रविवार, 11 मई 2014


क्या बसपा का पतन होगा?

(कँवल भारती)

ख़बरें यह आ रही हैं कि उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) 9 या 10 सीटों पर सिमट रही है. साफ है कि उसे बहुत भारी नुकसान होने जा रहा है. मेरा गृह जनपद रामपुर है और मंडल मुरादाबाद है, जिसमें दलितों की जाटव और वाल्मीकि दोनों उपजातियों ने मोदी के पक्ष में भाजपा को वोट दिया है. मुझे इसकी बिलकुल अपेक्षा नहीं थी. यह तो लगता था कि इस बार कुछ दलित वोट कांग्रेस को जा सकता है, पर वो भाजपा को जायेगा, यह अप्रत्याशित था. मैंने इसका कारण पता लगाया तो मालूम हुआ कि दलित लोग बसपा के स्थानीय नेताओं से परेशान थे, जो नेता कम और दलाल ज्यादा थे. लेकिन मेरी नजर में यह मोदी-लहर का परिणाम है. गहन छानबीन से यही हकीकत सामने भी आई. इससे साफ़ पता चलता है कि बसपा की राजनीति दम तोड़ रही  है. डाक्टर आंबेडकर ने दलित आन्दोलन की शुरुआत ब्राह्मणवाद और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के खिलाफ की थी, जिसे कांशीराम ने दलितों की सरकार बनाने के लिए उसे सत्ता-प्रतिष्ठान की राजनीति में बदल दिया था, और जिसके लिए उन्होंने भाजपा के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद (यानी फासीवाद) से हाथ मिलाने में भी कोई परहेज नहीं किया था. इसी के तहत उन्होंने भाजपा के साथ दो बार गठबंधन करके उत्तर प्रदेश में अपनी सरकार बनायी. भाजपा और सवर्णों को खुश करने के लिए मुख्यमंत्री मायावती ने शिक्षा और संस्कृति के विभाग भाजपा को दिए, जहाँ तेजी से उन्होंने निजीकरण को हरी झंडी दिखाई और दलित एक्ट को निष्प्रभावी करने के लिए बाकायदा शासनादेश जारी किया. उन्होंने अपने जिलाध्यक्षों को दर्जा राज्यमंत्री बनाया और उन्हें दलाली की खुली छूट दी. यही नहीं, उनकी पार्टी ने दलित उत्पीड़न और हत्याकांड के खिलाफ भी कहीं कोई आन्दोलन नहीं चलाया. दिल्ली में जन्तर-मन्तर पर भगाणा (हरियाणा) गाँव की बलात्कार की शिकार चार दलित लड़कियां लगभग एक महीने से धरने पर बैठी है, पर मायावती ने उनके लिए आन्दोलन करना तो दूर, उनका दुःख बाँटने के लिए धरना-स्थल पर झाँक कर भी नहीं देखा. ऐसी दलित या बहुजन राजनीति किस काम की?

आंबेडकर की राजनीति सांस्कृतिक रूपांतरण की राजनीति थी. इसके लिए उन्होंने दलितों को शिक्षित और संगठित होकर संघर्ष करने का नारा दिया था. मायावती और उनकी पार्टी ने आंबेडकर के इसी कैडर को तबाह कर दिया. उन्हें जिस हिन्दू राष्ट्रवाद के फोल्ड से दलित-बहुजनों को निकालना था, उन्होंने उसी हिंदुत्व को दलितों में मजबूत करने का काम किया. मतलब यह कि सामाजिक परिवर्तन का जो कैडर कांशीराम ने बामसेफ में शुरू किया था, उसे उन्होंने बसपा पार्टी बनाकर ख़त्म कर दिया था. इस तरह 1990 के बाद दलितों में जो नयी पीढ़ी पैदा हुई, वह हिंदुत्व के फोल्ड में ही पैदा हुई और हिन्दूराष्ट्रवाद से आकर्षित होकर आगे बढ़ी. इसलिए यदि वह इन चुनावों में मोदी से प्रभावित हुई है, तो आश्चर्य कैसा?

(11 मई 2014)

