मंगलवार, 21 मई 2013


मगहर का ‘दलित बचपन’ विशेषांक
कँवल भारती
प्रतिरोध, परिवर्तन और प्रगति की अनियतकालीन पत्रिका ‘मगहर’ का 432 पृष्ठों का ‘दलित बचपन’ विशेषांक दो कारणों से अत्यन्त महत्वपूर्ण है. एक, इसको पढ़ना सर्वथा नये अनुभवों से गुजरना है और दो, यह दलित साहित्य में संभवतः पहला काम है, जो मुकेश मानस की सम्पादकीय क्षमता से दस्तावेजी बन गया है. इस समय हिन्दी में लगभग पचास से भी ज्यादा पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन हो रहा है, पर अगर यह गणना की जाय कि ऐसी कितनी पत्रिकाएँ हैं, जिनका चिंतन और विमर्श में उल्लेखनीय काम है, और जिसका कोई अंक संजोकर रखने लायक निकला हो, तो शायद हमारी गिनती एक हाथ की अँगुलियों तक भी न पहुँच पाये. ‘मगहर’ नयी पत्रिका है और कुल जमा छह अंक ही अभी उसके निकले हैं. पर पहले अंक से ही वह दलित विमर्श को एक नयी धार देने के लिए जानी जायगी. ‘दलित बचपन’ विशेषांक उसका पांचवां अंक है, जो पहली बार एक अनछुए पहलू पर पूरी टीम वर्क के साथ निकाला गया है. यही कारण है कि यह विशेषांक हमे इतने व्यापक स्तर पर दलित लेखकों के बचपन से रू-ब-रू कराता है.
      बहुत से लेखकों ने अपने बचपन की मधुरता के रोचक किस्से बयान किये हैं. मधुर बचपन पर सुभद्राकुमारी चौहान की कविता प्रसिद्ध ही है. पर दलित लेखकों के बचपन इतने मधुर नहीं हैं कि उन्हें वे बार-बार याद करें. उनके बचपन तो भूख, गरीबी और अभावों की दुनिया के काले चित्र हैं. वे कहीं से भी सुन्दर नहीं लगते. पर बड़ा सवाल यह है कि उनके बचपन की दुनिया इतनी काली क्यों हैं? उनके लिए उस भयानक काली दुनिया का निर्माण किसने किया? अगर दुनिया का निर्माता ईश्वर है, तो वह बहुत अन्यायी और क्रूर ईश्वर है, जिसने दलितों के लिए काली और भयानक दुनिया बनाई.
      ‘मगहर’ का ‘दलित बचपन’ विशेषांक दलित जीवन की इसी काली दुनिया से हमारा साक्षातकार कराता है. इस अंक की एक खासियत यह भी है कि इसमें हिन्दी के साथ-साथ दूसरी भाषाओँ के दलित लेखकों के बचपन के चित्र भी दिए गए हैं. रविंदर कौर का लेख ‘गुरुवां दे दर्शन बारो ही कर लेंणा’ उनके बचपन के संघर्ष को तो हमारे सामने रखता ही है, यह भी बताता है कि गुरुओं की धरती पंजाब में भी दलितो की दुनिया आज़ादी की दुनिया नहीं है.
मेरे लिए तो यह चित्र नए नहीं हैं, पर उन तमाम लोगों को यह विशेषांक जरूर पढ़ना चाहिए, जो, यह सवाल उठाते हैं कि गैर दलित लेखक दलित साहित्य क्यों नहीं लिख सकते?
21 मई 2013  
      

