योंकि एक तो जनता के साथ उनका संवाद न के बराबर है और दूसरे वे दलित बुद्धिजीवियों को नापसन्द करती हैं। शायद बसपाभारत की एकमात्र पार्टी है, जिसकी अपनी कोई बौद्धिक सम्पदा नहीं है। दलित बुद्धिजीवी केवल जाति के आधार पर ही इस पार्टी से सहानुभूति रखते हैं। इसलिये इस तथ्य को समझना जरूरी है कि बसपा-सुप्रीमो, जो किंगमेकर ही नहीं, सौदेबाजी करके प्रधानमन्त्री बनने का भी सपना देख रही थीं, धड़ाम से नीचे कैसे गिर गयीं? इसका एक बड़ा कारण है नयी पीढ़ी के मध्यवर्गीय दलित युवकों का हिन्दू चेतना से जुड़ाव। इस पीढ़ी के साथ लगातार सम्पर्क और संवाद करने के बाद यह तथ्य सामने आया कि वे अपने दिन-भर का अधिकांश समय अपने हिन्दू दोस्तों के साथ व्यतीत करते हैं, जो उनके सहपाठी और सहकर्मी दोनों हैं। उनके साथ उनका उठना-बैठना, घूमना-फिरना और खाना-पीना सब होता है। वे एक-दूसरे के घरों में आते-जाते हैं, सुख-दुख में शरीक होते हैं। इस बीच जाति के सामाजिक तनाव उनके बीच नहीं होते। ये सम्बन्ध यहाॅं तक विकसित हुए हैं कि दलित युवक अपने हिन्दू दोस्तों के साथ मन्दिर भी जाते हैं और उनके देवी-जागरण जैसे धार्मिक कार्यों में भी भाग लेते हैं। इस दोस्ती ने दलित युवकों को सिर्फ हिन्दू चेतना से ही नहीं जोड़ा, बल्कि उन्हें हिन्दू राजनीति से भी जोड़ दिया। लेकिन इसी हिन्दू राजनीति ने उन्हें मुस्लिम-विरोधी भी बना दिया, जिसमें उनके कुछ कटु सामाजिक अनुभवों ने भी अपनी भूमिका निभायी है। चूॅंकि इन दलित युवकों के घरों में भी कोई सांस्कृतिक परिवर्तन नहीं हुआ है, इसलिये उनका मोदी के पक्ष में भाजपा के साथ जाना बिल्कुल भी आश्चर्यजनक नहीं है। मायावती चाहें तो अपने दलित वोट बैंक का सर्वे करा सकती हैं और देख सकती हैं कि जिस जमीन पर वे खड़ी हैं वह किस कदर दरक गयी है।
                सवाल यह है कि ऐसा क्यों हुआ? हमेशा हाथी पर बटन दबाने वाले कुछ दलितों का तर्क है कि जब मायावती हाथी से गणेश तक जा सकती हैं, तो वे सीधे गणेश को वोट क्यों नहीं दे सकते? जब मायावती परशुराम का गुणगान कर सकती हंै, तो वे मोदी का समर्थन क्यों नहीं कर सकते? जब मायावती को भाजपा मुख्यमन्त्री बना सकती हैं, तो वे मोदी को प्रधानमन्त्री क्यों नहीं बना सकते? ये वे तर्क हैं, जिनका कोई जवाब मायावती के पास नहीं है। कुछ दलितों का तो यहाॅं तक कहना है कि अगर बसपा की पिछली सीटें बरकरार रहतीं और भाजपा की सीटें बहुमत से कुछ कम आतीं, तो मायावती को भाजपा को ही समर्थन देकर अपना उल्लू सीधा करना था।
                दरअसल, जाति और वर्गविहीन समाज की दिशा में डा. आंबेडकर की जो रेडिकल वैचारिकी थी, मायावती न केवल उससे दूर हैं, बल्कि उसे जानना भी नही चाहती हैं। यही कारण है कि उन्होंने सत्ता में आने के लिये जातियों को मजबूत करने का शार्टकटरास्ता अपनाया। इसके सिवाय उन्होंने दलितों में कोई रेडिकल सांस्कृतिक आन्दोलन पैदा करने की कोशिश कभी नहीं की। सत्ता के शार्टकटरास्तों की परिणति हमेशा लाभकारी नहीं होती है, वह धूल भी चटा देती है।
                बहरहाल, देश की जनता ने यह जानते हुए भी कि मोदी घोर साम्प्रदायिक और मुस्लिम-विरोधी हैं, यह जानते हुए भी कि उनका राजनीतिक एजेण्डा लोकतन्त्र का नहीं, हिन्दू राष्ट्रवाद का है और यह जानते हुए भी कि वे बड़े पूॅंजीपतियों के हित में सामाजिक न्याय, सुरक्षा और परिवर्तन की संवैधानिक व्यवस्थाओं को बदल सकते हैं, उन्हें भारी बहुमत से जिताया है। मैं तो कहुॅंगा कि देश की निकम्मी वाम-सेकुलर शक्तियों ने थाल में सजाकर मोदी को सत्ता सौंप दी है। इसलिये अब प्रगतिशील चिन्तकों, लेखकों, पत्रकारों और कलाकारों की भूमिका और भी बढ़ गयी है, जिसे हमें अब पूरी निर्भीकता और जिम्मेदारी से निभाना होगा।

(17 मई 2014)