गुरुवार, 8 मई 2014

जाति-धर्म के शिकन्जे में लोकतन्त्र
(कॅंवल भारती)
 निस्सन्देह इस बार के लोकसभा चुनावों में एक बड़ा सवाल भ्रष्टाचार का उभर कर आया है। अरविन्द केजरीवाल से शुरु हुई इस लड़ाई ने यदि भ्रष्टाचार के सवाल पर युवा मध्य वर्ग को गम्भीर न बनाया होता, तो शायद भाजपा भी इसे अपने एजेण्डे में रखने वाली नहीं थी। केजरीवाल की भ्रष्टाचार-उन्मूलन की लड़ाई कहीं जनक्रान्ति में सफल न हो जाये, इसलिये आरएसएस, भाजपा और बड़े कारपोरेट ने मिलकर केजरीवाल के ही मुद्दों को मोदी के मुॅंह में डाला और उन्हें एक जननायक के रूप में उभारा। दरअसल मोदीे केजरीवाल के विरुद्ध संघपरिपवार की प्रतिक्रान्ति के साधन बने हैं। चूॅंकि भ्रष्टाचार से त्रस्त दिल्ली की जनता ने आम आदमी पार्टी को विजय दिला कर अरविन्द केजरीवाल को अपना नायक मान लिया था, इसलिये इस से चिन्तित भाजपा और संघ-परिवार ने नये अवतार में मोदी को गढ़ा। बाकायदा इस नये अवतार के लिये मोदी को प्रशिक्षित किया गया और उसी के फलस्वरूप मोदी ने जनता की नब्ज को छूने वाले सवाल उठाये और दोनों हाथ उठाकर चिल्ला-चिल्ला कर कहा कि वे भ्रष्टाचार को जड़ से खत्म कर देंगे। यह विद्रूप ही है कि जिन मोदी के चुनाव-प्रचार में पानी की तरह काला धन बहाया जा रहा है, वह मोदी भ्रष्टाचार खत्म करने की बात कर रहे हैं। कोई उनसे पूछने वाला नहीं है कि जिन धन-कुबेरों ने उनके लिये अपनी तिजोरी के मुॅंह खोले हुए हैं, क्या वे उसका ‘बदल’ नहीं चाहेंगे? और क्या यह ‘बदल’ भारत के संसाधनों की लूट और भ्रष्टाचार के तरीके अपनाये बगैर सम्भव हो सकता है? फिर वे किसे धोखा दे रहे हैं? जिन युवाओं को मोदी ने सपने दिखाये हैं और जिन हसीन सपनों में मस्त होकर वे नमो-नमो कर रहे हैं, अगर बदकिस्मती से मोदी की सरकार बनती है, तो वह दिन दूर नहीं, जब वे अपनी आॅंखों से अपने सपनों को चूर-चूर होते देखेंगे और यह जान जायेंगे कि वे ठगे गये हैं। 
 अरविन्द केजरीवाल ने सिर्फ भ्रष्टाचार के खिलाफ ही आवाज नहीं उठायी है, बल्कि आम आदमी के हित में  राजनीतिक सुधार का भी माहौल बनाया है। आज इसी माहौल की वजह से वे लोग भी चुनाव लड़ने का साहस कर सकते हैं, जो व्यवस्था से पीडि़त हैं और व्यवस्था को बदलना चाहते हैं। क्या मौजूदा व्यवस्था में गरीब और ईमानदार आदमी के लिये चुनाव लड़ना और जीतना सम्भव है? अगर असम्भव नहीं, तो कठिन तो है ही। क्या इसीलिये राजनीति में धनबलियों और बाहुबलियों के ही चुनाव लड़ने और जीतने की शर्मनाक परम्परा नहीं बनी हुई है? इसमें यदि हम धर्म-बल और जाति-बल को भी जोड़ लें, तो भारतीय राजनीति का जो सच उभर कर सामने आता है, क्या वह आम आदमी के हित में है? क्या सिर के बल खड़ी इस व्यवस्था को आम आदमी के हित में बदले जाने की जरूरत नहीं है? कौन बदलेगा इस व्यवस्था को? क्या मोदी बदलेंगे, जिनकी सारी राजनीति ही धन-बल और धर्म-बल पर चल रही है और जिन्होंने अपनी जाति के नाम पर भी ब्राह्मणवाद का नया खेल खेला है? भाजपा के लोग प्रचार कर रहे हैं कि हिन्दू समाज पिछड़ी जाति के नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में जातिविहीन हो गया है। अगर ऐसा ही है, तो वह मायावती के नेतृत्व में जातिविहीन क्यों नहीं हुआ? सच यह है कि नरेन्द्र मोदी पर हिन्दुत्ववादी इसलिये मुग्ध हैं, क्योंकि वे संघपरिवार के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद में आस्था रखते हैं और उसी के आधार पर वे मुस्लिम-विरोधी हैं। अगर मायावती की तरह मोदी भी लोकतान्त्रिक और धर्मनिरपेक्ष होते, तो हिन्दुत्ववादियों का उन्हें नायक मानना तो दूर, वे संघ और भाजपा में ही नहीं होते। 
धन और भ्रष्टाचार के सन्दर्भ में मुझे याद आता है, एक बार लखनऊ में मायावती के जन्मदिन की रैली में कांशीराम जी ने मायावती को धन की महिमा का पाठ पढ़ाया था। उस वक्त उनकी आलोचना हुई थी। पर आज लगता है कि वे अपनी जगह बिल्कुल सही थे। अगर दलित राजनीति को मुख्यधारा की राजनीति में अपना स्थान बनाना है या किसी भी राजनीति को, जो बदलाव चाहती है, और मुख्य धारा में अपना स्थान बनाना चाहती  है, तो धन के बगैर वह कुछ नहीं कर सकती, क्योंकि किसी भी राजनीतिक पार्टी के लिये संगठन का ढाॅंचा खड़ा करने से लेकर प्रचार करने तक में धन चाहिए। धन कहाॅं पर है? वह गरीब या शोषित जनता के पास नहीं है, बल्कि व्यापारियों, पूॅंजीपतियों और उद्योगपतियों के पास है। पर वे उन दलों को क्यों धन देंगे, जो शोषण और संसाधनों की लूट के खिलाफ कानून बनाने वाले हैं? वे जानते हैं कि परिवर्तनवादी शक्तियों के हाथों में सत्ता आने का मतलब क्या होता है? भारत की सत्ता अगर उनके हाथों में आती है, तो लूट और भ्रष्टाचार से खड़ा किया गया उनका साम्राज्य कैसे बचा रह सकता है? ऐसी स्थिति में दलित राजनीति या परिवर्तनवादी राजनीति के पास दो ही विकल्प बचते हैं- या तो वह जनता से चन्दा लेकर धन की व्यवस्था करे या फिर धन-संग्रह के लिये भ्रष्टाचार का रास्ता अपनाये। चूॅंकि जनता के चन्दे से करोड़ों रुपये इकट्ठे नहीं किये जा सकते, इसलिये उनके लिये एकमात्र रास्ता भ्रष्टाचार का ही बचता है। मायावती ने भी इसी रास्ते पर चलना ठीक समझा और वे सफल हुईं, पर व्यवस्था बदलना उनके लिये सम्भव नहीं है। उन्हें लूट-खसोट करने वाले वर्ग का धन और समर्थन तभी मिला, जब वे उनके लिये घातक नहीं रह गयीं। यही सिद्धान्त उदित राज पर भी लागू होता है। जब वे ब्राह्मणवाद के लिये गरजते थे, तो हिन्दुत्ववाद के लिये खतरनाक थे। इसीलिये वे भी अपनी पार्टी खड़ी करने में सफल नहीं हो सके। अब जब वे भाजपा में शामिल हो कर संघ के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के समर्थक हो गये हैं, तो वही हिन्दुत्व उनका गुणगान क्यों नहीं करेगा?
 अतः, समस्या यह है कि कोई भी पार्टी, चाहे उसने भ्रष्टाचार से धन इकट्ठा किया हो या उसे पूॅंजीपतियों ने धन दिया हो, गरीबोें के विकास की राजनीति नहीं कर सकती। कारण साफ है कि वह धन-दाताओं के विरुद्ध मोरचा खोलने का साहस नहीं कर सकती। इसलिये ये पार्टियाॅं जन-हित की प्रतीकात्मक राजनीति ही कर सकती हैं। भाजपा, काॅंग्रेस, सपा, बसपा आदि पार्टियाॅं यही कर रही हैं। वे जनता को सुलाने के लिये धर्म और जाति की अफीम का सहारा ले रही हैं। इसी अफीम से वे मुसलमानों को हिन्दुओं से और हिन्दुओं को सिखों से लड़वाती हैं और इसी से वे दलित-सवर्ण-संघर्ष कराती हैं। इसके लिये वे अपने तरीके से इतिहास का पुनर्पाठ कराती हैं, नफरत को जगाती हैं, और अस्पृश्यता तथा पुरानी सामन्ती-धार्मिक परम्पराओं को जिन्दा रखने वाली संस्थाओं को पालती-पोसती हैं।
 परिणामतः, जाति-धर्म और भ्रष्टाचार के विरुद्ध ‘आम आदमी पार्टी’ के उभार के बावजूद लोकसभा-2014 के इस महासमर में, जिसे मोदी-लहर कहा जा रहा है, यही धर्म और जाति की राजनीति चारो तरफ हावी है। सिर्फ हावी ही नहीं है, वरन् उसी के शिकन्जे में लोकतन्त्र जकड़ा हुआ भी है। विकास के तमाम दावों के बावजूद तीनो ‘एम’ (मोदी, मुलायम, माया) जाति-धर्म की ही राजनीति कर रहे हैं। भाजपा की हिन्दुत्व की राजनीति के विरुद्ध सपा की मुस्लिम राजनीति चल रही है, तो मायावती आरक्षण जारी रखने का वादा करके दलित जातियों को लुभा रही हैं। भाजपा का परम्परागत हिन्दू वोट जितना अन्धा है, उतना ही बसपा का दलित वोट बैंक अन्धा है। इन राजनेताओं के हित जातियों और समुदायों के बीच संघर्ष और तनाव कायम रखने में ही पूरे होते हैं। सब एक-दूसरे से लड़ते रहें, यही वे चाहते हैं और यही वे कर रहे हैं। इसके सिवा रोजी-रोटी, मकान, चिकित्सा और सुरक्षा के मुद्दे उनके लिये कोई मायने नहीं रखते हैं। ऐसे राजनीतिक हालात देश की गरीब जनता को हमेशा जहालत और दहशत के माहौल में रखते हैं। इसलिये लोकतन्त्र की मुक्ति के लिये इस स्थिति को खत्म करना जरूरी है। अब देखना यह है कि अरविन्द केजरीवाल की मेहनत और मुहिम रंग लाती है या जाति और धर्म की राजनीतिक प्रतिक्रान्ति ही लोकतन्त्र का माडल बनी रहती है।
(8 मई 2014)
 

शनिवार, 3 मई 2014


 

यदि मुलायमसिंह प्रधानमन्त्री बनते हैं

(कॅंवल भारती)

                माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता प्रकाश करात ने दूर की कौड़ी फेंकी है कि तीसरे मोरचे की सरकार बनेगी तो उसके नेता मुलायमसिंह यादव होंगे, अर्थात् वह मुलायमसिंह यादव को भारत का प्रधानमन्त्री बनाना चाहते हैं। माकपा का देश में जनाधार नहीं है, यह तो समझ में आता है, पर यह समझ में नहीं आता कि उसके नेता अपने डूबते जहाज को बचाने के लिये ऐसे कप्तान का सहारा लेंगे, जो अपने ही जहाज को डुबोने का काम कर रहा है। वह मुलायमसिंह यादव, जिनकी पार्टी की सरकार ने उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था का सत्यानाश कर रखा है और जिसने देश की बहू-बेटियों के साथ बलात्कार करने वालों का पक्ष लेते हुए सरेआम यह कहा हो कि बच्चे हैं, गलती हो जाती है तो क्या उन्हें फाॅंसी दे दी जाये’, क्या पूरे देश की कानून-व्यवस्था का सत्यानाश नहीं कर देंगे?

                इन्हीं मुलायमसिंह यादव ने गत दिनों अद्भुत तर्क दिया था कि उ0 प्र0 में कानून-व्यवस्था इसलिये खराब है, क्योंकि यहाॅं जनसंख्या सबसे ज्यादा है। उनका कहना है कि दिल्ली आदि अन्य राज्यों में कम अपराध इसलिये होते हैं, क्योंकि उनकी जनसंख्या कम है, पर चूॅंकि उ0 प्र0 की जनसंख्या ज्यादा है, इसलिये यहाॅं अपराध भी ज्यादा होते हैं। कबीर के शब्दों में यही कहा जा सकता है कि फूटी आॅंख विवेक की।क्योंकि इसी तर्क से वे अपने आप को एक अयोग्य प्रशासक होने का भी प्रमाणपत्र दे रहे हैं। इसी तर्क से उनका उ0 प्र0 के विभाजन का विरोध भी अर्थहीन हो जाता है, क्योंकि इस तर्क से तो अपराध कम करने और चुस्त कानून-व्यवस्था के लिये उ0 प्र0 को कम-से-कम दो-तीन लघु प्रदेशों में विभाजित करना जरूरी हो जाता है। प्रकाश करात के जेहन में यह सवाल क्यों नहीं आया कि जब बीस करोड़ की जनसंख्या वाला एक प्रदेश मुलायमसिंह यादव और उनकी पार्टी से नहीं सॅंभाला जा रहा है, तो वे सवा सौ करोड़ की आबादी वाला देश कैसे सॅंभाल सकते हैं? जब बीस करोड़ की आबादी वाले प्रदेश में उनकी पार्टी के दो साल के शासनकाल में जंगल-राज कायम हो गया है, तो यह कौन विश्वास कर लेगा कि उनके प्रधानमन्त्री बनने के बाद पूरे देश में जंगल-राज कायम नहीं हो जायेगा?