शनिवार, 18 मई 2013


बौद्धधर्म और दलित
(कँवल भारती)
      इतिहास के लेखन में इतिहास-लेखक के भीतर भी एक इतिहास चलता रहता है और इतिहास-लेखक की हरगिज यह कोशिश रहती है कि वह इतिहास को अपने हिसाब से चलाये. कहना न होगा कि हमारे बहुत से इतिहास लेखकों ने यही किया है. इतिहास में बहुत सारे सवालों के जवाब नहीं मिलते, जिसकी पूर्ति इतिहास-लेखकों ने काल्पनिक तथ्यों से करने की कोशिश की है. परिणाम यह हुआ कि काल्पनिक तथ्यों ने शोध की स्वाभाविक गति को अवरुद्ध कर दिया. यह गलती किसी एकाध इतिहास-लेखक ने नहीं की है, वरन लगभग सभी इतिहासकारों ने की है. कहा जाता है कि उर्दू-पर्सियन में यह गलती सबसे कम हुई है, यह हो सकता है, मैं उर्दू-पर्सियन इतिहास से वाकिफ नहीं हूँ. मगर यह सच है कि यह गलती सबसे ज्यादा हिंदी में हुई है.
       इस लेख में मेरा फोकस दलित के सन्दर्भ में बौद्धधर्म के इतिहास पर है. मेरी तीन किताबें---(१)‘दलितधर्म की अवधारणा और बौद्धधर्म’, (२) ‘संत रैदास : एक विश्लेषण’, और (३) ‘आजीवक परंपरा और कबीर’--- इसी इतिहास की खोज पर हैं. इन तीनों किताबों में मेरे बहुत से निष्कर्ष अनुमान पर आधारित हैं, यह मैं स्वीकार करता हूँ. इसका कारण है, जिस दिन डा. बाबासाहेब आंबेडकर ने बौद्धधर्म ग्रहण किया, उसी दिन से बौद्धधर्म दलितों का धर्म बन गया और दलितों में बौद्धधर्म के इतिहास का लेखन भावुकता का शिकार हो गया. इसका परिणाम यह हुआ कि वर्णव्यवस्था के विरोध की हर धारा बुद्ध से जुड़ गयी. जहाँ कड़ियाँ नहीं मिलती या जुड़ती थीं, वहाँ कल्पना ने तथ्य खड़े कर दिए. कुछ मामलों में और कुछ सीमा तक कल्पना की भूमिका महत्वपूर्ण भी होती है. इसके बिना काम नहीं चल सकता. लेकिन इसके बावजूद दलित के सन्दर्भ में बौद्धधर्म को लेकर कुछ सवालों के जवाब अभी भी नहीं मिलते, वे अनसुलझे ही रह गए हैं. मिसाल के तौर पर मैंने ‘दलितधर्म की अवधारणा और बौद्धधर्म’ में यह सवाल उठाया है कि अगर डा. आंबेडकर ने बौद्धधर्म न अपनाकर इस्लाम या ईसाईयत को अपनाया होता, तो क्या तब भी दलित उसी जूनून के साथ मुस्लिम या ईसाई बनते, जिस जूनून से बौद्ध बने और बन रहे हैं? इसका जवाब इस कल्पना के साथ देने की कोशिश की गयी है कि जो जूनून बौद्धधर्म के साथ दलितों का है, वह इस्लाम या ईसाईयत के साथ इसलिए नहीं हो सकता, क्योंकि बौद्धधर्म दलित चिंतन-परम्परा से जुड़ा है, इस्लाम और ईसाईयत नहीं जुड़ा है. अब सवाल यह विचारणीय है कि बौद्धधर्म दलित चिंतन-परम्परा से किस आधार पर जुड़ा है? यही वह गुत्थी है, जो अनसुलझी है.