                कानून-व्यवस्था को लेकर उ0 प्र0 की जनता में त्राहि-त्राहि मची हुई है। वह अपने को ठगा सा महसूस कर रही है। इसके कारण बहुत स्पष्ट हैं। अगर सपा-नेतृत्व मंथन करना चाहे, तो कर सकता है। उ0 प्र0 में सपा को पूर्ण बहुमत मिलने के पीछे बहुत-से कारणों में एक मुख्य कारण यह भी था कि सपा के प्रचार-अभियान की बागडोर युवा नेता अखिलेश के हाथों में थी। जनता ने यह सोच कर कि एक युवा मुख्यमन्त्री के नेतृत्व में उ0 प्र0 की तरक्की होगी और गुण्डई खत्म होगी, जनता ने सपा को पूर्ण बहुमत से जिताया था। यह जीत अखिलेश यादव की थी, न कि मुलायमसिंह यादव की। प्रदेश की युवा जनता की माॅंग थी कि अखिलेश यादव ही मुख्यमन्त्री हों। और मुलायमसिंह ने इसी युवा-मन की भावना का मान रखते हुए मुख्यमन्त्री-पद पर अखिलेश यादव की ताजपोशी करायी थी। जनता खुश थी कि प्रदेश की बागडोर एक उत्साही युवा नेता के हाथों में है, पर यह खुशी उस समय काफूर हो गयी, जब उनके पिता ने 50 प्रतिशत सत्ता अपने हाथों में रखी, और बाकी 50 प्रतिशत सत्ता के लिये उनके चाचा शिवपाल सिंह यादव और रामपुर के चचा मियाॅं आजम खाॅं को उनके दोनों कन्धों पर बैठा दिया। युवा मुख्यमन्त्री ने भी बयान दे दिया कि वे अपने बुजुर्गों से राय-मशवरा लेकर ही सरकार चलायेंगे। यहीं से पूरे शासन का बण्टाधार शुरु हो गया। अब ये बुजुर्ग क्यों अखिलेश को अपनी मर्जी से काम करने देंगे? और इन बुजुर्गों ने उसे आज तक अपनी मर्जी से काम नहीं करने दिया। अखिलेश ने वही किया, जो इन्होंने उससे करवाया, उसने वही देखा, जो इन्होंने उसे दिखाया और उसने वही कहा, जो इन्होंने उससे कहलवाया। मतलब यह कि प्रदेश में चार मुख्यमन्त्री हैं, जिनमें अखिलेश यादव सिर्फ नाम के मुख्यमन्त्री बने हुए हैं। विद्रूप यह नहीं है कि प्रदेश की युवा जनता के साथ छल हुआ है, बल्कि विद्रूप यह भी है कि एक युवा नेता का करियर बनने से पहले ही खत्म हो गया। अब अखिलेश यादव से राजनीति में किसी चमत्कार की आशा नहीं की जा सकती। और इसके जिम्मेदार सिर्फ और सिर्फ उनके पिता मुलायमसिंह यादव हैं।

                हमारे उत्तर प्रदेश में बिल्ली के भाग से छींका हाथ लगने की एक कहाबत प्रचलित है। हो सकता है कि यह कहाबत चरितार्थ हो जाय और मुलायमसिंह यादव के हाथ प्रधानमन्त्री की कुर्सी लग जाय! तब क्या होगा? उत्तर प्रदेश ही अपने को दुहरायेगा और एक नहीं, कई दर्जन अघोषित प्रधानमन्त्री मुलायमसिंह यादव के कन्धों पर बैठे होंगे। और स्थिति यह हो जायेगी कि साल-छह महीने में ही गुण्डों के राज से पूरे देश में त्राहि-त्राहि मच जायेगी। चलिये, यह तो अभी दूर की कौड़ी है, मुलायमसिंह यादव के लिये दिल्ली अभी बहुत दूर है। प्रधानमन्त्री बनने की कवायद से ज्यादा बेहतर उनके लिये यह होगा कि वे अपनी प्रदेश सरकार को दुरुस्त करने की कोशिश करें, जिस पर लोकसभा चुनावों के बाद संकट के बादल मॅंडरा सकते हैं।

मैं बताना चाहता हॅंू कि उ0 प्र0 में स्थिति बिगड़ने की शुरुआत कहाॅं से हुई? मेरी बात से कोई असहमत हो सकता है, पर सच्चाई यही है कि कानून-व्यवस्था शासन-प्रशासन और जिलों में अपने चहेते अधिकारियों की तैनाती करने से बिगड़ी है। मुलायमसिंह यादव, शिवपालसिंह यादव और आजम खाॅं की तिगड़ी ने जिलों में डीएम-एसपी से लेकर सीओ, एसओ, आरटीओ तक के सभी छोटे-बड़े पदों पर चुन-चुनकर यादव और मुस्लिम अधिकारियों की तैनाती कर दी। हालांकि इसमें कोई हर्ज नहीं है, क्योंकि सभी पार्टियाॅं ऐसा ही करती रही हैं। काॅंगे्रस और भाजपा के राज में तो ज्यादातर ब्राह्मण ही सभी मुख्य पदों पर बिराजमान रहते हैं। पर सपा सरकार ने भी प्रदेश में अपने अधिकारियों की तैनाती का मापदण्ड उनकी काम करने की दक्षता और प्रशासनिक उपलब्धियाॅं के बजाय उनकी जाति और उनके धर्म को बनाया। पर इन मुस्लिम और यादव अधिकारियों में भी सपा सरकार के मन्त्रियों को वही अधिकारी पसन्द आये, जो उनके घरेलू नौकर की हैसियत से काम करने की योग्यता रखते थे। फलतः, ये अधिकारी मन्त्री-विधायकों के टूल्स की तरह इस्तेमाल होते रहे। जिन अधिकारियों से यह गुलामी न हो सकी, उन्हें तुरन्त हटा दिया गया। अतः, प्रदेश में स्थिति बिगड़नी ही थी, क्योंकि जिलों में तैनात अधिकारियों को जब सपा के मन्त्रियों, दर्जा मन्त्रियों और विधायकों का ही फरमावरदार बनकर रहना है, तो जनता को सुरक्षा कहाॅं मिल सकती है? मुरादाबाद में एक सपा नेता के कहने से ही एक थाने के मुस्लिम एसओ ने एक व्यापारी का अपहरण कर उसकी हत्या करके पुलिस जीप से ही उसकी लाश को दूसरे जिले की सीमा में फिंकवा दिया। भला हो उन गाॅंव वालों का, जिन्होंने पुलिस को लाश फेंकते हुए देख लिया, और उनके बयान से मामला खुल गया। अब वह एसओ गिरफ्तारी से बचने के लिये सपा नेताओं के यहाॅं शरण लिये हुए है। रामपुर में एक मुस्लिम सीओ सिटी और एक यादव एआरटीओ दोनों ही आजम खाॅं के इशारे पर उनके विरोधियों को सबक सिखाने का काम करते हैं। आजम खाॅं अपने कई विरोधियों के खिलाफ इन्हीं यादव एआरटीओ से झूठी एफआईआर लिखवाकर उन्हें जेल भिजवा चुके हैं और इन्हीं मुस्लिम सीओ सिटी से पिटवा चुके हैं। फेसबुक पर आजम खाॅं के विरुद्ध टिप्पणी पर जब मेरी गिरफ्तारी हुई, तो इन्हीं सीओ सिटी के आदेश पर थाने के दरोगा मुझे पैजामा-बनियान में ही बेइज्जत करके घसीटते हुए थाने ले गये थे। दो डीएम और एक एसपी ने आजम खाॅं के मौखिक गैरकानूनी आदेशों को जब नहीं माना, तो उन्हें बेइज्जत होकर रामपुर से जाना पड़ा। यह मुरादाबाद और रामपुर का ही सच नहीं है, वरन् पूरे प्रदेश का सच है। इन मुस्लिम और यादव अधिकारियों ने सपा के दबंग मन्त्रियों और विधायकों के दबाव में जनता का जीना मुश्किल कर रखा है।