       डा. आंबेडकर ने बौद्ध परम्परा की खोज में इस कल्पना का सहारा लिया है कि दलित (अछूत जातियां) एक समय बौद्ध थीं, जो गोमांस खाती थीं, इसी आधार पर ब्राह्मणों ने उनका सामाजिक बहिष्कार किया और उन्हें अस्पृश्य घोषित किया. इस सम्बन्ध में एक महत्वपूर्ण शोध-कार्य, डा. विलक्षण रविदास ने किया है, जो ‘अछूत जातियां और बौद्धधर्म’ नाम से अभी हाल में (2009) में प्रकाशित हुआ है. उन्होंने डा. आंबेडकर की कल्पना का खंडन किया है. उनके अनुसार अछूत जनजातीय कबीलों के लोग थे, जो गाँव के बाहर रहते थे. उनका धर्म और दर्शन वैदिक धर्म-दर्शन से भिन्न था, जो ईश्वर और परलोक को नहीं मानता था. इसी आधार पर ब्राह्मणों ने उनका बहिष्कार किया था और उन्हें अछूत घोषित किया था. ये आजीवक, चार्वाक और लोकायतिक परम्परा में आते थे. (पृष्ठ 46-47 और 57-58) यहाँ तक सब ठीक है, अनीश्वरवाद और अनात्मवाद के अपने दर्शन की वजह से बुद्ध इस परम्परा से जुड़ भी जाते हैं. लेकिन डा. रविदास ने यहाँ एक और सवाल उठाया है कि ‘प्राचीन भारत में अस्पृश्यता का उन्मूलन बौद्धधर्म द्वारा क्यों नहीं किया जा सका?’ सवाल महत्वपूर्ण है. जब बुद्ध वर्णव्यस्था और जातिभेद के विरोधी थे, और उनके द्वार सबके लिए खुले थे, तो अस्पृश्यता को मिट जाना चाहिए था. अगर बुद्ध के समय में नहीं, तो बौद्ध राजाओं के काल में उसे जरूर मिट जाना चाहिए था. लेकिन न अस्पृश्यता का उन्मूलन हुआ और न जाति-मुक्त समाज बन सका. इस सवाल का जवाब डा. रविदास भी नहीं दे सके हैं कि ऐसा क्योंकर नहीं हो सका? वे इसके जवाब में केवल बुद्ध के धार्मिक सिद्धांतों की व्याख्या में ही उलझ कर रह गए हैं. इसी क्रम में वे एक जगह लिखते हैं- ‘बौद्ध धर्म द्वारा अस्पृश्यता के विरुद्ध किये गए व्यावहारिक प्रयास बड़े ही मौलिक और महत्वपूर्ण थे. ...(उसने) इस अमानवीय नियम एवं व्यवस्था का सिर्फ वैचारिक स्तर पर ही विरोध नहीं किया, वरन अपने धर्म और संघ का द्वार अछूत जातियों के लिए भी खुला रखा’. वे यहाँ तक कहते हैं- ‘बुद्ध संघ और धर्म में अछूत जातियों के लोगों को भिक्षु बना कर बौद्धधर्म ने न सिर्फ अछूतों के ज्ञान, अध्यात्म एवं जीवन के विकास का एक रास्ता दिया, बल्कि उन्हें स्पृश्य जातियों के बीच स्पृश्य और श्रेष्ठ बनाकर भेजा, जो उन्हें अछूत मानते थे, हीन और नीच कहते थे’. (पृष्ठ 146-47)
       इससे बिलकुल इंकार नहीं है कि बुद्ध ने अछूत जातियों के लोगों को अपने संघ में दीक्षित किया था, पर मूल सवाल तो अभी भी अपनी जगह है कि जाति-व्यवस्था और अस्पृश्यता का उन्मूलन क्यों नहीं हो सका? यदि बौद्धधर्म सामाजिक क्रान्ति की एक बड़ी घटना थी, जो वास्तव में थी भी, तो अछूत जातियां उस क्रान्ति से अछूती क्यों रहीं? वह क्रान्ति उन् तक क्यों