                मेरे ऊपर यह आरोप लगाया जा सकता है कि मैं मुस्लिम और यादव के खिलाफ वैमनस्यता पैदा कर रहा हूॅं। मै इस आरोप का खण्डन करते हुए यह बताना चाहता हूॅं कि यह सच नहीं है। मै मुस्लिम और यादव का नाम जानबूझ कर इसलिये ले रहा हूॅं कि मैं उन्हें बताना चाहता हूॅं कि प्रदेश की बदतर हालत के लिये सपा सरकार से 100 गुना ज्यादा ये मुस्लिम और यादव अधिकारी जिम्मेदार हैं। समाजवादी पार्टी ने इन मुस्लिम और यादव अधिकारियों को एक मौका दिया था अपनी काबलियत और प्रशासनिक कुशलता साबित करने के लिये। पर ये नहीं कर सके। ये भूल गये कि इन्हें मुख्यधारा में लाने का सुनहरा अवसर सामाजिक न्याय की राजनीति ने दिया था, जिसकी लड़ाई कांशीराम के साथ-साथ मुलायमसिंह यादव ने भी लड़ी थी। एक लम्बे संघर्ष के बाद उन्हें यह अधिकार मिला था। अतः इन मुस्लिम और यादव अधिकारियों का कत्र्तव्य बनता था कि वे अपने आप को योग्यता और कुशलता में द्विज अधिकारियों से 100 गुना ज्यादा श्रेष्ठ साबित करके दिखाते। पर इन्होंने ईमानदारी से जनता के प्रति अपना कत्र्तव्य निभाने के बजाय और सरकार की कल्याणकारी और न्यायसंगत नीतियों पर चलने के बजाय मन्त्रियों और विधायकों की सेवा में लगे रहना ज्यादा बेहतर समझा। क्या फर्क पड़ता, अगर ये मन्त्रियों के गलत आदेशों को मानने से इनकार कर देते? अधिक-से-अधिक इनका स्थानान्तरण ही तो हो जाता। पर, एक ईमानदार और कुशल प्रशासक के रूप में जनता पर अपनी छाप छोड़ जाते। लेकिन इन्होंने सोचा कि यही मौका है, जितना कमाया जा सकता है, कमा लो और मन्त्रियों की गुलामी करके जितनी तरक्की मिल सकती है, ले लो। इन्होंने यह नहीं सोचा कि ऐसा करके वे अपने आप को अपराधी बना रहे हैं और प्रशासन के क्षेत्र में अपने आप को अयोग्य साबित कर रहे हैं। ऐसा करके इन्होंने अपना भविष्य तो खराब किया ही है, समाजवादी पार्टी का भी बेड़ा गर्क कर दिया। अगर मुलायमसिंह यादव और अखिलेश यादव सुन रहे हैं, तो अभी कुछ नहीं बिगड़ा है, वे अपने मुस्लिम और यादव अधिकारियों को पाठ पढ़ायें कि वे मन्त्रियों, दर्जा मन्त्रियों और विधायकों की गुलामी से बाहर निकलें और जनता से दोस्ती करें। शायद आगामी विधान सभा चुनावों में उनकी कुछ लाज रह जाय। पर, अभी एक और कटु सत्य मुलायमसिंह यादव यह भी सुन लें कि उनके पसन्दीदा मन्त्री आजम खाॅं को यह चिन्ता बिल्कुल नहीं है कि लोकसभा चुनावों में सपा जीतती है या हारती है, वरन् उनकी चिन्ता यह है कि प्रदेश में सपा के बाकी बचे तीन सालों में वह अपनी यूनिवर्सिटी के लिये विकास के नाम पर कितना धन सरकार से ऐंठ सकते हैं। उनकी सारी कवायद अपनी यूनिवर्सिटी के लिये है, समाजवादी पार्टी को मजबूत करने के लिये नहीं। यदि आज  चुनाव आयोग ने उनके चुनाव-प्रचार पर पाबन्दी लगायी हुई है, तो यह भी आजम खाॅं की ही सोची-समझी चाल है, ताकि वह सपा की हार का ठीकरा चुनाव आयोग पर फोड़ सकें और खुद साफ बच जायें। आजम खाॅं जैसे सपा नेताओं ने अपने क्षेत्र की जनता पर कितना जुल्म ढाया है, उसका रत्ती-भर एहसास भी मुलायमसिंह यादव को नहीं है। क्या ऐसा नेता भारत का प्रधानमन्त्री बनने की योग्यता रखता है?

( 2 मई 2014 )

                 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

शनिवार, 19 अप्रैल 2014

        दलित चिंतक कंवल भारती से सुरेश कुमार की बातचीत
सुरेश कुमार -दलित विमर्श क्या है? यह अन्य विमर्शों से किस प्रकार भिन्न है? वरिष्ठ विचारक  के रूप में आपकी राय क्या है ?
कंवल भारती- दलित विमर्श अन्य विमर्शों से बहुत अलग है। दलित विमर्श लोकतंत्र का विमर्श है। लोकतंत्र में जिन उपेक्षित वर्गों की पीड़ा को अभिव्यक्ति नहीं मिली, दलित साहित्य और विमर्श उस कमी को पूरा करता है। दलित समाज के साथ हजारों साल से चली रही उत्पीड़न और दमन की परम्परा और दलितों को उपेक्षित करने वाली व्यवस्था के प्रति लोकतंत्र का स्वर है, दलित विमर्श। दलित विमर्श को दलितों का विमर्श कहना या दलित जातियों के आधार पर इसको जातिवादी विमर्श नहीं कहा जा सकता, जो कहता है, वह नासमझ है।
सुरेश कुमार - आप की दृष्टि में दलित चिंतन की आंतरिक चुनौतियाँ क्या हैं ?
कंवल भारती- देखिए, दलितों की आंतरिक चुनौतियाॅं जाति व्यवस्था की कमजोरियाँ हैं। इसी की वजह से दलित विमर्श में भी जाति के आधार पर धारणाएं चल रही हैं। कुछ साहित्यकार चमार-जाटव के विमर्श में भी उलझ गये हंै। इस विमर्श को ओमप्रकाश वाल्मीकि ने भी हवा दी है। ये कमजोरिया जाति व्यवस्था की वजह से हैं। फिर भी दलित जातियों के बीच में भेदभाव की जो दीवारें हैं, वह अगर दलित विमर्श में आती हैं, तो अच्छी बात है। ब्राह्मणवादी व्यवस्था के मूल में जाति ही तो है। ब्राह्मणवादी लोग कभी नहीं चाहेंगे कि जाति खत्म हो। इसलिये ब्राह्मणवादी साजिशों से दलित साहित्कारों को बचना है। दलित जातियाॅं बहुत जल्दी ब्राह्मणवादी साजिशों का शिकार हो जाती हंै। कुछ दलित जातियों का वर्चस्ववाद भी इसको खाद-पानी देता है। इसके लिये दलित विमर्श का लोकतांत्रिक होना बहुत जरूरी है, वरना जातिवाद हमारे आन्दोलन को खत्म कर देगा।
सुरेश कुमार - दलित चिंतन की धारा में रैदास, कबीर स्वामी अछूतानंद, अम्बेडकर को तो स्वीकार किया जा रहा ह,ै बुद्ध को नही?। एक वरिष्ठ लेखक के नाते आपकी क्या राय है?
कंवल भारती- असल में, जो जातिवादी हैं, वे ही बुद्ध को नकार रहे हैं। मैंने पहले कहा है कि दलित विमर्श लोकतांत्रिक विमर्श है और भारत में बुद्ध लोकतन्त्र के सबसे बड़े व्याख्याता हैं, तो इस संदर्भ में बुद्ध को नकारा ही नहीं जा सकता। बुद्ध पहले व्यक्ति थे जिन्होनेें गणतंत्र के पक्ष में आवाज उठायी थी, वर्ण व्यवस्था का खण्डन किया था। अब उसे नकारते हुए कुछ चिंतकों का कहना है कि वे क्षत्रिय थे इसलिए वे दलित दलित विमर्श का हिस्सा नहीं बन सकते। यह जातिवादी दलील है, कोई वैज्ञानिक तर्क नहीं है। इस तरह से तो हम अश्वघोष, राहुल सांकृत्यायन, सबको नकारेंगे। यह पागलपन है। बुद्ध को नकारने का मतलब है कि हम इतिहास के पूरे कालखंड को नकार रहे हैं। क्षत्रिय होना एक अलग बात है। पर यह देखिए कि उनकी वैचारिकी क्या है? क्या वह जातिवाद के पक्ष में है? आप वाल्टेयर को देखिए, वे जिस वर्ग में पैदा हुए उसी वर्ग के विरुद्ध उन्होंने विद्रोह किया, उसी प्रकार बुद्ध भी हैं जो अपने ही वर्ण के खिलाफ खड़े होते हैं। वे राजा के पुत्र थे। वे राजपुत्रों के लड़कों को भिक्षु बनाते हैं और इसलिए बनाते हैं क्योंकि वे भोगेश्वर-परायण युवकों को जमीनी हकीकत दिखाना चाहते थे, कि वे भूखा रहकर देखें कि भूख क्या होती है? वे पैदल चलकर देखें कि पाॅंवों में किस तरह छाले पड़ते हैं? तो उन्होंने इस प्रकार उनको हकीकत दिखाई। यह उन्होंने बहुत बड़ा काम किया है। इसलिए बुद्ध को नहीं नकारा जा सकता। 
सुरेश कुमार -बुद्ध को  कौन विद्वान नकार रहे हैं उनके नाम बताइये?
कॅंवल भारती-उनको तो आप भी जानते हैं। डा. धर्मवीर हैं, श्यौराज सिंह बेचैन हैं, डा.दिनेश राम हैं। ये सब बुद्ध को नकार रहे हैं, मेरी समझ में नहीं आता कि इस नकार को लेकर वे जाना कहाॅं चाहते हैं ? डा. धर्मवीर का मानना है कि बाबा साहब ने बौद्ध धर्म अपनाकर बहुत बड़ी गलती की है। यह तो अपने को समझ वाला और आंबेडकर को नासमझ बताने की नादानी है। ये लोग इतिहास की धारा को मोड़ने का काम कर रहे हैं। बुद्ध को या अम्बेडकर को नकारने से चीजें थोड़े ही बदल जायेंगी। बुद्धिज्म को आये अब तक 50 साल हुए होंगे। 50 साल में पूरा भारत तो बौद्ध नहीं हुआ। 10 या 15  प्रतिशत दलित ही बौद्ध हुए होंगे। डा. धर्मवीर नया आजीवक धर्म चला रहे हैं। पता नहीं वे कितने वर्षों में दलितों को आजीवक बना देंगे? धर्मवीर तो कबीर को भी सिर्फ जारकर्म तक सीमित करने का गन्दा खेल खेल रहे हैं।
सुरेश कुमार -दलित साहित्य में दलित महिला लेखिकाओं की भागीदारी अपेक्षाकृत कुछ कम दिखाई दे रही है। वरिष्ठ आलोचक हाने के नाते आप से जानना चहूंगा। इसका कारण क्या हो सकता है?
 कंवल भारती- आज से 30-40 वर्ष पहले हिन्दी में एक पत्रिका निकलती थी चाँद’। इस पत्रिका ने सम्भवतः 1935 में ‘विदुषी अंक निकाला था। उस समय ‘हिन्दू लड़की यदि मिडिल पास कर लेती थी, तो उसका चाँद पत्रिका में फोटो छपता था। जो लड़की बी0ए0 पास कर लेती थी, उस पर टिप्पणियाँ और लेख निकालते थे। यह वह जमाना था जब स्त्री को पढ़ने का अधिकार बिल्कुल नहीं था। जब हिंदू स्त्रियों को पढ़ने का अधिकार नहीं था तो दलित स्त्रियों का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। स्त्री-शिक्षा के क्षेत्र में जो जन-जागरण हुआ है, वो खास तौर से 80 और 90 के दशक में हुआ है। दलितों ने जब से पढ़ना-लिखना शुरू किया है, तो उनमें भी वही भावना थी कि वे अपनी लड़कियों को पढ़ायें, लेकिन पैसे के अभाव में थोड़ा बहुत ही पढ़ा पाते थे। लड़कियाँ घर में काम करने लगती थी।
 अब लड़कियाँ पढ़ रही हैं तो लिख भी रही हैं। इसलिए दलित लड़कियों में साहित्य की चेतना थोड़ी देर से आयी है। उनकी शिक्षा जैसे-जैसे बढ़ती जायेगी, वैसे-वैसे उनका दिमाग भी खुलता जायेगा। बहुत सी जातियों में तो आज भी लड़कियाॅं शिक्षा प्राप्त नहीं कर रही हैं। यही वजह है कि दलित महिला लेखन में कमी है। इसका मतलब यह नहीं है कि दलित स्त्री लेखन बिल्कुल हाशिए पर है। मेरी पुस्तक ‘दलित कविता का संघर्ष’ में मैंने अनेक दलित कवियत्रियों जैसे- अनुसूया, आशा गौतम, कुसुमलता आदि का जिक्र किया है, जो 70-80 के दशक में बहुत अच्छा गीत लिखती थी। पर पता नहीं अब वे कहाँ हैं? सम्भवतः शादी करने के बाद उनका लेखन कार्य खत्म हो गया। मैं चाॅंद के  ‘विदुषी’ अंक की बात कर रहा था। उसमें तब काफी संख्या में लेखिकाओं की सूची है। इस अंक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उसमें किसी पुरुष लेखक का लेख नहीं है। लेकिन आज वे लेखिकाएॅं दिखाई नहीं देती। महादेवी वर्मा, सुभद्रा कुमारी चैहान और दो-तीन महिलाओं का नाम है जिन्हें सब जानते हैं बाकी कहाँ गई, कुछ नहीं पता। स्त्रियों के साथ बड़ी विडम्बना जुड़ी हुई है। उन्हें घर-गृहस्थी के भार भी उठाने पड़ते हैं, बच्चे भी पालने होते हैं। स्त्रियों के लिये इन समस्याओं से जूझते हुए लेखन करना आसान काम नहीं है।
सुरेश कुमार -दलित विमर्श मातृसत्ता और पितृसत्ता से तो लड़ रहा है लेकिन उसमें कहीं न कहीं दलित समाज की समस्याएं छूटी जा रही हैं, इस विषय में आपकी राय क्या है?
कंवल भारती-हाॅं, यह बात तो सही है। समाज में बहुत सारे मुद्दे हैं जिनसे समाज का निर्माण होता है। वे सब भी साहित्य में आने चाहिए। राजनीतिक और आर्थिक सवाल दलित साहित्य में नजर ही नहीं आ रहे हैं। निजीकरण से कितना नुकसान हो रहा है, इस पर कोई चिंतन नहीं हो रहा है। लोकतंत्र में भागीदारी की बात तो की जा रही है, पर जो हमारे प्रतिनिधि ह,ैं वे हमारा कितना प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, यह भी तो साहित्य में आना चाहीए। पर यह नहीं हो रहा है। दलितों के नजरिए से राजनीतिक माॅडल किस तरह का होना चाहिए, इस पर कोई विचार नहीं हो रहा है। इसलिए वे सारी समस्याएॅं जो राजनीति से जुड़ी हुई है, पीछे छूट जाती हंै। दलित लेखन में या तो अंतर्जातीय विवाह पर कहानियाँ आ रही हैं या जातीय उत्पीड़न पर।  न जातिवाद पर लेखन और न हो रहा है सांप्रदायिकता पर। दलित साहित्य को अपना दायरा व्यापक बनाना होगा।
सुरेश कुमार - हिन्दी आलोचना में और दलित आलोचना में मूल अंतर क्या है? आप हिन्दी दलित साहित्य  के प्रमुख आलोचक  होने के नाते आपकी दृष्टि में मूल अंतर क्या है?
कंवल भारती- हिन्दी के पारंपरिक आलोचना में वे सवाल नहीं है जो दलित आलोचकों ने उठाये है। मिसाल के तौर पर निराला की ‘चतुरी चमार’ कहानी को लीजिए, उसमें जो चतुरी है, वह कबीरपंथी है और कबीर साहित्य का मर्मज्ञ है। पर वह नशा करता है, माॅंस खाता है। निराला ने यहाॅं कबीर पंथ का विकृतीकरण किया है। कबीरपंथी की यह विशेषता है कि वह न मांस खाता है और न नशा करता हैै। हिन्दी के आलोचक इस कहानी को दलित चेतना की कहानी मानते हैं। लेकिन दलित आलोचक उसे दलित चेतना की कहानी नहीं मान सकते। इसी तरह निराला की ‘राम की शक्ति पूजा’ कविता है, जिसका पूरा ढांचा सामंतवादी है। मैंने इसकी उदाहरण केसाथ आलोचना की है, जिसमें मैंने दो सवाल उठाये हैं-एक तो भाषा पर कि वह सामंती भाषा है। दूसरायह कि उसमें सामन्ती पुरुष का गुणगान किया गया है। प्रेमचंद की कहानियाँ तो फिर भी बहुत अच्छी हैं। लेकिन कुछ कहानियाँ जैसे कफन, सदगति, मंदिर को लेकर ही दलित आलोचकों ने सवाल उठाये। ये सवाल मुखधारा की आलोचना में नहीं मिलेंगे। प्रेमचंद कह रहे है कि सुखिया के पति ने सपने में आकर कहा कि बीमार बच्चे को मंदिर में ले जाओ, वहाॅं पूजा करने से वह ठीक हो जायेगा।  सवाल यह है कि जब दलित का मंदिर में जाना निषिद्ध था, तो उसका पति ऐसा सोच भी कैसे सकता था? व्यक्ति सपने में आकर तभी कुछ कहेगा जब इस तरह की घटनाएं वहाँ होती रहेंगी। इस तरह की कल्पनाओं से हिन्दू समाज की कठोरता को तो साबित किया जा सकता है, पर वह न यथार्थवादी है और न वैज्ञानिक समाधान है।
सुरेश कुमार -दलित साहित्य का विकास जिस तरह से हुआ है, उस प्रकार से दलित पत्रकारिता का नहीं। आप शुरूआती दौर में एक पत्रकार भी रहे हैं, तो इसके कारण क्या हैं?
कंवल भारती- आजकल लोग सवाल उठाते हैं कि मीडिया में दलित पत्रकार नहीं हैं, ढूढ़ते रह जाओगे। पहली बात यह कि मीडिया या पत्रकारिता में दलित जाना ही नहीं चाहते हंै। बहुत कम लोग जाना चाहते हैं क्योंकि वहाँ पैसा कम है, सुरक्षा भी नहीं है और वह एक कठिन पेशा भी है। मैंने अपने लेखन की शुरुआत पत्रकारिता से की थी। मैं अपनी तारीफ नहीं कर रहा हूँ किंतु मुझे गर्व होता है कि मैंने हिन्दी पत्रकारिता में दलित सवालों को उठाने की शुरुआत की। जब मैं ‘स्वतंत्र भारत’ में लिखा करता था सन् 70-80 की बात है प्रभात, राष्ट्रीय सहारा, अमर उजाला में दलित सवालों पर बराबर मेरे लेख छपा करते थे। नैमिशराय जी भी उन्हीं दिनों पत्रकारिता में आये थे। उसके बाद तो बहुत सारे लोग दलित पत्रकारिता में आये और अब तो अपने अखबार और पत्रिकाएॅं भी दलित लेखक निकालने लगे हैं। इसलिये अब तो दलित पत्रकारिता का एक तरह से पृथक विकास भी हो रहा है।
 सुरेश कुमार -आपके और डाॅ0 धर्मवीर के बीच जो वैचारिक मतभेद चल रहा है उसका मूल कारण क्या है?
कंवल भारती- देखिए, डा. धर्मवीर से मेरी कोई व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं है। उनसे विचारों की लड़ाई है। वे जिस तरह का प्रदूषण दलित साहित्य में फैला रहे हैं, वह समाज के हित में नहीं है। वे दलित स्त्रियों के प्रति जिस अपमानजनक साहित्य का निर्माण कर रहे हैं, उसे कोई भी सम्वेदनशील लेखक बरदाश्त नहीं कर सकता।  वे कह रहे हैं कि हर दलित बच्चा अवैध है और हर दलित पुरुष को बच्चे का डी0एन0ए0 टेस्ट कराना चाहिए कि वह उसी का है या किसी और का? इसका मतलब है कि उनकी नजर में हर दलित स्त्री जार-कर्म कर रही है। इस स्त्री-विरोधी चिन्तन को कैसे बरदाश्त किया जा सकता है? इसलिये मैंने उनका विरोध किया और ‘धर्मवीर का फासिस्ट चिन्तन’ किताब लिखी। असल में धर्मवीर मानसिक रोगी हैं। इसलिये उनकी सोच बहुत ही गलत है। मिसाल के तौर पर अगर किसी घर में पिता-पुत्र में झगड़ा है तो वह  सीधा आरोप लगा देंगे कि वह पुत्र अवैध सन्तान है। यह एक बीमार सोच है।
  इधर, हिन्दी के तमाम आलोचक मुझ पर ताने कसते थे कि धर्मवीर पर आप मौन क्योें हैं? वे दलित स्त्री के खिलाफ लिख रहे हैं, वे बुद्ध के खिलाफ लिख रहे हैं। राॅंची में एक सेमिनार में सुभाष गताडे़ और मोहनदास नैमिशराय ने श्यौराज सिहं बेचैन की मौजूदगी में मुझसे कहा कि आपकी खामोशी अच्छी नहीं है। अगर आप मौन रहकर धर्मवीर का समर्थन कर रहे हैं, तो यह खतरनाक है। मुझे भी लगा कि धर्मवीर के खिलाफ लिखना चाहिए। मैंने नमिता सिंह से बात की और उनकी पत्रिका ‘वर्तमान साहित्य’ मे मैंने लिखना शुरु कर दिया। उन्हीं लेखों का संकलन ‘धर्मवीर का फासिस्ट चिंतन’ नाम से किताब के रूप में छपकर आया। मैं बहुत संतुष्ट हूँ कि मैंने एक फांसीवादी विचारधारा को नकारा है। धर्मवीर के शिष्यों को छोड़कर पूरे हिन्दी बिरादरी ने ‘धर्मवीर का फासिस्ट चिंतन’ किताब का स्वागत किया है।
सुरेश कुमार -‘धर्मवीर का फासिस्ट चिंतन’ किताब का स्वागत किन लेखकों ने किया नाम लेकर बताए?
कॅंवल भारती-यह गलत सवाल है। सभी लेखकों ने उस किताब का किया है। कोई एक नाम हो तो बताऊॅं। 
सुरेश कुमार -आपकी कितनी कृतियाँ अब तक प्रकाशित हुई हैं और आपकी पहली रचना कौन है ?
कंवल भारती- मैंने अपने लेखन की  ‘शुरुआत’ कविता से की है। मेरी पहली रचना 1971 ‘नई चेतना नये राग’ से छपी थी। उसमें मेरी कविताओं के साथ-साथ अन्य कवियों की कविताएॅं भी शामिल थीं। यह किताब चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु ने अपने पब्लिकेशन से छापी थी। 1977 में मेरी दूसरी किताब ‘ईश्वर, ब्रह्म और आत्मा’ छपी। उस किताब का पंजाबी में भी अनुवाद हुआ, जो इंग्लैण्ड में छपा और उसकी पहले संस्करण की ही 10,000 प्रतियाँ छपी थीं। इसके बाद में ‘डाॅ0 अम्बेडकर बौद्ध क्यों बने’ और ‘धम्मविजय’ ये दो कितार्बें आइं। अब तक मेरी 40 किताबें छप चुकी हैं।
सुरेश कुमार -युवा पीढ़ी के जो  दलित लेखक हैं, उनके लेखन के संबंध मंे आपकी राय क्या है?
 कंवल भारती- काफी संख्या में युवा दलित लेखक लेखन के क्षेत्र में आये हैं। उनके लेखन में एक किस्म की विविधता भी है और सवालों की परिपक्वता भी उनमें मिलती है। लेकिन उनसे मेरा यह कहना है कि उन्हें भावुकता से बचना चाहिए। दलित साहित्य को अब तो उन्हीं से उम्मीदें हैं।
    (यह साक्षात्कार होटल ‘रेस्ट इन’ चारबाग, लखनऊ में दिनांक 27 दिसम्बर 2013 को लिया गया था।)