नहीं पहुंची? मैंने अपनी किताब ‘संत रैदास : एक विश्लेषण’ में कबीर-रैदास आदि दलित संतों को बौद्ध परम्परा से जोड़ने के लिए एक ऐतिहासिक तथ्य की कल्पना की है. हाँ, वह एक कल्पना ही है, पर असंभावित नहीं है. मैंने लिखा है कि बौद्धधर्म के पतन के बाद बहुत से बौद्ध भिक्षु, जो विदेश नहीं भाग सके थे, गृहस्थ बनकर दलित बस्तियों में जाकर रहने लगे थे, क्योंकि वहीँ उन्हें शरण मिल सकती थी. वहीँ उन्होंने शादियाँ कर लीं और फिर वे वहीँ के होकर रह गए. पीढ़ियाँ गुजर गयीं, बुद्ध तो खत्म हो गए, पर उनकी विचारधारा बची रह गयी. इन्हीं पीढ़ियों में कबीर और रैदास जैसे क्रान्तिकारी कवि हुए. यह कल्पना ही है और इसकी ऐतिहासिकता पर सवाल उठाया जा सकता है, क्योंकि इस कल्पना से भी हमें अपने मूल सवाल का जवाब नहीं मिलता कि अछूत जातियां बौद्ध क्रान्ति से अछूती क्यों रहीं?
डा. विलक्षण रविदास तो इस सवाल का जवाब ही नहीं दे सके हैं. वे सत्य के करीब से गुजर कर भी वहाँ से भटक गए हैं. वे अन्त तक बुद्ध के धर्म और दर्शन में दलित और पीड़ित जनों के लिए मुक्ति की किरण ही देखते रह गए हैं, जबकि यह दर्शन का सवाल ही नहीं है. उन्होंने एच. ओल्डन वर्ग का भी खंडन किया है, जिन्होंने सही सवाल उठाया है कि बौद्धधर्म पर ब्राह्मणों और कुलीनों का प्रभाव था, जिन्होंने निर्धन और अभागे (अछूत) लोगों की उपेक्षा की थी. अगर बौद्धधर्म ने दलितों को आकर्षित किया था, तो कम-से-कम उन् क्षेत्रों के दलित तो बुद्ध की शरण में चले ही जाते, और पूरे उत्साह से झुण्ड के झुण्ड जाते, जहां बुद्ध ने चारिका (धर्मोपदेश) करते हुए चालीस साल बिताए थे. इस तरह पूरे बिहार और पूर्बी उत्तर प्रदेश में वह दलित क्रान्ति, जो 1956 में डा. बाबासाहेब आंबेडकर ने की थी, ढाई हजार वर्ष पहले बुद्ध के समय में ही हो गयी होती. यह क्रान्ति अगर नहीं हुई, तो इसके दो ही कारण हैं. या तो बौद्धधर्म ने दलितों को आकर्षित नहीं किया या बुद्ध के ब्राह्मण और कुलीन शिष्यों ने उन्हें ‘धम्म’ में घुसने नहीं दिया. सम्भावनाएं दोनों ही हो सकती हैं.
       इस सन्दर्भ में सबसे आधारभूत सवाल यह विचारणीय है कि जिस ब्राह्मणवाद ने बौद्धधर्म के मठ, विहार, स्तूप और ग्रन्थ नष्ट कर दिए और उसे भारत से निर्वासित कर दिया, वह ब्राह्मणवाद कबीर और रैदास को क्यों नहीं उखाड़ सका? इस सवाल का जवाब यही हो सकता है कि बौद्धधर्म की जड़ें दलित जातियों में नहीं थीं, जबकि कबीर और रैदास के पीछे उनका विशाल जन-समूह खड़ा था, वहाँ उनकी गहरी जड़ें थीं. आज यदि दलित जातियों में बौद्धधर्म प्रतिष्ठित हुआ है, तो यह फल तो डा. आंबेडकर की क्रान्ति का ही है.
(16 मई 2013)