मंगलवार, 15 अप्रैल 2014


श्रीमती ओमप्रकाश वाल्मीकि का बडबोलापन

(कँवल भारती)

भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला में ओमप्रकाश वाल्मीकि की स्मृति में 14-15 अप्रेल को दो दिन का सेमिनार हुआ, जिसमें संयोग से मैं भी एक सत्र का अध्यक्ष था. अंतिम सत्र में श्रीमती चंद्रकला वाल्मीकि ने अपने वक्तव्य में कहा कि कुछ लोग ओमप्रकाश वाल्मीकि का विरोध कर रहे हैं, उनके जीते जी किसी ने उनका विरोध करने की हिम्मत नहीं की. उन्होंने यह भी कहा कि कुछ लोगों ने मेरे बारे में (यानि श्रीमती वाल्मीकि के बारे में) भी लिखा है. क्या लिखा है? यह तो उन्होंने नहीं बताया, पर बोलीं कि वाल्मीकि जी ने मुझे पूरी छूट दी थी. मैं भगवान् को मानती हूँ, पूजा करती हूँ और मन्दिर भी जाती हूँ. पर उन्होंने मुझे कभी नहीं रोका. उन्होंने यह भी कहा कि कुछ लोग मेरे घर शोक व्यक्त करने आये थे या मेरे घर की कहानी जानने. उन्होंने अंत में धमकाने के अंदाज़ में कहा कि मैं अभी मरी नहीं हूँ, मैं उनकी भी पोल खोल दूंगी. यह सारी भड़ास उनकी मेरे ऊपर थी. पर वह इतनी डरपोक निकलीं कि अपनी बात कहकर तुरंत भाग खड़ी हुईं, एक मिनट भी नहीं रुकी. अगर वह वहां रुकती, तो मैं उन्हें बताता कि बिना नाम बताये बात करना सबसे बड़ी कायरता है.

मैं उन्हें बताना चाहता हूँ कि ज्यादा बडबोलापन अच्छा नहीं होता है. वाल्मीकि कोई खुदा नहीं थे, लेखक थे और उनमें बहुत सारी कमजोरियां थीं. वह भूल गयीं, जब कुरुक्षेत्र में उनके सामने ही रतनकुमार सांभरिया ने कहा था कि वाल्मीकि जी से तो कहानी लिखना ही नहीं आती और उन्हें दलित लेखक कहने में भी शर्म आती है. वह भूल गयीं, संजीव खुदशाह ने वाल्मीकि जी पर साहित्यिक चोरी का आरोप लगाया था और उस विवाद को शांत करने में मैंने पहल की थी. उन्होंने अपनी आस्तिकता और पूजा पाठ को स्त्री स्वाधीनता की आड़ में ढकने की कोशिश की है. पर उन्हें शर्म आनी चाहिए कि जो स्त्री एक घर में रहकर और उनके साथ देश भर में घूम कर भी वाल्मीकि जी के विचारों को नहीं समझ सकी, उसे उनके काम को भी आगे बढ़ाने का हक नहीं है. जो स्त्री खुले आम कहती थी कि मैं वाल्मीकि जी के विचारों से सहमत नहीं हूँ, वह अब किस मुंह से उनके विचारों का समर्थन करेंगी? मैं उन्हें बताना चाहता हूँ कि वाल्मीकि जी में जाटव-विरोध कूट-कूट कर भरा था, और इसीलिए वे अपनी जाति-बिरादरी के लोगों तक सिमटकर कर रह गये थे.

अंत में मैं उन्हें चुनौती देता हूँ कि जैसा उन्होंने पोल खोलने की बात की है, खोलकर दिखाएँ. और जितने भी उनके पास मेरे या किसी अन्य के खिलाफ सुबूत हों, वह सब सामने रखें. और यह भी वह अच्छी तरह समझ लें कि मेरे जैसे व्यक्ति ने वाल्मीकि जी की आलोचना उनके जीवनकाल में ही की थी.

(15 अप्रेल 2014, शिमला)  

रविवार, 13 अप्रैल 2014


(14 अपे्रल 2014 को भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला में आयोजित सेमीनार में पठित आलेख)

ओमप्रकाश वाल्मीकि और दलित साहित्य

कॅंवल भारती

यह कहा जाता है कि महाराष्ट्र में जब दलित पैंथर अस्तित्व में आया, उसी समय दलित साहित्य भी अस्तित्व में आया। लेकिन यह उसके नामकरण के विषय में सच हो सकता है, दलित साहित्य के बारे में नहीं। अछूत जातियों द्वारा लिखा जाने वाला साहित्य दलित पैंथर के जन्म से पहले से मौजूद रहा है। यह सिर्फ महाराष्ट्र में ही नहीं, बल्कि भारत की हर भाषा में मौजूद रहा है। हिन्दी क्षेत्र में इसका इतिहास सदियों पुराना है।

अगर हम आधुनिक हिन्दी दलित साहित्य की बात करें, तो यह उन्नीस सौ बीस और तीस के दशक में अस्तित्व में आया। इसकी शुरुआत स्वामी अछूतानन्द हरिहरने की थी, जो आदि हिन्दूआन्दोलन के प्रवत्र्तक, कवि, नाटककार और सम्पादक-पत्रकार थे। उन्होंने 1920 में कानपुर में आदि हिन्दू प्रेसस्थापित किया, और आदि हिन्दूअखबार निकाला, 1929 में आर्य-अनार्य-संघर्ष पर आदि खण्ड काव्यकी रचना की और 1926 में ब्राह्मणवाद के काले इतिहास पर रामराज्य-न्यायऔर मायानन्द बलिदाननाम से दो नाटक लिखे। यही नहीं, उन्होंने आदि हिन्दू रंगमंच भी बनाया था, जो उनकी सभाओं में उन नाटकों का मंचन करता था। स्वामी जी की मृत्यु के पश्चात् आजादी के बाद इस चेतना और धारा का विकास उनके परम मित्र और साथी चन्द्रिकाप्रसाद जिज्ञासु ने किया। उन्होंने देखा कि देश में लोकशाही कायम होने के बाद भी ब्राह्मणशाही हावी है और हिन्दी साहित्य में ब्राह्मणवाद की जय-जयकार करने वाले लेखक राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किये जा रहे हैं। हिन्दी साहित्य हिन्दू साहित्य बन गया था, जिसमें न दलितों की तकलीफें थीं और न उनकी आवाज थी। इसी समय चन्द्रिकाप्रसाद जिज्ञासु ने हिन्दी साहित्य में दलित-शोषित समाज के पक्ष में चिन्तन और विमर्श की नयी धारा चलायी। उन्होंने दलित-इतिहास की खोज की, कबीर-रैदास के सन्तमत को प्रतिष्ठित किया और हिन्दू संस्कृति को कठघरे में खड़ा किया। उन्होंने 1960 में दलितों के साहित्य को प्रकाशित करने के लिये बहुजन कल्याण प्रकाशनकी स्थापना की और समाज सेवा प्रेसलगायी। उन्होंने सौ से भी अधिक किताबें लिखीं और अन्य दलित लेखकों की भी बहुत सी किताबें प्रकाशित कीं। उन्होंने ही पहली बार हिन्दी क्षेत्र के दलितों को कबीर, रैदास, बुद्ध, आंबेडकर और रामास्वामी नायकर के जीवन-दर्शन से परिचित कराया। उन्हीं के साहित्य ने हिन्दी में दलित साहित्य की दूसरी आधुनिक पीढ़ी का निर्माण किया।

ओमप्रकाश वाल्मीकि इसी आन्दोलन की उपज हैं। उन्होंने अपनी आत्मकथा में चन्द्रिकाप्रसाद जिज्ञासु का जिक्र किया है, जिनकी डा़ आंबेडकर के जीवन पर लिखी किताब बाबासाहेब का जीवन-संघर्षको पढ़कर ही पहली दफा उन्होंने आंबेडकर के बारे में जाना था। वाल्मीकि जी ने इस किताब का नाम भूलवश गलत लिखा है-डा. अम्बेडकरः जीवन-परिचय। उस समय वाल्मीकि 12वीं में पढ़ते थे और गाॅंधी, नेहरू, पटेल, राजेन्द्रप्रसाद, राधाकृष्ण, विवेकानन्द, भगतसिंह, सुभाषचन्द्र बोस, यहाॅं तक कि सावरकर के नामों से भी परिचित थे, पर डा. अम्बेडकर का नाम उन्होंने विल्कुल नहीं सुना था। इसलिये जब उनके जाटव सहपाठी हेमलाल ने उन्हें जिज्ञासु जी की किताब दी, तो उन्होंने उससे बहुत हैरान होकर पूछा कि ये अम्बेडकर कौन हैं? अतः कहना न होगा कि अम्बेडकर की उस जीवनी को पढ़कर ही उन्हें दलित यथार्थ और आन्दोलन का ज्ञान हुआ। उन्होंने स्वयं लिखा है- जैसे-जैसे मैं इस पुस्तक के पृष्ठ पलटता गया, मुझे लगा, जैसे जीवन का एक अध्याय मेरे सामने उघड़ गया है। ऐसा अध्याय जिससे मैं अनजान था। डा. अंबेडकर के जीवन-संघर्ष ने मुझे झकझोर दिया था।इस किताब ने उनमें अंबेडकर के प्रति गहरी रुचि पैदा कर दी, परिणामतः पुस्तकालय में अंबेडकर की जो किताबें उन्हें मिल सकीं, उनको भी उन्होंने पढ़ लिया। उन दिनों हिन्दी में चार पुस्तकें ही उपलब्ध थीं। वाल्मीकि जी ने लिखा है- इन पुस्तकों के अध्ययन से मेरे भीतर एक प्रवाहमान चेतना जागृत हो उठी थी। इन पुस्तकों ने मेरे गूॅंगेपन को शब्द दे दिये थे। व्यवस्था के प्रति विरोध की भावना मेरे मन में इन्हीं दिनों पुख्ता हुई थी।’ (जूठन, पृष्ठ 89)

यही वह समय है, जब ओमप्रकाश वाल्मीकि के भीतर एक लेखक ने जन्म लिया। उन्होंने कविताएॅं लिखीं, जो उस समय की दलित पत्रिका निर्णायक भीममें छपती थीं। इन्हीं कविताओं का एक संग्रह उन्होंने सदियों का संतापनाम से 1989 में अपने पैसों से छपवाया था। दलित साहित्य में  इसी कविता-संग्रह ने हिन्दी की मुख्यधारा की आधुनिक कविता को आईना दिखाया था। यह 30 पृष्ठों की पुस्तिका थी, जिसमें उनकी 19 कविताएॅं संकलित हैं। यह वह समय था, जब न मुख्यधारा के अखबार दलितों की रचनाएॅं छापते थे और न आज की तरह प्रकाशक उनकी किताबें छापते थे। इसलिये इस संग्रह पर कहीं कोई हलचल नहीं मची थी। मुख्यधारा ने उन्हें तब अपनाया, जब 1996 में राजेन्द्र यादव ने अपने वार्षिक कार्यक्रम में उन्हें प्रस्तुत किया और उन्हीं के प्रयास से 1997 में उनकी आत्मकथा जूठनको राधाकृष्ण प्रकाशन ने प्रकाशित किया। इससे पहले उनकी ही नहीं, किसी भी दलित लेखक की कोई किताब किसी हिन्दी प्रकाशक ने नहीं छापी थी। जूठनको जबरदस्त प्रसिद्धि मिली और साथ ही दलित साहित्य को भी। लेकिन इसी समय दलित साहित्य को लेकर हिन्दी में एक तीखी बहस शुरू हुई, जिसमें वामपंथी लेखकों ने सकारात्मक रुख न अपनाया होता, तो ब्राह्मणवादी लेखकों ने उसे खारिज ही कर दिया था, हांलाकि आज भी वे इसके प्रति बिल्कुल भी संवेदनशील नजर नहीं आते हैं।