सोमवार, 29 अक्टूबर 2012


वाल्मीकि जयंती  और दलित मुक्ति का प्रश्न 

कँवल भारती

      आज वाल्मीकि जयंती है. सरकार ने आज की छुट्टी घोषित की है. अगर यह छुट्टी रामायण के रचयिता आदि कवि वाल्मीकि के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए होती, तो यह एक अलग प्रश्न होता. तब वेदों, गीता, महाभारत के रचयिताओं के नाम की छुट्टियों का प्रश्न भी पैदा होता. लेकिन ऐसा नहीं है. यह छुट्टी सरकार ने सफाई कर्मचारियों को ध्यान में रख कर घोषित की है. अब सवाल यह विचारणीय है कि वाल्मीकि का सफाई कर्मचारियों से क्या सम्बन्ध बनता है? वाल्मीकि मंचों से भी इस दिन छुआछूत और दलित मुक्ति पर चर्चा होती है. पर क्यों? यह प्रश्न मुझे बहुत परेशान करता है. मैंने इस विषय में बहुत मंथन किया, बहुत अध्ययन किया और बहुत सोचा, पर मेरा समाधान नहीं हुआ. आज भी यह सवाल अनसुलझा ही है कि दलित मुक्ति से वाल्मीकि का क्या संबंध है? वाल्मीकि ब्राहमण थे,यह बात रामायण ही हमें बताती है. वाल्मीकि ने कठोर तपस्या की, यह भी पता चलता है. दलित परम्परा में तपस्या की अवधारणा ही नहीं है. यह वैदिक परम्परा की अवधारणा  है. इसी वैदिक परम्परा से वाल्मीकि आते हैं. वाल्मीकि का आश्रम भी वैदिक परम्परा का गुरुकुल है, जिसमें ब्राह्मण और  राजपरिवारों के बच्चे विद्या अर्जन करते हैं. ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिलता कि वाल्मीकि ने शूद्रों को शिक्षा दी हो. अछूत जातियों की या सफाई कार्य से जुड़े लोगों की मुक्ति के संबंध में भी उनके किसी आन्दोलन का पता नहीं चलता. फिर वाल्मीकि सफाई कर्मचारयों के  भगवान  कैसे हो गए?
       जब हम इतिहास का अवलोकन करते हें, तो १९२५ से पहले हमें वाल्मीकि शब्द नहीं मिलता.  सफाई कर्मचारियों  और चूह्डों को हिंदू फोल्ड में बनाये रखने केउद्देश्य से उन्हें वाल्मीकि से जोड़ने और वाल्मीकि नाम देने की योजना बीस के दशक में आर्य समाज ने  बनाई थी. इस काम को जिस आर्य समाजी पंडित ने अंजाम दिया था, उसका नाम अमीचंद शर्मा था। यह वही समय है, जब पूरे देश में दलित मुक्ति के आन्दोलन चल रहे थे. महाराष्ट्र में डा. आंबेडकर का हिंदू व्यवस्था के खिलाफ सत्याग्रह,  उत्तर भारत में स्वामी अछूतानन्द का आदि हिंदू आन्दोलन और पंजाब में मंगूराम मूंगोवालिया का आदधर्म आन्दोलन उस समय अपने चरम पर थे. पंजाब में दलित जातियां बहुत तेजी से आदधर्म स्वीकार कर रही थीं. आर्य समाज ने इसी क्रांति को रोकने के लिए अमीचंद शर्मा को काम पर लगाया. योजना के तहत अमीचंद शर्मा ने सफाई कर्मचारियों के महल्लों में आना-जाना शुरू किया. उनकी कुछ समस्याओं को लेकर काम करना शुरू किया. शीघ्र ही वह उनके बीच घुल-मिल गया और उनका नेता बन गया. उसने उन्हें डा. आंबेडकर, अछूतानन्द और मंगूराम के आंदोलनों के खिलाफ भडकाना शुरू किया. वे अनपढ़ और गरीब लोग उसके जाल में फंस गए. १९२५ में अमीचंद शर्मा ने 'श्री वाल्मीकि प्रकाश' नाम की किताब लिखी, जिसमें उसने वाल्मीकि को उनका गुरु बताया और उन्हें वाल्मीकि का धर्म अपनाने को कहा. उसने उनके सामने वाल्मीकि धर्म की रूपरेखा भी रखी. आंबेडकर, अछूतानन्द और मंगूराम के आन्दोलन दलित जातियों को गंदे पेशे छोड़ कर स्वाभिमान के साथ साफ-सुथरे पेशे अपनाने को कहते थे. इन आंदोलनों के प्रभाव में आकार तमाम दलित जातियां गंदे पेशे छोड़ रही थीं. इस परिवर्तन से हिंदू बहुत परेशान थे. उनकी चिंता यह थी कि अगर सफाई करने वाले दलितों ने मैला उठाने का काम छोड़ दिया, तो हिंदुओं के घर नर्क बन जायेंगे. इसलिए अमीचंद शर्मा ने वाल्मीकि धर्म खड़ा करके सफाई कर्मी समुदाय को 'वाल्मीकि समुदाय' बना दिया. उसने उन्हें दो बातें समझायीं। पहली यह कि हमेशा हिन्दू धर्म की जय मनाओ, और दूसरी यह कि यदि वे हिंदुओं की सेवा करना छोड़ देंगे, तो न् उनके पास धन आएगा और न् ज्ञान आ पा पायेगा.
      अमीचंद शर्मा का षड्यंत्र कितना सफल हुआ, यह आज हम सबके सामने है.आदिकवि वाल्मीकि के नाम से सफाई कर्मी समाज वाल्मीकि समुदाय के रूप में पूरी तरह स्थापित हो चुका है. 'वाल्मीकि धर्म 'के संगठन पंजाब से निकल कर पूरे उत्तर भारत में खड़े हो गए हैं. वाल्मीकि धर्म के अनुयायी वाल्मीकि की माला और लोकेट पहनते हैं. इनके अपने धर्माचार्य हैं, जो बाकायदा प्रवचन देते हैं और कर्मकांड कराते हैं. ये वाल्मीकि जयंती को प्रगटदिवस कहते हैं. इनकी मान्यता है कि वाल्मीकि भगवान हैं, उनका जन्म नहीं हुआ था, वे कमल के फूल पर प्रगट हुए थे, वे सृष्टि के रचयिता भी हैं और उन्होने रामायण की रचना राम के जन्म से भी चार हजार साल पहले ही अपनी कल्पना से लिख दी थी.