इस बहस में जो सबसे बड़ा सवाल उठाया गया था और जो आज भी उठाया जाता है, वह यह है कि क्या दलित साहित्य दलित ही लिख सकता है? इस सवाल पर थोड़ी चर्चा करना यहाॅं इसलिये जरूरी लगता है, क्योंकि इससे ओमप्रकाश वाल्मीकि के साहित्य को और दलित साहित्य की अवधारणा दोनों को ठीक से समझा जा सकता है। इस सन्दर्भ में पहला प्रतिप्रश्न यह है कि जूठनकी रचना ओमप्रकाश वाल्मीकि ने ही क्यों की? किसी गैर-दलित लेखक ने ऐसा लेखन क्यों नहीं किया? माना कि जूठनआत्मकथा है और शायद यह किसी सवर्ण की आत्मकथा नहीं हो सकती। पर यह नहीं माना जा सकता कि किसी गैर-दलित लेखक ने अपने जीवन में जूठन खाने वाली दलित जाति को बिल्कुल न देखा हो? तब किसी गैर-दलित लेखक ने उस देखे हुए यथार्थ को ही संवेदना के साथ चित्रित करने की आवश्यकता क्यों नहीं समझी? क्या इसका यह अर्थ नहीं है कि दलित का जीवन उनकी सम्वेदना और चेतना में था ही नहीं। कहना न होगा कि दलित लेखकों ने जिस सामाजिक यथार्थ को अपने साहित्य में दिखाया है, उसे गैर-दलित लेखक कैसे दिखा सकते थे, जबकि दलितों के साथ उनका सामाजिक व्यवहार ही नहीं था।

ओमप्रकाश वाल्मीकि के कविता-कर्म पर आता हूॅं। उनके पहले कविता-संग्रह सदियों का संतापमें पहली कविता है- ठाकुर का कुंआ। इस कविता ने हिन्दी साहित्य के भद्रलोक को, जो हिन्दुत्व के तहत शीर्षासन कर रहा था, पैरों के बल खड़ा कर दिया था। इस कविता में ठाकुर का कुंआजातिव्यवस्था का प्रतीक नहीं है, बल्कि सामन्तवादी और पूंजीवादी व्यवस्था का प्रतीक है। कुंआ का अर्थ है पानी, जिसके बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। जीवन के ये सारे संसाधन इसी सामन्ती और पूंजीवादी व्यवस्था के हाथों में हैं। उत्पादन करने वाली जातियां और मेहनतकश लोग सब-के सब इसी व्यवस्था के गुलाम हैं. इसी यथार्थ को ओमप्रकाश वाल्मीकि ने इस कविता में व्यक्त किया है-चूल्हा मिट्टी का/मिट्टी तालाब की/तालाब ठाकुर का/भूख रोटी की/रोटी बाजरे की/बाजरा खेत का/खेत ठाकुर का/बैल ठाकुर का/हल ठाकुर का/हल की मूठ पर हथेली अपनी/फसल ठाकुर की/कुंआ ठाकुर का/पानी ठाकुर का/खेत-खलिहान ठाकुर के/गली-मुहल्ले ठाकुर के/फिर अपना क्या? गाँव? शहर? देश?” इस कविता में सबसे विचारोत्तेजक पंक्ति यही है- फिर अपना क्या?’ यह सवाल उस जन का है, जो इस तंत्र में धर्मतंत्र और जातितंत्र के नाम पर सबसे ज्यादा शोषित है, और जिसकी पीड़ा का कोई अंत नहीं है। यह जन मुट्ठी तानकर सड़क पर उतरता है, व्यवस्था को ललकारता है-किन्तु इतना याद रखो/ जिस रोज इन्कार कर दिया/दीया बनने से मेरे जिस्म ने/अँधेरे में खो जायोगे/हमेशा-हमेशा के लिये,’’ तो यह तंत्र उसे कुचलने के लिए नृशंसता की हर हद से गुजर जाता है. लेकिन सदियों का संतापकविता में वाल्मीकि कहते हैं कि दुश्मन के खिलाफ इस चीख को जिन्दा रखना है, क्योंकि भयानक त्रासदी के युग का खात्मा होने के इन्तजार में हमने हजारों वर्ष बिता दिये, अब और नहीं-दोस्तों, इस चीख को जगाकर पूछो/कि अभी और कितने दिन/इसी तरह गुमसुम रहकर/सदियों का संताप सहना है?”

    तब तुम क्या करोगे?’ इस संग्रह की सबसे चर्चित कविता है, जिसमे कवि ने दर्द और आक्रोश को व्यक्त करने की अपनी अलग ही प्रश्नात्मक शैली ईजाद की है। यह शैली इतनी लोकप्रिय हुई कि इससे प्रभावित होकर कितनी ही दलित कविताएँ लिखी गयीं। मेरी कविता तब तुम्हारी निष्ठा क्या होती?’ की शैली भी इसी कविता से ली गयी है। वाल्मीकि ने इस कविता में उन लोगों की चेतना को झकझोरा है, जो दलितों के प्रति पूरी तरह संवेदना-विहीन हैं। ऐसे ही लोगों से वे सवाल करते हैं-यदि तुम्हें, मरे जानवर को खींचकर/ले जाने के लिए कहा जाये/और, कहा जाय ढोने को/पूरे परिवार का मैला/पहनने को दी जाय उतरन/तब तुम क्या करोगे?/यदि तुम्हें/रहने को दिया जाय/फूंस का कच्चा घर/वक्त-बे-वक्त फूंककर जिसे/स्वाह कर दिया जाय/बरसात की रातों में/ घुटने-घुटने पानी में/सोने को कहा जाय,/तब तुम क्या करोगे?” यह लम्बी कविता है, जिसमे दलित जीवन का वह यथार्थ भद्र वर्ग के सामने रखा गया है, जिसे वह देखना तक पसंद नहीं करता। इसलिए अंत में कवि कहता है-साफ-सुथरा रंग तुम्हारा/झुलसकर सांवला पड़ जायेगा/खो जायेगा आँखों का सलोनापन/तब तुम कागज पर/नहीं लिख पाओगे/सत्यम, शिवम, सुन्दरम।

हालांकि ओमप्रकाश वाल्मीकि को सबसे ज्यादा सफलता उनकी आत्मकथा जूठनसे मिली, पर सच यह है कि उनकी अनुभूतियों का सर्वाधिक विस्तार उनकी कहानियों में हुआ है. उन्होंने नयी कहानी के दौर में दलित कहानी की रचना करके नयी कहानी के अलमबरदारों को यह बताया कि नयी कहानी में व्यक्ति की अपेक्षा समाज तो अस्तित्व में है, पर दलित समाज उसमें भी मौजूद नहीं है. सलाम, पच्चीस चैका डेढ़ सौ, रिहाई, सपना, बैल की खाल, गो-हत्या, ग्रहण, जिनावर, अम्मा, खानाबदोश, कुचक्र, घुसपैठिये, प्रोमोशन, हत्यारे, मैं ब्राह्मण नहीं हूँ और कूड़ाघर जैसी कहानियों ने यह बताया कि यथार्थ में नयी कहानी वह नहीं है, जिसे राजेन्द्र यादव और कमलेश्वर लिख रहे थे, बल्कि वह है जिसमे हाशिये का समाज अपने सवालों के साथ मौजूद है.

                वाल्मीकि की जिस एक कहानी पर सबसे ज्यादा विवाद हुआ, वह शवयात्राहै. यह विवाद वाल्मीकि-जाटव-विवाद बन गया था. पर यह विवाद जिन्होंने भी खड़ा किया, उन्होंने वाल्मीकि को ही सही साबित किया। जातीय भेदभाव सिर्फ दलित और सवर्ण के बीच की व्यवस्था नहीं है, वरन् यह हर वर्ग और समाज में मौजूद है। शवयात्राके जरिए कुछ लेखकों ने उनपर यह आरोप लगाने की कोशिश की कि वाल्मीकि जाटव-विरोध की नयी इबारत लिख रहे हैं। पर ऐसा नहीं है। उनकी सलामकहानी देखिए, जिसमें वे गाॅंव में वाल्मीकि समाज में प्रचलित सलाम की रस्म को तोड़ते हैं। इस रस्म में शादी के बाद दुल्हा या दुल्हन को सवर्ण-घरों में सलाम करने के लिये जाना होता था। यह दलित के स्वाभिमान को कुचलने वाली रस्म थी। इस कहानी में नायक हरीश, जो दूल्हा भी है, इस रस्म के खिलाफ आवाज उठाता है और उसे तोड़ता है। पर अन्त में इसी कहानी में वह वाल्मीकि समाज का अन्तर्विरोध भी दिखाते है, जिसमें वाल्मीकि जाति का ही एक बालक उस शादी में मुसलमान के हाथ की बनी रोटी खाने से मना कर देता है। बालक का बाप उसे यह समझाता है कि रोटी बनाने वाला मुसलमान नहीं है, हिन्दू है। ओमप्रकाश वाल्मीकि चाहते तो उसके मुॅंह से यह कहलवा सकते थे कि रोटी हिन्दू-मुसलमान की नहीं होती, आटे की होती है। वे इस प्रसंग को निकाल भी सकते थे, क्योंकि इससे कहानी कमजोर हो गयी है, पर उन्होंने न यह प्रसंग निकाला और न बालक के बाप के मुॅंह में काल्पनिक शब्द डलवाये, आलोचना बरदाश्त कर ली।

                निस्सन्देह ओमप्रकाश वाल्मीकि ने दलित साहित्य को उस ऊॅंचाई पर पहुॅंचाया है, जहाॅं से वह मुख्यधारा के साहित्य का भी मार्ग-प्रशस्त करता है।

(शिमला, 13 अपे्रल 2014)