२९ अक्टूबर २०१२

रविवार, 28 अक्टूबर 2012

सवाल प्रतिनिधित्व का है, आरक्षण का नहीं 

कँवल भारती

      नामवर सिंह ने गत दिनों दस किताबों का विमोचन किया। उनमें एक किताब दलित लेखक अजय नावरिया की थी। दसों किताबें सवर्णों की होनी चाहिए थीं। उनमें एक दलित कैसे घुस गया? प्रकाशक की यह मजाल कि वह  सवर्णों  की जमात में दलित को खड़ा कर दे! बस नामवर सिंह का पारा चढ़ गया। वह जितना गरिया सकते थे, उन्होंने दलित को गरियाया। फिर उन्होंने  फतवा दिया कि अगर साहित्य में लेखकों को आरक्षण मिलने लगे तो वह राजनीति की तरह गंदा हो जाएगा। कोई दलित के नाम पर पागल हो चुके इस छद्म वामपंथी से यह पूछे कि अगर सवर्ण इतने ही साफ़ सुथरे थे, तो भारत दो हजार वर्षों तक गुलाम क्यों बना? आज जब दलित लेखक तुम्हारे साहित्य, धर्म और संस्कृति की बखिया उधेड़ रहे हैं, तो तुम्हे यह गन्दा लग रहा है। आज दलित के मुहं में जुबान आ गयी है, अपनी बात कहने के लिए, तो नामवर सिंह को यह गंदगी दिखाई दे रही है। सामन्तवाद की जुगाली करने वाला यह छद्म प्रगतिशील कह रहा है कि साहित्य में आरक्षण देने से राजनीति की तरह साहित्य भी गन्दा हो जायेगा। यह घोर दलित विरोधी बयान ही नहीं है, लोकतंत्र विरोधी बयान भी है। यह राजशाही का समर्थन करने वाला बयान है, जिसमें शूद्रों और दलितों के लिए गुलामी के सिवा कोई अधिकार नहीं थे। ऐसा लगता है कि नामवर सिंह ने इतिहास नहीं पढ़ा है। अगर पढ़ा होता तो उन्हें मालूम होता कि भारत की राजनैतिक सत्ता ब्रिटिश ने कांग्रेस को सौपी थी, न कि दलितों को। चार दशकों तक भारत पर कांग्रेस ने राज किया, जो ब्राह्मणों, सामन्तों और पूंजीपतियों की पार्टी थी। फिर नामवर सिंह बताएं कि राजनीति को किसने गन्दा किया? क्या कांग्रेस में दलितों की चलती थी? दलित तो कांग्रेस में यसमैन थे। वे न नीति निर्माता थे और न फैसला लेने वाले। तब जाहिर है कि राजनीति को गन्दा करने वाले लोग ब्राह्मण, ठाकुर और बनिया हैं। पिछले दस सालों में भ्रष्टाचार के जितने भी घोटाले हुए हैं, उनके करने वाले सब के सब सवर्ण हैं। हाँ, कुछ दलित भी जरूर भ्रष्ट हुए हैं, पर उन्होंने सिर्फ भ्रष्ट व्यवस्था का लाभ उठाया है। दलित नेता चाहे मायावती हों, चाहे मुलायम सिंह, वे व्यवस्था के निर्माता नहीं हैं, सिर्फ लाभार्थी हैं।
      नामवर सिंह किस आरक्षण की बात कर रहे हैं? ऐसा लगता है कि उन्हें आरक्षण फोबिया हो गया है। क्या वह कोई उदाहरण दे सकते हैं कि कब दलित लेखकों ने साहित्य में आरक्षण की मांग की है? दलितों ने नौकरियों में आरक्षण की मांग की है, जो उनका संवैधानिक अधिकार है। इस अधिकार के तहत कुछ दलित विश्वविद्यालयों में नौकरी पा गये हैं। संयोग से वे लेखक भी हैं। अजय नावरिया भी जामिया मिलिया में प्रोफेसर हैं। नामवर सिंह को यही आरक्षण हजम नहीं हो रहा है। साहित्य तो सिर्फ बहाना है। जिन विश्वविद्यालयों में द्विजों का राज था, उनमें दलित उन्हें बर्दाश्त नहीं हो रहा है। कल्पना कीजिये, जब विश्वविद्यालयों में मुट्ठी भर दलितों का यह प्रताप है कि देश के सारे विश्वविद्यालयों में दलित साहित्य पढ़ाया जाने लगा है, तो पचास-साठ साल बाद क्या हाल होगा, जब विश्वविद्यालयों में दलितों का भरपूर प्रतिनिधित्व होगा? दरअसल नामवर सिंह इसीको गंदगी कह रहे हैं। इन सामंतों को कैसे समझाया जाए कि जिसे वो आरक्षण कह रहे हैं, वो प्रतिनिधित्व है। दलित आरक्षण नहीं, अपना प्रतिनिधित्व चाहते हैं। साहित्य में भी दलित लेखक प्रतिनिधित्व की बात करते हैं। अगर नामवर सिंह चाहते हैं कि साहित्य में द्विजों का ही प्रतिनिधित्व बना रहे, तो ऐसा साहित्य अलोकतांत्रिक और वर्णवादी ही होगा। और ऐसा साहित्य आज नहीं तो कल, कूड़ा घर में ही पड़ा होगा।    


28 अक्टूबर 2012 
       









मंगलवार, 16 अक्टूबर 2012


मलाला तुम मर नहीं सकतीं 
कँवल भारती 


तालिबान तुम से  डर गया मलाला 
तुम्हारी तहरीक ने तालिबान को परास्त कर दिया
तुमने इस्लाम को बचा लिया। 
तुम इस्लाम की अप्रितम योद्धा हो 
तुम नहीं मर सकतीं मलाला 
तुम पाक के मुस्लिम इतिहास में हमेशा जीवित रहोगी 
जैसे भारत के हिन्दू इतिहास में शम्बूक जीवित है। 
तुमने तालिबान की वर्ण व्यवस्था को ललकारा है, 
जो ख्वातीन की शिक्षा पर पाबन्दी लगाती है, ठीक उसी तरह 
जैसे शम्बूक ने ललकारा था रामराज्य की वर्ण व्यवस्था को,
जिसमें शूद्रों की शिक्षा पर पाबन्दी थी। 
तालिबान भयभीत था कि अगर लड़कियां पढ़ गयीं, 
तो मुस्लिम समाज बेदार हो जायेगा 
जिसे वह चाहता था अँधेरे में रखना। 
ठीक ऐसे ही रामराज्य  का ब्राह्मण भयभीत था कि अगर शूद्र पढ़ गये, 
तो उसमें ज्ञानोदय हो जायेगा और वह गुलामी छोड़ देगा। 
तुम जानती हो मलाला,
जो तुमने किया वही शम्बूक ने किया था।
तुमने नहीं माना तालिबान के फरमान को, 
और स्कूल जा कर उलट दी  उसकी व्यवस्था
ऐसे ही  शम्बूक ने उलट दी थी
स्थापित कर देह की भौतिक व्यवस्था।
तिलमिलाया था ब्राह्मण, 
जैसे तालिबान तिलमिलाया तुम से।
शम्बूक ने की थी रामराज्य में बगावत 
जैसे तुमने की तालिबान के राज से बगावत। 
तुम खतरा बन गयीं थीं तालिबान की सत्ता  के लिए, 
ऐसे ही शम्बूक बन गया था ब्राह्मण की सत्ता के लिए खतरा।
ब्राह्मण की सत्ता बचाने के लिए
राम को मारना पड़ा था शम्बूक को,
जैसे तालिबान को तुम्हे मारना पड़ा
अपनी सत्ता बचाने के लिए। 
लेकिन तुम मरोगी नहीं मलाला,
मरेगा तालिबान।
तुमने झकझोर दिया है कोमा में पड़े पाकिस्तान को 
जगा दिया औरतों को, 
जागृत हो तुम अब हर मुसलमान लड़की में।
जैसे शम्बूक अब हर शूद्र में जागृत है
अस्मिता और स्वाभिमान के रूप में। 
तुम भी मलाला हमेशा जीवित रहोगी 
मुस्लिम लड़कियों में अस्मिता और स्वाभिमान की 
मशाल बन कर।
                  
                                           कँवल भारती